आत्मनिर्भर दलहन मिशन के अंतर्गत बिहार में पहली संरचित दलहन खरीद पहल शुरू

आत्मनिर्भर दलहन मिशन के अंतर्गत बिहार में पहली संरचित दलहन खरीद पहल शुरू

  • मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र – 3 के अंतर्गत ‘ भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास, भारतीय कृषि और कृषि विपणन, भारत में खाद्य सुरक्षा ’ खण्ड से संबंधित। 
  • प्रारंभिक परीक्षा के लिए – ‘ आत्मनिर्भर दलहन मिशन, राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता संघ (NCCF), राष्ट्रीय सहकारी विपणन संघ (NAFED), मूल्य अंतर भुगतान योजना (PDPS), निजी खरीद एवं भंडारण योजना (PPSS), कृषि विज्ञान केंद्र (KVKs), इंटरक्रॉपिंग, ज़ीरो-टिल फार्मिंग ’ खण्ड से संबंधित। 

 

खबरों में क्यों ?

 

 

  • हाल ही में भारत सरकार ने प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (PM-AASHA) के तहत न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) आधारित खरीद प्रणाली को और सुदृढ़ किया है। इस पहल के अंतर्गत छत्तीसगढ़ में खरीद संचालन का विस्तार किया गया है, जबकि बिहार में ‘आत्मनिर्भर दलहन मिशन’ के तहत पहली बार संगठित दलहन खरीद पहल शुरू की गई है। इन प्रयासों का उद्देश्य किसानों को बेहतर मूल्य समर्थन प्रदान करना तथा देश में दलहन उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना है।

 

बिहार में दलहन खरीद पहल की शुरुआत : 

 

  • बिहार में मसूर जैसी दलहनी फसलों की संगठित खरीद ‘ राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता संघ (NCCF) ’ के नेतृत्व में प्रारंभ की गई है। इसके साथ ही ‘ राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (NAFED) ’ अपने व्यापक सहकारी नेटवर्क के माध्यम से मूल्य समर्थन योजना के तहत इस पहल के विस्तार की दिशा में कार्य कर रहा है।

 

छत्तीसगढ़ में MSP आधारित खरीद व्यवस्था : 

 

  • छत्तीसगढ़ में MSP आधारित खरीद भी NCCF द्वारा संचालित की जा रही है। इस प्रक्रिया में ई-समयुक्ति जैसे डिजिटल मंचों तथा विभिन्न जिलों में ‘प्राथमिक कृषि साख समितियों (PACS)’ के केंद्रों का उपयोग किया जा रहा है। यह व्यवस्था विशेष रूप से चना और मसूर जैसी फसलों पर केंद्रित है तथा बड़े पैमाने पर किसानों की भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रयास करती है।

 

आत्मनिर्भर दलहन मिशन : 

 

  • परिचय : केंद्रीय बजट 2025 – 26 में घोषित, दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन (मिशन फॉर आत्मनिर्भरता इन पल्सेस) अक्तूबर 2025 में शुरू किया गया था। यह एक केंद्रीय प्रायोजित योजना है, जिसका उद्देश्य वर्ष 2025–26 से 2030–31 के बीच दलहन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना है।
  • प्रमुख फसलें : यह मिशन विशेष रूप से तूर (अरहर), उड़द और मसूर पर केंद्रित है, जो दैनिक उपभोग के लिए महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन वर्तमान में उत्पादन में कमियों का सामना कर रही हैं।
  • प्रमुख उद्देश्य : यह आयात कम करने, उपज में सुधार लाने, जलवायु-प्रतिकूल प्रथाओं को बढ़ावा देने, किसानों की आय बढ़ाने और दीर्घकालिक पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।

 

दलहन से संबंधित प्रमुख तथ्य : 

 

