11 Aug हिमाचल में मानसून कहर: 259 सड़कें बंद, 161 ट्रांसफार्मर प्रभावित, जानिए पूरा हाल
✎ हिमाचल प्रदेश में मानसून की भारी बारिश ने आपदा प्रबंधन और आधारभूत संरचना की सुदृढ़ता पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिससे पहाड़ी क्षेत्रों में जलवायु-लचीली विकास रणनीतियों की आवश्यकता पर बल मिलता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भौतिक भूगोल, आपदाएँ और उनका प्रबंधन) | GS Paper III — आपदा प्रबंधन, आधारभूत संरचना (ऊर्जा, सड़कें, जल आपूर्ति)
- Prelims: मानसून, भूस्खलन, राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF), राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR), जलवायु परिवर्तन
- Essay: जलवायु परिवर्तन और भारत में आपदा प्रबंधन की चुनौतियाँ, पहाड़ी क्षेत्रों में सतत विकास और आधारभूत संरचना का महत्व
त्वरित पुनरावृत्ति: हिमाचल प्रदेश में मानसून की भारी बारिश ने आपदा प्रबंधन और आधारभूत संरचना की सुदृढ़ता पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिससे पहाड़ी क्षेत्रों में जलवायु-लचीली विकास रणनीतियों की आवश्यकता पर बल मिलता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हिमाचल प्रदेश में मानसून की भारी बारिश के कारण जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। राज्य आपातकालीन संचालन केंद्र की रिपोर्ट के अनुसार, 259 सड़कें बंद हो गई हैं, 161 बिजली ट्रांसफार्मर और 54 पेयजल योजनाएँ बाधित हुई हैं। मानसून के कारण अब तक 157 लोगों की मौत और 257 लोगों के घायल होने की सूचना है, जिससे राज्य में आपदा प्रबंधन और आधारभूत संरचना की सुदृढ़ता पर ध्यान केंद्रित हुआ है।
पृष्ठभूमि
- हिमाचल प्रदेश एक पहाड़ी राज्य है जो अपनी जटिल भूगर्भीय संरचना और संवेदनशील पारिस्थितिकी के कारण मानसून के दौरान भूस्खलन (Landslides), बाढ़ और अचानक आई बाढ़ (Flash floods) के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
- राज्य की अर्थव्यवस्था पर्यटन, कृषि और बागवानी पर बहुत अधिक निर्भर करती है, जो प्राकृतिक आपदाओं से गंभीर रूप से प्रभावित होती हैं।
- मानसून का मौसम, जो आमतौर पर जून से सितंबर तक रहता है, राज्य में भारी वर्षा लाता है, जिससे नदियों और नालों का जलस्तर बढ़ जाता है और मिट्टी का कटाव होता है।
- राज्य सरकार ने आपदाओं से निपटने के लिए राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) और अन्य एजेंसियों को सक्रिय किया है, लेकिन बड़े पैमाने पर होने वाली क्षति अक्सर पुनर्निर्माण और राहत कार्यों के लिए अतिरिक्त संसाधनों की मांग करती है।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण हाल के वर्षों में वर्षा के पैटर्न में बदलाव देखा गया है, जिससे अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ अधिक बार और तीव्र हो गई हैं, जिससे आपदाओं की गंभीरता बढ़ रही है।
- आधारभूत संरचना जैसे सड़कें, पुल, बिजली और जल आपूर्ति प्रणालियाँ अक्सर इन आपदाओं का पहला शिकार होती हैं, जिससे दैनिक जीवन और आर्थिक गतिविधियों में बाधा आती है।
आपदा प्रबंधन और आधारभूत संरचना
- आपदा प्रबंधन (Disaster Management) में आपदाओं के जोखिम को कम करने, उनसे निपटने और उनके बाद पुनर्निर्माण के लिए किए जाने वाले सभी उपाय शामिल होते हैं। इसमें रोकथाम, शमन, तैयारी, प्रतिक्रिया और पुनर्प्राप्ति के चरण होते हैं।
