रैट-होल माइनिंग (Rat-Hole Mining) : कारण और प्रभाव

रैट-होल माइनिंग (Rat-Hole Mining) : कारण और प्रभाव

रैट-होल माइनिंग (Rat-Hole Mining): कारण और प्रभाव

सामान्य अध्ययन-3 : पर्यावरण और पारिस्थितिकी और जैव विविधता

चर्चा में क्यों?

हाल ही में मेघालय के पूर्वी जयंतिया हिल्स में एक अवैध रैट-होल कोयला खदान में हुए विस्फोट के कारण कम-से-कम 18 श्रमिकों की मौत हो गई। इस त्रासदी ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद इस अवैध और असुरक्षित प्रथा की निरंतरता को एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

रैट-होल माइनिंग क्या है?

परिभाषा: यह कोयला उत्खनन की एक प्राचीन, आदिम और जोखिम भरी तकनीक है, जिसमें कोयले की पतली परतों तक पहुँचने के लिए पहाड़ियों में बहुत संकीर्ण सुरंगें खोदी जाती हैं।
• विशेषताएँ: ये सुरंगें आमतौर पर केवल 3-4 फीट ऊँची होती हैं, जिससे खनिकों को रेंगते हुए या बैठकर काम करना पड़ता है। इनमें वैज्ञानिक योजना, वेंटिलेशन (वायु-संचार) या संरचनात्मक सहारे का पूर्ण अभाव होता है।
• भौगोलिक प्रसार: यह मुख्य रूप से मेघालय में प्रचलित है, हालांकि पूर्वोत्तर भारत के अन्य राज्यों से भी इसके प्रमाण मिलते हैं।

प्रकार: साइड-कटिंग बनाम बॉक्स-कटिंग रैट-होल माइनिंग के दो प्रमुख तरीके हैं:

• साइड-कटिंग (Side-cutting): इसमें पहाड़ियों की ढलानों पर दिखाई देने वाली कोयला परतों का अनुसरण करते हुए क्षैतिज (horizontal) सुरंगें खोदी जाती हैं।
• बॉक्स-कटिंग (Box-cutting): इसमें पहले एक गहरा ऊर्ध्वाधर (vertical) गड्ढा खोदा जाता है, और फिर उसके तल से चारों दिशाओं में ‘ऑक्टोपस की भुजाओं’ की भाँति अनेक संकीर्ण क्षैतिज सुरंगें निकाली जाती हैं।

 विधिक स्थिति : 

• NGT प्रतिबंध (2014): राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने इसे ‘अवैज्ञानिक और अवैध’ बताते हुए इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था।
सर्वोच्च न्यायालय: शीर्ष अदालत ने NGT के इस प्रतिबंध को बरकरार रखा है।
• MMDR अधिनियम, 1957: वर्तमान में ऐसी सभी गतिविधियाँ खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 का उल्लंघन मानी जाती हैं।

 इसके बने रहने के कारण

• भूवैज्ञानिक: मेघालय में कोयले की परतें अत्यंत पतली (2 मीटर से कम) हैं, जिससे बड़े पैमाने पर ओपन-कास्ट खनन आर्थिक रूप से महंगा और अव्यवहारिक हो जाता है।
• आर्थिक व आजीविका: क्षेत्र में औद्योगिक विकास की कमी के कारण यह स्थानीय समुदायों के लिए “त्वरित धन” और आजीविका का एकमात्र साधन बन गया है।
• संस्थागत/प्रशासनिक: खदान मालिकों, स्थानीय अधिकारियों और राजनीतिक प्रभावशाली व्यक्तियों के बीच का गठजोड़ इस व्यापार को जीवित रखता है。
छठी अनुसूची से जुड़ी चुनौतियाँ: यहाँ भूमि और खनिजों का स्वामित्व स्थानीय समुदायों और स्वायत्त ज़िला परिषदों (ADC) के पास होता है, जिससे केंद्र सरकार का पर्यवेक्षण सीमित हो जाता है और राष्ट्रीय कानूनों के प्रवर्तन में बाधा आती है।

प्रमुख चिंताएँ 

• श्रमिक सुरक्षा: ये खदानें “डेथ ट्रैप” हैं जहाँ छत गिरने, अचानक बाढ़ आने और विषैली गैसों से मौत का निरंतर खतरा रहता है।
• बाल श्रम: संकीर्ण सुरंगों के कारण अवैध रूप से बच्चों को नियोजित किया जाता है, जो मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है।

