21 Sep फिल्म महोत्सवों के लिए सेंसर छूट बन गई बाधा: 31 फिल्में हुईं प्रभावित
✎ फिल्म समारोहों के लिए सेंसर छूट, जो पहले एक नियमित प्रक्रिया थी, अब राजनीतिक सामग्री के कारण एक बाधा बन गई है, जिससे कलात्मक अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भारतीय विरासत और संस्कृति | GS Paper II — शासन, संविधान और राजव्यवस्था
- Prelims: केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC), सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, सिनेमैटोग्राफ अधिनियम 1952, फिल्म समारोह, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अनुच्छेद 19(1)(a)
- Essay: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कलात्मक अभिव्यक्ति की सीमाएँ, भारत में कला और संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन
त्वरित पुनरावृत्ति: फिल्म समारोहों के लिए सेंसर छूट, जो पहले एक नियमित प्रक्रिया थी, अब राजनीतिक सामग्री के कारण एक बाधा बन गई है, जिससे कलात्मक अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल के आगामी अंतर्राष्ट्रीय वृत्तचित्र और लघु फिल्म समारोह (IDSFFK) में 31 फिल्मों को सेंसर छूट से वंचित कर दिया गया है, जिनमें से अधिकांश को उनके राजनीतिक कथानक के कारण अस्वीकृत किया गया है। यह घटना फिल्म समारोहों और फिल्म निर्माताओं के लिए सेंसर छूट प्रक्रिया के एक बाधा में बदलने की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाती है, जो पहले एक नियमित प्रक्रिया हुआ करती थी।
पृष्ठभूमि
- सेंसर छूट प्रक्रिया दशकों से फिल्म समारोहों के लिए एक सामान्य प्रक्रिया थी, जहाँ सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (Information and Broadcasting Ministry) आमतौर पर फिल्मों की सूची को बिना किसी आपत्ति के मंजूरी दे देता था।
- यह प्रक्रिया विशेष रूप से उन फिल्मों के लिए महत्वपूर्ण थी जो आमतौर पर गैर-सेंसरकृत होती थीं और सीमित दर्शकों, जैसे प्रतिनिधियों, फिल्म पेशेवरों और विद्वानों के लिए प्रदर्शित की जाती थीं।
- हाल के वर्षों में, मंत्रालय ने कुछ फिल्मों के ‘स्क्रीनर’ (वीडियो लिंक) की मांग करना शुरू कर दिया है और राजनीतिक सामग्री के आधार पर छूट देने से इनकार किया है।
- 2016 में IFFK में ‘मुहम्मद-द मैसेंजर ऑफ गॉड’ और ‘का बॉडीस्केप्स’ जैसी फिल्मों को सेंसर छूट से वंचित किया गया था।
- 2017 में IDSFFK में JNU विरोध प्रदर्शनों, कश्मीर में अशांति और रोहित वेमुला मुद्दे से संबंधित तीन वृत्तचित्रों को छूट नहीं मिली थी।
- 2019 में आनंद पटवर्धन की वृत्तचित्र ‘विवेक’ को केरल उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद ही प्रदर्शित किया जा सका था, जब मंत्रालय ने छूट से इनकार कर दिया था।
- पिछले साल 30वें IFFK में 19 फिल्मों को छूट नहीं मिली थी, जिनमें फिलिस्तीनी और सोवियत-युग की क्लासिक फिल्में शामिल थीं।
भारत में फिल्म सेंसरशिप और छूट क्या है?
