बालिका तस्करी: NHRC का स्वतः संज्ञान, मानवाधिकार उल्लंघन पर रिपोर्ट तलब

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बालिका तस्करी: NHRC का स्वतः संज्ञान, मानवाधिकार उल्लंघन पर रिपोर्ट तलब

बालिकाओं की तस्करी की प्रक्रियाबिक्रीगरीबी के कारणपरिवहनफर्जी दस्तावेजपहचान बदलनावयस्क होने परदेह व्यापारउच्च कीमत पर
बालिकाओं की तस्करी की प्रक्रिया

✎ मानव तस्करी और बाल-विक्रय अनुच्छेद 23 के अंतर्गत प्रतिषिद्ध है; राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 12 के तहत स्वत: संज्ञान लेकर रिपोर्ट मांग सकता है, परंतु उसकी सिफारिशें सलाहकारी होती हैं और दंड…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — समाज (महिलाओं और बच्चों से संबंधित मुद्दे; सामाजिक असमानता और गरीबी का प्रभाव)  |  GS Paper II — राज्यव्यवस्था (मौलिक अधिकार; सांविधिक निकाय; केंद्र-राज्य समन्वय; सामाजिक न्याय — कमजोर वर्गों के लिए योजनाएँ और संस्थाएँ)
  • Prelims: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) — संरचना, कार्य और स्वत: संज्ञान की शक्ति, मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 12 — आयोग के कार्य; सिफारिशी प्रकृति, अनुच्छेद 23 — मानव तस्करी और बेगार का प्रतिषेध, अनुच्छेद 39(च) — बालकों को शोषण से संरक्षण (राज्य के नीति-निदेशक तत्व), बाल संरक्षण से जुड़े विधान — किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015; POCSO अधिनियम, 2012, अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 और भारतीय न्याय संहिता, 2023 में मानव तस्करी से संबंधित प्रावधान, उज्ज्वला योजना और मानव तस्करी-रोधी इकाइयाँ (Anti-Human Trafficking Units), राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) — बाल अधिकारों की निगरानी
  • Essay: गरीबी, सामाजिक मानसिकता और कानून: बालिकाओं की सुरक्षा की बहुआयामी चुनौती, मानव तस्करी के विरुद्ध संस्थागत प्रतिक्रिया — अधिकारों की रक्षा में संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका

त्वरित पुनरावृत्ति: मानव तस्करी और बाल-विक्रय अनुच्छेद 23 के अंतर्गत प्रतिषिद्ध है; राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 12 के तहत स्वत: संज्ञान लेकर रिपोर्ट मांग सकता है, परंतु उसकी सिफारिशें सलाहकारी होती हैं और दंड का निर्णय न्यायपालिका करती है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मीडिया में प्रकाशित उन खबरों पर स्वत: संज्ञान लिया है, जिनमें मध्य प्रदेश और राजस्थान के सीमावर्ती जिलों से बालिकाओं की बिक्री और उनकी महाराष्ट्र के शहरों में तस्करी का उल्लेख है। रिपोर्टों के अनुसार गरीबी और अन्य कारणों से कुछ माता-पिता बेटियों को 3 लाख रुपये से 5 लाख रुपये तक में बिचौलियों को बेच देते हैं; इसके बाद गोद लिए हुए बच्चों को दर्शाने वाले फर्जी दस्तावेजों के सहारे उन्हें दूसरे स्थानों पर ले जाया जाता है, वयस्क होने पर उनकी पहचान बदल दी जाती है और उन्हें देह व्यापार के लिए 35 लाख रुपये से 40 लाख रुपये तक में बेचा जाता है। आयोग ने कहा कि यदि ये रिपोर्टें सही हैं, तो वे पीड़ित बालिकाओं के मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन को दर्शाती हैं। इसी आधार पर आयोग ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र के मुख्य सचिवों तथा पुलिस महानिदेशकों को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अंतर-राज्यीय तस्करी नेटवर्क, बाल-विक्रय और पहचान छिपाने की प्रक्रिया, तीनों राज्यों के प्रशासन और पुलिस की संयुक्त जवाबदेही शामिल है।

