उत्तराखंड के नशामुक्ति केंद्र का दौरा: आयुष मंत्रालय से सहयोग की संभावना

उत्तराखंड के नशामुक्ति केंद्र का दौरा: आयुष मंत्रालय से सहयोग की संभावना

नशामुक्ति केंद्र संचालन प्रक्रियाकेंद्र स्थापनासरकारी सहायतागरिमा दृष्टिकोणसमग्र उपचारपारंपरिक पद्धतियांयोग-ध्यानपायलट मूल्यांकनसुरक्षा परीक्षणप्रसारअन्य केंद्रों हेतु
नशामुक्ति केंद्र संचालन प्रक्रिया

✎ नशामुक्ति में मांग न्यूनीकरण का नोडल मंत्रालय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय है, जबकि आयुष पद्धतियों के समेकन हेतु साक्ष्य-आधारित पायलट परियोजनाएं और नैदानिक पर्यवेक्षण अनिवार्य हैं।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन एवं सामाजिक न्याय (कमजोर वर्गों के लिए योजनाएं, नशामुक्ति व पुनर्वास नीति)  |  GS Paper II — राजव्यवस्था (अनुच्छेद 47, मौलिक अधिकार और राज्य के नीति निदेशक तत्व)  |  GS Paper II — स्वास्थ्य (मानसिक स्वास्थ्य, आयुष चिकित्सा का समेकन)
  • Prelims: राष्ट्रीय मादक द्रव्य मांग न्यूनीकरण कार्य योजना (NAPDDR), नार्कोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्स्टेंसेज़ (NDPS) अधिनियम, 1985, एकीकृत पुनर्वास केंद्र योजना (IRCA), मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017, अनुच्छेद 47 (पोषण स्तर, जीवन स्तर और मादक पेयों तथा हानिकारक नशीले पदार्थों पर प्रतिबंध), आयुष मंत्रालय (2014 में स्वतंत्र मंत्रालय के रूप में गठित), राष्ट्रीय मादक द्रव्य नियंत्रण ब्यूरो (NCB) और मांग न्यूनीकरण में अंतर, संयुक्त राष्ट्र नशीली दवा एवं अपराध कार्यालय (UNODC)
  • Essay: नशे की समस्या: आपूर्ति पर नियंत्रण से मांग न्यूनीकरण और पुनर्वास तक का सफर, पारंपरिक चिकित्सा और आधुनिक नैदानिक देखभाल का समन्वय: साक्ष्य, सुरक्षा और गरिमा का प्रश्न

त्वरित पुनरावृत्ति: नशामुक्ति में मांग न्यूनीकरण का नोडल मंत्रालय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय है, जबकि आयुष पद्धतियों के समेकन हेतु साक्ष्य-आधारित पायलट परियोजनाएं और नैदानिक पर्यवेक्षण अनिवार्य हैं।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

यह खबर चर्चा में क्यों?

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की अपर सचिव श्रीमती मोना के. खंडार ने उत्तराखंड के रायवाला स्थित सरकारी नशामुक्ति केंद्र का दौरा किया, जिसका संचालन सोसाइटी फॉर प्रमोशन ऑफ यूथ एंड मासेस (SPYM) द्वारा किया जाता है। इस केंद्र में चिकित्सा देखभाल, पेशेवर परामर्श, संरचित दैनिक दिनचर्या और स्वास्थ्य संबंधी गतिविधियों को मिलाकर गरिमा-केंद्रित समग्र दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है। दौरे के दौरान उन्होंने आयुष मंत्रालय के सहयोग से योग, ध्यान और प्राकृतिक चिकित्सा जैसी उपयुक्त पारंपरिक स्वास्थ्य पद्धतियों को नशामुक्ति कार्यक्रमों में एकीकृत करने की संभावनाएं तलाशने की इच्छा जताई। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि पहले पायलट परियोजनाओं के माध्यम से इनकी सुरक्षा, स्वीकार्यता और लाभ का व्यवस्थित मूल्यांकन हो, और सफल प्रथाओं को अन्य सरकारी सहायता प्राप्त केंद्रों में अपनाने पर विचार सम्बंधित मंत्रालयों की स्वीकृति के अधीन किया जाए। साथ ही, पारदर्शी प्रक्रियाओं, योग्य पेशेवरों, शिकायत निवारण और दुर्व्यवहार से सुरक्षा के उपायों पर भी बल दिया गया।

