संसद में आज: सीतारमण कर राहत विधेयक पेश करेंगी, कांग्रेस ने दलबदल कानून पर चर्चा की मांग की

Parliament news LIVE: Sitharaman to introduce taxation bill in Lok Sabha; Congress seeks discussion on defection law — concept mind map

संसद में आज: सीतारमण कर राहत विधेयक पेश करेंगी, कांग्रेस ने दलबदल कानून पर चर्चा की मांग की

✎ दल-बदल कानून राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने हेतु सदस्यों को अयोग्य ठहराता है, जबकि कराधान विधेयक सरकार की वित्तीय नीतियों को लागू करने का माध्यम है, दोनों ही संसदीय लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।

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Dilution of Anti-Defection Law

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय राजव्यवस्था, संसद और राज्य विधानमंडल—संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।  |  GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।
  • Prelims: दल-बदल कानून, दसवीं अनुसूची, अयोग्यता के आधार, अध्यक्ष/सभापति की भूमिका, कराधान विधेयक, वित्त विधेयक, भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम
  • Essay: भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक अवसरवाद और नैतिकता, संसदीय लोकतंत्र में दल-बदल की चुनौतियाँ और समाधान

त्वरित पुनरावृत्ति: दल-बदल कानून राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने हेतु सदस्यों को अयोग्य ठहराता है, जबकि कराधान विधेयक सरकार की वित्तीय नीतियों को लागू करने का माध्यम है, दोनों ही संसदीय लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।

यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में संसद के मानसून सत्र के दौरान, कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने दल-बदल कानून पर चर्चा की मांग करते हुए लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion) का नोटिस दिया। उन्होंने ‘अवसरवाद से प्रेरित सामूहिक राजनीतिक दल-बदल’ पर अंकुश लगाने के लिए एक नए दल-बदल कानून की आवश्यकता पर बल दिया।

पृष्ठभूमि

  • भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) को 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ा गया था, जिसे सामान्यतः दल-बदल विरोधी कानून (Anti-defection Law) के रूप में जाना जाता है।
  • इस कानून का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दल-बदल को रोकना और संसद तथा राज्य विधानसभाओं में राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करना था।
  • यह कानून सदस्यों को कुछ विशेष परिस्थितियों में अयोग्य घोषित करता है, जैसे स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ना या पार्टी के निर्देशों के विपरीत मतदान करना।
  • अयोग्यता संबंधी अंतिम निर्णय सदन के अध्यक्ष (Speaker) या सभापति (Chairman) द्वारा लिया जाता है।
  • कराधान विधेयक (Taxation Bill) एक प्रकार का वित्त विधेयक (Finance Bill) होता है, जो सरकार की कराधान नीतियों और राजस्व संग्रह से संबंधित होता है।
  • वित्त विधेयक केवल लोकसभा में पेश किया जा सकता है और इसे राष्ट्रपति की सिफारिश के बाद ही पेश किया जा सकता है।

दल-बदल कानून और कराधान विधेयक क्या हैं?