पृष्ठभूमि

  • मानव तस्करी को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 के अंतर्गत प्रतिषिद्ध किया गया है, और अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन तथा गरिमा के अधिकार की व्याख्या में इसे मानव अधिकार उल्लंघन माना जाता है।
  • बच्चों के शोषण से संरक्षण का सिद्धांत अनुच्छेद 39(च) में नीति-निदेशक तत्व के रूप में निहित है, जो राज्य को बालकों की स्वस्थ विकास की परिस्थितियाँ सुनिश्चित करने का निर्देश देता है।
  • बाल-विक्रय और अवैध गोद-प्रक्रिया के विरुद्ध किशोर न्याय अधिनियम, 2015 में दंडात्मक प्रावधान हैं, जबकि मानव तस्करी के अपराध के लिए भारतीय न्याय संहिता, 2023 में भी प्रावधान हैं।
  • मानव तस्करी-रोधी इकाइयाँ और उज्ज्वला योजना जैसी केंद्रीय पहलें रोकथाम, बचाव और पुनर्वास के लिए कार्यरत हैं; राज्य सरकारें पुलिस और सामाजिक कल्याण विभागों के माध्यम से इन्हें लागू करती हैं।
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत हुई है। आयोग स्वत: संज्ञान लेकर जाँच कर सकता है, और उसकी सिफारिशें सामान्यत: सलाहकारी प्रकृति की होती हैं, बाध्यकारी नहीं।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और मानव तस्करी से संबंधित विधिक ढाँचा क्या है?

  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) एक सांविधिक, स्वायत्त निकाय है जिसकी स्थापना मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत हुई है।
  • अधिनियम की धारा 12 के अनुसार आयोग मानव अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत पर या स्वत: संज्ञान लेकर जाँच कर सकता है, और संबंधित सरकार या प्राधिकारी से रिपोर्ट मांग सकता है।
  • आयोग के पास न्यायालय के समान दीवानी वाद की कुछ शक्तियाँ होती हैं, परंतु वह किसी व्यक्ति को दंडित नहीं कर सकता; दंड देने का कार्य न्यायपालिका का है।
  • मानव तस्करी का अर्थ है बल, छल, प्रलोभन या किसी अन्य माध्यम से व्यक्तियों की भर्ती, परिवहन, आश्रय या हस्तांतरण, जिसका उद्देश्य शोषण हो; इसमें यौन शोषण, बंधुआ श्रम और बाल-विक्रय शामिल हैं।
  • अनुच्छेद 23 राज्य को मानव तस्करी और बेगार को पूर्णत: प्रतिषिद्ध करने का निर्देश देता है, और इसी भावना के अंतर्गत बंधुआ मजदूरी (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 बना।
  • बाल-विक्रय के मामलों में अभियोजन मुख्यतः पुलिस द्वारा किया जाता है, और राज्य स्तर पर बाल कल्याण समितियाँ तथा जिला बाल संरक्षण इकाइयाँ बचाए गए बच्चों की देखरेख करती हैं।
  • राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) बाल अधिकारों की निगरानी करता है, जबकि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग व्यापक मानव अधिकार उल्लंघन की जाँच करता है; दोनों की भूमिकाएँ परस्पर पूरक हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
स्वत: संज्ञान (Suo Motu Cognizance) राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission) ने किसी पीड़ित की शिकायत के बिना मीडिया रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई शुरू की। यह मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 12 के अंतर्गत आयोग के कार्यों में शामिल है
कार्रवाई का स्वरूप मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र के मुख्य सचिवों तथा पुलिस महानिदेशकों को नोटिस जारी कर दो सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई। यह आयोग की जांच-पूर्व की प्रक्रिया है
बिक्री की प्रक्रिया गरीबी और अन्य कारणों से माता-पिता द्वारा बेटियों को 3 लाख रुपये से 5 लाख रुपये तक में बिचौलियों को बेचा जाना बताया गया है
पहचान छिपाने का तरीका बालिकाओं को गोद लिए हुए बच्चे दर्शाने वाले फर्जी दस्तावेज़ों के सहारे दूसरे स्थानों पर ले जाया जाता है। वयस्क होने पर उनके व्यक्तिगत विवरण बदल दिए जाते हैं
अंतरराज्यीय आयाम सीमावर्ती जिलों से महाराष्ट्र के शहरों तक तस्करी का मार्ग कई राज्यों में फैला है, इसलिए राज्यों के बीच समन्वय आवश्यक हो जाता है
आर्थिक लेन-देन वयस्क होने पर 35 लाख रुपये से 40 लाख रुपये तक में वाणिज्यिक यौन शोषण के लिए बिक्री की बात कही गई है। इससे तस्करी का आर्थिक लाभ से सीधा संबंध स्पष्ट होता है