पृष्ठभूमि

  • भारत में नशे की समस्या से निपटने की कानूनी आधारशिला NDPS अधिनियम, 1985 है, जो नशीले पदार्थों के उत्पादन, कब्जे, व्यापार और उपभोग से जुड़े अपराधों को नियंत्रित करता है। इसके प्रवर्तन की प्रमुख एजेंसी राष्ट्रीय मादक द्रव्य नियंत्रण ब्यूरो (NCB) है।
  • नशे की मांग को कम करने और उपचार-पुनर्वास को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के पास है। इसी के तहत राष्ट्रीय मादक द्रव्य मांग न्यूनीकरण कार्य योजना (NAPDDR) और एकीकृत पुनर्वास केंद्र योजना (IRCA) के माध्यम से सरकारी सहायता प्राप्त नशामुक्ति केंद्र चलाए जाते हैं।
  • मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, सूचित सहमति और गरिमा के साथ उपचार के अधिकार को सुनिश्चित करता है, जो नशा-उपचार की कानूनी और नैतिक पृष्ठभूमि भी है।
  • आयुष मंत्रालय आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी के विकास और प्रसार के लिए नोडल मंत्रालय है। आधुनिक चिकित्सा के साथ इन पद्धतियों के समेकन पर प्रमाण-आधारित शोध और मानकीकरण की आवश्यकता बनी रहती है।
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र नशीली दवा एवं अपराध कार्यालय (UNODC) नशे की रोकथाम को स्वास्थ्य-आधारित दृष्टिकोण से जोड़ने पर बल देता है, जिसमें उपचार, पुनर्वास और सामाजिक पुनःएकीकरण को केंद्रीय स्थान प्राप्त है।

नशामुक्ति एवं पुनर्वास नीति क्या है?