  • दल-बदल कानून: यह कानून सांसदों और विधायकों को एक पार्टी से दूसरी पार्टी में दल-बदल करने से रोकता है, यदि वे ऐसा करते हैं तो उन्हें सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
  • अयोग्यता के आधार: स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ना, पार्टी के निर्देशों के विपरीत मतदान करना या मतदान से अनुपस्थित रहना, निर्दलीय सदस्य का किसी पार्टी में शामिल होना, और मनोनीत सदस्य का 6 महीने बाद किसी पार्टी में शामिल होना।
  • अध्यक्ष की भूमिका: दल-बदल के मामलों में अयोग्यता पर निर्णय लेने का अधिकार सदन के अध्यक्ष या सभापति के पास होता है। इस निर्णय की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की जा सकती है।
  • कानून में अपवाद: यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य पार्टी में विलय कर लेते हैं, तो उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होता है।
  • कराधान विधेयक: यह एक विधायी प्रस्ताव है जो सरकार द्वारा लगाए गए करों, शुल्कों और अन्य वित्तीय लेवी से संबंधित होता है।
  • संसदीय प्रक्रिया: कराधान विधेयक को लोकसभा में पेश किया जाता है, जहाँ से पारित होने के बाद इसे राज्यसभा में भेजा जाता है। राज्यसभा को इस पर 14 दिनों के भीतर अपनी सिफारिशें देनी होती हैं, जिन्हें लोकसभा स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
करधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 यह विधेयक भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007, आयकर अधिनियम, 2025 और वित्त अधिनियम, 2026 में संशोधन का प्रस्ताव करता है, जो देश की वित्तीय और कराधान नीतियों को प्रभावित करेगा।
दल-बदल विरोधी कानून पर चर्चा की मांग कांग्रेस सांसद ने अवसरवादी ‘सामूहिक दल-बदल’ पर अंकुश लगाने के लिए एक नए दल-बदल विरोधी कानून की आवश्यकता पर चर्चा की मांग की है, जो भारतीय राजनीति में स्थिरता और नैतिकता के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रश्नकाल और शून्यकाल का स्थगन दल-बदल विरोधी कानून पर चर्चा के लिए प्रश्नकाल और शून्यकाल को स्थगित करने का प्रस्ताव सदन के नियमों और प्रक्रियाओं के तहत एक महत्वपूर्ण संसदीय उपकरण है, जिसका उपयोग तत्काल सार्वजनिक महत्व के मामलों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए किया जाता है।
संसद में विरोध प्रदर्शन विपक्ष द्वारा राम मंदिर दान विवाद को लेकर विरोध प्रदर्शन भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका और सरकार को जवाबदेह ठहराने के उनके अधिकार को दर्शाता है।

महत्व

राजनीतिक महत्व

  • दल-बदल विरोधी कानून पर चर्चा की मांग भारतीय राजनीति में अवसरवादी दल-बदल की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता को दर्शाती है, जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों और मतदाताओं के जनादेश को कमजोर कर सकती है।
  • यह चर्चा राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र और असहमति के लिए जगह सुनिश्चित करने के महत्व को भी उजागर करती है, ताकि केवल अवसरवाद के बजाय वास्तविक वैचारिक मतभेदों के आधार पर दल-बदल हो।

संसदीय महत्व

  • प्रश्नकाल, शून्यकाल और अन्य सूचीबद्ध कार्यों को स्थगित करने का प्रस्ताव संसदीय प्रक्रियाओं के महत्व को दर्शाता है, जिसके माध्यम से सदस्य तत्काल सार्वजनिक महत्व के मामलों पर चर्चा कर सकते हैं।
  • विधेयकों का परिचय और उन पर चर्चा संसद की विधायी भूमिका का एक अभिन्न अंग है, जो देश के कानूनों को अद्यतन और संशोधित करने के लिए महत्वपूर्ण है।

आर्थिक महत्व

  • करधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 का परिचय देश की कराधान प्रणाली और वित्तीय विनियमन को प्रभावित करेगा, जिसका व्यापक आर्थिक प्रभाव हो सकता है।
  • यह विधेयक भुगतान और निपटान प्रणालियों को भी प्रभावित करता है, जो डिजिटल लेनदेन और वित्तीय समावेशन के युग में महत्वपूर्ण है।

चुनौतियाँ

1. दल-बदल विरोधी कानून की प्रभावशीलता

  • वर्तमान दल-बदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) के बावजूद, ‘सामूहिक दल-बदल’ की घटनाएं अभी भी देखी जाती हैं, जो कानून की प्रभावशीलता पर सवाल उठाती हैं।
  • कानून को इस तरह से तैयार करना एक चुनौती है जो अवसरवादी दल-बदल को रोके और साथ ही सांसदों को ईमानदार असहमति और वैचारिक मतभेदों के आधार पर अपनी राय व्यक्त करने की स्वतंत्रता भी दे।

2. संसदीय कार्यवाही में व्यवधान

  • विपक्ष द्वारा लगातार विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी से संसद की कार्यवाही बाधित होती है, जिससे महत्वपूर्ण विधायी और चर्चा संबंधी कार्य प्रभावित होते हैं।
  • यह सुनिश्चित करना एक चुनौती है कि विरोध प्रदर्शन प्रभावी हों लेकिन साथ ही संसद की कार्यप्रणाली को भी बनाए रखा जाए।

