09 Feb दसवीं अनुसूची : दल-बदल विरोधी कानून
दसवीं अनुसूची : दल-बदल विरोधी कानून
सामान्य अध्ययन-II : भारतीय संविधान संसद राज्य विधायिका संवैधानिक संशोधन
चर्चा में क्यों?
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे आमतौर पर ‘दल-बदल विरोधी कानून’ के रूप में जाना जाता है, भारतीय लोकतंत्र के नैतिक और संवैधानिक ढांचे का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तेलंगाना विधानसभा के अध्यक्ष (स्पीकर) को दी गई तीन सप्ताह की अंतिम समय-सीमा ने इस कानून और इसकी सीमाओं को एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। न्यायालय ने यह स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि विधायकों के विरुद्ध लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर इस निर्धारित अवधि में निर्णय नहीं लिया गया, तो इसे न्याय की अवहेलना माना जाएगा और अवमानना की कार्यवाही शुरू की जा सकती है।

दल-बदल विरोधी कानून का ऐतिहासिक विकास और उद्देश्य :
भारतीय राजनीति में ‘आया राम, गया राम’ की संस्कृति, जहाँ विधायक निजी लाभ के लिए बार-बार दल बदलते थे, ने सरकारों की स्थिरता को गंभीर खतरे में डाल दिया था। इसी अस्थिरता को रोकने के लिए वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से दसवीं अनुसूची को भारतीय संविधान का हिस्सा बनाया गया,।
इस कानून के प्राथमिक उद्देश्य निम्नलिखित थे:
1. राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करना: बार-बार होने वाले दल-बदल से सरकारों को गिरने से बचाना।
2. नैतिकता और अनुशासन: निर्वाचित प्रतिनिधियों में पार्टी के प्रति निष्ठा और अनुशासन को बढ़ावा देना।
3. हॉर्स-ट्रेडिंग पर अंकुश: प्रलोभन और खरीद-फरोख्त (विधायकों की खरीद-फरोख्त) के माध्यम से राजनीतिक भ्रष्टाचार को कम करना।
वर्ष 2003 में 91वें संवैधानिक संशोधन द्वारा इस कानून को और अधिक सुदृढ़ किया गया। इससे पहले, यदि किसी दल के एक-तिहाई (1/3) सदस्य दल छोड़ते थे, तो उसे ‘विभाजन’ मानकर अयोग्यता से छूट दी जाती थी। इस संशोधन ने ‘विभाजन’ के प्रावधान को पूरी तरह समाप्त कर दिया और केवल दो-तिहाई (2/3) सदस्यों के विलय को ही कानूनी मान्यता प्रदान की।
अयोग्यता के मानदंड: कब और कैसे?
संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत किसी सांसद या विधायक की सदस्यता रद्द करने के लिए स्पष्ट आधार निर्धारित किए गए हैं:
• स्वैच्छिक सदस्यता का त्याग: यदि कोई सदस्य अपने राजनीतिक दल की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ देता है। यहाँ महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने ‘रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ (1994)’ मामले में स्पष्ट किया कि ‘स्वैच्छिक त्याग’ केवल औपचारिक इस्तीफे तक सीमित नहीं है, बल्कि सदस्य के आचरण और व्यवहार से भी इसकी पुष्टि की जा सकती है,।
• व्हिप का उल्लंघन: राजनीतिक दल सदन के भीतर मतदान के लिए निर्देश (व्हिप) जारी करते हैं। यदि कोई सदस्य अपनी पार्टी के निर्देशों के विरुद्ध मतदान करता है या मतदान से जानबूझकर अनुपस्थित रहता है, तो वह अयोग्य ठहराया जा सकता है।
• निर्दलीय और मनोनीत सदस्य: यदि कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो उसकी सदस्यता तुरंत समाप्त हो जाती है। इसी प्रकार, एक मनोनीत सदस्य के पास किसी दल में शामिल होने के लिए केवल 6 महीने का समय होता है; इसके बाद शामिल होने पर उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।
कानून के तहत अपवाद और छूट :
अयोग्यता के कड़े नियमों के बावजूद, कानून कुछ विशेष परिस्थितियों में छूट भी प्रदान करता है:
1. विलय (Merger): यदि किसी राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य किसी अन्य दल में विलय के लिए सहमत होते हैं, तो वे अयोग्यता की परिधि से बाहर रहते हैं। इसमें मूल दल में बने रहने वाले और विलय करने वाले, दोनों समूहों को सुरक्षा प्राप्त है।
2. पीठासीन अधिकारियों की तटस्थता: सदन के गरिमामयी पद (जैसे स्पीकर, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष) पर आसीन होने वाले व्यक्ति को अपनी निष्पक्षता बनाए रखने के लिए अपनी मूल पार्टी से इस्तीफा देने की अनुमति है, और इसके आधार पर उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
पीठासीन अधिकारी (स्पीकर) की विवादास्पद भूमिका
दसवीं अनुसूची के कार्यान्वयन में सबसे बड़ी चुनौती सदन के अध्यक्ष (स्पीकर) की भूमिका रही है। कानून के अनुसार, अयोग्यता से संबंधित सभी याचिकाओं पर निर्णय लेने का अंतिम अधिकार स्पीकर के पास होता है। हालाँकि, व्यवहार में इस शक्ति का दुरुपयोग अक्सर देखा गया है:
• समय-सीमा का अभाव: मूल कानून में याचिकाओं के निपटारे के लिए कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है।
• ‘पॉकेट वीटो’ और पक्षपात: चूंकि स्पीकर अक्सर सत्ताधारी दल से ही होता है, वह विपक्षी सदस्यों की अयोग्यता पर वर्षों तक निर्णय नहीं लेता, जिसे ‘पॉकेट वीटो’ कहा जाता है। इससे दल-बदल करने वाले सदस्यों को अपनी अयोग्यता के बावजूद सदन की कार्यवाही में भाग लेने और मंत्री पद का आनंद लेने की सुविधा मिल जाती है।
