08 Aug एसएचआरसी ने कन्नूर में मैंग्रोव और आर्द्रभूमि संरक्षण के लिए सख्त नियमों का पालन सुनिश्चित किया
✎ राज्य मानवाधिकार आयोग ने कन्नूर में मैंग्रोव और आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए सख्त प्रवर्तन का आदेश दिया है, जो स्वच्छ पर्यावरण के संवैधानिक अधिकार को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: मानवाधिकार आयोग, संवैधानिक निकाय, पर्यावरण संरक्षण से संबंधित संवैधानिक प्रावधान | GS Paper III — पर्यावरण: मैंग्रोव, आर्द्रभूमि, पारिस्थितिकी तंत्र, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, जलवायु परिवर्तन
- Prelims: राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC), मैंग्रोव वन, आर्द्रभूमि (Wetlands), रामसर स्थल, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ), अनुच्छेद 21
- Essay: पर्यावरण संरक्षण और मानवाधिकारों का अंतर्संबंध, सतत विकास के लक्ष्य और भारत की चुनौतियाँ
त्वरित पुनरावृत्ति: राज्य मानवाधिकार आयोग ने कन्नूर में मैंग्रोव और आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए सख्त प्रवर्तन का आदेश दिया है, जो स्वच्छ पर्यावरण के संवैधानिक अधिकार को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC) ने कन्नूर जिले में मैंग्रोव वनों और आर्द्रभूमियों के संरक्षण तथा बहाली के लिए मौजूदा नियमों व सरकारी दिशानिर्देशों को सख्ती से लागू करने का आदेश दिया है। यह आदेश जिले में अवैज्ञानिक विकास गतिविधियों और निर्माण मलबे को नदियों के किनारे डंप करने की शिकायत के बाद आया है, जिसने पर्यावरण संबंधी गंभीर चिंताएँ उत्पन्न की हैं। आयोग ने जिला कलेक्टर और प्रधान मुख्य वन संरक्षक को विभिन्न विभागों के साथ समन्वय स्थापित कर मैंग्रोव, आर्द्रभूमि और नदी तट पारिस्थितिकी तंत्र की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।
पृष्ठभूमि
- भारत में मैंग्रोव वन लगभग 4,992 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 0.15 प्रतिशत है। ये मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, गुजरात, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, आंध्र प्रदेश तथा ओडिशा के तटीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
- मैंग्रोव तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण घटक हैं, जो तटीय कटाव को रोकते हैं, तूफान और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं से बचाव करते हैं तथा विभिन्न समुद्री जीवों के लिए प्रजनन और पोषण स्थल प्रदान करते हैं।
- आर्द्रभूमियाँ (Wetlands) भी महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र हैं, जो जल शोधन, बाढ़ नियंत्रण और जैव विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। भारत में कई आर्द्रभूमियों को रामसर स्थलों के रूप में नामित किया गया है।
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 (Environment Protection Act, 1986) और तटीय विनियमन क्षेत्र (Coastal Regulation Zone – CRZ) अधिसूचनाएँ मैंग्रोव और आर्द्रभूमियों सहित तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण के लिए कानूनी ढाँचा प्रदान करती हैं।
- भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 (Article 21) ‘जीवन के अधिकार’ की गारंटी देता है, जिसमें स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण में रहने का अधिकार भी शामिल है। सर्वोच्च न्यायालय ने कई निर्णयों में इसे स्थापित किया है।
- राज्य मानवाधिकार आयोग एक वैधानिक निकाय है, जो मानवाधिकारों के उल्लंघन की जाँच करता है और उनके संरक्षण के लिए सिफारिशें करता है। पर्यावरण के अधिकार को अक्सर मानवाधिकार के एक पहलू के रूप में देखा जाता है।
मैंग्रोव और आर्द्रभूमियाँ क्या हैं?
