08 Aug कर्नाटक के मेकेदातु बाँध निर्माण पर बीजेपी-सीपीआई ने किया प्रदर्शन

✎ कावेरी जल विवाद भारत में अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का एक प्रमुख उदाहरण है, जिसका समाधान संवैधानिक प्रावधानों और न्यायाधिकरणों के माध्यम से किया जाता है, लेकिन यह संघवाद और जल प्रबंधन की चुनौतियों को दर्शाता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान, संघवाद, अंतर-राज्यीय संबंध | GS Paper III — जल संसाधन, कृषि
- Prelims: कावेरी नदी, कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT), अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956, अनुच्छेद 262, मेकेदातु परियोजना, संविधान की सातवीं अनुसूची
- Essay: भारत में संघवाद की चुनौतियाँ, जल विवाद: राज्यों के बीच सहयोग और संघर्ष का एक अध्ययन
त्वरित पुनरावृत्ति: कावेरी जल विवाद भारत में अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का एक प्रमुख उदाहरण है, जिसका समाधान संवैधानिक प्रावधानों और न्यायाधिकरणों के माध्यम से किया जाता है, लेकिन यह संघवाद और जल प्रबंधन की चुनौतियों को दर्शाता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, भारतीय जनता पार्टी (BJP) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने कर्नाटक सरकार के खिलाफ कावेरी नदी जल विवाद को लेकर विरोध प्रदर्शन किया है। इन दलों ने कर्नाटक सरकार पर तमिलनाडु को कावेरी जल का उसका उचित हिस्सा जारी न करने और मेकेदातु में कावेरी नदी पर एक बांध बनाने की योजना पर आगे बढ़ने का आरोप लगाया है। प्रदर्शनकारियों ने तमिलनाडु के डेल्टा जिलों में खड़ी कुरुवई फसल को बचाने और पीने के पानी की कमी को रोकने के लिए तत्काल जल जारी करने की मांग की है।
पृष्ठभूमि
- कावेरी जल विवाद भारत के दक्षिणी राज्यों, विशेषकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच एक दीर्घकालिक और संवेदनशील मुद्दा है।
- इस विवाद की जड़ें ब्रिटिश काल में मैसूर रियासत और मद्रास प्रेसीडेंसी के बीच हुए समझौतों में निहित हैं।
- भारत की स्वतंत्रता के बाद, यह विवाद विभिन्न राज्यों के पुनर्गठन के साथ और जटिल हो गया, जिसमें केरल और पुडुचेरी भी शामिल हो गए।
- विवाद को हल करने के लिए, भारत सरकार ने 1990 में कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (Cauvery Water Disputes Tribunal – CWDT) का गठन किया था।
- न्यायाधिकरण ने 2007 में अपना अंतिम निर्णय दिया, जिसमें चारों बेसिन राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के बीच जल के बंटवारे का निर्धारण किया गया।
- न्यायाधिकरण के निर्णय को 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ संशोधनों के साथ बरकरार रखा, जिसने जल बंटवारे के फार्मूले को अंतिम रूप दिया।
- मेकेदातु परियोजना कर्नाटक द्वारा कावेरी नदी पर एक संतुलन जलाशय और जलविद्युत परियोजना के निर्माण का प्रस्ताव है, जिसका तमिलनाडु विरोध करता है, यह तर्क देते हुए कि यह उसके निचले प्रवाह अधिकारों को प्रभावित करेगा।
अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद क्या हैं और इनका समाधान कैसे होता है?
- अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद (Inter-State River Water Disputes) तब उत्पन्न होते हैं जब एक ही नदी बेसिन में स्थित विभिन्न राज्य नदी के जल के उपयोग, वितरण और नियंत्रण को लेकर असहमत होते हैं।
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।
- इस अनुच्छेद के तहत, संसद ने दो महत्वपूर्ण कानून बनाए हैं: नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 (River Boards Act, 1956) और अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State River Water Disputes Act, 1956)।
- अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956, केंद्र सरकार को राज्यों के बीच नदी जल विवादों को सुलझाने के लिए एक न्यायाधिकरण (Tribunal) स्थापित करने का अधिकार देता है।
- एक बार जब न्यायाधिकरण अपना निर्णय देता है, तो वह निर्णय अंतिम और संबंधित राज्यों के लिए बाध्यकारी होता है।
- इस अधिनियम के तहत, न्यायाधिकरण के निर्णय को किसी भी न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा गया है, हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ मामलों में न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की संभावना को बरकरार रखा है।
- इन विवादों का समाधान संघवाद (Federalism) की भावना को बनाए रखने और राज्यों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है।
- जल संविधान की सातवीं अनुसूची (Seventh Schedule) की राज्य सूची (State List) का विषय है, लेकिन अंतर-राज्यीय नदियों के विनियमन और विकास को संघ सूची (Union List) में शामिल किया गया है, जिससे केंद्र सरकार को इन विवादों में हस्तक्षेप करने का अधिकार मिलता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| कावेरी जल विवाद | यह भारत में एक प्रमुख अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद है, जो दशकों से तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और पुडुचेरी के बीच चला आ रहा है। |
| मेकेदातु बांध परियोजना | कर्नाटक द्वारा प्रस्तावित यह बांध परियोजना तमिलनाडु के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि इससे कावेरी नदी के जल प्रवाह पर प्रभाव पड़ने की आशंका है। |
| कुरूवाई फसल | यह तमिलनाडु के डेल्टा क्षेत्रों में उगाई जाने वाली एक महत्वपूर्ण धान की फसल है, जिसके लिए कावेरी जल की समय पर उपलब्धता आवश्यक है। |
| पेयजल संकट | नदी जल की कमी से संबंधित राज्यों में पेयजल की समस्या उत्पन्न हो सकती है, जो एक मानवीय और सामाजिक चिंता का विषय है। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- कावेरी जल विवाद का कृषि क्षेत्र पर सीधा प्रभाव पड़ता है, विशेषकर तमिलनाडु के डेल्टा क्षेत्रों में ‘कुरूवाई’ जैसी महत्वपूर्ण फसलों की खेती पर। जल की कमी से फसल उत्पादन में गिरावट आती है, जिससे किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।
- जल संसाधनों की कमी से औद्योगिक विकास भी बाधित हो सकता है, क्योंकि कई उद्योगों को अपनी प्रक्रियाओं के लिए पानी की आवश्यकता होती है।
- विवाद के कारण उत्पन्न होने वाली अशांति और विरोध प्रदर्शन निवेश के माहौल को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकते हैं, जिससे आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) धीमी हो सकती है।
सामाजिक महत्व
- नदी जल की कमी से संबंधित राज्यों में पेयजल संकट उत्पन्न हो सकता है, जिससे आम जनता के जीवन पर सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- जल विवादों के कारण अंतर-राज्यीय तनाव और सामाजिक अशांति बढ़ सकती है, जिससे कानून और व्यवस्था की स्थिति प्रभावित हो सकती है।
- किसानों और कृषि श्रमिकों की आजीविका पर सीधा प्रभाव पड़ने से ग्रामीण क्षेत्रों में पलायन और गरीबी बढ़ सकती है।
राजनीतिक महत्व
- कावेरी जल विवाद एक संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा है, जिसका उपयोग विभिन्न राजनीतिक दल संबंधित राज्यों में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए करते हैं।
- यह विवाद संघवाद (Federalism) और केंद्र-राज्य संबंधों की प्रकृति को भी उजागर करता है, क्योंकि केंद्र सरकार को अक्सर राज्यों के बीच मध्यस्थता करनी पड़ती है।
