08 Aug बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने के लिए नया विधेयक: 13 वर्ष से कम आयु वालों पर प्रतिबंध
✎ SHIELD विधेयक, 2025 का लक्ष्य सोशल मीडिया और गेमिंग प्लेटफॉर्म पर बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करना है, जिसमें अभिभावकीय सहमति, व्यक्तिगत विज्ञापन पर प्रतिबंध और आयु-सत्यापन प्रणाली जैसे प्रावधान शामिल हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — सामाजिक न्याय, शासन, कल्याणकारी योजनाएं | GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा
- Prelims: SHIELD विधेयक, 2025, निजी सदस्य विधेयक, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A, बाल अधिकार, डिजिटल साक्षरता, व्यक्तिगत डेटा संरक्षण
- Essay: डिजिटल युग में बच्चों के अधिकार और चुनौतियाँ, तकनीकी प्रगति और नैतिक दुविधाएँ: सोशल मीडिया का विनियमन
त्वरित पुनरावृत्ति: SHIELD विधेयक, 2025 का लक्ष्य सोशल मीडिया और गेमिंग प्लेटफॉर्म पर बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करना है, जिसमें अभिभावकीय सहमति, व्यक्तिगत विज्ञापन पर प्रतिबंध और आयु-सत्यापन प्रणाली जैसे प्रावधान शामिल हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, एक निजी सदस्य विधेयक, ‘सेफगार्डिंग हेल्दी इंटरनेट एनवायरनमेंट्स फॉर लिटिल डिजिटल-नेटिव्स (SHIELD) विधेयक, 2025’ संसद में पेश किया जाना था। इस विधेयक का उद्देश्य 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों को अभिभावकों की सत्यापित सहमति के बिना सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म पर खाते बनाने से रोकना है। यह विधेयक बच्चों को लक्षित करने वाले व्यक्तिगत विज्ञापनों पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव करता है, जिससे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
पृष्ठभूमि
- भारत में इंटरनेट और स्मार्टफोन के बढ़ते उपयोग के साथ, बच्चे भी डिजिटल दुनिया का एक बड़ा हिस्सा बन गए हैं।
- सोशल मीडिया और गेमिंग प्लेटफॉर्म पर बच्चों की असुरक्षा, साइबरबुलिंग, अनुपयुक्त सामग्री तक पहुँच और डेटा गोपनीयता के उल्लंघन जैसे मुद्दे चिंता का विषय रहे हैं।
- वर्तमान में, भारत में बच्चों के ऑनलाइन व्यवहार और डेटा सुरक्षा को विशेष रूप से विनियमित करने वाला कोई व्यापक कानून नहीं है।
- कई विकसित देशों में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए कड़े कानून हैं, जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका में बच्चों का ऑनलाइन गोपनीयता संरक्षण अधिनियम (Children’s Online Privacy Protection Act – COPPA)।
- संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार कन्वेंशन (UN Convention on the Rights of the Child) भारत द्वारा अनुमोदित है, जो बच्चों के सर्वोत्तम हितों की रक्षा पर जोर देता है, जिसमें डिजिटल वातावरण भी शामिल है।
- सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 (Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules, 2021) कुछ हद तक ऑनलाइन सामग्री को विनियमित करते हैं, लेकिन बच्चों की विशिष्ट सुरक्षा पर केंद्रित नहीं हैं।
- निजता का अधिकार (Right to Privacy) भारत में एक मौलिक अधिकार है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने पुट्टस्वामी मामले में स्थापित किया था, जो बच्चों के डेटा की सुरक्षा के महत्व को रेखांकित करता है।
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक, 2023 (Digital Personal Data Protection Bill, 2023) भी बच्चों के डेटा के प्रसंस्करण के लिए विशेष प्रावधान करता है, जिसमें माता-पिता की सहमति अनिवार्य है।
SHIELD विधेयक, 2025 क्या है?