- मैंग्रोव: ये उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले विशेष प्रकार के पेड़ और झाड़ियाँ हैं, जो खारे पानी में उगने के लिए अनुकूलित होते हैं। इनकी जड़ें पानी के ऊपर निकली होती हैं, जो इन्हें ऑक्सीजन लेने में मदद करती हैं।
- पारिस्थितिक महत्व: मैंग्रोव तटीय क्षेत्रों को कटाव से बचाते हैं, तूफानों और सुनामी के प्रभाव को कम करते हैं, तथा मछली, केकड़े और अन्य समुद्री जीवों के लिए नर्सरी और आवास प्रदान करते हैं। ये कार्बन पृथक्करण (Carbon Sequestration) में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- आर्द्रभूमियाँ: ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ पानी स्थायी या मौसमी रूप से भूमि को कवर करता है, जैसे दलदल, दलदली भूमि, पीटभूमि और जल निकाय (झीलें, नदियाँ, मुहाने, तटीय क्षेत्र)।
- आर्द्रभूमियों का महत्व: ये जैव विविधता के हॉटस्पॉट होते हैं, जल शोधन करते हैं, भूजल को रिचार्ज करते हैं, बाढ़ को नियंत्रित करते हैं और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में मदद करते हैं।
- भारत में संरक्षण: भारत में आर्द्रभूमियों को आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 (Wetlands (Conservation and Management) Rules, 2017) के तहत विनियमित किया जाता है। कई आर्द्रभूमियों को रामसर कन्वेंशन के तहत ‘अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि’ के रूप में नामित किया गया है।
- खतरे: शहरीकरण, कृषि विस्तार, प्रदूषण, अतिक्रमण, जलवायु परिवर्तन और अवैज्ञानिक विकास गतिविधियाँ मैंग्रोव और आर्द्रभूमियों के लिए प्रमुख खतरे हैं।
- संरक्षण के प्रयास: भारत सरकार विभिन्न योजनाओं और नीतियों के माध्यम से इन महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण और बहाली के लिए प्रयास कर रही है, जिसमें राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम और मैंग्रोव संरक्षण योजनाएँ शामिल हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| मैंग्रोव वन | तटीय पारिस्थितिकी तंत्र (Coastal Ecosystem) का महत्वपूर्ण हिस्सा; समुद्री जीवन के लिए नर्सरी; सुनामी और चक्रवात से तटीय सुरक्षा। |
| आर्द्रभूमि (Wetlands) | जैव विविधता के हॉटस्पॉट; जल शुद्धिकरण; बाढ़ नियंत्रण; भूजल पुनर्भरण। |
| नदी तट पारिस्थितिकी तंत्र | नदियों के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण; मिट्टी के कटाव को रोकना; स्थानीय जैव विविधता का समर्थन। |
| पर्यावरण संरक्षण नियम | पर्यावरण को क्षति से बचाने और सतत विकास (Sustainable Development) सुनिश्चित करने के लिए कानूनी ढाँचा। |
| मानव अधिकार आयोग (SHRC) | नागरिकों के स्वस्थ और स्वच्छ पर्यावरण में रहने के अधिकार की रक्षा करना। |
महत्व
पर्यावरणीय महत्व
- मैंग्रोव और आर्द्रभूमि कार्बन पृथक्करण (Carbon Sequestration) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के शमन के लिए आवश्यक है।
- ये पारिस्थितिकी तंत्र कई लुप्तप्राय प्रजातियों सहित विविध वनस्पतियों और जीवों के लिए आवास प्रदान करते हैं, जिससे जैव विविधता का संरक्षण होता है।
- मैंग्रोव तटीय कटाव को रोकते हैं और तूफानों तथा सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं से तटीय समुदायों की रक्षा करते हैं।
सामाजिक-आर्थिक महत्व
- स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार नागरिकों के जीवन के अधिकार का एक अभिन्न अंग है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्याख्या की गई है।
- स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र स्थानीय समुदायों के लिए आजीविका के अवसर प्रदान करते हैं, जैसे मछली पकड़ना और पर्यावरण-पर्यटन (Eco-tourism)।
- पर्यावरण क्षरण से स्थानीय आबादी के स्वास्थ्य और कल्याण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे बीमारियों और विस्थापन का खतरा बढ़ जाता है।
शासन और विनियामक महत्व
- राज्य मानव अधिकार आयोग का हस्तक्षेप मौजूदा पर्यावरण कानूनों और दिशानिर्देशों के प्रभावी प्रवर्तन की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।
- यह घटना जिला प्रशासन और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की कमी को उजागर करती है, जो पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है।
- अवैध डंपिंग और अतिक्रमण के खिलाफ सख्त कार्रवाई से भविष्य में ऐसे उल्लंघनों को रोकने में मदद मिलेगी।
चुनौतियाँ
1. अवैज्ञानिक विकास गतिविधियाँ
- कन्नूर में अवैध निर्माण और ठोस कचरे का डंपिंग मैंग्रोव और आर्द्रभूमि को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचा रहा है।