- भारत में फिल्मों का विनियमन सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 (Cinematograph Act, 1952) और सिनेमैटोग्राफ (प्रमाणीकरण) नियम, 1983 (Cinematograph (Certification) Rules, 1983) के तहत होता है।
- केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (Central Board of Film Certification – CBFC) एक वैधानिक निकाय है जो फिल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन को प्रमाणित करता है।
- CBFC का मुख्य कार्य यह सुनिश्चित करना है कि फिल्में भारतीय समाज के मूल्यों और संवेदनशीलता के अनुरूप हों, और उनमें कोई आपत्तिजनक सामग्री न हो।
- फिल्म समारोहों में प्रदर्शित होने वाली फिल्मों को आमतौर पर CBFC प्रमाणन से छूट दी जाती है, बशर्ते उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा विशेष अनुमति प्राप्त हो।
- यह छूट सीमित दर्शकों और कलात्मक/शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए होती है, और यह सुनिश्चित करती है कि अंतरराष्ट्रीय और प्रायोगिक फिल्मों को बिना व्यावसायिक सेंसरशिप के प्रदर्शित किया जा सके।
- अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार भारत के संविधान द्वारा गारंटीकृत है, जिसमें कलात्मक अभिव्यक्ति भी शामिल है, हालांकि इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
- सेंसरशिप के मुद्दे पर अक्सर कलात्मक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था/नैतिकता के बीच संतुलन को लेकर बहस होती रहती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| फिल्म समारोहों के लिए सेंसर छूट | यह प्रक्रिया फिल्म समारोहों में उन फिल्मों को प्रदर्शित करने की अनुमति देती है जिन्हें सामान्य सेंसर बोर्ड प्रमाणन से छूट प्राप्त है। यह सीमित दर्शकों, फिल्म पेशेवरों और विद्वानों के लिए होती है। |
| राजनीतिक सामग्री वाली फिल्मों को छूट से इनकार | हाल के वर्षों में, राजनीतिक सामग्री वाली कई फिल्मों को छूट देने से इनकार किया गया है, जिससे उनके प्रदर्शन में बाधा उत्पन्न हुई है। |
| सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की भूमिका | मंत्रालय छूट प्रदान करने या अस्वीकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पहले यह एक नियमित प्रक्रिया थी, लेकिन अब यह अधिक कठोर हो गई है। |
| स्क्रीनर की मांग | मंत्रालय अब कुछ फिल्मों के स्क्रीनर (वीडियो लिंक) की मांग कर रहा है, जो पहले नहीं होता था। यह प्रक्रिया को और अधिक जटिल बनाता है। |
| न्यायिक हस्तक्षेप | कुछ मामलों में, फिल्म निर्माताओं और आयोजकों को छूट प्राप्त करने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा है। |
महत्व
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रभाव
- फिल्म समारोहों में सेंसर छूट से इनकार कलात्मक और रचनात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (freedom of artistic and creative expression) पर सीधा प्रभाव डालता है।
- यह फिल्म निर्माताओं को विवादास्पद या राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषयों पर फिल्में बनाने से हतोत्साहित कर सकता है, जिससे कलात्मक विविधता और आलोचनात्मक संवाद सीमित हो सकता है।
सांस्कृतिक आदान-प्रदान और बौद्धिक विमर्श
- फिल्म समारोह सांस्कृतिक आदान-प्रदान (cultural exchange) और बौद्धिक विमर्श (intellectual discourse) के महत्वपूर्ण मंच होते हैं।
- छूट से इनकार इन मंचों पर विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों के प्रदर्शन को बाधित करता है, जिससे दर्शकों को वैश्विक सिनेमा और समसामयिक मुद्दों से अवगत होने का अवसर कम मिलता है।
फिल्म उद्योग पर प्रभाव
- यह फिल्म निर्माताओं, विशेषकर वृत्तचित्र और लघु फिल्म निर्माताओं के लिए एक बाधा बन गया है, जो अक्सर मुख्यधारा के सिनेमा से अलग विषयों पर काम करते हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भारतीय फिल्मों के प्रदर्शन पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे देश की सॉफ्ट पावर (soft power) और सांस्कृतिक कूटनीति (cultural diplomacy) कमजोर हो सकती है।
शासन और पारदर्शिता
- छूट प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और मनमानी इनकार के आरोप शासन (governance) के सिद्धांतों पर सवाल उठाते हैं।
- यह एक ऐसी प्रणाली की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है जो स्पष्ट दिशानिर्देशों और निष्पक्ष मूल्यांकन के साथ कलात्मक स्वतंत्रता का सम्मान करती हो।
चुनौतियाँ
1. कलात्मक स्वतंत्रता का हनन
