हाईकोर्ट में बाघों की मौत पर सुनवाई: कैनाइन डिस्टेंपर वायरस बना कारण

हाईकोर्ट में बाघों की मौत पर सुनवाई: कैनाइन डिस्टेंपर वायरस बना कारण

हाईकोर्ट में बाघों की मौत पर सुनवाई: कैनाइन डिस्टेंपर वायरस बना कारण

बाघ मृत्यु जांच प्रक्रियायाचिका दायरजनहितसुनवाईमध्य प्रदेशरिपोर्ट माँगनिधि, टीकाजांचवायरस कारणनियुक्तिरिक्त पदअगली सुनवाई16 नवंबर
बाघ मृत्यु जांच प्रक्रिया

✎ कैनाइन डिस्टेंपर वायरस एक मॉर्बिलीवायरस है जो कुत्तों और जंगली मांसाहारी जीवों को संक्रमित करता है; इसका प्रभावी बचाव घरेलू कुत्तों के टीकाकरण और बाघ अभयारण्यों में 'एक स्वास्थ्य' आधारित निगरानी से होता है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — पर्यावरण (जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण)  |  GS Paper III — विज्ञान और प्रौद्योगिकी (पशु रोग और जैव-सुरक्षा)  |  GS Paper II — शासन (न्यायपालिका की भूमिका और जनहित याचिका)
  • Prelims: कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) — मॉर्बिलीवायरस जीनस, पैरामिक्सोविरिडी परिवार, व्याघ्र परियोजना (Project Tiger) — वर्ष 1973, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) — वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत वैधानिक निकाय, कान्हा राष्ट्रीय उद्यान और कान्हा बाघ अभयारण्य, मध्य प्रदेश, बाघ अभयारण्य के कोर/क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट और बफर क्षेत्र का अंतर, जनहित याचिका (PIL) और लोकस स्टैंडाई (वाद-हेतुता) में शिथिलता, अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 48A (नीति निदेशक तत्व), अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 32 के अंतर्गत रिट क्षेत्राधिकार
  • Essay: जैव विविधता संरक्षण में विज्ञान, विधि और स्थानीय समुदाय की भूमिका, ‘एक स्वास्थ्य’ (One Health) दृष्टिकोण: मनुष्य, पशु और पर्यावरण का परस्पर संबंध

त्वरित पुनरावृत्ति: कैनाइन डिस्टेंपर वायरस एक मॉर्बिलीवायरस है जो कुत्तों और जंगली मांसाहारी जीवों को संक्रमित करता है; इसका प्रभावी बचाव घरेलू कुत्तों के टीकाकरण और बाघ अभयारण्यों में ‘एक स्वास्थ्य’ आधारित निगरानी से होता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर पीठ में कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में बाघों की संदिग्ध मौतों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता के अनुसार इन मौतों का संभावित कारण कैनाइन डिस्टेंपर वायरस है और अप्रैल-मई में आठ बाघों की मृत्यु का उल्लेख किया गया। सुनवाई में बताया गया कि कान्हा में अब तक 20 बाघों की मौत संदिग्ध रूप से इसी वायरस से हुई है, जिनमें पाँच के पोस्टमार्टम में वायरस को कारण पाया गया। न्यायालय ने सितंबर-अक्टूबर में मरे दो बाघों की मौत के कारणों की रिपोर्ट, राज्य के अन्य बाघ अभयारण्यों में कुत्तों के टीकाकरण और निधि-आवंटन की स्थिति रिपोर्ट, तथा रिक्त पदों पर नियुक्ति से संबंधित जानकारी माँगी है। अगली सुनवाई 16 नवंबर को निर्धारित है। याचिका में किए गए कई दावे, जैसे वायरस से बाघ का स्वभाव बदल जाना और वायु से संक्रमण न फैलना, अभी न्यायालय में जाँच के विषय हैं और इन्हें वैज्ञानिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इस प्रकरण का मूल प्रश्न यह है कि बाघ संरक्षण में रोग-नियंत्रण, निधि और मानव-संसाधन की जवाबदेही कैसे सुनिश्चित हो।