- यह अनियोजित विकास पारिस्थितिकी तंत्र की प्राकृतिक कार्यप्रणाली को बाधित करता है और जैव विविधता को खतरे में डालता है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण क्षरण और संरक्षण
2. कानूनों का अप्रभावी प्रवर्तन
- मौजूदा नियमों और सरकारी दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन नहीं किया जा रहा है, जिससे पर्यावरण को नुकसान हो रहा है।
- पर्यवेक्षण और आवधिक समीक्षा की कमी संरक्षण उपायों को कमजोर करती है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण शासन और कानून
3. अंतर-विभागीय समन्वय का अभाव
- जिला कलेक्टर और प्रधान मुख्य वन संरक्षक के बीच विभिन्न विभागों के साथ समन्वय की आवश्यकता है।
- समन्वय की कमी से संरक्षण प्रयासों में देरी और अक्षमता आती है।
यूपीएससी लिंक: शासन में समन्वय
4. नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन
- अस्वच्छ और अस्वास्थ्यकर वातावरण में रहने से नागरिकों के स्वस्थ और स्वच्छ पर्यावरण में रहने के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन होता है।
- यह विशेष रूप से कमजोर समुदायों को प्रभावित करता है जो सीधे इन पारिस्थितिकी तंत्रों पर निर्भर करते हैं।
यूपीएससी लिंक: मानव अधिकार और पर्यावरण न्याय
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| निर्माण मलबा और प्लास्टिक कचरा डंपिंग | मैंग्रोव और आर्द्रभूमि को भौतिक क्षति; जल निकायों का प्रदूषण; पारिस्थितिकी तंत्र का विनाश। |
| अवैध अतिक्रमण | प्राकृतिक आवासों का नुकसान; पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं में कमी; भूमि उपयोग पैटर्न में परिवर्तन। |
| पर्यावरण नियमों का उल्लंघन | कानून के शासन का कमजोर होना; पर्यावरण संरक्षण लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफलता। |
| निगरानी और समीक्षा की कमी | संरक्षण उपायों की प्रभावशीलता का आकलन करने में असमर्थता; समस्याओं की पहचान करने में देरी। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण और प्रबंधन कार्यक्रम
- मैंग्रोव और प्रवाल भित्तियों का संरक्षण और प्रबंधन योजना
आगे की राह
- मैंग्रोव, आर्द्रभूमि और नदी तट पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए मौजूदा नियमों और दिशानिर्देशों को सख्ती से लागू किया जाए।
- जिला प्रशासन, वन विभाग और अन्य संबंधित विभागों के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित किया जाए।
- अवैध डंपिंग, अतिक्रमण और मैंग्रोव विनाश से संबंधित शिकायतों की समयबद्ध तरीके से जांच की जाए और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।
- संरक्षण उपायों की प्रभावी निगरानी और आवधिक समीक्षा के लिए एक तंत्र स्थापित किया जाए।
- पर्यावरण संरक्षण के महत्व और नागरिकों के स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार के बारे में जन जागरूकता बढ़ाई जाए।
- स्थानीय समुदायों को संरक्षण प्रयासों में शामिल किया जाए, क्योंकि वे इन पारिस्थितिकी तंत्रों के प्राथमिक हितधारक हैं।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
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संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘स्वच्छ पर्यावरण में रहने का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और सुधार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 51A (g)’, ‘note’: ‘प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करना’}
अवधारणा प्रवाह
अवैज्ञानिक विकास और कचरा डंपिंग → मैंग्रोव और आर्द्रभूमि का विनाश → पर्यावरण क्षरण और जैव विविधता का नुकसान → स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार का उल्लंघन → SHRC का हस्तक्षेप और प्रवर्तन का आदेश
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC) एक संवैधानिक निकाय है जिसका उल्लेख सीधे भारत के संविधान में किया गया है।
2. SHRC के पास मैंग्रोव और आर्द्रभूमि जैसे पर्यावरणीय मुद्दों पर निर्देश जारी करने की शक्ति है, यदि वे मानव अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित हों।
3. SHRC के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है। राज्य मानवाधिकार आयोग एक सांविधिक निकाय (Statutory body) है, जिसका गठन मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत किया गया है, न कि संवैधानिक निकाय। कथन 2 सही है। SHRC मानव अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित किसी भी मामले में हस्तक्षेप कर सकता है, जिसमें स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार भी शामिल है, जिसे जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का एक अभिन्न अंग माना जाता है। कथन 3 सही है। SHRC के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा एक समिति की सिफारिश पर की जाती है।