- फिल्म समारोहों में राजनीतिक सामग्री वाली फिल्मों को छूट से इनकार कलात्मक अभिव्यक्ति और रचनात्मक स्वतंत्रता को बाधित करता है।
- यह फिल्म निर्माताओं को उन विषयों पर काम करने से हतोत्साहित करता है जो संवेदनशील हो सकते हैं, जिससे कलात्मक विविधता और आलोचनात्मक दृष्टिकोणों की कमी हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय समाज, कला एवं संस्कृति
2. पारदर्शिता और मनमानी
- छूट प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और मंत्रालय द्वारा मनमाने ढंग से स्क्रीनर की मांग करना चिंता का विषय है।
- स्पष्ट दिशानिर्देशों और एक निष्पक्ष मूल्यांकन तंत्र की अनुपस्थिति निर्णय लेने में मनमानी को बढ़ावा देती है।
यूपीएससी लिंक: शासन, पारदर्शिता एवं जवाबदेही
3. न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता
- कई मामलों में, फिल्म निर्माताओं को अपनी फिल्मों के प्रदर्शन के लिए न्यायिक हस्तक्षेप (judicial intervention) का सहारा लेना पड़ा है।
- यह दर्शाता है कि प्रशासनिक प्रक्रियाएं पर्याप्त रूप से प्रभावी या निष्पक्ष नहीं हैं, जिससे न्यायपालिका पर अनावश्यक बोझ पड़ रहा है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान, न्यायपालिका
4. अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा पर प्रभाव
- अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में फिल्मों के प्रदर्शन पर प्रतिबंध भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा (international reputation) और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की क्षमता को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है।
- यह देश की सॉफ्ट पावर और वैश्विक मंच पर विचारों की विविधता को बढ़ावा देने की क्षमता को कमजोर करता है।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध, सॉफ्ट पावर
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| सेंसर छूट से इनकार | फिल्म समारोहों में राजनीतिक या संवेदनशील सामग्री वाली फिल्मों के प्रदर्शन को रोकना। |
| प्रक्रिया में बदलाव | पहले एक नियमित प्रक्रिया का अब एक बाधा में बदलना, जिसमें स्क्रीनर की मांग शामिल है। |
| कलात्मक स्वतंत्रता का हनन | फिल्म निर्माताओं को विवादास्पद विषयों पर काम करने से हतोत्साहित करना। |
| पारदर्शिता की कमी | छूट देने या अस्वीकार करने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देशों और तर्क का अभाव। |
| न्यायिक सहारा की आवश्यकता | फिल्मों के प्रदर्शन के लिए बार-बार अदालतों का दरवाजा खटखटाना पड़ना। |
आगे की राह
- सेंसर छूट प्रक्रिया के लिए स्पष्ट और पारदर्शी दिशानिर्देश (clear and transparent guidelines) स्थापित किए जाएं, जिसमें अस्वीकृति के कारणों का स्पष्ट उल्लेख हो।
- सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा फिल्म समारोहों के लिए एक विशेषज्ञ समिति (expert committee) का गठन किया जाए, जिसमें फिल्म निर्माता, विद्वान और कला समीक्षक शामिल हों, जो छूट के आवेदनों का मूल्यांकन करें।
- फिल्म समारोहों को कलात्मक अभिव्यक्ति के मंच के रूप में मान्यता दी जाए और उनके लिए सेंसर बोर्ड प्रमाणन से छूट की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित किया जाए।
- फिल्म समारोहों में प्रदर्शित होने वाली फिल्मों के लिए ‘सीमित दर्शक’ (limited audience) के सिद्धांत को बनाए रखा जाए, क्योंकि ये फिल्में आम जनता के लिए नहीं होती हैं।
- कलात्मक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन (balance between artistic freedom and national security) स्थापित करने के लिए एक व्यापक नीतिगत ढांचा (comprehensive policy framework) विकसित किया जाए।
- फिल्म निर्माताओं और आयोजकों के साथ नियमित संवाद (regular dialogue) स्थापित किया जाए ताकि उनकी चिंताओं को समझा जा सके और प्रक्रिया में सुधार किया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
फिल्म प्रमाणन · सेंसर बोर्ड · अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता · कलात्मक स्वतंत्रता · सिनेमैटोग्राफ अधिनियम · न्यायिक समीक्षा · सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय · फिल्म समारोह · सेंसर छूट · मूल अधिकार
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 19(1)(a)’, ‘note’: ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार’}
अवधारणा प्रवाह
फिल्म समारोहों में सेंसर छूट की प्रक्रिया → राजनीतिक सामग्री वाली फिल्मों को छूट से इनकार → कलात्मक अभिव्यक्ति और रचनात्मक स्वतंत्रता पर प्रभाव → फिल्म निर्माताओं और आयोजकों के लिए बाधाएं → न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता और पारदर्शिता की कमी