पृष्ठभूमि

  • व्याघ्र परियोजना वर्ष 1973 में शुरू हुई थी और इसके अंतर्गत बाघ अभयारण्यों का नेटवर्क विकसित किया गया। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में 2006 के संशोधन द्वारा व्याघ्र परियोजना को वैधानिक आधार दिया गया और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की स्थापना हुई।
  • मध्य प्रदेश को ‘टाइगर स्टेट’ कहा जाता है और कान्हा उसके प्रमुख बाघ अभयारण्यों में से एक है। इसलिए यहाँ की घटनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर बाघ संरक्षण की समीक्षा का विषय बनती हैं।
  • भारत में वन्यजीवों में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस का प्रकोप नया नहीं है। वर्ष 2018 में गुजरात के गिर क्षेत्र में शेरों की मौतों में इस वायरस की पुष्टि हुई थी, जिससे घरेलू और जंगली मांसाहारी जीवों के बीच संक्रमण का खतरा सामने आया।
  • भारतीय न्यायपालिका ने 1980 के दशक से जनहित याचिका की अवधारणा विकसित की, जिसमें कोई भी व्यक्ति या संगठन जनहित से जुड़े मामलों में न्यायालय जा सकता है। पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के अनेक मामलों में न्यायालय ने राज्य को रिपोर्ट और कार्ययोजना प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
  • बाघ अभयारण्यों के प्रबंधन में निधि की कमी, रिक्त पदों और निगरानी तंत्र की कमजोरी को बार-बार समस्या के रूप में रेखांकित किया गया है। इसी कारण न्यायालय ने निधि और नियुक्ति दोनों पर जवाब माँगा है।

कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) क्या है?

