कर्नाटक उच्च न्यायालय ने मुल्लयनागिरि पहाड़ियों को संरक्षण रिजर्व घोषित करने पर राज्य को नोटिस जारी किया

Karnataka High Court notice to State on plea to declare Mullayyanagiri Hills areas ‘conservation reserve’ — diagram

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने मुल्लयनागिरि पहाड़ियों को संरक्षण रिजर्व घोषित करने पर राज्य को नोटिस जारी किया

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Mullayyanagiri Conservation Reserve

✎ संरक्षण रिज़र्व ऐसे संरक्षित क्षेत्र हैं जिन्हें वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 36A के तहत अधिसूचित किया जाता है, ताकि राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के बाहर के महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्रों को स्थानीय…

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता  |  GS Paper II — शासन, न्यायपालिका और जनहित याचिकाएँ
  • Prelims: मुल्लायनगिरि पहाड़ियाँ, संरक्षण रिज़र्व, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972, धारा 36A, जनहित याचिका (PIL), भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट, कर्नाटक उच्च न्यायालय
  • Essay: पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन, न्यायपालिका की भूमिका: पर्यावरण शासन को सुदृढ़ करना

त्वरित पुनरावृत्ति: संरक्षण रिज़र्व ऐसे संरक्षित क्षेत्र हैं जिन्हें वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 36A के तहत अधिसूचित किया जाता है, ताकि राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के बाहर के महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्रों को स्थानीय समुदाय की भागीदारी के साथ संरक्षित किया जा सके।

यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने मुल्लायनगिरि पहाड़ियों के क्षेत्रों को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 36A के तहत ‘संरक्षण रिज़र्व’ (Conservation Reserve) घोषित करने की मांग वाली एक जनहित याचिका (PIL) पर राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि 2018 में मसौदा प्रस्ताव के बावजूद, अधिकारी अंतिम अधिसूचना जारी करने में विफल रहे हैं, जिससे यह पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र अनियंत्रित निर्माण और पर्यटन गतिविधियों के कारण भूस्खलन के बढ़ते जोखिम का सामना कर रहा है, जैसा कि भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (Geological Survey of India) की एक रिपोर्ट में भी रेखांकित किया गया है।

पृष्ठभूमि

  • मुल्लायनगिरि पहाड़ियाँ कर्नाटक के चिक्कमगलुरु जिले में स्थित हैं और पश्चिमी घाट का हिस्सा हैं, जो अपनी समृद्ध जैव विविधता और पारिस्थितिक संवेदनशीलता के लिए जाने जाते हैं।
  • 2018 में, लगभग 14,183 एकड़ मुल्लायनगिरि पहाड़ियों को ‘संरक्षण रिज़र्व’ घोषित करने के लिए एक मसौदा प्रस्ताव तैयार किया गया था, लेकिन इसकी अंतिम अधिसूचना जारी नहीं की गई।
  • याचिकाकर्ताओं ने पहले भी जुलाई 2019 में उच्च न्यायालय का रुख किया था, जब अदालत ने अधिकारियों को अंतिम अधिसूचना जारी करने का निर्देश दिया था, लेकिन इसका पालन नहीं किया गया।
  • क्षेत्र में अनियंत्रित निर्माण गतिविधियों और पर्यटन को बढ़ावा देने से पारिस्थितिक क्षति बढ़ रही है, जिससे भूस्खलन का खतरा बढ़ गया है।
  • भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण की एक हालिया रिपोर्ट ने मुल्लायनगिरि और चंद्रद्रोण श्रेणियों को वनों की कटाई और अनियंत्रित निर्माण के कारण बार-बार भूस्खलन के उच्च जोखिम वाले ‘खतरनाक क्षेत्र’ घोषित किया है।
  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 36A राज्य सरकार को किसी ऐसे क्षेत्र को ‘संरक्षण रिज़र्व’ घोषित करने का अधिकार देती है जो राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों से सटे हों या उन्हें जोड़ते हों, और जो स्थानीय समुदायों द्वारा संरक्षित हों।

संरक्षण रिज़र्व (Conservation Reserve) क्या हैं?