- भारत में आपदा प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) शीर्ष निकाय है, जबकि राज्य स्तर पर राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) और जिला स्तर पर जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) कार्य करते हैं।
- आधारभूत संरचना (Infrastructure) में सड़कें, रेलवे, हवाई अड्डे, बंदरगाह, बिजली संयंत्र, जल आपूर्ति और सीवरेज सिस्टम, दूरसंचार नेटवर्क और अन्य सार्वजनिक उपयोगिताएँ शामिल हैं जो किसी देश के आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण के लिए आवश्यक हैं।
- पहाड़ी क्षेत्रों में आधारभूत संरचना का निर्माण और रखरखाव विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण होता है क्योंकि यहाँ की भूगर्भीय अस्थिरता, दुर्गम इलाके और कठोर मौसम की स्थिति होती है।
- आपदा जोखिम न्यूनीकरण (Disaster Risk Reduction – DRR) एक व्यवस्थित दृष्टिकोण है जिसका उद्देश्य आपदाओं के कारणों का विश्लेषण और प्रबंधन करके आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करना है। इसमें संरचनात्मक और गैर-संरचनात्मक दोनों उपाय शामिल हैं।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण, आधारभूत संरचना को ‘जलवायु-लचीला’ (Climate-resilient) बनाना महत्वपूर्ण हो गया है, जिसका अर्थ है कि इसे भविष्य की जलवायु परिस्थितियों और चरम मौसम की घटनाओं का सामना करने में सक्षम होना चाहिए।
- आपदाओं के दौरान त्वरित प्रतिक्रिया और राहत कार्य महत्वपूर्ण होते हैं, जिसमें प्रभावित क्षेत्रों तक पहुँचने के लिए सड़कों को खोलना, बिजली और पानी की आपूर्ति बहाल करना, और प्रभावित लोगों को आश्रय व सहायता प्रदान करना शामिल है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| भारी वर्षा और भूस्खलन | हिमाचल प्रदेश में मानसून के दौरान सामान्य जनजीवन पर गंभीर प्रभाव, बुनियादी ढांचे को नुकसान और जानमाल का नुकसान। |
| सड़कें अवरुद्ध | परिवहन नेटवर्क बाधित, आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति में बाधा और लोगों की आवाजाही पर रोक। |
| बिजली ट्रांसफार्मर प्रभावित | बिजली आपूर्ति में व्यवधान, जिससे घरों, व्यवसायों और आवश्यक सेवाओं पर असर पड़ता है। |
| पेयजल योजनाएं बाधित | स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता पर प्रतिकूल प्रभाव, जिससे स्वास्थ्य और स्वच्छता संबंधी चिंताएं बढ़ती हैं। |
| जानमाल का नुकसान | मानसून से संबंधित आपदाओं के कारण लोगों की मृत्यु और घायल होने की सूचना, साथ ही पशुधन की हानि। |
| संपत्ति को व्यापक नुकसान | निजी और सार्वजनिक संपत्ति, जैसे घर, दुकानें, फसलें और सरकारी ढांचे को क्षति। |
महत्व
पर्यावरणीय महत्व
- हिमालयी क्षेत्र में नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों को दर्शाता है, जहाँ अत्यधिक मौसम की घटनाएं अधिक बार हो रही हैं।
- भूस्खलन और मिट्टी के कटाव में वृद्धि से वनों की कटाई और अनियोजित शहरीकरण जैसे मानवीय कारकों की भूमिका पर प्रकाश डालता है।
सामाजिक महत्व
- आपदाओं के कारण जानमाल के नुकसान, विस्थापन और आजीविका के नुकसान से स्थानीय समुदायों पर गंभीर सामाजिक-आर्थिक प्रभाव पड़ता है।
- बुनियादी सेवाओं जैसे सड़क, बिजली और पानी की आपूर्ति में व्यवधान से दैनिक जीवन प्रभावित होता है और आपातकालीन प्रतिक्रिया में बाधा आती है।
आर्थिक महत्व
- कृषि, पर्यटन और स्थानीय व्यापार जैसे क्षेत्रों को नुकसान से राज्य की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- बुनियादी ढांचे की मरम्मत और पुनर्निर्माण में भारी लागत आती है, जिससे राज्य के वित्तीय संसाधनों पर दबाव पड़ता है।