महत्व

मानवाधिकार (Human Rights)

  • बालिकाओं की बिक्री और तस्करी गरिमा के साथ जीने के अधिकार और शोषण से मुक्ति के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि राज्य की संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करना उसका वैधानिक दायित्व है
  • यदि रिपोर्ट में दी गई जानकारी सही पाई जाती है, तो यह मामला बाल अधिकारों के संरक्षण की व्यवस्था की कमियों को उजागर करेगा

सामाजिक-आर्थिक (Socio-Economic)

  • गरीबी और आर्थिक दबाव में परिवार बच्चों को आय या राहत के साधन के रूप में देखने की स्थिति में पहुंच सकते हैं, जिसका लाभ बिचौलिए उठाते हैं
  • बालिकाओं को बोझ मानने जैसी लैंगिक धारणाएं उनकी सुरक्षा को और कमजोर करती हैं
  • विस्थापन, सीमावर्ती क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और सामाजिक निगरानी की कमी तस्करी के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाती हैं

विधिक और प्रशासनिक (Legal and Administrative)

  • भारतीय न्याय संहिता, 2023 में मानव तस्करी से संबंधित प्रावधान हैं, किंतु फर्जी दस्तावेज़ों और पहचान परिवर्तन की जांच के लिए विशेष दक्षता आवश्यक है
  • बाल विवाह या बाल शोषण के प्रकरणों की तरह यहां भी बाल कल्याण समिति और पुलिस के बीच समन्वय की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है
  • एक से अधिक राज्यों से जुड़े मामलों में अंतरराज्यीय समन्वय से ही अपराध के पूरे नेटवर्क तक पहुंचा जा सकता है

चुनौतियाँ

1. गरीबी और लैंगिक भेदभाव

  • आर्थिक तंगी में माता-पिता का बेटियों को बेचने जैसा कदम उठाना मूल रूप से गरीबी और सामाजिक असमानता से जुड़ा है
  • बालिकाओं के प्रति भेदभावपूर्ण सामाजिक दृष्टिकोण बदले बिना केवल दंडात्मक उपाय पर्याप्त नहीं होंगे

2. फर्जी दस्तावेज़ और पहचान परिवर्तन

  • गोद लेने के फर्जी दस्तावेज़ बालिकाओं की वास्तविक पहचान को छिपा देते हैं, जिससे उनका पता लगाना कठिन हो जाता है
  • वयस्क होने पर व्यक्तिगत विवरण बदलने से पीड़िता को खोजने और उसका पुनर्वास करने में जटिलता बढ़ती है

3. अंतरराज्यीय समन्वय

  • सीमावर्ती जिलों और गंतव्य राज्यों के बीच पुलिस, बाल कल्याण और सामाजिक सेवाओं में समन्वय का अभाव अपराधियों को लाभ देता है
  • विभिन्न राज्यों की अलग-अलग प्रशासनिक प्रक्रियाएं एक साझा और त्वरित कार्रवाई में बाधा डाल सकती हैं

4. संगठित अपराध का नेटवर्क

  • बिचौलियों, दस्तावेज़ तैयार करने वालों और खरीदारों के बीच फैला नेटवर्क संगठित अपराध की प्रकृति दर्शाता है
  • सूचना तंत्र और खुफिया जानकारी के बिना ऐसे नेटवर्क को तोड़ना कठिन होता है