  • कैनाइन डिस्टेंपर वायरस मॉर्बिलीवायरस जीनस का एक RNA विषाणु है, जो पैरामिक्सोविरिडी परिवार से संबंधित है। यह मनुष्यों में खसरा (Measles) फैलाने वाले विषाणु का निकट संबंधी माना जाता है।
  • यह मुख्यतः कुत्तों और अन्य मांसाहारी जीवों, जैसे लोमड़ी, भेड़िया, रैकून और कुछ बिल्ली-वंशी प्रजातियों को संक्रमित करता है। बाघ, शेर और तेंदुआ भी इसके प्रति संवेदनशील पाए गए हैं।
  • संक्रमण का मुख्य मार्ग संक्रमित पशु के नाक-आँख के स्राव, लार और मूत्र-मल से दूषित वस्तुएँ, भोजन और जल हैं। निकट संपर्क और साझा जल स्रोत इसके प्रसार को बढ़ाते हैं। वायु-जनित बूँदों से संक्रमण की संभावना भी वैज्ञानिक साहित्य में उल्लिखित है।
  • लक्षणों में तेज़ बुखार, श्वसन और आंत्र संबंधी समस्याएँ तथा तंत्रिका तंत्र प्रभावित होने पर दौरे और लकवा शामिल हैं। कई मामलों में संक्रमण घातक सिद्ध होता है।
  • इस वायरस के लिए कोई विशिष्ट एंटीवायरल उपचार उपलब्ध नहीं है। सहायक उपचार (Supportive Care) से लक्षणों का प्रबंधन किया जाता है, जबकि रोकथाम का सबसे प्रभावी उपाय कुत्तों का नियमित टीकाकरण है।
  • वन्यजीव क्षेत्रों में बचाव के लिए संक्रमित पशुओं का अलगाव (क्वारंटीन), आवारा और घरेलू कुत्तों का टीकाकरण, जल स्रोतों का प्रबंधन और रोग-निगरानी तंत्र को सुदृढ़ करना आवश्यक माना जाता है।
  • यह रोग ‘एक स्वास्थ्य’ (One Health) दृष्टिकोण का अच्छा उदाहरण है, क्योंकि पशु-चिकित्सा, वन विभाग, स्थानीय प्रशासन और मानव स्वास्थ्य का समन्वय ही इसके नियंत्रण में निर्णायक होता है।
  • याचिका में किया गया यह दावा कि वायरस बाघ का शिकारी स्वभाव बदल देता है, वैज्ञानिक रूप से स्थापित तथ्य नहीं है। ऐसे निष्कर्षों के लिए पोस्टमार्टम, प्रयोगशाला जाँच और विशेषज्ञ रिपोर्ट आवश्यक हैं, जिन्हें न्यायालय ने मँगवाया है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
रोगकारक (Pathogen) कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (Canine Distemper Virus) मांसाहारी स्तनधारियों को संक्रमित करने वाला विषाणु है। इसका CDV के रूप में उल्लेख होता है। यह श्वसन और तंत्रिका तंत्र दोनों को प्रभावित कर सकता है।
प्रसार का मार्ग याचिका के अनुसार मुख्य प्रसार संक्रमित कुत्तों के संपर्क और साझा जल स्रोतों से होता है, जहाँ वन्य प्राणी पानी पीने आते हैं। याचिका में कहा गया है कि यह वायरस हवा से नहीं फैलता।
कान्हा में स्थिति (याचिका के अनुसार) लगभग 20 बाघों की मृत्यु संदिग्ध रूप से इस वायरस से बताई गई है। इनमें से पाँच के पोस्टमार्टम में वायरस को मृत्यु का कारण पाया गया। दो बाघों को क्वारंटीन कर मुक्की हेल्थ सेंटर में उपचार हेतु रखा गया था।
न्यायिक कार्यवाही मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की युगलपीठ ने सितंबर-अक्टूबर में मरे दो बाघों के कारणों की रिपोर्ट और केंद्र से निधि कटौती पर जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 16 नवंबर को होगी।
संरक्षित क्षेत्र कान्हा टाइगर रिजर्व (Kanha Tiger Reserve), मध्य प्रदेश। यह बाघ संरक्षण के लिए अधिसूचित टाइगर रिजर्व है, जिसकी निगरानी और प्रबंधन राज्य वन विभाग करता है।
याचिका में मांगे गए उपाय बाघों के लिए निवारक और उपचारात्मक उपाय, कुत्तों का क्वारंटीन और टीकाकरण, टाइगर रिजर्वों को पर्याप्त निधि और रिक्त पदों पर नियुक्ति।

महत्व

पारिस्थितिकीय (Ecological)

  • बाघ खाद्य शृंखला के शीर्ष पर होने के कारण पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन का सूचक है। उसकी मृत्यु से शाकाहारी जीवों की संख्या और वनस्पति पर प्रभाव पड़ सकता है।
  • एक ही संक्रमण से कई बाघों की मृत्यु होने पर किसी टाइगर रिजर्व की आनुवंशिक विविधता और आबादी की स्थिरता पर दीर्घकालिक असर पड़ता है।
  • वन्य प्राणियों और घरेलू कुत्तों के बीच रोग संचरण यह दिखाता है कि संरक्षित क्षेत्र बाहरी जैविक दबावों से अलग नहीं हैं।

संवैधानिक एवं विधिक (Constitutional and Legal)

  • जनहित याचिका के माध्यम से उच्च न्यायालय ने पर्यावरण और वन्य जीव संरक्षण से जुड़े मामले में राज्य से रिपोर्ट और जवाब मांगा है। यह न्यायिक निगरानी (Judicial Monitoring) का उदाहरण है।
  • वन्य जीव संरक्षण विधि (Wildlife (Protection) Act, 1972) के अंतर्गत बाघ संरक्षण के प्रावधान लागू होते हैं। बाघ संरक्षण प्राधिकरण (National Tiger Conservation Authority) की भूमिका भी इसी ढांचे में आती है।
  • पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960) और पशु जन्म नियंत्रण नियम कुत्तों की आबादी और टीकाकरण से जुड़े हैं, जो इस मामले में रोग नियंत्रण से सीधे संबंधित हैं।