- SHIELD विधेयक, 2025 एक निजी सदस्य विधेयक है जिसे भाजपा सांसद बैजयंत पांडा द्वारा प्रस्तावित किया गया है।
- यह विधेयक ‘बच्चे’ को 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है।
- विधेयक का मुख्य उद्देश्य सोशल मीडिया सेवाओं, ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म और अन्य डिजिटल मध्यस्थों पर बच्चों की सुरक्षा के लिए विशेष दायित्व थोपना है।
- यह 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों को अभिभावकों की सत्यापित सहमति के बिना खाते बनाने से प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव करता है।
- विधेयक प्लेटफॉर्मों को बच्चों को ट्रैक करने, प्रोफाइल बनाने या व्यक्तिगत विज्ञापनों के साथ लक्षित करने से रोकता है।
- प्लेटफॉर्मों के लिए आयु-सत्यापन प्रणाली (age-verification systems) और अभिभावक-नियंत्रण डैशबोर्ड (parental-control dashboards) अनिवार्य करने का प्रस्ताव है।
- अभिभावक-नियंत्रण डैशबोर्ड अभिभावकों को गतिविधि की निगरानी करने, गोपनीयता सेटिंग्स प्रबंधित करने और स्क्रीन समय को प्रतिबंधित करने की अनुमति देंगे।
- प्लेटफॉर्मों को बच्चों को अश्लील सामग्री, जुआ, हिंसक या चरमपंथी सामग्री और नशीली दवाओं से संबंधित सामग्री के संपर्क में आने से रोकने के लिए कदम उठाने होंगे।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया/गेमिंग खातों पर प्रतिबंध | नाबालिगों को ऑनलाइन जोखिमों से बचाने और उनकी डिजिटल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण। |
| माता-पिता की सत्यापित सहमति अनिवार्य | बच्चों के ऑनलाइन खातों के निर्माण में माता-पिता की भूमिका और जवाबदेही को मजबूत करता है। |
| व्यक्तिगत विज्ञापन पर सीमाएँ | बच्चों को लक्षित करने वाले अनुचित विपणन प्रथाओं से बचाता है, जो उनके व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। |
| अनिवार्य आयु-सत्यापन प्रणाली | प्लेटफॉर्मों पर बच्चों की सही आयु सुनिश्चित करने में मदद करता है, जिससे आयु-उपयुक्त सामग्री तक पहुँच सुनिश्चित होती है। |
| माता-पिता-नियंत्रण डैशबोर्ड | अभिभावकों को बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों की निगरानी करने, गोपनीयता सेटिंग्स प्रबंधित करने और स्क्रीन समय को नियंत्रित करने का अधिकार देता है। |
| नियमों के उल्लंघन पर ₹10 करोड़ तक का जुर्माना | प्लेटफॉर्मों को प्रस्तावित कानूनों का पालन करने के लिए प्रोत्साहित करता है, जिससे बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- यह विधेयक बच्चों को साइबरबुलिंग, अनुपयुक्त सामग्री और ऑनलाइन शोषण जैसे विभिन्न ऑनलाइन खतरों से बचाने का प्रयास करता है।
- यह बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण पर सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभावों को कम करने में मदद कर सकता है, जैसे कि चिंता और अवसाद।
- यह डिजिटल साक्षरता और ऑनलाइन सुरक्षा के महत्व के बारे में माता-पिता और बच्चों दोनों के बीच जागरूकता बढ़ाएगा।
नैतिक महत्व
- यह बच्चों के डेटा गोपनीयता (Data Privacy) और व्यक्तिगत जानकारी के दुरुपयोग को रोकने के लिए एक नैतिक ढाँचा प्रदान करता है।
- यह डिजिटल प्लेटफॉर्मों की नैतिक जिम्मेदारी पर जोर देता है कि वे अपने सबसे कमजोर उपयोगकर्ताओं, यानी बच्चों की सुरक्षा करें।
- यह बच्चों के अधिकारों, विशेष रूप से निजता के अधिकार (Right to Privacy) और स्वस्थ विकास के अधिकार को बनाए रखने में मदद करता है।
प्रशासनिक महत्व
- यह डिजिटल प्लेटफॉर्मों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश और जवाबदेही तंत्र स्थापित करता है, जिससे विनियमन में आसानी होगी।
- यह सरकार को बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
- यह सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (Information Technology Act) के तहत मौजूदा प्रावधानों को मजबूत करेगा और डिजिटल युग की चुनौतियों का सामना करेगा।
चुनौतियाँ
1. आयु सत्यापन की चुनौतियाँ
- ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों पर बच्चों की आयु को सटीक रूप से सत्यापित करना तकनीकी रूप से जटिल और महंगा हो सकता है।
- गोपनीयता संबंधी चिंताएँ उत्पन्न हो सकती हैं यदि आयु सत्यापन के लिए व्यक्तिगत डेटा एकत्र किया जाता है।