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में फिल्मों के प्रमाणन का कार्य केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) द्वारा किया जाता है।
2. फिल्म समारोहों में प्रदर्शित होने वाली फिल्मों को हमेशा CBFC से प्रमाणन की आवश्यकता होती है।
3. सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 फिल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन को विनियमित करता है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। CBFC भारत में फिल्मों के प्रमाणन के लिए एक वैधानिक निकाय है। कथन 2 गलत है। फिल्म समारोहों में प्रदर्शित होने वाली फिल्मों को अक्सर प्रमाणन से छूट मिलती है, हालांकि यह प्रक्रिया हाल ही में जटिल हो गई है। कथन 3 सही है। सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 भारत में फिल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन को नियंत्रित करने वाला प्राथमिक कानून है।
Q2. अभिकथन (A): हाल के वर्षों में फिल्म समारोहों के लिए सेंसर छूट प्राप्त करना एक जटिल प्रक्रिया बन गया है।
कारण (R): सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय अब कुछ फिल्मों की राजनीतिक सामग्री के कारण छूट देने से इनकार कर रहा है।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि फिल्म समारोहों के लिए सेंसर छूट प्राप्त करने की प्रक्रिया अब एक बाधा बन गई है। कारण (R) भी सही है क्योंकि मंत्रालय ने राजनीतिक सामग्री वाली फिल्मों को छूट देने से इनकार किया है, जैसा कि केरल अंतर्राष्ट्रीय वृत्तचित्र और लघु फिल्म महोत्सव के मामले में देखा गया है। R, A का सही स्पष्टीकरण है क्योंकि राजनीतिक सामग्री के कारण छूट से इनकार ही प्रक्रिया को जटिल बना रहा है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में फिल्म प्रमाणन से संबंधित मौजूदा चुनौतियों पर चर्चा कीजिए, विशेष रूप से फिल्म समारोहों के संदर्भ में सेंसर छूट के मुद्दे पर। क्या कलात्मक स्वतंत्रता पर ऐसे प्रतिबंधों को संवैधानिक रूप से उचित ठहराया जा सकता है? समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** भारत में फिल्म प्रमाणन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि और हाल ही में फिल्म समारोहों के लिए सेंसर छूट में आई बाधाओं का उल्लेख।
2. **मौजूदा चुनौतियाँ:**
* **सेंसर छूट में बाधा:** पहले की ‘नियमित प्रक्रिया’ का अब ‘बाधा’ बनना।
* **राजनीतिक सामग्री पर आपत्ति:** विशेष रूप से राजनीतिक या सामाजिक रूप से संवेदनशील विषयों वाली फिल्मों को लक्षित करना।
* **सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की भूमिका:** मंत्रालय द्वारा सीधे फिल्मों की स्क्रीनिंग की मांग और छूट से इनकार।
* **न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता:** फिल्म निर्माताओं और आयोजकों को अदालतों का सहारा लेना पड़ रहा है (जैसे आनंद पटवर्धन का मामला)।
* **कलात्मक स्वतंत्रता पर प्रभाव:** फिल्म निर्माताओं और त्योहार आयोजकों के लिए अनिश्चितता और रचनात्मकता पर संभावित नकारात्मक प्रभाव।
3. **संवैधानिक औचित्य का समालोचनात्मक परीक्षण:**
* **अनुच्छेद 19(1)(a):** अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का संदर्भ।
* **अनुच्छेद 19(2):** इस अधिकार पर लगाए जा सकने वाले ‘उचित प्रतिबंधों’ (जैसे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, मानहानि) का उल्लेख।
* **न्यायिक दृष्टिकोण:** सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का संदर्भ जो कलात्मक स्वतंत्रता और सेंसरशिप के बीच संतुलन स्थापित करते हैं (जैसे ‘के.ए. अब्बास बनाम भारत संघ’ मामला, जहाँ पूर्व-सेंसरशिप को कुछ शर्तों के साथ स्वीकार किया गया था)।
* **सेंसरशिप बनाम प्रमाणन:** इस अंतर को स्पष्ट करें – भारत में प्रमाणन का उद्देश्य सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए उपयुक्तता सुनिश्चित करना है, न कि विचारों को दबाना।
* **आलोचनात्मक विश्लेषण:** क्या राजनीतिक सामग्री के आधार पर छूट से इनकार करना अनुच्छेद 19(2) के तहत ‘उचित प्रतिबंध’ की श्रेणी में आता है? अक्सर, फिल्म समारोहों में सीमित दर्शकों के लिए प्रदर्शन होता है, जो सार्वजनिक प्रदर्शन से भिन्न होता है।
4. **निष्कर्ष:** कलात्मक स्वतंत्रता और राज्य के विनियमन के बीच संतुलन की आवश्यकता पर बल। एक पारदर्शी और सुसंगत सेंसर छूट नीति की वकालत जो संवैधानिक मूल्यों का सम्मान करती हो।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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