  • संरक्षण रिज़र्व और सामुदायिक रिज़र्व (Community Reserve) भारत में संरक्षित क्षेत्रों का एक वर्ग हैं जिन्हें वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में 2002 के संशोधन के माध्यम से पेश किया गया था।
  • इनका उद्देश्य राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के बाहर के क्षेत्रों को संरक्षण प्रदान करना है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों को जो इन स्थापित संरक्षित क्षेत्रों को जोड़ते हैं या उनके बफर जोन के रूप में कार्य करते हैं।
  • एक ‘संरक्षण रिज़र्व’ को राज्य सरकार द्वारा घोषित किया जाता है, जब वह किसी ऐसे सरकारी भूमि क्षेत्र को संरक्षित करना चाहती है जो राष्ट्रीय उद्यान या वन्यजीव अभयारण्य से सटा हो और जहाँ स्थानीय समुदायों की भागीदारी आवश्यक हो।
  • इन क्षेत्रों का प्रबंधन एक ‘संरक्षण रिज़र्व प्रबंधन समिति’ द्वारा किया जाता है, जिसमें स्थानीय समुदायों के प्रतिनिधि, वन विभाग के अधिकारी और विशेषज्ञ शामिल होते हैं।
  • इन रिज़र्व का मुख्य उद्देश्य स्थानीय समुदायों के पारंपरिक अधिकारों और आजीविका को प्रभावित किए बिना जैव विविधता का संरक्षण करना है।
  • संरक्षण रिज़र्व घोषित होने से उस क्षेत्र में विकासात्मक गतिविधियों पर कुछ प्रतिबंध लगते हैं, जो पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक होते हैं।
  • यह अधिनियम की धारा 36A के तहत अधिसूचित किए जाते हैं, जो राज्य सरकार को इस तरह के क्षेत्रों को घोषित करने की शक्ति प्रदान करती है।
  • भारत में कई संरक्षण रिज़र्व हैं जो विभिन्न राज्यों में वन्यजीव गलियारों और महत्वपूर्ण पारिस्थितिक स्थलों की रक्षा करते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
संरक्षण रिज़र्व (Conservation Reserve) वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 36A के तहत घोषित संरक्षित क्षेत्र। यह राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों से सटे या उन्हें जोड़ने वाले क्षेत्रों को शामिल करता है, जहाँ स्थानीय समुदायों की भागीदारी से संरक्षण किया जाता है।
मुलय्यानगिरि पहाड़ियाँ (Mullayyanagiri Hills) कर्नाटक के चिक्कमगलुरु जिले में स्थित एक पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र, जो पश्चिमी घाट का हिस्सा है। यह जैव विविधता और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए महत्वपूर्ण है।
जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL) उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में जनहित के मामलों में दायर की जाने वाली याचिका। यह न्यायिक सक्रियता का एक उपकरण है जो कमजोर वर्गों के अधिकारों और पर्यावरणीय मुद्दों जैसे सार्वजनिक महत्व के मामलों को संबोधित करता है।
भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट (Geological Survey Report) मुलय्यानगिरि और चंद्रद्रोण पर्वतमाला को भूस्खलन के उच्च जोखिम वाले ‘खतरनाक क्षेत्र’ घोषित किया गया है, जो वनों की कटाई और अनियंत्रित निर्माण से जुड़ा है। यह क्षेत्र के संरक्षण की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है।

महत्व

पर्यावरण और पारिस्थितिकी

  • मुलय्यानगिरि पहाड़ियाँ पश्चिमी घाट का हिस्सा हैं, जो एक वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट है। इस क्षेत्र को संरक्षण रिज़र्व घोषित करने से इसकी अनूठी वनस्पतियों और जीवों की रक्षा होगी।
  • भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में भूस्खलन के बढ़ते जोखिम को उजागर किया गया है, जो वनों की कटाई और अनियंत्रित निर्माण से जुड़ा है। संरक्षण रिज़र्व का दर्जा इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को और अधिक क्षति से बचाएगा।

शासन और कानून

  • उच्च न्यायालय द्वारा राज्य सरकार को नोटिस जारी करना, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत पर्यावरणीय संरक्षण के कानूनी प्रावधानों को लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
  • यह मामला जनहित याचिका के माध्यम से न्यायिक सक्रियता के महत्व को दर्शाता है, जहाँ नागरिक समाज संगठन पर्यावरणीय मुद्दों पर सरकार की निष्क्रियता को चुनौती दे सकते हैं।

स्थानीय समुदाय और पर्यटन

  • संरक्षण रिज़र्व की घोषणा से पर्यटन गतिविधियों को विनियमित करने में मदद मिलेगी, जिससे अनियंत्रित निर्माण और पारिस्थितिक क्षति को रोका जा सकेगा, जबकि स्थायी पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।
  • संरक्षण रिज़र्व में स्थानीय समुदायों की भागीदारी अनिवार्य होती है, जिससे उन्हें संरक्षण प्रयासों में शामिल किया जा सकता है और उनके पारंपरिक अधिकारों का सम्मान किया जा सकता है।

चुनौतियाँ

1. पर्यावरणीय क्षरण का जोखिम

  • वनों की कटाई और अनियंत्रित निर्माण गतिविधियों के कारण मुलय्यानगिरि क्षेत्र में भूस्खलन का खतरा बढ़ गया है, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ रहा है।
  • संरक्षण रिज़र्व घोषित करने में देरी से क्षेत्र की नाजुक जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों को अपरिवर्तनीय क्षति हो सकती है।