शासन और नीति महत्व
- आपदा प्रबंधन (Disaster Management) और पूर्व चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल देता है।
- पहाड़ी क्षेत्रों में टिकाऊ विकास (Sustainable Development) और निर्माण प्रथाओं को अपनाने की अनिवार्यता को रेखांकित करता है।
चुनौतियाँ
1. बुनियादी ढांचे का लचीलापन
- पहाड़ी इलाकों में सड़कों, पुलों, बिजली लाइनों और जल आपूर्ति प्रणालियों को अत्यधिक मौसम की घटनाओं का सामना करने के लिए पर्याप्त रूप से मजबूत बनाना एक बड़ी चुनौती है।
- भूस्खलन और बाढ़ के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का निर्माण और रखरखाव विशेष रूप से कठिन है।
यूपीएससी लिंक: आपदा और आपदा प्रबंधन
2. प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली
- अत्यधिक वर्षा और भूस्खलन की सटीक भविष्यवाणी करना और समय पर चेतावनी जारी करना, खासकर दूरदराज के क्षेत्रों में, एक महत्वपूर्ण चुनौती है।
- स्थानीय समुदायों तक चेतावनी संदेशों को प्रभावी ढंग से पहुंचाना और उन्हें प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार करना भी आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: आपदा प्रबंधन में प्रौद्योगिकी की भूमिका
3. पुनर्वास और पुनर्निर्माण
- आपदा प्रभावित लोगों का त्वरित और प्रभावी पुनर्वास सुनिश्चित करना, जिसमें आश्रय, भोजन और चिकित्सा सहायता शामिल है, एक जटिल कार्य है।
- क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे और घरों का पुनर्निर्माण, खासकर सीमित संसाधनों वाले पहाड़ी क्षेत्रों में, एक लंबी और महंगी प्रक्रिया है।
यूपीएससी लिंक: आपदा के बाद पुनर्निर्माण
4. जलवायु परिवर्तन अनुकूलन
- जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती चरम मौसमी घटनाओं के अनुकूलन के लिए दीर्घकालिक रणनीतियों को विकसित करना और लागू करना।
- इसमें जल प्रबंधन, भूमि उपयोग योजना और पारिस्थितिकी तंत्र बहाली जैसी पहल शामिल हैं।
यूपीएससी लिंक: जलवायु परिवर्तन और भारत पर इसके प्रभाव
5. अंतर-एजेंसी समन्वय
- राज्य और केंद्र सरकार की विभिन्न एजेंसियों, गैर-सरकारी संगठनों और स्थानीय समुदायों के बीच प्रभावी समन्वय सुनिश्चित करना, ताकि आपदा प्रतिक्रिया और राहत कार्यों को सुचारू रूप से चलाया जा सके।
- संसाधनों का कुशल आवंटन और प्रयासों का दोहराव रोकना महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: आपदा प्रबंधन में संस्थागत ढाँचा
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| बुनियादी ढांचे की भेद्यता | पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कें, बिजली और पानी की प्रणालियाँ अत्यधिक वर्षा और भूस्खलन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं। |
| मानवीय और पशुधन क्षति | आपदाओं के कारण जानमाल का नुकसान और पशुधन की हानि, जिससे समुदायों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। |
| आर्थिक व्यवधान | कृषि, पर्यटन और अन्य आर्थिक गतिविधियों पर नकारात्मक प्रभाव, जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है। |
| पर्यावरणीय क्षरण | भूस्खलन, मिट्टी का कटाव और वनों की कटाई से पारिस्थितिकी तंत्र को दीर्घकालिक क्षति। |
| सीमित संसाधन | आपदा प्रतिक्रिया, राहत और पुनर्निर्माण के लिए राज्य के पास सीमित वित्तीय और तकनीकी संसाधन। |
| दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंच | सड़कें बंद होने के कारण दूरदराज के और पहाड़ी क्षेत्रों तक आपातकालीन सहायता और राहत सामग्री पहुंचाना मुश्किल हो जाता है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (National Disaster Response Fund – NDRF)
- राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (State Disaster Response Fund – SDRF)
- राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना (National Disaster Management Plan)
आगे की राह
- आपदा-रोधी बुनियादी ढांचे का निर्माण: सड़कों, पुलों और अन्य महत्वपूर्ण संरचनाओं को अत्यधिक मौसम की घटनाओं का सामना करने के लिए मजबूत और लचीला बनाना।
- पूर्व चेतावनी प्रणालियों का सुदृढीकरण: भूस्खलन और बाढ़ के लिए उन्नत मौसम पूर्वानुमान और पूर्व चेतावनी प्रणालियों को स्थापित करना और उनका प्रभावी ढंग से उपयोग करना।
- समुदाय-आधारित आपदा प्रबंधन: स्थानीय समुदायों को आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रतिक्रिया के लिए प्रशिक्षित और सशक्त बनाना।
- पर्यावरण-संवेदनशील विकास: पहाड़ी क्षेत्रों में वनों की कटाई को रोकना, वैज्ञानिक भूमि उपयोग योजना को बढ़ावा देना और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील निर्माण प्रथाओं को अपनाना।
- अंतर-एजेंसी समन्वय में सुधार: आपदा प्रतिक्रिया और राहत कार्यों के लिए विभिन्न सरकारी विभागों और एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करना।
- पुनर्वास और पुनर्निर्माण के लिए दीर्घकालिक योजना: आपदा प्रभावित लोगों के लिए स्थायी पुनर्वास और क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे के त्वरित पुनर्निर्माण के लिए व्यापक योजनाएं विकसित करना।
- जलवायु परिवर्तन अनुकूलन रणनीतियाँ: जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और भविष्य की आपदाओं के लिए तैयारी करने हेतु दीर्घकालिक अनुकूलन रणनीतियों को लागू करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मानसूनी आपदाएँ · आपदा प्रबंधन · हिमाचल प्रदेश · भूस्खलन · जलवायु परिवर्तन · बुनियादी ढाँचा · राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष · राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 243W’, ‘note’: ‘शहरी स्थानीय निकायों की शक्तियां, प्राधिकार और उत्तरदायित्व’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 243G’, ‘note’: ‘पंचायतों की शक्तियां, प्राधिकार और उत्तरदायित्व’}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘संघ, राज्य और समवर्ती सूची में आपदा प्रबंधन’}
अवधारणा प्रवाह
अत्यधिक मानसूनी वर्षा → भूस्खलन और बाढ़ → सड़कें, बिजली और पेयजल आपूर्ति बाधित → जानमाल और संपत्ति का नुकसान → आर्थिक और सामाजिक व्यवधान → आपदा प्रबंधन और पुनर्निर्माण की आवश्यकता
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) का गठन किया गया था।
2. राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) प्राथमिक रूप से केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित होता है।
3. भूस्खलन को एक प्राकृतिक आपदा माना जाता है, जो अक्सर अत्यधिक वर्षा से और भी गंभीर हो जाती है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 भारत में आपदा प्रबंधन के लिए एक व्यापक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है और इसी के तहत NDMA का गठन किया गया था। कथन 2 गलत है। SDRF में केंद्र सरकार का योगदान 75% (विशेष श्रेणी के राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 90%) होता है, लेकिन यह राज्य सरकार के योगदान से भी बनता है और राज्य सरकार द्वारा ही इसका प्रबंधन किया जाता है। कथन 3 सही है। भूस्खलन एक प्राकृतिक आपदा है, और भारी वर्षा अक्सर मिट्टी को संतृप्त करके इसकी संभावना और गंभीरता को बढ़ा देती है।