  • दलहन फलीदार पौधों के खाद्य बीज हैं, जिनकी कटाई केवल उनके सूखे दानों के लिए की जाती है और ये लेग्युमिनोसी (फैबेसी) परिवार से संबंधित हैं।
  • दलहनों में प्रोटीन, फाइबर और पोषक तत्त्व अधिक होते हैं, वसा कम होती है, ये नाइट्रोजन-फिक्सिंग फसलों के रूप में कार्य करती हैं जो मिट्टी की उर्वरता में सुधार करती हैं, और सूखने पर इनका शेल्फ जीवन लंबा होता है। 
  • जलवायु परिस्थितियाँ : दलहन उत्पादन के लिए 20-27 डिग्री सेल्सियस तापमान, 25-60 से.मी. वर्षा और रेतीली-दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है तथा इनकी खेती वर्ष भर की जाती है।
  • रबी दलहन (60% से अधिक योगदान) : चना (काबुली चना), चना (देशी चना), मसूर (लेंस); इन फसलों को बुवाई के लिए हल्की सर्दी, वृद्धि के लिए ठंडा मौसम तथा कटाई के समय गर्म मौसम की आवश्यकता होती है।
  • खरीफ दलहन : मूँग (हरी मूँग), उड़द (काली दाल), अरहर (तुअर); इन फसलों को पूरे वृद्धि चक्र के दौरान गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है।
  • भारत की उत्पादन स्थिति : भारत विश्व स्तर पर दलहन का सबसे बड़ा उत्पादक (25%), उपभोक्ता (27%) और आयातक (14%) है। शीर्ष उत्पादक राज्य मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक हैं।
  • दलहन खाद्यान्न क्षेत्र के 20% हिस्से को कवर करती हैं, लेकिन कुल उत्पादन में केवल 7–10% का योगदान देती हैं। इनमें चना (लगभग 40%) प्रमुख फसल है, इसके बाद तूर/अरहर (15–20%) और उड़द व मूँग (प्रत्येक 8–10%) का स्थान आता है।

 

भारत में दलहनों के निम्न उत्पादन के प्रमुख कारण : 

 

  1. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और नीतिगत पक्षपात : सरकार की MSP नीति गेहूँ और चावल के पक्ष में है, जबकि जल, विद्युत और उर्वरकों पर दी जाने वाली सब्सिडी जल-प्रधान फसलों जैसे धान को प्रोत्साहित करती है। इससे किसान दलहनों की बजाय धान जैसी फसलों की कृषि ज्यादा करते हैं। गेहूँ और चावल की तरह दलहनों की सरकारी खरीद सुसंगत नहीं है, जिससे इसकी कृषि और हतोत्साहित होती है।
  2. जलवायु की अस्थिरता : दलहनों की कृषि अधिकतर वर्षा-आश्रित क्षेत्रों में होती है, जिससे यह मानसून वर्षा पर अत्यधिक निर्भर होती है। यह फसलें चरम मौसम की परिस्थितियों (जैसे अनावृष्टि, बेमौसम वर्षा, अनियमित मानसून) के प्रति कम सहनशील होती हैं और प्रायः क्षतिग्रस्त हो जाती हैं।
  3. कम उत्पादकता और स्थिर उपज दर : भारत में दलहनों की औसत उत्पादकता केवल 660 किग्रा/हेक्टेयर है, जो वैश्विक औसत 909 किग्रा/हेक्टेयर से काफी कम है। इसका मुख्य कारण खराब बीज गुणवत्ता, उच्च उपज देने वाली किस्मों (HYV) की कमी और उन्नत तकनीकों को अपनाने में बाधा है। चावल और गेहूँ जैसे अनाजों की तुलना में दलहनों में अनुसंधान एवं विकास की वृद्धि धीमी रही है।
  4. विखंडित कृषि प्रणाली : अधिकांश दलहन किसान छोटे और सीमांत किसान हैं (जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि है)। इससे उनके पास आर्थिक पैमाने का लाभ नहीं होता और वे बेहतर बीज, सिंचाई व्यवस्था और उर्वरकों में निवेश नहीं कर पाते हैं।
  5. मृदा और कीट संबंधी चुनौतियाँ : दलहन फसलें प्रोटीन, अमीनो एसिड तथा सूक्ष्म पोषक तत्त्वों से भरपूर होने के कारण कीटों को अधिक आकर्षित करती हैं, जिससे इनमें कीट और रोगों का प्रकोप अन्य फसलों की तुलना में अधिक होता है।
  6. फसल संरक्षण प्रौद्योगिकियों के सीमित उपयोग संबंधी चुनौतियाँ : भारत में दलहन फसलों को मृदा की लवणता, पोषक तत्त्वों की कमी और लागत की कमी के कारण फसल संरक्षण प्रौद्योगिकियों के सीमित उपयोग जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है।