2. पर्यटन और विकास का दबाव

  • पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए निर्माण गतिविधियों की अनुमति देने से पारिस्थितिक क्षति बढ़ रही है, जो दीर्घकालिक स्थिरता के लिए खतरा है।
  • पर्यावरणीय संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाना एक चुनौती है, खासकर संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में।

3. सरकारी निष्क्रियता और कार्यान्वयन में कमी

  • 2018 में मसौदा प्रस्ताव के बावजूद अंतिम अधिसूचना जारी करने में अधिकारियों की विफलता, कानूनी निर्देशों और पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं के कार्यान्वयन में कमी को दर्शाती है।
  • उच्च न्यायालय के पिछले निर्देशों का पालन न करना, शासन में जवाबदेही और पारदर्शिता की कमी को उजागर करता है।

4. कानूनी और प्रशासनिक बाधाएँ

  • संरक्षण रिज़र्व घोषित करने की प्रक्रिया में विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की कमी और नौकरशाही की देरी हो सकती है।
  • भूमि अधिग्रहण और स्थानीय हितधारकों के साथ परामर्श जैसे मुद्दे भी कार्यान्वयन में बाधाएँ उत्पन्न कर सकते हैं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
संरक्षण रिज़र्व की घोषणा में देरी पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में निरंतर क्षरण और जैव विविधता का नुकसान।
अनियंत्रित निर्माण गतिविधियाँ पर्यटन के नाम पर वनों की कटाई और भूस्खलन के जोखिम में वृद्धि।
सरकारी अधिकारियों की निष्क्रियता कानूनी निर्देशों और मसौदा प्रस्तावों के बावजूद अंतिम अधिसूचना जारी करने में विफलता।
भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट की अनदेखी भूस्खलन के ‘खतरनाक क्षेत्र’ के रूप में पहचान के बावजूद अपर्याप्त कार्रवाई।

आगे की राह

  • कर्नाटक सरकार को मुलय्यानगिरि पहाड़ियों को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 36A के तहत तत्काल ‘संरक्षण रिज़र्व’ घोषित करने के लिए अंतिम अधिसूचना जारी करनी चाहिए।
  • क्षेत्र में सभी अनियंत्रित निर्माण गतिविधियों पर तत्काल रोक लगाई जानी चाहिए और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment – EIA) के आधार पर ही किसी भी विकास कार्य की अनुमति दी जानी चाहिए।
  • भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट की सिफारिशों को गंभीरता से लेते हुए, भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों में शमन उपायों को लागू किया जाना चाहिए।
  • स्थानीय समुदायों और नागरिक समाज संगठनों को संरक्षण प्रयासों में सक्रिय रूप से शामिल किया जाना चाहिए, जिससे सहभागी प्रबंधन सुनिश्चित हो सके।
  • पर्यटन गतिविधियों को विनियमित करने के लिए एक व्यापक और सतत पर्यटन नीति विकसित की जानी चाहिए, जो पारिस्थितिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखे।
  • न्यायिक निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए सरकारी विभागों के बीच बेहतर समन्वय और जवाबदेही तंत्र स्थापित किए जाने चाहिए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 · संरक्षण आरक्षित क्षेत्र · जनहित याचिका · पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र · मुलय्यानगिरि पहाड़ियाँ · भूस्खलन · पर्यावरणीय क्षति · सतत पर्यटन · जैव विविधता संरक्षण · उच्च न्यायालय की भूमिका

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 21: जीवन का अधिकार (स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार इसमें निहित है)
  • अनुच्छेद 48A: पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन (राज्य का नीति निर्देशक सिद्धांत)
  • अनुच्छेद 51A(g): प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और संवर्धन (मौलिक कर्तव्य)

अवधारणा प्रवाह

मुलय्यानगिरि पहाड़ियों में पारिस्थितिक संवेदनशीलता  →  वनों की कटाई और अनियंत्रित निर्माण से भूस्खलन का खतरा  →  संरक्षण रिज़र्व घोषित करने के लिए जनहित याचिका  →  उच्च न्यायालय द्वारा राज्य सरकार को नोटिस जारी  →  वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत संरक्षण की आवश्यकता  →  स्थायी संरक्षण और सतत विकास की दिशा में कदम