Q2. अभिकथन (A): मानसूनी वर्षा भारत में कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
कारण (R): अत्यधिक मानसूनी वर्षा अक्सर भूस्खलन, बाढ़ और बुनियादी ढाँचे को नुकसान पहुँचाती है।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि मानसून भारत की कृषि अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है। कारण (R) भी सही है क्योंकि अत्यधिक वर्षा से भूस्खलन, बाढ़ और बुनियादी ढाँचे को क्षति जैसी आपदाएँ आती हैं। हालाँकि, कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या नहीं है, क्योंकि R में मानसूनी वर्षा के नकारात्मक प्रभावों का उल्लेख है, जबकि A में इसके सकारात्मक महत्व पर जोर दिया गया है। दोनों कथन व्यक्तिगत रूप से सही हैं लेकिन एक-दूसरे की व्याख्या नहीं करते।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में मानसूनी आपदाओं, विशेष रूप से पहाड़ी क्षेत्रों में, के बढ़ते प्रभाव के कारणों का विश्लेषण कीजिए। इन आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए आपदा प्रबंधन के विभिन्न घटकों पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: भारत में मानसून के महत्व और हाल के वर्षों में मानसूनी आपदाओं, विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों में, में वृद्धि का संक्षिप्त उल्लेख। (जैसे हिमाचल प्रदेश में भूस्खलन, बाढ़)
2. मानसूनी आपदाओं के बढ़ते प्रभावों के कारण:
a. जलवायु परिवर्तन: वर्षा पैटर्न में बदलाव, अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में वृद्धि।
b. अनियोजित शहरीकरण और बुनियादी ढाँचा विकास: पहाड़ी ढलानों पर निर्माण, वनों की कटाई।
c. भूवैज्ञानिक कारक: हिमालय जैसे युवा और अस्थिर पर्वत श्रृंखलाओं की संवेदनशीलता।
d. अपर्याप्त जल निकासी प्रणाली: पानी के जमाव और मिट्टी के कटाव में वृद्धि।
e. जागरूकता और तैयारी की कमी: स्थानीय समुदायों में जोखिम की समझ का अभाव।
3. आपदा प्रबंधन के विभिन्न घटक (नुकसान कम करने के लिए):
a. शमन (Mitigation): जोखिम मूल्यांकन, भूमि उपयोग योजना, भवन संहिता का सख्त प्रवर्तन, वनीकरण, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली।
b. तैयारी (Preparedness): आपदा प्रतिक्रिया योजनाओं का विकास, मॉक ड्रिल, क्षमता निर्माण, समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन।
c. प्रतिक्रिया (Response): खोज और बचाव अभियान, राहत सामग्री का वितरण, चिकित्सा सहायता, अस्थायी आश्रय।
d. पुनर्निर्माण और पुनर्वास (Reconstruction and Rehabilitation): क्षतिग्रस्त बुनियादी ढाँचे का पुनर्निर्माण, प्रभावित लोगों का पुनर्वास, आजीविका बहाली।
e. संस्थागत ढाँचा: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA), जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) की भूमिका।
f. प्रौद्योगिकी का उपयोग: रिमोट सेंसिंग, GIS, मौसम पूर्वानुमान।
4. निष्कर्ष: एक समग्र और बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल, जिसमें वैज्ञानिक अनुसंधान, सामुदायिक भागीदारी और नीतिगत हस्तक्षेप शामिल हों।
स्रोत: amarujala.com
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