 

पीएम-आशा (प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान) : 

 

 

  • परिचय : यह योजना (PM-AASHA) वर्ष 2018 में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने और किसानों को मूल्य अस्थिरता से बचाने के लिए शुरू की गई थी।
  • उद्देश्य : इस योजना का उद्देश्य लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करना, मनमानी बिक्री (डिस्ट्रेस सेल) को कम करना तथा विशेष रूप से दलहन एवं तिलहन के किसानों के लिए कृषि आय स्थिरता को मज़बूत करना है।
  • घटक : इस योजना के अंतर्गत निम्नलिखित तीन घटकों के माध्यम से एक व्यापक मूल्य समर्थन ढाँचा प्रदान किया जाता है:
  • मूल्य समर्थन योजना (PSS) – दलहन, तिलहन और खोपरा की भौतिक खरीद के लिए।
  • मूल्य अंतर भुगतान योजना (PDPS) – जब बाज़ार मूल्य MSP से नीचे गिर जाए, तो किसानों को अंतर की भरपाई के लिए।
  • निजी खरीद एवं भंडारण योजना (PPSS) – खरीद प्रक्रिया में निजी क्षेत्र को शामिल करने के लिए।

 

दलहन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए समाधानात्मक कदम / उपाय : 

 

  • उत्पादकता में वृद्धि करने की आवश्यकता : बेहतर उपज और बेहतर पोषण के लिए उच्च उत्पादक, जलवायु-प्रतिरोधी एवं रोग-प्रतिरोधी किस्मों जैसे अरहर की संकर और जैव-सशक्त दलहन (जैसे आयरन युक्त मसूर) को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। इसके साथ ही प्रमुख दलहन उत्पादक राज्यों (मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र) में सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप/स्प्रिंकलर) का विस्तार करना और खरीफ के बाद की खाली पड़ी धान की भूमि का उपयोग दलहन उत्पादन के लिए  करना और मृदा स्वास्थ्य कार्ड, सेंसर-आधारित सिंचाई और AI-संचालित कीट प्रबंधन के माध्यम से परिशुद्ध कृषि (प्रिसिज़न फार्मिंग) को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।
  • समय पर खरीद सुनिश्चित करने के लिए नीतिगत एवं MSP खरीद प्रणाली में सुधार करने की जरूरत : दालों की समय पर खरीद सुनिश्चित करके MSP खरीद को सुदृढ़ करना तथा अधिक किसानों को कवर करने के लिए पीएम-आशा योजना का विस्तार करने की आवश्यकता है।
  • फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता : दलहन को प्रोत्साहन देने के लिए  जल-गहन फसलों (चावल, गन्ना) के लिए सहायता में कमी करके सब्सिडी को पुनः संतुलित करना तथा प्रोत्साहनों के माध्यम से धान-गेहूँ की एकल खेती से दालों और बाजरा की खेती में फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।
  • प्रसंस्करण अवसंरचना को सुदृढ़ करना और भंडारण प्रणाली में सुधार करने की जरूरत : दलहनों के फसलोत्तर क्षति (वर्तमान में 5-10%) को कम करने के लिए आधुनिक वेयरहाउसिंग, साइलो और हर्मेटिक भंडारण का विस्तार करना तथा इसके साथ ही खेतों के नज़दीक मिनी दाल मिल्स, फोर्टिफिकेशन और पैकेजिंग को समर्थन देकर प्रसंस्करण अवसंरचना को सुदृढ़ करना और किसानों को मध्यस्थों से बचने में सहायता करने के लिए किसान उत्पादक संगठनों (FPO) को प्रोत्साहित करके प्रत्यक्ष बाज़ार संपर्क को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
  • अनुसंधान एवं विस्तार सेवाओं को बढ़ावा देने की जरूरत : बहुफसली खेती के लिए शीघ्र पकने वाली मूंग जैसी अल्पावधि, उच्च उपज वाली किस्मों को विकसित करने हेतु अनुसंधान एवं विकास निधि में वृद्धि करने की आवश्यकता है।
  • कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) का विस्तार किया जाए ताकि किसानों को अंतरफसल प्रणाली (जैसे कपास और दलहन), शून्य जुताई कृषि, तथा एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) में प्रशिक्षण दिया जा सके। 
  • बफर स्टॉक नीति को अपनाने की आवश्यकता : 2.5 – 3 मिलियन टन का गतिशील बफर स्टॉक बनाए रखा जाए ताकि मूल्य झटकों को कम किया जा सके। अधिशेष वाले वर्षों में आयात पर टैरिफ लगाकर उसे नियंत्रित किया जाए, जबकि कमी के समय आयात की अनुमति दी जाए।