पर्यावरणीय प्रभाव:

◦ एसिड माइन ड्रेनेज (AMD): सल्फरयुक्त खनिजों के जल के संपर्क में आने से सल्फ्यूरिक अम्ल बनता है।
◦ नदी प्रदूषण: कोपिली, मिंतदू और लुखा जैसी नदियाँ इतनी अम्लीय हो गई हैं कि उनमें जलीय जीवन समाप्त हो गया है।
◦ पारिस्थितिक क्षति: बड़े पैमाने पर वनों की कटाई, मृदा अपरदन और वायु प्रदूषण
• स्वास्थ्य प्रभाव: पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के अभाव में खनिक सिलिकोसिस, न्यूमोकोनियोसिस और ‘ब्लैक लंग’ जैसी जानलेवा बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं。

 नियामकीय व प्रवर्तन चुनौतियाँ प्रवर्तन में मुख्य बाधा केंद्र-राज्य-ADC के बीच समन्वय की कमी है। इसके अलावा, मानव संसाधनों की कमी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण MMDR अधिनियम का प्रभावी कार्यान्वयन नहीं हो पाता है।

समाधान व आगे की राह

• तकनीकी निगरानी: अवैध खनन की वास्तविक समय में पहचान हेतु ड्रोन, उपग्रह चित्रण और GIS मैपिंग का उपयोग कर एक केंद्रीय डेटाबेस तैयार किया जाए。
• वैकल्पिक आजीविकाएँ: सरकार को अनन्नास की खेती, ईको-पर्यटन और कृषि-उद्यानिकी को बढ़ावा देना चाहिए ताकि कोयले पर आर्थिक निर्भरता कम हो。
संस्थागत सुधार: एक समर्पित ‘माइनिंग EAC’ कैडर का गठन, जो सीधे NGT को रिपोर्ट करे और स्थानीय दबाव से मुक्त रहे。
पर्यावरण पुनर्स्थापन: MEPRF कोष का उपयोग कर पूर्व खनिकों को “ग्रीन कॉर्प्स” के रूप में पारिस्थितिक बहाली कार्यों में नियोजित किया जाए。
वैज्ञानिक खनन: जहाँ परतें मोटी हों, वहां भूमि एकीकरण के माध्यम से यंत्रीकृत ओपन-कास्ट पद्धति को अपनाया जाए。

निष्कर्ष :

रैट-होल माइनिंग की समस्या का समाधान केवल प्रतिबंधों में नहीं, बल्कि एक दो-आयामी रणनीति में निहित है। हमें सख्त तकनीकी निगरानी के माध्यम से अवैध खनन को रोकना होगा और साथ ही मानव गरिमा सुनिश्चित करने के लिए सतत आजीविका के वैकल्पिक अवसर प्रदान करने होंगे। तभी हम पारिस्थितिक संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन स्थापित कर पाएंगे।

 प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q.रैट-होल माइनिंग (Rat-Hole Mining) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. इसमें पहाड़ी ढलानों में अत्यंत संकरी सुरंगें खोदकर कोयले की पतली परतों का उत्खनन किया जाता है।
  2. यह विधि वैज्ञानिक योजना, पर्याप्त वेंटिलेशन और संरचनात्मक समर्थन पर आधारित होती है।
  3. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने वर्ष 2014 में इसे अवैज्ञानिक एवं असुरक्षित बताते हुए प्रतिबंधित किया था।
  4. यह मुख्यतः मेघालय में प्रचलित रही है, जहाँ कोयले की परतें बहुत पतली पाई जाती हैं।

उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
(a) केवल 1 और 3
(b) केवल 1, 3 और 4
(c) केवल 2 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (b) केवल 1, 3 और 4

 मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q. “रैट-होल माइनिंग एक अवैज्ञानिक खनन पद्धति है, जिसके गंभीर पर्यावरणीय एवं मानव स्वास्थ्य संबंधी दुष्परिणाम हैं।” इस कथन के आलोक में रैट-होल माइनिंग से उत्पन्न पर्यावरणीय तथा मानव स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों पर चर्चा कीजिए।   

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