न्यायपालिका का हस्तक्षेप और ऐतिहासिक निर्णय
सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार इस कानून की व्याख्या की है ताकि इसकी निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके:
1. किहोतो होलोहन बनाम जचिल्हु (1992): इस ऐतिहासिक मामले में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि स्पीकर का निर्णय अंतिम नहीं है। यदि निर्णय दुर्भावनापूर्ण मंशा, प्रक्रियात्मक अनियमितता या संवैधानिक उल्लंघन पर आधारित है, तो इसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
2. केशम मेघचंद्र सिंह मामला (2020): मणिपुर विधानसभा से जुड़े इस मामले में न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्देश दिया कि अयोग्यता के मामलों का फैसला अधिमानतः 3 महीने के भीतर किया जाना चाहिए। देरी को दसवीं अनुसूची के मूल उद्देश्य को विफल करने वाला बताया गया।
3. पाडी कौशिक रेड्डी बनाम तेलंगाना (2025): हालिया निर्णय में न्यायालय ने न केवल समय-सीमा निर्धारित की है, बल्कि स्पीकर की भूमिका पर बुनियादी पुनर्विचार और व्यापक संसदीय सुधारों की आवश्यकता पर भी बल दिया है।
कानून की आलोचना और लोकतंत्र पर प्रभाव :
जहाँ यह कानून स्थिरता प्रदान करता है, वहीं इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी हैं:
• असहमति की स्वतंत्रता पर अंकुश: व्हिप की अनिवार्यता के कारण विधायक अपनी व्यक्तिगत राय या अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों की इच्छा के विरुद्ध पार्टी के निर्देशों का पालन करने को मजबूर होते हैं,।
• आंतरिक लोकतंत्र का अभाव: यह कानून राजनीतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व को असीमित शक्तियाँ प्रदान करता है, जिससे पार्टी के भीतर स्वस्थ बहस और आलोचना की संभावना कम हो जाती है।
सुधार के लिए प्रस्तावित मार्ग: आगे की राह
दल-बदल विरोधी कानून को प्रभावी और निष्पक्ष बनाने के लिए विशेषज्ञों और विभिन्न आयोगों ने कई सुझाव दिए हैं:
1. स्वतंत्र अधिकरण (Tribunal) का गठन: 2020 के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय और कई समितियों ने सुझाव दिया है कि अयोग्यता के मामलों का निर्णय लेने की शक्ति राजनीतिक रूप से प्रभावित स्पीकर से हटाकर एक स्वतंत्र निकाय को दी जानी चाहिए,। यह सेवानिवृत्त न्यायाधीशों द्वारा संचालित ट्रिब्यूनल या निर्वाचन आयोग हो सकता है। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) ने भी सिफारिश की थी कि राष्ट्रपति या राज्यपाल को निर्वाचन आयोग की सलाह पर यह निर्णय लेना चाहिए।
2. ब्रिटिश मॉडल और स्पीकर की निष्पक्षता: भारत को ब्रिटेन की उस परंपरा पर विचार करना चाहिए जहाँ स्पीकर निर्वाचित होने के बाद अपनी पार्टी से औपचारिक रूप से इस्तीफा दे देता है, ताकि सदन में उसकी निष्पक्षता पर कोई प्रश्न न उठे।
3. व्हिप के दायरे को सीमित करना: व्हिप का उपयोग केवल उन प्रस्तावों तक सीमित होना चाहिए जो सरकार के अस्तित्व को सीधे प्रभावित करते हैं, जैसे अविश्वास प्रस्ताव, बजट या धन विधेयक। अन्य विधायी कार्यों (सामाजिक, विकासात्मक विधेयक) पर सदस्यों को अपने विवेक और क्षेत्रीय हितों के अनुसार मतदान करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
4. पारदर्शिता और समयबद्धता: दिनेश गोस्वामी समिति (1990) और विधि आयोग की रिपोर्टों के अनुसार, पूरी प्रक्रिया को समयबद्ध, पारदर्शी और सार्वजनिक जाँच के लिए खुला होना चाहिए ताकि जनता का विश्वास बना रहे।
निष्कर्ष :
सर्वोच्च न्यायालय की हालिया चेतावनी इस बात का प्रमाण है कि दल-बदल विरोधी कानून के कार्यान्वयन में गंभीर खामियाँ हैं। केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है; उसे निष्पक्षता और नैतिकता के साथ लागू करना लोकतांत्रिक अखंडता के लिए अनिवार्य है। जब तक निर्णय लेने की प्रक्रिया में राजनीतिक पूर्वाग्रह और देरी को समाप्त नहीं किया जाएगा, तब तक यह कानून हॉर्स-ट्रेडिंग और सत्ता के खेल को रोकने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाएगा। समय आ गया है कि भारत स्वतंत्र न्यायनिर्णयन और संसदीय सुधारों की दिशा में कदम बढ़ाए ताकि प्रतिनिधि लोकतंत्र की गरिमा अक्षुण्ण बनी रहे
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q. भारत के संविधान की निम्नलिखित अनुसूचियों में से किसमें दल-बदल विरोधी प्रावधान हैं? (2014)
(a) दूसरी अनुसूची
(b) पाँचवीं अनुसूची
(c) आठवीं अनुसूची
(d) दसवीं अनुसूची
उत्तर: (d)
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.”अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने में देरी से दल-बदल विरोधी कानून का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है।” हाल के उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेपों के आलोक में चर्चा कीजिये।
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