5. पीड़िता का पुनर्वास और गवाही

  • बचाई गई बालिकाओं के लिए आश्रय, शिक्षा, परामर्श और आजीविका की व्यवस्था सुनिश्चित करना आवश्यक है
  • भय, सामाजिक कलंक और दबाव के कारण पीड़िताएं गवाही देने से हिचक सकती हैं, जिससे अभियोजन कमजोर होता है

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

समस्या चिंता
गरीबी और सामाजिक दबाव आर्थिक विवशता में बेटियों की बिक्री की घटनाएं परिवार-स्तर पर रोकथाम को कठिन बनाती हैं
फर्जी दस्तावेज़ गोद लेने के झूठे कागज़ात से बालिकाओं की वास्तविक पहचान और आयु छिपाई जाती है
पहचान में बदलाव वयस्क होने पर विवरण बदलने से पीड़िताओं का पता लगाना और उन्हें बचाना कठिन होता है
राज्यों के बीच समन्वय सीमावर्ती जिलों और गंतव्य शहरों के बीच सूचना साझा करने की व्यवस्था सुदृढ़ होनी चाहिए
संगठित नेटवर्क बिचौलियों और खरीदारों का गिरोह बड़े स्तर पर सक्रिय होने की आशंका जताई गई है, जिसकी जांच आवश्यक है

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • एकीकृत बाल संरक्षण योजना (Integrated Child Protection Scheme) – बाल संरक्षण, बाल कल्याण समितियों और बचाए गए बच्चों के पुनर्वास से सीधा संबंध
  • व्यावसायिक यौन शोषण के लिए तस्करी के पीड़ितों की रोकथाम, बचाव, पुनर्वास और पुन: एकीकरण हेतु व्यापक योजना (Ujjawala) – मानव तस्करी की रोकथाम और पीड़ितों के पुनर्वास से प्रत्यक्ष संबंध; इसे उज्ज्वला (LPG) योजना से अलग समझना चाहिए

आगे की राह

  • सीमावर्ती जिलों में बाल कल्याण समितियों, पुलिस और सामाजिक कार्यकर्ताओं का नियमित निगरानी तंत्र बनाया जाए
  • गोद लेने और बच्चों के स्थानांतरण से जुड़े दस्तावेज़ों की सत्यापन प्रणाली को डिजिटल और केंद्रीकृत रूप से जांचा जाए
  • मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र के बीच अंतरराज्यीय समन्वय बैठकों और सूचना साझा करने के मानक प्रोटोकॉल तय किए जाएं
  • मानव तस्करी-विरोधी इकाइयों (Anti-Human Trafficking Units) की क्षमता, प्रशिक्षण और संसाधन बढ़ाए जाएं
  • गरीबी-प्रवण क्षेत्रों में आय सहायता, शिक्षा और बालिकाओं के प्रति सामाजिक जागरूकता के कार्यक्रम सुदृढ़ किए जाएं
  • पीड़िता बालिकाओं के लिए आश्रय, परामर्श और गवाही के दौरान सुरक्षा की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए
  • वयस्क होने पर पहचान बदलने जैसे प्रकरणों की जांच के लिए रिकॉर्ड-मिलान और डेटाबेस आधारित पड़ताल को प्रभावी बनाया जाए

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

मानव तस्करी (Human Trafficking) · अनुच्छेद 23 और शोषण के विरुद्ध अधिकार · स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) · राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission) · मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 (Protection of Human Rights Act, 1993) · बाल संरक्षण विधि (Child Protection Law) · किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (Juvenile Justice Act, 2015) · वाणिज्यिक यौन शोषण (Commercial Sexual Exploitation) · अवैध दत्तक ग्रहण (Illegal Adoption) · उज्ज्वला योजना (Ujjawala Scheme) · सीमावर्ती जिलों में सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा (Socio-economic Vulnerability) · संघवाद और पुलिस-प्रशासन में समन्वय (Federal Coordination)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 21 – गरिमा और शोषण-मुक्त जीवन का अधिकार
  • अनुच्छेद 23 – मानव तस्करी और बेगार का प्रतिषेध
  • अनुच्छेद 39 (e) और (f) – बच्चों के दुरुपयोग और शोषण से संरक्षण
  • अनुच्छेद 15(3) – महिलाओं और बालिकाओं हेतु विशेष उपबंध