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह अधिनियम भारत में वन्यजीवों और उनके आवासों के संरक्षण के लिए एक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
2. ‘संरक्षण आरक्षित’ (Conservation Reserve) क्षेत्र की घोषणा राज्य सरकार द्वारा की जाती है, यदि वह किसी राष्ट्रीय उद्यान या वन्यजीव अभयारण्य से सटे किसी क्षेत्र को संरक्षित करना चाहती है।
3. इस अधिनियम के तहत ‘सामुदायिक आरक्षित’ (Community Reserve) क्षेत्र की घोषणा केवल केंद्र सरकार द्वारा की जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 भारत में वन्यजीवों और उनके आवासों के संरक्षण के लिए एक व्यापक कानूनी ढाँचा है। कथन 2 सही है। अधिनियम की धारा 36ए के तहत, राज्य सरकार किसी ऐसे क्षेत्र को ‘संरक्षण आरक्षित’ घोषित कर सकती है जो राष्ट्रीय उद्यान या वन्यजीव अभयारण्य से सटा हो और जहाँ निजी या सामुदायिक भूमि पर आधारित संरक्षण प्रयासों की आवश्यकता हो। कथन 3 गलत है। ‘सामुदायिक आरक्षित’ क्षेत्र की घोषणा भी राज्य सरकार द्वारा की जाती है, यदि स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर संरक्षण के प्रयास किए जाने हों।

Q2. अभिकथन (A): कर्नाटक उच्च न्यायालय ने मुल्य्यानगिरि पहाड़ियों को ‘संरक्षण आरक्षित’ घोषित करने की याचिका पर राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है।
कारण (R): भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (Geological Survey of India) की एक हालिया रिपोर्ट ने मुल्य्यानगिरि और चंद्रद्रोण श्रेणियों को वनों की कटाई और अनियमित निर्माण के कारण लगातार भूस्खलन के उच्च जोखिम वाले ‘खतरे वाले क्षेत्र’ घोषित किया है।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सत्य है, क्योंकि कर्नाटक उच्च न्यायालय ने वास्तव में मुल्य्यानगिरि पहाड़ियों को ‘संरक्षण आरक्षित’ घोषित करने की याचिका पर राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। कारण (R) भी सत्य है, क्योंकि भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट में इन क्षेत्रों को भूस्खलन के उच्च जोखिम वाले ‘खतरे वाले क्षेत्र’ घोषित किया गया है, जो याचिकाकर्ताओं द्वारा ‘संरक्षण आरक्षित’ घोषित करने की मांग का एक प्रमुख आधार है। इस प्रकार, कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत ‘संरक्षण आरक्षित’ की अवधारणा की व्याख्या कीजिए। मुल्य्यानगिरि पहाड़ियों जैसे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को ‘संरक्षण आरक्षित’ घोषित करने में देरी से उत्पन्न होने वाले पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक परिणामों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 का संक्षिप्त उल्लेख और ‘संरक्षण आरक्षित’ की अवधारणा का परिचय। (20-30 शब्द)
2. **’संरक्षण आरक्षित’ की अवधारणा:**
* अधिनियम की धारा 36ए के तहत प्रावधान।
* उद्देश्य: राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के बीच कनेक्टिविटी प्रदान करना, निजी/सामुदायिक भूमि पर संरक्षण को बढ़ावा देना।
* घोषणा प्रक्रिया: राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना, स्थानीय समुदायों के साथ परामर्श।
* प्रबंधन: संरक्षण आरक्षित प्रबंधन समिति का गठन। (60-70 शब्द)
3. **मुल्य्यानगिरि पहाड़ियों का संदर्भ:**
* पारिस्थितिक संवेदनशीलता: पश्चिमी घाट का हिस्सा, जैव विविधता हॉटस्पॉट, भूस्खलन का खतरा (GSI रिपोर्ट का उल्लेख)।
* ‘संरक्षण आरक्षित’ घोषित करने में देरी: मसौदा प्रस्ताव (2018) के बावजूद अंतिम अधिसूचना का अभाव, उच्च न्यायालय के पिछले निर्देशों की अवहेलना। (40-50 शब्द)
4. **देरी के पर्यावरणीय परिणाम:**
* जैव विविधता का नुकसान: स्थानिक प्रजातियों पर खतरा।
* पारिस्थितिकी तंत्र का क्षरण: वनों की कटाई, मृदा अपरदन, भूस्खलन की आवृत्ति में वृद्धि।
* जल स्रोतों पर प्रभाव: जल चक्र का व्यवधान।
* पर्यटन और निर्माण गतिविधियाँ: अनियंत्रित विकास से पारिस्थितिक दबाव। (70-80 शब्द)
5. **देरी के सामाजिक-आर्थिक परिणाम:**
* स्थानीय समुदायों पर प्रभाव: आजीविका का नुकसान, प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता।
* आपदा जोखिम में वृद्धि: भूस्खलन से जान-माल का नुकसान।
* सतत पर्यटन की संभावनाओं पर नकारात्मक प्रभाव।
* शासन और कानूनी जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न। (50-60 शब्द)
6. **निष्कर्ष:** ‘संरक्षण आरक्षित’ की समय पर घोषणा का महत्व, पारिस्थितिक संतुलन और सतत विकास के लिए ऐसे क्षेत्रों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल। (20-30 शब्द)

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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