  • नशामुक्ति (De-addiction) से आशय ऐसी चिकित्सकीय और सामाजिक प्रक्रिया से है, जिसके द्वारा व्यक्ति मादक पदार्थों पर निर्भरता से मुक्त होता है, जबकि पुनर्वास (Rehabilitation) का अर्थ है उसे परिवार, समुदाय और रोजगार के जीवन में पुनः स्थापित करना।
  • नशे की नीति में मांग न्यूनीकरण (Demand Reduction) रोकथाम, जागरूकता, उपचार और पुनर्वास को जोड़ती है, जबकि आपूर्ति नियंत्रण (Supply Reduction) का दायित्व कानून प्रवर्तन एजेंसियों पर होता है।
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 47 राज्य को पोषण स्तर और जीवन स्तर सुधारने तथा मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पदार्थों पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश देता है। यह नीति-निर्माण का नैतिक-संवैधानिक आधार है।
  • जीवन और गरिमा के साथ जीने का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत आता है, और इसी के विस्तार में पुनर्वास सेवाओं में मानवीय और सुरक्षित देखभाल को संवैधानिक महत्व प्राप्त है।
  • एकीकृत पुनर्वास केंद्र योजना के अंतर्गत सामान्यतः चिकित्सा देखभाल, मनोवैज्ञानिक परामर्श, व्यावसायिक प्रशिक्षण और सामुदायिक पुनःस्थापन जैसे घटक सम्मिलित होते हैं, जिन्हें संरचित दिनचर्या के साथ जोड़ा जाता है।
  • पायलट परियोजना (Pilot Project) किसी नए हस्तक्षेप को सीमित पैमाने पर परखने की प्रक्रिया है, जिसमें दस्तावेजीकरण, मूल्यांकन और मानक-निर्धारण के बाद ही व्यापक अपनाने का निर्णय लिया जाता है।
  • पारंपरिक स्वास्थ्य पद्धतियों को आधुनिक नशा-उपचार में जोड़ने के लिए नैदानिक पर्यवेक्षण, साक्ष्य-आधारित मूल्यांकन, प्रशिक्षित कर्मचारी और गुणवत्ता मानक आवश्यक हैं, ताकि सुरक्षा और प्रभावशीलता सुनिश्चित हो।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
नशामुक्ति केंद्र का समग्र मॉडल (Integrated De-addiction Model) चिकित्सा देखभाल, पेशेवर परामर्श, संरचित दैनिक दिनचर्या और स्वास्थ्य गतिविधियों को एक साथ जोड़कर उपचार की व्यवस्था
संचालन ढांचा रायवाला का यह सरकारी सहायता प्राप्त नशामुक्ति केंद्र सोसाइटी फॉर प्रमोशन ऑफ यूथ एंड मासेस (SPYM) द्वारा संचालित है, जो सरकारी सहायता वाले केंद्रों के व्यापक ढांचे का हिस्सा है
गरिमा-केंद्रित दृष्टिकोण (Dignity-centred Approach) उपचार के केंद्र में रोगी की गरिमा, धैर्य और सहानुभूति को रखा गया है, जो जीवन के अधिकार की संवैधानिक भावना से जुड़ता है
आयुष एकीकरण का प्रस्ताव योग, ध्यान और प्राकृतिक चिकित्सा को साक्ष्य-आधारित उपचार और पेशेवर परामर्श के साथ जोड़कर पायलट परियोजनाओं के माध्यम से परखने की पहल
मूल्यांकन और दस्तावेजीकरण सुरक्षा, स्वीकार्यता और संभावित लाभों के आकलन के लिए व्यवस्थित योजना, प्रलेखन और वैज्ञानिक मूल्यांकन को अनिवार्य माना गया
क्रमिक पुनर्वास स्वस्थ दिनचर्या, खुला संवाद, आत्मविश्वास की बहाली और परिवार तथा समुदाय में वापसी की तैयारी को चरणबद्ध प्रक्रिया के रूप में देखना

महत्व

सामाजिक न्याय और जन-स्वास्थ्य

  • नशे की समस्या को केवल अपराध के बजाय स्वास्थ्य और सामाजिक पुनर्वास की समस्या मानने का दृष्टिकोण इस पहल की मूल भावना है।
  • मादक पदार्थों की मांग में कमी (Drug Demand Reduction) के लिए उपचार के साथ पुनर्वास और सामुदायिक पुनःस्थापन को आवश्यक माना जाता है।
  • पुनर्वास को स्वास्थ्य लाभ की क्रमिक प्रक्रिया के रूप में देखने से दीर्घकालिक परिणामों पर ध्यान बढ़ता है।

संवैधानिक और मानवाधिकार आधार

  • अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार उपचाराधीन व्यक्तियों पर भी लागू होता है, इसलिए हिंसा, धमकी और अपमान से सुरक्षा राज्य का दायित्व है।
  • अनुच्छेद 47 राज्य को लोक स्वास्थ्य के स्तर को ऊंचा करने और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पदार्थों के निषेध का निर्देश देता है। इस दिशा में पुनर्वास सेवाएं निदेशक तत्वों की भावना को व्यवहार में उतारती हैं।

नीति-निर्माण और साक्ष्य आधारित शासन

  • पायलट परियोजनाओं से पहले परीक्षण करने का तरीका साक्ष्य आधारित नीति निर्माण का उदाहरण है, जिसमें सफल प्रथाओं को व्यापक रूप से अपनाने से पहले जांच होती है।
  • अंतर-मंत्रालयी सहयोग (सामाजिक न्याय और आयुष मंत्रालय) से नीतिगत समग्रता आती है और विभिन्न विशेषज्ञताओं का उपयोग संभव होता है।