प्रशासनिक एवं वित्तीय (Administrative and Fiscal)

  • टाइगर रिजर्वों के लिए केंद्र और राज्य के बीच वित्तीय साझेदारी है। निधि की कमी और रिक्त पदों से रोग निगरानी, क्वारंटीन सुविधाएँ और गश्त प्रभावित होती हैं।
  • रिक्त पदों पर नियुक्ति का मुद्दा प्रशासनिक क्षमता और संस्थागत तैयारी का प्रश्न है, जो संरक्षण नीति के क्रियान्वयन की कुंजी है।

एक स्वास्थ्य दृष्टिकोण (One Health Approach)

  • मनुष्य, पशु और पर्यावरण के स्वास्थ्य को एक साथ देखने वाला दृष्टिकोण इस मामले पर लागू होता है, क्योंकि कुत्तों का संक्रमण वन्य जीवों तक पहुँचता है।
  • पशुपालन और ग्रामीण क्षेत्रों के कुत्तों का टीकाकरण रोग नियंत्रण की पहली कड़ी है, जो वन्य जीवों के संरक्षण में भी सहायक होगा।

चुनौतियाँ

1. वैज्ञानिक पुष्टि का अभाव

  • याचिका में कहा गया है कि वायरस बाघ की शिकार करने की प्रवृत्ति को बदल देता है और वह गाय जैसा व्यवहार करने लगता है। यह दावा अभी वैज्ञानिक रूप से स्थापित नहीं है।
  • मृत्यु के सभी मामलों में पोस्टमार्टम से पुष्टि नहीं हुई है। संदिग्ध और पुष्ट मामलों में अंतर स्पष्ट रखना आवश्यक है।
  • परीक्षा या उत्तर में इस व्यवहारगत दावे को तथ्य के रूप में नहीं लिखना चाहिए। इसे याचिकाकर्ता का तर्क मानना उचित है।

2. कुत्तों के माध्यम से रोग संचरण

  • संक्रमित कुत्ते वायरस के मुख्य वाहक बताए गए हैं। बाघों के आवास के आसपास के गाँवों और पशुओं की आबादी इसमें अहम कड़ी है।
  • साझा जल स्रोत संक्रमण का माध्यम बनते हैं। वन्य जीवों और घरेलू पशुओं के बीच संपर्क रोकना कठिन है।
  • कुत्तों की आबादी का नियंत्रण पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम से जुड़ा है, जिसमें टीकाकरण का समन्वय आवश्यक है।

3. केंद्र-राज्य वित्तीय समन्वय

  • वन्य जीव संरक्षण संविधान की समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए केंद्र और राज्य दोनों की भूमिका है।
  • याचिका में केंद्र द्वारा पर्याप्त निधि न देने का मुद्दा उठाया गया है। निधि प्रवाह, उपयोग और प्रमाणन की स्पष्ट प्रक्रिया आवश्यक है।
  • निधि और उसके उपयोग पर न्यायालय का जवाब मांगना प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न है।

4. मानव संसाधन और संस्थागत क्षमता

  • रिक्त पदों पर नियुक्ति न होने से वन रक्षकों, पशु चिकित्सकों और निगरानी कर्मियों की कमी होती है।
  • सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद नियुक्ति न होना प्रशासनिक प्रतिबद्धता में अंतर को दिखाता है।
  • क्षेत्र में चिकित्सा सुविधा, क्वारंटीन केंद्र और प्रयोगशाला क्षमता सीमित होने से समय पर उपचार कठिन होता है।