 

निष्कर्ष : 

 

  • भारत के दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता केवल एक आर्थिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत के सतत विकास लक्ष्यों SDG-2 (शून्य भुखमरी) एवं SDG-13 (जलवायु कार्रवाई) की प्राप्ति हेतु एक अनिवार्य रणनीतिक कदम है। 
  • ‘आत्मनिर्भर दलहन मिशन’ और ‘पीएम-आशा’ जैसी योजनाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ और बिहार जैसे राज्यों में दिखने वाले सकारात्मक परिणाम इस बात के प्रमाण हैं कि सटीक नीतिगत हस्तक्षेप और आधुनिक तकनीक का समन्वय पोषण सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकता है। 
  • यद्यपि भारत के लिए वर्ष 2030 – 31 तक दलहन उत्पादन में पूर्ण आत्मनिर्भरता प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण है, किंतु वर्तमान प्रयासों की निरंतरता और किसानों के सशक्तिकरण से यह लक्ष्य पूर्णतः साध्य है। 
  • केन्द्र सरकार की यह पहल न केवल देश की खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ करेगी, बल्कि वैश्विक कृषि मानचित्र पर भारत की स्थिति को एक नए शिखर पर ले जाएगी।  

 

स्रोत – पी.आई.बी, डी. डी. न्यूज एवं द हिन्दू।

 

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न : 

 

Q. 1. भारत में दलहन उत्पादन की परिस्थितियों और आंकड़ों के बारे में कौन सा / से कथन सत्य हैं? 

  1. भारत विश्व स्तर पर दलहन का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता और आयातक है। 
  2. दलहन खाद्यान्न क्षेत्र के 20% हिस्से को कवर करती हैं और कुल उत्पादन में लगभग 15-20% योगदान देती हैं। 
  3. रबी दलहनों (जैसे चना, मसूर) का कुल उत्पादन में 60% से अधिक का योगदान है। 
  4. दलहन उत्पादन के लिए आमतौर पर 20-27 डिग्री सेल्सियस तापमान और रेतीली-दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है। 

नीचे दिए गए कूट के माध्यम से सही उत्तर का चयन कीजिए : 

A. केवल कथन 1, 2 और 3 

B. केवल कथन 1, 3 और 4 

C. केवल कथन 2, 3 और 4

D. उपरोक्त सभी कथन।  

उत्तर – B. कथन 2 गलत है क्योंकि भारत में दलहन कुल उत्पादन में केवल 7–10% का योगदान देती हैं, न कि 15-20% देती हैं। 

 

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न : 

 

Q. 1. “भारत विश्व का सबसे बड़ा दलहन उत्पादक होने के बावजूद अपनी घरेलू मांग को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर बना हुआ है।” इस संदर्भ में भारत के दलहन क्षेत्र के समक्ष उपस्थित प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए तथा इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने हेतु प्रभावी उपाय सुझाइए। ( शब्द सीमा –   250, अंक – 15 )

Dr. Akhilesh Kumar Shrivastava
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