पारंपरिक चिकित्सा का समन्वय

  • आयुष पद्धतियों को आधुनिक चिकित्सा के सहायक के रूप में परखने की पहल भारत की एकीकृत स्वास्थ्य दृष्टि से मेल खाती है।
  • यह परखा जाएगा कि योग और प्राकृतिक चिकित्सा पेशेवर उपचार को किस सीमा तक पूरक बना सकते हैं, न कि उसका विकल्प।

चुनौतियाँ

1. साक्ष्य का अभाव और वैज्ञानिक सत्यापन

  • योग, ध्यान और प्राकृतिक चिकित्सा के नशामुक्ति में प्रभाव पर सुदृढ़ और व्यापक नैदानिक साक्ष्य अभी सीमित माने जाते हैं।
  • बिना उचित पर्यवेक्षण के पारंपरिक पद्धतियों का प्रयोग रोगी की सुरक्षा और चिकित्सा परिणामों पर असर डाल सकता है।

2. अंतर-मंत्रालयी और केंद्र-राज्य समन्वय

  • नशामुक्ति केंद्रों का संचालन विभिन्न मंत्रालयों और संस्थाओं के बीच बंटा है, इसलिए स्पष्ट भूमिका-विभाजन आवश्यक है।
  • लोक स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है, जबकि सामाजिक न्याय मंत्रालय की नीति और केंद्रीय वित्तीय सहायता का स्वरूप संघीय समन्वय की मांग करता है।

3. मानकीकरण और प्रशिक्षित मानव संसाधन

  • विभिन्न केंद्रों में एक समान प्रोटोकॉल, गुणवत्ता मानक और उपचार दिशा-निर्देशों का अभाव सेवाओं की एकरूपता को प्रभावित करता है।
  • चिकित्सक, परामर्शदाता, आयुष विशेषज्ञ और पुनर्वास कर्मियों का प्रशिक्षण एक साथ करना कठिन और खर्चीला हो सकता है।

4. रोगी अधिकार, सहमति और शिकायत निवारण

  • मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 (Mental Healthcare Act, 2017) सूचित सहमति और गरिमा के अधिकार पर बल देता है; नई पद्धतियों में इनका पालन सुनिश्चित करना आवश्यक है।
  • पारदर्शी प्रक्रियाएं और प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली न होने पर दुर्व्यवहार की आशंका बनी रहती है।

5. सामाजिक कलंक और समुदाय में पुनर्वास

  • नशामुक्ति के बाद परिवार और समाज द्वारा स्वीकार्यता न मिलना पुनः नशे की ओर लौटने का एक बड़ा कारण माना जाता है।
  • केंद्र में मिले कौशल और आत्मविश्वास को समुदाय में रोजगार और सामाजिक भागीदारी से जोड़ना एक अलग चुनौती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
साक्ष्य की कमी पारंपरिक पद्धतियों की प्रभावशीलता और सुरक्षा पर ठोस वैज्ञानिक आंकड़ों के बिना व्यापक अपनाना जोखिमपूर्ण हो सकता है
समन्वय सामाजिक न्याय, आयुष और राज्य स्वास्थ्य विभागों के बीच स्पष्ट जिम्मेदारी न होने से कार्यान्वयन में विलंब संभव है
गुणवत्ता मानक केंद्रों के बीच प्रोटोकॉल और प्रशिक्षण में अंतर से सेवाओं की एकरूपता प्रभावित होती है
रोगी सुरक्षा हिंसा, धमकी और अपमान से सुरक्षा तथा सूचित सहमति के बिना नई पद्धतियां लागू होने का खतरा रहता है
पुनर्वास के बाद की स्थिति समाज की स्वीकार्यता और रोजगार के अवसरों के अभाव में पुनः नशे की संभावना बनी रहती है