यूपीएससी लिंक: शासन, ई-गवर्नेंस
2. निजता का अधिकार बनाम बाल सुरक्षा
- माता-पिता द्वारा बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों की निगरानी से बच्चों की निजता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।
- एक संतुलन बनाना आवश्यक है जहाँ बच्चों की सुरक्षा भी हो और उनके व्यक्तिगत स्थान का सम्मान भी किया जाए।
यूपीएससी लिंक: संविधान, मौलिक अधिकार
3. निजी सदस्य विधेयक की सीमाएँ
- निजी सदस्य विधेयक (Private Member’s Bill) शायद ही कभी कानून बन पाते हैं, जिससे इस विधेयक के पारित होने की संभावना कम हो जाती है।
- सरकार के समर्थन के बिना, ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर कानून बनाना मुश्किल होता है।
यूपीएससी लिंक: संसद, विधायी प्रक्रिया
4. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता
- सोशल मीडिया और गेमिंग प्लेटफॉर्म अक्सर बहुराष्ट्रीय होते हैं, जिससे केवल राष्ट्रीय कानून से उन्हें पूरी तरह से विनियमित करना मुश्किल हो जाता है।
- बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए वैश्विक स्तर पर सहयोग और मानकीकृत नियमों की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध, संधियाँ
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| आयु सत्यापन | सटीक और गोपनीयता-अनुकूल आयु सत्यापन प्रणालियों को लागू करने की तकनीकी और लागत संबंधी चुनौतियाँ। |
| निजता का अधिकार | माता-पिता के नियंत्रण और बच्चों की निजता के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करना। |
| कानून का प्रवर्तन | डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर प्रस्तावित नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करना, विशेषकर वैश्विक कंपनियों के लिए। |
| डिजिटल साक्षरता | माता-पिता और बच्चों दोनों के बीच डिजिटल सुरक्षा और ऑनलाइन जोखिमों के बारे में जागरूकता की कमी। |
| तकनीकी विकास | तेजी से बदलते डिजिटल परिदृश्य में कानूनों को प्रासंगिक और प्रभावी बनाए रखना। |
आगे की राह
- एक व्यापक सरकारी विधेयक पेश किया जाए जो निजी सदस्य विधेयक के प्रावधानों को शामिल करे और उसे कानून बनाने के लिए प्राथमिकता दे।
- आयु सत्यापन के लिए मजबूत, गोपनीयता-केंद्रित और उपयोगकर्ता-अनुकूल तकनीकी समाधान विकसित किए जाएँ।
- बच्चों, माता-पिता और शिक्षकों के लिए डिजिटल साक्षरता और ऑनलाइन सुरक्षा पर राष्ट्रव्यापी जागरूकता अभियान चलाए जाएँ।
- डिजिटल प्लेटफॉर्मों के साथ परामर्श और सहयोग किया जाए ताकि वे इन नियमों का पालन करने के लिए आवश्यक बदलाव कर सकें।
- बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और मानकीकृत नियमों को बढ़ावा दिया जाए।
- कानून के प्रभावी प्रवर्तन के लिए एक मजबूत नियामक तंत्र स्थापित किया जाए, जिसमें उल्लंघनकर्ताओं के लिए स्पष्ट दंड शामिल हों।
- बच्चों के निजता के अधिकार और उनकी सुरक्षा के बीच एक उचित संतुलन सुनिश्चित करने के लिए नियमित समीक्षा और संशोधन किए जाएँ।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
निजी सदस्य विधेयक · सोशल मीडिया विनियमन · बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा · आयु सत्यापन प्रणाली · माता-पिता की सहमति · व्यक्तिगत विज्ञापन पर प्रतिबंध · सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम · डिजिटल मध्यस्थ · डेटा गोपनीयता · बाल अधिकार
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- [‘अनुच्छेद 21’, ‘निजता का अधिकार, गरिमापूर्ण जीवन’]
- [‘अनुच्छेद 21A’, ‘शिक्षा का अधिकार (स्वस्थ विकास के लिए)’]
- [‘अनुच्छेद 39(f)’, ‘बच्चों के स्वस्थ विकास के अवसर’]
अवधारणा प्रवाह
डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर बच्चों की बढ़ती उपस्थिति → ऑनलाइन खतरों (साइबरबुलिंग, अनुपयुक्त सामग्री) में वृद्धि → बच्चों की सुरक्षा के लिए कानूनी ढाँचे की आवश्यकता → SHIELD विधेयक, 2025 का प्रस्ताव → आयु सत्यापन, माता-पिता की सहमति, विज्ञापन पर प्रतिबंध → बच्चों के लिए सुरक्षित ऑनलाइन वातावरण का निर्माण
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. निजी सदस्य विधेयक केवल लोकसभा में ही पेश किए जा सकते हैं।