- न्यायालयों और न्यायाधिकरणों द्वारा दिए गए निर्णयों का पालन सुनिश्चित करना एक राजनीतिक चुनौती है, और अक्सर इन निर्णयों को लागू करने में कठिनाइयाँ आती हैं।
चुनौतियाँ
1. अंतर-राज्यीय जल विवादों का प्रबंधन
- विभिन्न राज्यों के बीच जल संसाधनों के बंटवारे पर आम सहमति बनाना एक जटिल कार्य है, क्योंकि प्रत्येक राज्य अपने हितों को प्राथमिकता देता है।
- न्यायालयों और न्यायाधिकरणों द्वारा दिए गए निर्णयों को सभी संबंधित पक्षों द्वारा स्वीकार्य बनाना और उनका प्रभावी ढंग से कार्यान्वयन सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: संघवाद, अंतर-राज्यीय संबंध
2. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
- जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा पैटर्न में अनिश्चितता और सूखा जैसी स्थितियाँ बढ़ रही हैं, जिससे नदी जल की उपलब्धता प्रभावित हो रही है और विवाद और गहरा रहे हैं।
- जल संसाधनों के प्रबंधन में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को एकीकृत करना एक नई चुनौती है, जिसके लिए दीर्घकालिक रणनीतियों की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण, आपदा प्रबंधन
3. राजनीतिकरण और लोकलुभावनवाद
- जल विवादों का अक्सर राजनीतिकरण किया जाता है, जिससे समाधान खोजना और भी मुश्किल हो जाता है। राजनीतिक दल इन मुद्दों का उपयोग वोट बैंक की राजनीति के लिए करते हैं।
- लोकलुभावन नीतियों और बयानों से समस्या का समाधान होने के बजाय तनाव और बढ़ जाता है, जिससे सहयोग की संभावना कम हो जाती है।
यूपीएससी लिंक: शासन, राजनीतिक दल
4. बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का विरोध
- मेकेदातु जैसे बांध परियोजनाओं का एक राज्य द्वारा विरोध किया जाता है, जिससे विकास कार्य बाधित होते हैं और जल प्रबंधन की क्षमता प्रभावित होती है।
- परियोजनाओं के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को लेकर भी अक्सर विवाद उत्पन्न होते हैं, जिससे उनके कार्यान्वयन में देरी होती है।
यूपीएससी लिंक: बुनियादी ढांचा, पर्यावरण प्रभाव आकलन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| जल बंटवारा | राज्यों के बीच जल के उचित और न्यायसंगत बंटवारे पर सहमति का अभाव। |
| मेकेदातु बांध | कर्नाटक द्वारा प्रस्तावित बांध से तमिलनाडु को अपने हिस्से के पानी की कमी का डर। |
| फसल सुरक्षा | तमिलनाडु में कुरूवाई जैसी महत्वपूर्ण फसलों के लिए समय पर पानी की अनुपलब्धता। |
| पेयजल | जल की कमी से संबंधित राज्यों में संभावित पेयजल संकट। |
| न्यायिक निर्णय | सर्वोच्च न्यायालय और न्यायाधिकरणों के निर्णयों के कार्यान्वयन में चुनौतियाँ। |
आगे की राह
- अंतर-राज्यीय जल विवादों को सुलझाने के लिए एक स्थायी और प्रभावी तंत्र स्थापित करना, जिसमें सभी हितधारकों की भागीदारी हो।
- कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (Cauvery Water Management Authority) और कावेरी जल विनियमन समिति (Cauvery Water Regulation Committee) जैसे संस्थानों को सशक्त बनाना और उनके निर्णयों का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करना।
- जल संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन और कुशल उपयोग को बढ़ावा देना, जिसमें जल संचयन, पुनर्चक्रण और सिंचाई की आधुनिक तकनीकों का उपयोग शामिल हो।
- संबंधित राज्यों के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा देना, ताकि आपसी विश्वास और समझ विकसित हो सके।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए जल प्रबंधन नीतियों को संशोधित करना और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार रहना।
- जन जागरूकता अभियान चलाना ताकि जल संरक्षण के महत्व को समझा जा सके और जल के विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा दिया जा सके।
- विवादों के राजनीतिकरण से बचना और तकनीकी तथा वैज्ञानिक आधार पर समाधान खोजने पर ध्यान केंद्रित करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
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संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 262’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का न्यायनिर्णयन’}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची (सूची II, प्रविष्टि 17)’, ‘note’: “राज्य सूची में ‘जल’ का विषय”}