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • राष्ट्रीय मादक द्रव्य मांग न्यूनीकरण कार्य योजना (National Action Plan for Drug Demand Reduction – NAPDDR)

आगे की राह

  • पायलट परियोजनाओं की योजना बनाते समय स्पष्ट शोध-प्रश्न, नैतिक अनुमोदन और नैदानिक पर्यवेक्षण को पहले से निर्धारित किया जाए।
  • योग, ध्यान और प्राकृतिक चिकित्सा को पेशेवर उपचार के पूरक के रूप में परखा जाए, विकल्प के रूप में नहीं।
  • आयुष, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और अनुसंधान संस्थानों की संयुक्त समिति बनाकर प्रोटोकॉल और गुणवत्ता मानक तैयार किए जाएं।
  • सभी नशामुक्ति केंद्रों के लिए सामान्य दिशा-निर्देश, दस्तावेजीकरण प्रारूप और मूल्यांकन सूचकांक तय किए जाएं।
  • कर्मचारियों के नियमित प्रशिक्षण और पेशेवर योग्यता के मानदंड लागू किए जाएं।
  • पारदर्शी शिकायत निवारण प्रणाली, स्वतंत्र निरीक्षण और रोगी की सूचित सहमति को अनिवार्य बनाया जाए।
  • पुनर्वास के बाद कौशल विकास, रोजगार और परिवार-समुदाय में पुनःस्थापन के लिए स्थानीय निकायों और अन्य विभागों से समन्वय बढ़ाया जाए।
  • राज्य सरकारों को विश्वास में लेकर सफल प्रथाओं को संघीय ढांचे के अनुरूप अपनाने की प्रक्रिया तय की जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

नशा मुक्ति (De-addiction) · पुनर्वास (Rehabilitation) · गरिमा-केंद्रित देखभाल (Dignity-centred Care) · नशा मुक्ति भारत अभियान (Nasha Mukt Bharat Abhiyaan) · एनडीपीएस अधिनियम, 1985 (NDPS Act, 1985) · मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 (Mental Healthcare Act, 2017) · आयुष (AYUSH) · साक्ष्य-आधारित चिकित्सा (Evidence-based Medicine) · प्रायोगिक परियोजना (Pilot Project) · अनुच्छेद 21 और जीवन का अधिकार (Article 21) · अनुच्छेद 47 और लोक स्वास्थ्य (Article 47) · शिकायत निवारण तंत्र (Grievance Redressal Mechanism)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 21: गरिमापूर्ण जीवन और उपचाराधीन व्यक्तियों की सुरक्षा
  • अनुच्छेद 47: लोक स्वास्थ्य सुधार और नशीले पदार्थों का निषेध
  • सातवीं अनुसूची, राज्य सूची (प्रविष्टि 6): लोक स्वास्थ्य राज्य का विषय

अवधारणा प्रवाह

नशे की समस्या को स्वास्थ्य और सामाजिक पुनर्वास की चुनौती के रूप में पहचाना गया  →  सरकारी सहायता प्राप्त नशामुक्ति केंद्र में चिकित्सा, परामर्श और संरचित दिनचर्या का समग्र मॉडल लागू हुआ  →  अपर सचिव के दौरे में योग और प्राकृतिक चिकित्सा को आयुष मंत्रालय के सहयोग से एकीकृत करने का प्रस्ताव आया  →  प्रस्तावित पायलट परियोजनाओं में नैदानिक पर्यवेक्षण, दस्तावेजीकरण और वैज्ञानिक मूल्यांकन को अनिवार्य माना गया  →  मूल्यांकन के निष्कर्षों और संबंधित मंत्रालयों की मंजूरी के बाद सफल प्रथाओं को अन्य केंद्रों में अपनाने पर विचार होगा  →  मानक प्रोटोकॉल, प्रशिक्षण और रोगी सुरक्षा के ढांचे से पुनर्वास सेवाओं की गुणवत्ता और राष्ट्रव्यापी एकरूपता बढ़ सकती है