5. रोग निगरानी और आपातकालीन तैयारी

  • संक्रामक रोगों की शुरुआती पहचान के लिए नियमित रक्त और ऊतक नमूना परीक्षण आवश्यक है।
  • बाघों की मृत्यु के बाद समय पर पोस्टमार्टम और रिपोर्ट न होने से कारण की पहचान में देरी होती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
वैज्ञानिक प्रमाण व्यवहारगत बदलाव का दावा अप्रमाणित है; केवल कुछ मामलों में पोस्टमार्टम से वायरस की पुष्टि हुई है।
संक्रमण का स्रोत संक्रमित कुत्तों और साझा जल स्रोतों पर नियंत्रण कठिन है, विशेषकर बफर क्षेत्र के गाँवों में।
निधि की कमी टाइगर रिजर्वों को पर्याप्त केंद्रीय निधि न मिलने का आरोप है, जिससे निगरानी और उपचार प्रभावित होते हैं।
रिक्त पद पदों पर नियुक्ति न होने से गश्त, चिकित्सा और रिकॉर्ड-रखने का काम कमज़ोर होता है।
समन्वय का अभाव वन विभाग, पशुपालन विभाग और स्थानीय निकायों के बीच साझा कार्ययोजना की कमी है।
न्यायिक निगरानी की सीमा न्यायालय नीति-निर्माण नहीं करता; वह रिपोर्ट और जवाब मांगकर कार्यपालिका को जवाबदेह बनाता है।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • प्रोजेक्ट टाइगर (Project Tiger)

आगे की राह

  • संदिग्ध मौतों के हर मामले में समय पर पोस्टमार्टम, नमूना परीक्षण और मृत्यु का वैज्ञानिक कारण दर्ज करने की मानक प्रक्रिया बनाई जाए।
  • टाइगर रिजर्व के आसपास कुत्तों के नियमित टीकाकरण और जनसंख्या नियंत्रण को पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम के साथ जोड़ा जाए।
  • साझा जल स्रोतों की पहचान कर वन्य जीवों और पशुओं के बीच संपर्क कम करने के लिए अलग जल व्यवस्था बनाई जाए।
  • वन विभाग, पशुपालन विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच एक स्वास्थ्य दृष्टिकोण पर आधारित संयुक्त रोग निगरानी तंत्र बने।
  • प्रोजेक्ट टाइगर के अंतर्गत निधि आवंटन और उसके उपयोग का समय पर लेखा-परीक्षण और सार्वजनिक प्रतिवेदन हो।
  • टाइगर रिजर्वों में रिक्त पदों को समय-सीमा में भरा जाए और प्रशिक्षित कर्मियों की स्थायी व्यवस्था बने।
  • क्वारंटीन केंद्रों और पशु चिकित्सा प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ाई जाए, ताकि आपातकालीन स्थिति में त्वरित उपचार संभव हो।
  • न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन की स्थिति पर नियमित स्टेटस रिपोर्ट लेकर कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित हो।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

बाघ संरक्षण · कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (Canine Distemper Virus) – CDV · राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (National Tiger Conservation Authority) – NTCA · प्रोजेक्ट टाइगर (Project Tiger) · वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (Wildlife (Protection) Act, 1972) · एक स्वास्थ्य दृष्टिकोण (One Health Approach) · जनहित याचिका (Public Interest Litigation) – PIL · अनुच्छेद 21 और पर्यावरण संरक्षण · अनुच्छेद 48क और अनुच्छेद 51क(छ) · न्यायिक समीक्षा और विशेषज्ञ-आधारित प्रशासन · टाइगर रिजर्व प्रबंधन · संस्थागत जवाबदेही

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 226: उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता और जनहित याचिका का मार्ग
  • अनुच्छेद 21: जीवन के अधिकार में पर्यावरण संरक्षण (न्यायिक व्याख्या)
  • अनुच्छेद 48क: वन और वन्य जीवों की रक्षा का राज्य का दायित्व
  • अनुच्छेद 51क(छ): प्राणियों के प्रति दयाभाव का मूल कर्तव्य
  • सातवीं अनुसूची, समवर्ती सूची, प्रविष्टि 17ख: वन्य प्राणियों का संरक्षण