अवधारणा प्रवाह
कम वर्षा और सूखे की स्थिति → कावेरी नदी में जल स्तर में कमी → कर्नाटक द्वारा तमिलनाडु को जल छोड़ने में देरी → तमिलनाडु में कुरूवाई फसल और पेयजल संकट की आशंका → विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा विरोध प्रदर्शन
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 262 अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के न्यायनिर्णयन से संबंधित है।
2. संसद ने अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 अधिनियमित किया है।
3. कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) का गठन अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत किया गया था।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 और 2 सही हैं। अनुच्छेद 262 अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के न्यायनिर्णयन से संबंधित है, और संसद ने इस संबंध में अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 अधिनियमित किया है। कथन 3 भी सही है, कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) का गठन इसी अधिनियम के तहत किया गया था।
Q2. कावेरी नदी के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
1. कावेरी नदी पश्चिमी घाट में ब्रह्मगिरि पहाड़ियों से निकलती है।
2. यह कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी से होकर बहती है।
3. मेकेदाटू परियोजना कावेरी नदी पर प्रस्तावित एक बहुउद्देशीय परियोजना है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: 1, 2 और 3 — कथन 1 सही है, कावेरी नदी पश्चिमी घाट में ब्रह्मगिरि पहाड़ियों से निकलती है। कथन 2 गलत है, कावेरी नदी कर्नाटक और तमिलनाडु से होकर बहती है, और इसके बेसिन में केरल और पुडुचेरी भी शामिल हैं, लेकिन यह सीधे केरल से होकर नहीं बहती है। कथन 3 सही है, मेकेदाटू परियोजना कावेरी नदी पर प्रस्तावित एक बहुउद्देशीय परियोजना है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान में संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक हस्तक्षेपों की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। कावेरी जल विवाद के संदर्भ में इसकी चुनौतियों और प्रभावों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: भारत में अंतर-राज्यीय जल विवादों की प्रकृति और उनके महत्व का संक्षिप्त परिचय।
2. संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 262 (अंतर-राज्यीय नदी विवादों का न्यायनिर्णयन), अनुच्छेद 263 (अंतर-राज्यीय परिषद) और सातवीं अनुसूची की सूची II (राज्य सूची) और सूची I (संघ सूची) में जल से संबंधित प्रविष्टियों का उल्लेख।
3. वैधानिक ढाँचा: अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 और इसके तहत गठित न्यायाधिकरणों (जैसे कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण) की भूमिका।
4. न्यायिक हस्तक्षेप: सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका, विशेष रूप से न्यायाधिकरणों के निर्णयों की न्यायिक समीक्षा और उनके कार्यान्वयन में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों (जैसे 2018 का कावेरी जल विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय) का उल्लेख।
5. कावेरी जल विवाद का संदर्भ: कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, मेकेदाटू परियोजना का मुद्दा, और जल बँटवारे को लेकर राज्यों के बीच चल रहे गतिरोध का विश्लेषण।
6. चुनौतियाँ: इन विवादों के समाधान में आने वाली चुनौतियाँ जैसे राजनीतिकरण, डेटा की कमी, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव, राज्यों के बीच विश्वास की कमी और कार्यान्वयन में देरी।
7. प्रभाव: कृषि पर प्रभाव (जैसे कुरुवई फसल), पेयजल संकट, अंतर-राज्यीय संबंधों पर तनाव और संघवाद पर प्रभाव।
8. निष्कर्ष: इन विवादों के स्थायी समाधान के लिए सहयोगात्मक संघवाद, डेटा साझाकरण और एक व्यापक राष्ट्रीय जल नीति की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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