3. वित्तीय कानूनों का जटिल स्वरूप

  • करधान और अन्य कानूनों में संशोधन अक्सर जटिल होते हैं और उनके दूरगामी परिणाम होते हैं, जिनके लिए गहन विचार-विमर्श और विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।
  • यह सुनिश्चित करना एक चुनौती है कि ऐसे कानून व्यापक विचार-विमर्श के बाद पारित हों और उनके इच्छित परिणाम प्राप्त हों।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
दल-बदल विरोधी कानून का दुरुपयोग यह कानून कभी-कभी राजनीतिक दलों द्वारा असंतुष्ट सदस्यों को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे आंतरिक लोकतंत्र बाधित होता है।
संसदीय समय का नुकसान विरोध प्रदर्शनों और स्थगनों के कारण संसद का बहुमूल्य समय बर्बाद होता है, जिससे महत्वपूर्ण विधेयकों और सार्वजनिक महत्व के मामलों पर चर्चा नहीं हो पाती।
कानूनी अस्पष्टता दल-बदल विरोधी कानून में ‘स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना’ या ‘पार्टी के निर्देश के विरुद्ध मतदान’ जैसे वाक्यांशों की व्याख्या में अस्पष्टता बनी हुई है, जिससे न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है।
जनता का विश्वास अवसरवादी दल-बदल और संसदीय व्यवधानों से राजनीतिक प्रक्रिया में जनता का विश्वास कम हो सकता है।

आगे की राह

  • दल-बदल विरोधी कानून में संशोधन पर एक व्यापक संसदीय बहस आयोजित की जाए, जिसमें सभी हितधारकों की राय शामिल हो।
  • कानून को इस तरह से मजबूत किया जाए कि वह अवसरवादी दल-बदल को प्रभावी ढंग से रोके, लेकिन साथ ही सांसदों को ईमानदार असहमति और वैचारिक मतभेदों के लिए जगह भी प्रदान करे।
  • संसदीय कार्यवाही में व्यवधानों को कम करने के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आम सहमति और सहयोग को बढ़ावा दिया जाए।
  • वित्तीय विधेयकों पर गहन विचार-विमर्श सुनिश्चित करने के लिए संसदीय समितियों की भूमिका को मजबूत किया जाए।
  • संसद के भीतर स्वस्थ बहस और असहमति की संस्कृति को प्रोत्साहित किया जाए, जिससे महत्वपूर्ण मुद्दों पर रचनात्मक चर्चा हो सके।
  • जनप्रतिनिधियों के लिए आचार संहिता को मजबूत किया जाए ताकि राजनीतिक नैतिकता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

दल-बदल कानून · दसवीं अनुसूची · संवैधानिक संशोधन · अयोग्यता का आधार · अध्यक्ष की भूमिका · न्यायिक समीक्षा · राजनीतिक अवसरवाद · संसदीय कार्यवाही · कराधान विधेयक · लोकसभा

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 102(2) और 191(2)’, ‘note’: ‘दल-बदल के आधार पर अयोग्यता’}
  • {‘article’: ‘दसवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘दल-बदल विरोधी कानून का प्रावधान’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 105’, ‘note’: ‘संसद सदस्यों के विशेषाधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 110’, ‘note’: ‘धन विधेयक की परिभाषा’}

अवधारणा प्रवाह

अवसरवादी दल-बदल की घटनाएं  →  वर्तमान दल-बदल विरोधी कानून की सीमाएं  →  नए दल-बदल विरोधी कानून की मांग  →  संसद में चर्चा और विधायी प्रक्रिया  →  राजनीतिक स्थिरता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रभाव

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. दल-बदल विरोधी कानून को 52वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा संविधान में जोड़ा गया था।
2. यह कानून संसद और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों पर लागू होता है।
3. दल-बदल के मामलों में अयोग्यता पर अंतिम निर्णय भारत के राष्ट्रपति द्वारा लिया जाता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। दल-बदल विरोधी कानून को 52वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा संविधान में दसवीं अनुसूची के रूप में जोड़ा गया था। कथन 2 सही है। यह कानून संसद के दोनों सदनों और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों पर लागू होता है। कथन 3 गलत है। दल-बदल के मामलों में अयोग्यता पर अंतिम निर्णय सदन के पीठासीन अधिकारी (लोकसभा में अध्यक्ष और राज्यसभा में सभापति) द्वारा लिया जाता है, न कि राष्ट्रपति द्वारा।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा प्रावधान दल-बदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) के तहत किसी सदस्य को अयोग्य घोषित करने का आधार नहीं है?