अवधारणा प्रवाह

संक्रमित कुत्तों और साझा जल स्रोतों के माध्यम से कैनाइन डिस्टेंपर वायरस का वन्य जीवों में प्रसार  →  कान्हा टाइगर रिजर्व में बाघों में तंत्रिका और श्वसन संबंधी लक्षण तथा संदिग्ध मृत्यु  →  कुछ मामलों में पोस्टमार्टम द्वारा वायरस की पुष्टि, अन्य मामलों में कारण संदिग्ध  →  याचिकाकर्ता द्वारा जनहित याचिका दायर कर बाघ संरक्षण, निधि और रिक्त पदों का मुद्दा उठाना  →  मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा मौतों की रिपोर्ट, टीकाकरण और निधि पर स्टेटस रिपोर्ट मांगना  →  राज्य और केंद्र सरकार द्वारा निगरानी, टीकाकरण और निधि उपयोग पर जवाब प्रस्तुत करना  →  16 नवंबर की अगली सुनवाई में न्यायिक निर्देशों के अनुपालन की समीक्षा

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बाघ वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I में सूचीबद्ध है।
2. राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की स्थापना वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2006 के माध्यम से की गई।
3. कैनाइन डिस्टेंपर एक जीवाणु (Bacterium) से होने वाला रोग है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी चार

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: बाघ को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I में रखा गया है, जिससे उसे सर्वोच्च स्तर का कानूनी संरक्षण मिलता है। कथन 2 सही है: NTCA एक वैधानिक निकाय है, जिसे 2006 के संशोधन के बाद पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन सशक्त किया गया। कथन 3 गलत है: कैनाइन डिस्टेंपर विषाणु (Virus) जनित रोग है, जो Morbillivirus समूह से संबंधित है, जीवाणु से नहीं।

Q2. निम्नलिखित अभिकथन और कारण पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): भारत में बाघ संरक्षण से जुड़े मामलों को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार की दृष्टि से भी देखा गया है।
कारण (R): सर्वोच्च न्यायालय ने स्वच्छ एवं स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत पठित किया है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. A सही है, किंतु R गलत है
  4. A गलत है, किंतु R सही है

उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है — अभिकथन (A) सही है, क्योंकि पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े मामलों को न्यायालयों ने जीवन के अधिकार से जोड़ा है। कारण (R) भी सही है, क्योंकि स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य (1991) जैसे निर्णयों में अनुच्छेद 21 का अंग माना गया। R, A की सही व्याख्या है, क्योंकि जीवन के अधिकार का विस्तार ही इन मामलों को न्यायिक क्षेत्र में लाता है।

Q3. निम्नलिखित सुमेलों पर विचार कीजिए:
सूची I (संवैधानिक प्रावधान) — सूची II (विषय)
A. अनुच्छेद 48क — 1. राज्य द्वारा पर्यावरण और वनों व वन्यजीवों की सुरक्षा का नीति-निर्देश
B. अनुच्छेद 51क(छ) — 2. नागरिकों का मूल कर्तव्य: प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार
C. अनुच्छेद 226 — 3. उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता
D. अनुच्छेद 21 — 4. प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण
सही सुमेलन का चयन कीजिए:

  1. A-1, B-2, C-3, D-4
  2. A-2, B-1, C-4, D-3
  3. A-1, B-3, C-2, D-4
  4. A-4, B-2, C-1, D-3

उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4 — अनुच्छेद 48क राज्य के लिए नीति-निर्देशक तत्व है, जो पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण से संबंधित है (A-1)। अनुच्छेद 51क(छ) नागरिकों का मूल कर्तव्य है (B-2)। अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को रिट जारी करने की शक्ति देता है, जिसके अंतर्गत जनहित याचिकाएँ भी सुनी जाती हैं (C-3)। अनुच्छेद 21 जीवन और दैहिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है (D-4)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ बाघ संरक्षण में अब शिकार और आवास-क्षय के साथ-साथ संक्रामक रोग भी गंभीर चुनौती बनकर उभर रहे हैं, जिनमें घरेलू पशुओं से फैलने वाले विषाणु प्रमुख हैं। भारत के संवैधानिक और वैधानिक ढाँचे में ऐसे रोगों से बाघों की रक्षा का दायित्व किन संस्थाओं पर है, इसकी समीक्षा कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि क्या ऐसे मामलों में जनहित याचिका के माध्यम से न्यायिक हस्तक्षेप विशेषज्ञ-आधारित प्रशासनिक निर्णय-प्रक्रिया का विकल्प बन सकता है? (15 Marks)

रूपरेखा: भूमिका: कान्हा टाइगर रिजर्व (मध्य प्रदेश) में संदिग्ध बाघ मौतों पर जनहित याचिका का उल्लेख करें और स्पष्ट करें कि याचिका में किए गए दावे अभी सिद्ध तथ्य नहीं, बल्कि न्यायालय के विचाराधीन आरोप हैं (अगली सुनवाई 16 नवंबर)।

संवैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 48क (राज्य का पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण का नीति-निर्देश), अनुच्छेद 51क(छ) (नागरिकों का मूल कर्तव्य), अनुच्छेद 21 (स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार, सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य, 1991; एम.सी. मेहता मामलों का उल्लेख), अनुच्छेद 32 और 226 (जनहित याचिका की प्रक्रिया; हुसैनारा खातून मामला, 1979 से PIL की शुरुआत)।

वैधानिक और संस्थागत ढाँचा: वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत बाघ की अनुसूची I में स्थिति; 2006 संशोधन से NTCA की स्थापना और टाइगर रिजर्व के लिए बाघ संरक्षण योजना (Tiger Conservation Plan) का प्रावधान; प्रोजेक्ट टाइगर (1973) की केंद्र प्रायोजित योजना और राज्य-केंद्र वित्तीय साझेदारी; वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB); भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) का वैज्ञानिक सहयोग; पशु चिकित्सा और वन विभाग का समन्वय; पोस्टमार्टम व नमूना-जाँच की भूमिका।

एक स्वास्थ्य दृष्टिकोण (One Health Approach): मनुष्य, घरेलू पशु और वन्यजीव के स्वास्थ्य को जोड़ने वाला दृष्टिकोण; कुत्तों का टीकाकरण, क्वारंटीन, साझा जल-स्रोतों का प्रबंधन और निगरानी कैसे बाघ संरक्षण से जुड़ते हैं।

संतुलित विश्लेषण: (क) पक्ष में तर्क: संवैधानिक जवाबदेही सुनिश्चित करना, फंड और रिक्त पदों जैसे प्रशासनिक अंतरालों को उजागर करना, सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व आदेशों के अनुपालन की निगरानी। (ख) विपक्ष में तर्क: शक्ति-पृथक्करण (Separation of Powers) का प्रश्न, न्यायालय की वैज्ञानिक विशेषज्ञता की सीमा, वैज्ञानिक कारणों का निर्धारण विशेषज्ञ संस्थाओं (NTCA, WII, पशु चिकित्सा विशेषज्ञ) का कार्य होना, और न्यायिक हस्तक्षेप का अत्यधिक विस्तार (judicial overreach) का खतरा।

निष्कर्ष: न्यायिक समीक्षा प्रशासन को जवाबदेह बनाने का उपकरण है, विकल्प नहीं; संस्थागत क्षमता, नियमित निगरानी, डेटा-आधारित रिपोर्ट और समयबद्ध नियुक्तियाँ ही स्थायी समाधान हैं।

स्रोत: amarujala.com


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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