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. नशा मुक्ति भारत अभियान का क्रियान्वयन सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा किया जाता है।
2. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 47 राज्य को चिकित्सा प्रयोजनों के अतिरिक्त स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पेयों और मादक दवाओं के सेवन पर रोक लगाने की दिशा में प्रयास करने का निर्देश देता है।
3. टेली-मानस (Tele-MANAS) टोल-फ्री मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन है, जिसका संचालन आयुष मंत्रालय द्वारा किया जाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: नशा मुक्ति भारत अभियान सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा चलाया जाता है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 47 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) लोक स्वास्थ्य के उन्नयन और हानिकारक मादक पदार्थों पर रोक का निर्देश देता है। कथन 3 गलत है: टेली-मानस का संचालन स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन है, आयुष मंत्रालय के अधीन नहीं। अतः दो कथन सही हैं।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों (A और R) पर विचार कीजिए:
कथन (A): नशा मुक्ति केंद्रों में योग और प्राकृतिक चिकित्सा को शामिल करने से पहले उसे उचित नैदानिक पर्यवेक्षण में प्रायोगिक परियोजनाओं के माध्यम से परखा जाना चाहिए।
कारण (R): पारंपरिक स्वास्थ्य पद्धतियों की सुरक्षा और उपयोगिता का वैज्ञानिक आकलन केवल व्यवस्थित दस्तावेज़ीकरण और मूल्यांकन के माध्यम से ही संभव है।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) सही है और (R) उसकी सही व्याख्या है
  2. (A) सही है, किंतु (R) उसकी सही व्याख्या नहीं है
  3. (A) सही है, किंतु (R) गलत है
  4. (A) गलत है, किंतु (R) सही है

उत्तर: (A) सही है और (R) उसकी सही व्याख्या है — (A) और (R) दोनों सही हैं। किसी पारंपरिक पद्धति को नशा मुक्ति उपचार में जोड़ने से पहले उसकी सुरक्षा, स्वीकार्यता और लाभ का व्यवस्थित मूल्यांकन आवश्यक है। इसी कारण (R) (A) की सही व्याख्या करता है, क्योंकि प्रायोगिक परियोजना की पूर्व-शर्त ही दस्तावेज़ीकरण और मूल्यांकन है।

Q3. निम्नलिखित सूचियों का सही मिलान कीजिए:

सूची I (संस्था)
A. नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो
B. राष्ट्रीय मादक द्रव्य निर्भरता उपचार केंद्र
C. टेली-मानस
D. केंद्रीय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा अनुसंधान परिषद

सूची II (कार्य/पहचान)
1. टोल-फ्री मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन
2. मादक पदार्थ कानूनों का प्रवर्तन, गृह मंत्रालय के अधीन
3. एम्स, नई दिल्ली में स्थित तृतीयक उपचार केंद्र
4. आयुष मंत्रालय के अधीन योग और प्राकृतिक चिकित्सा का अनुसंधान निकाय

सही विकल्प चुनिए:

  1. A-2, B-3, C-1, D-4
  2. A-3, B-2, C-4, D-1
  3. A-1, B-4, C-2, D-3
  4. A-2, B-1, C-3, D-4

उत्तर: A-2, B-3, C-1, D-4 — नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (A) गृह मंत्रालय के अधीन मादक पदार्थ कानूनों का प्रवर्तन करता है, इसलिए A-2। राष्ट्रीय मादक द्रव्य निर्भरता उपचार केंद्र (B) एम्स, नई दिल्ली में स्थित है, इसलिए B-3। टेली-मानस (C) टोल-फ्री मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन है, इसलिए C-1। केंद्रीय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा अनुसंधान परिषद (D) आयुष मंत्रालय का अनुसंधान निकाय है, इसलिए D-4।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ नशा मुक्ति केंद्रों में योग, ध्यान और प्राकृतिक चिकित्सा जैसी पारंपरिक स्वास्थ्य पद्धतियों को आधुनिक चिकित्सा और पेशेवर परामर्श के साथ एकीकृत करने के प्रस्ताव का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि ऐसे एकीकरण को संवैधानिक गरिमा और रोगी सुरक्षा की कसौटी पर किन शर्तों के साथ खरा उतरना होगा। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर की संरचना: (1) भूमिका: नशा मुक्ति भारत अभियान (2020 में आरंभ, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय) और रायवाला (उत्तराखंड) केंद्र में सामाजिक न्याय मंत्रालय तथा आयुष मंत्रालय के बीच प्रस्तावित सहयोग का संदर्भ। (2) संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमा और स्वास्थ्य का अधिकार; कंज्यूमर एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर बनाम भारत संघ (1995) में स्वास्थ्य के अधिकार की व्याख्या; पुट्टस्वामी मामला (2017) में गरिमा और निजता का अधिकार; अनुच्छेद 47 में लोक स्वास्थ्य और मादक पदार्थों के नियंत्रण का निर्देश। (3) वैधानिक ढांचा: एनडीपीएस अधिनियम, 1985 की धारा 71 (उपचार और पुनर्वास) और धारा 64A (नशे के आदी अपराधियों के लिए छूट का प्रावधान); मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 में सूचित सहमति, गोपनीयता और शिकायत निवारण के प्रावधान। (4) पक्ष में तर्क: पारंपरिक पद्धतियों में समग्र दृष्टिकोण, दिनचर्या और आत्मविश्वास निर्माण; प्रायोगिक परियोजनाओं से साक्ष्य का निर्माण; व्यापक अनुप्रयोग से पहले मूल्यांकन। (5) विपक्ष/सावधानियां: पारंपरिक पद्धति को चिकित्सा का विकल्प मानने का जोखिम; साक्ष्य की कमी; सुरक्षा और दुरुपयोग के खतरे; एकीकरण में विशेषज्ञ समन्वय (चिकित्सक, आयुष विशेषज्ञ, मनोचिकित्सक, पुनर्वास विशेषज्ञ) की आवश्यकता। (6) संस्थागत प्रक्रिया: प्रोटोकॉल, गुणवत्ता मानक, कर्मचारी प्रशिक्षण, दस्तावेज़ीकरण, स्वतंत्र मूल्यांकन और सम्बंधित मंत्रालयों की मंजूरी; पारदर्शी शिकायत निवारण और हिंसा व अपमान से सुरक्षा। (7) निष्कर्ष: पेशेवर उपचार के पूरक के रूप में, साक्ष्य आधारित और गरिमा-केंद्रित एकीकरण का तर्कसंगत पक्ष; अंत में यह निष्कर्ष कि एकीकरण की वैधता परिणामों के वैज्ञानिक मूल्यांकन और मानवीय देखभाल पर निर्भर है।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)

Uttarakhand PCS (UKPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: उत्तराखंड के रायवाला स्थित सरकारी नशामुक्ति केंद्र का दौरा हाल ही में किसके द्वारा किया गया?

  1. A. सामाजिक न्याय मंत्रालय की अपर सचिव सुश्री मोना के. खंडार
  2. B. मुख्यमंत्री उत्तराखंड
  3. C. राज्यपाल उत्तराखंड
  4. D. राष्ट्रीय नशा नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष

उत्तर: A. सामाजिक न्याय मंत्रालय की अपर सचिव सुश्री मोना के. खंडार — सामाजिक न्याय मंत्रालय की अपर सचिव सुश्री मोना के. खंडार ने राज्य के नशामुक्ति केंद्रों की स्थिति का जायजा लेने के लिए रायवाला स्थित केंद्र का दौरा किया।

Mains: उत्तराखंड में नशामुक्ति केंद्रों की स्थिति एवं उनके संचालन में आने वाली चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए, राज्य सरकार द्वारा इस दिशा में उठाए गए कदमों का वर्णन कीजिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

No Comments

Post A Comment