2. SHIELD विधेयक, 2025 का उद्देश्य 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों को माता-पिता की सहमति के बिना सोशल मीडिया खाते बनाने से रोकना है।
3. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69A सरकार को कुछ ऑनलाइन सामग्री को ब्लॉक करने की शक्ति देती है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है। निजी सदस्य विधेयक संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में पेश किए जा सकते हैं। कथन 2 गलत है। SHIELD विधेयक, 2025 में ‘बच्चे’ को 18 वर्ष से कम आयु का परिभाषित किया गया है और इसका उद्देश्य माता-पिता की सहमति के बिना बच्चों को खाते बनाने से रोकना है, न कि विशेष रूप से 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों को। कथन 3 सही है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69A केंद्र सरकार या उसके अधिकृत अधिकारी को सार्वजनिक पहुंच से किसी भी कंप्यूटर संसाधन में किसी भी जानकारी को ब्लॉक करने का निर्देश देने की शक्ति देती है।
Q2. अभिकथन (A): भारत में निजी सदस्य विधेयक शायद ही कभी कानून बन पाते हैं।
कारण (R): निजी सदस्य विधेयक पर चर्चा के लिए संसद में सीमित समय उपलब्ध होता है और उन्हें अक्सर सरकार का समर्थन प्राप्त नहीं होता है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है। — अभिकथन (A) सही है, क्योंकि स्वतंत्रता के बाद से केवल लगभग एक दर्जन निजी सदस्य विधेयक ही कानून बन पाए हैं। कारण (R) भी सही है और अभिकथन का सही स्पष्टीकरण है, क्योंकि निजी सदस्य विधेयकों पर चर्चा के लिए संसद का बहुत कम समय आवंटित होता है (आमतौर पर शुक्रवार दोपहर को ढाई घंटे) और उन्हें सरकार के समर्थन के बिना पारित करना मुश्किल होता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ बच्चों के लिए सुरक्षित ऑनलाइन वातावरण सुनिश्चित करने हेतु प्रस्तावित SHIELD विधेयक, 2025 के प्रमुख प्रावधानों पर चर्चा कीजिए। साथ ही, भारत में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने में निजी सदस्य विधेयकों की सीमाओं का भी विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के महत्व और SHIELD विधेयक, 2025 के संदर्भ का संक्षिप्त परिचय।
2. **SHIELD विधेयक, 2025 के प्रमुख प्रावधान:**
* ‘बच्चे’ की परिभाषा (18 वर्ष से कम)।
* माता-पिता की सत्यापित सहमति के बिना खाता बनाने पर प्रतिबंध।
* व्यक्तिगत विज्ञापन, ट्रैकिंग और प्रोफाइलिंग पर प्रतिबंध।
* आयु-सत्यापन प्रणालियों की अनिवार्यता।
* माता-पिता के नियंत्रण डैशबोर्ड (गतिविधि की निगरानी, गोपनीयता सेटिंग्स, स्क्रीन टाइम प्रबंधन)।
* अश्लील सामग्री, जुआ, हिंसक/चरमपंथी सामग्री और नशीली दवाओं से संबंधित सामग्री से बच्चों को बचाने के उपाय।
* उल्लंघन पर दंड (₹10 करोड़ तक का जुर्माना, सेवाओं का अस्थायी निलंबन या अवरुद्ध करना)।
3. **भारत में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने में निजी सदस्य विधेयकों की सीमाएँ:**
* **सीमित समय:** संसद में निजी सदस्य विधेयकों पर चर्चा के लिए बहुत कम समय आवंटित होता है।
* **सरकारी समर्थन का अभाव:** अधिकांश निजी सदस्य विधेयकों को सरकार का समर्थन नहीं मिलता, जिससे उनके पारित होने की संभावना कम हो जाती है।
* **कानून बनने की दर:** स्वतंत्रता के बाद से बहुत कम निजी सदस्य विधेयक कानून बन पाए हैं (लगभग एक दर्जन)।
* **व्यापक नीतिगत प्रभाव:** बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा जैसे जटिल मुद्दों के लिए अक्सर व्यापक सरकारी नीति और संसाधनों की आवश्यकता होती है, जो निजी सदस्य विधेयक के दायरे से बाहर हो सकते हैं।
* **कार्यान्वयन चुनौतियाँ:** यदि पारित भी हो जाए, तो निजी सदस्य विधेयक के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक प्रशासनिक मशीनरी और बजट का अभाव हो सकता है।
4. **निष्कर्ष:** बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए निजी सदस्य विधेयकों के महत्व को स्वीकार करते हुए, यह भी स्वीकार करना कि ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर व्यापक और प्रभावी कानून के लिए सरकार की सक्रिय भागीदारी और समर्थन आवश्यक है।
स्रोत: Hindustan Times
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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