  1. यदि कोई निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है।
  2. यदि कोई सदस्य अपनी पार्टी द्वारा जारी किसी निर्देश के विपरीत सदन में मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है।
  3. यदि कोई निर्दलीय सदस्य किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाता है।
  4. यदि कोई मनोनीत सदस्य अपनी नियुक्ति के छह महीने बाद किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाता है।

उत्तर: यदि कोई मनोनीत सदस्य अपनी नियुक्ति के छह महीने बाद किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाता है। — विकल्प D सही है। दल-बदल विरोधी कानून के तहत, एक मनोनीत सदस्य अपनी नियुक्ति के छह महीने के भीतर किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो सकता है। यदि वह छह महीने के बाद ऐसा करता है, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है। अन्य सभी विकल्प अयोग्यता के आधार हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ दल-बदल विरोधी कानून के पीछे के उद्देश्यों की विवेचना कीजिए। क्या यह कानून राजनीतिक अवसरवाद को रोकने और संसदीय लोकतंत्र को मजबूत करने में सफल रहा है? आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** दल-बदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) का संक्षिप्त परिचय, इसका उद्देश्य और 52वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1985 का उल्लेख।
2. **उद्देश्य:** कानून के मुख्य उद्देश्यों की व्याख्या करें, जैसे राजनीतिक स्थिरता लाना, विधायकों के व्यक्तिगत लाभ के लिए दल-बदल को रोकना, जनादेश का सम्मान करना और खरीद-फरोख्त पर अंकुश लगाना।
3. **सफलताएं:** उन बिंदुओं पर चर्चा करें जहाँ कानून सफल रहा है, जैसे सरकारों को कुछ हद तक स्थिरता प्रदान करना, बड़े पैमाने पर दल-बदल पर रोक लगाना और विधायकों को पार्टी के प्रति अधिक जवाबदेह बनाना।
4. **आलोचनात्मक परीक्षण/कमियाँ:** उन पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करें जहाँ कानून विफल रहा है या इसकी सीमाएँ हैं:
* **अध्यक्ष की भूमिका:** पीठासीन अधिकारी के निर्णयों में पक्षपात का आरोप और न्यायिक समीक्षा की सीमितता (किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू मामला, 1992)।
* **सामूहिक दल-बदल:** कानून व्यक्तिगत दल-बदल को रोकता है लेकिन बड़े पैमाने पर दल-बदल (पार्टी के एक-तिहाई या दो-तिहाई सदस्यों द्वारा) को वैध बनाता है (हालांकि 91वें संशोधन, 2003 के बाद ‘विभाजन’ की अवधारणा समाप्त कर दी गई है, ‘विलय’ अभी भी अनुमेय है)।
* **आंतरिक असंतोष का दमन:** यह पार्टी के भीतर रचनात्मक असंतोष और स्वतंत्र विचार को दबाता है, जिससे विधायकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित होती है।
* **राजनीतिक अवसरवाद का नया रूप:** दल-बदल के बजाय ‘सामूहिक इस्तीफे’ या ‘विलय’ जैसे नए तरीके अपनाए जा रहे हैं।
* **निर्णय में देरी:** पीठासीन अधिकारी द्वारा अयोग्यता के मामलों में निर्णय लेने में अनावश्यक देरी।
5. **सुधार के सुझाव (संक्षेप में):** दिनेश गोस्वामी समिति, विधि आयोग की रिपोर्ट, चुनाव आयोग के सुझावों का उल्लेख करें (जैसे निर्णय लेने की शक्ति राष्ट्रपति/राज्यपाल या चुनाव आयोग को देना, समय-सीमा निर्धारित करना)।
6. **निष्कर्ष:** कानून के महत्व और इसकी कमियों को स्वीकार करते हुए, संसदीय लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए आवश्यक सुधारों पर बल दें।

स्रोत: Hindustan Times


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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