Q2. मैंग्रोव वनों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
1. मैंग्रोव वन केवल उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
2. वे तटीय कटाव को रोकने और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं से बचाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
3. मैंग्रोव की जड़ें ऑक्सीजन-रहित मिट्टी में भी जीवित रहने के लिए अनुकूलित होती हैं।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: 1, 2 और 3 — कथन 1 सही है। मैंग्रोव मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के तटीय खारे पानी और दलदली क्षेत्रों में उगते हैं। कथन 2 सही है। मैंग्रोव अपनी घनी जड़ प्रणालियों के कारण तटीय कटाव को रोकने, तूफानों और सुनामी के प्रभाव को कम करने में मदद करते हैं। कथन 3 सही है। मैंग्रोव की जड़ें विशेष रूप से अनुकूलित होती हैं, जैसे कि वायवीय जड़ें (pneumatophores), जो उन्हें ऑक्सीजन-रहित दलदली मिट्टी में भी श्वसन करने में सक्षम बनाती हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) के एक अभिन्न अंग के रूप में कैसे देखा जाता है? इस संदर्भ में, राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC) जैसे सांविधिक निकाय पर्यावरण संरक्षण में क्या भूमिका निभा सकते हैं? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) के विस्तार के रूप में सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के माध्यम से स्थापित किया गया है। यह नागरिकों के गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार के लिए एक मूलभूत शर्त है।
2. **स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार और अनुच्छेद 21:**
* **सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय:** मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978), सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य (1991), एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (विभिन्न मामले) जैसे ऐतिहासिक निर्णयों का उल्लेख।
* **व्यापक व्याख्या:** न्यायालय ने जीवन के अधिकार को केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित न रखकर, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार के रूप में व्याख्यायित किया है, जिसमें प्रदूषण मुक्त हवा, पानी और स्वस्थ पर्यावरण शामिल है।
* **राज्य का दायित्व:** राज्य का संवैधानिक दायित्व है कि वह नागरिकों को स्वस्थ और स्वच्छ वातावरण प्रदान करे।
3. **राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC) की भूमिका:**
* **सांविधिक आधार:** मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत स्थापित एक सांविधिक निकाय।
* **मानवाधिकारों का प्रहरी:** SHRC मानव अधिकारों के उल्लंघन की जांच करता है और निवारण की सिफारिश करता है। स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार का उल्लंघन सीधे जीवन के अधिकार का उल्लंघन है, जिस पर SHRC संज्ञान ले सकता है।
* **जांच और सिफारिशें:** पर्यावरणीय क्षति, जैसे अवैध डंपिंग, मैंग्रोव/आर्द्रभूमि का विनाश, जो नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन को प्रभावित करता है, पर शिकायतें प्राप्त होने पर जांच करना।
* **निर्देश जारी करना:** संबंधित सरकारी विभागों (जैसे जिला कलेक्टर, प्रधान मुख्य वन संरक्षक) को नियमों के सख्त प्रवर्तन, निगरानी और संरक्षण उपायों के लिए निर्देश जारी करना।
* **जागरूकता और पैरवी:** पर्यावरण संरक्षण के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना और नीतिगत सुधारों की वकालत करना।
* **समन्वय:** विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय स्थापित करने में मदद करना ताकि पर्यावरणीय नियमों का प्रभावी ढंग से पालन हो सके।
4. **चुनौतियाँ और सीमाएँ:** SHRC की सिफारिशें बाध्यकारी नहीं होतीं, केवल सलाहकारी होती हैं। प्रवर्तन के लिए सरकारी इच्छाशक्ति और सहयोग पर निर्भरता।
5. **निष्कर्ष:** SHRC जैसे निकाय पर्यावरण संरक्षण और मानव अधिकारों की सुरक्षा के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करते हैं। वे संवैधानिक दायित्वों को पूरा करने और नागरिकों को स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, खासकर जब स्थानीय प्रशासन निष्क्रिय हो।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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