अवधारणा प्रवाह

गरीबी और सामाजिक दबाव से परिवार द्वारा बालिकाओं को बिचौलियों को बेचना  →  बिचौलियों द्वारा फर्जी गोद-दस्तावेज़ों के सहारे बालिकाओं को दूसरे राज्यों में ले जाना  →  वयस्क होने पर पहचान और विवरण बदलकर महाराष्ट्र के शहरों में वाणिज्यिक यौन शोषण के लिए बिक्री  →  मीडिया रिपोर्ट के माध्यम से मामला सार्वजनिक होना (30 अक्टूबर 2026)  →  राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा स्वत: संज्ञान और तीन राज्यों के मुख्य सचिवों व पुलिस महानिदेशकों को नोटिस (3 नवंबर 2026)  →  दो सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट के आधार पर जांच, अपराधियों पर कार्रवाई और पीड़िताओं का पुनर्वास

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत गठित एक वैधानिक निकाय है।
2. आयोग मानव अधिकारों के उल्लंघन से जुड़े मामलों में स्वतः संज्ञान ले सकता है।
3. आयोग की सिफारिशें राज्य सरकारों पर विधिक रूप से बाध्यकारी होती हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: NHRC की स्थापना मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत हुई है। कथन 2 सही है: अधिनियम की धारा 12 के अंतर्गत आयोग स्वतः संज्ञान लेकर जांच कर सकता है। कथन 3 गलत है: आयोग की सिफारिशें सलाहकारी प्रकृति की होती हैं और सरकार पर विधिक रूप से बाध्यकारी नहीं होतीं, इसलिए सही उत्तर ‘केवल दो’ है।

Q2. निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): मानव तस्करी और बेगार का भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 द्वारा निषेध किया गया है।
कारण (R): अनुच्छेद 23 के अधिकार केवल राज्य के विरुद्ध प्रवर्तनीय हैं, निजी व्यक्तियों के विरुद्ध नहीं।
उपर्युक्त के संदर्भ में सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सही है, किंतु R गलत है।
  4. A गलत है, किंतु R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है। — अभिकथन (A) सही है: अनुच्छेद 23 मानव तस्करी और बेगार का निषेध करता है। कारण (R) का पहला भाग गलत है: पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ (1982, एशियाड कर्मकार मामला) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 23 निजी व्यक्तियों के विरुद्ध भी लागू होता है। इसलिए R गलत है, और सही विकल्प यह है कि A सही है पर R गलत है। अतः उत्तर संख्या 2 (A सही, R गलत) होना चाहिए।

Q3. निम्नलिखित सूचियों का सही मिलान कीजिए:
सूची-I (अधिनियम)
a. अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956
b. किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015
c. लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012
d. मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993
सूची-II (विशेषता)
1. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का वैधानिक आधार
2. बालकों की बिक्री और क्रय के लिए दंडात्मक प्रावधान
3. बालकों को लैंगिक अपराधों से संरक्षण
4. वेश्यावृत्ति के उद्देश्य से व्यापार का निवारण
सही उत्तर चुनिए:

  1. a-4, b-2, c-3, d-1
  2. a-2, b-4, c-1, d-3
  3. a-4, b-3, c-2, d-1
  4. a-1, b-2, c-3, d-4

उत्तर: a-4, b-2, c-3, d-1 — अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 का संबंध वेश्यावृत्ति के उद्देश्य से व्यापार के निवारण से है (a-4)। किशोर न्याय अधिनियम, 2015 में बालकों की बिक्री और क्रय के लिए दंड का प्रावधान है (b-2)। POCSO अधिनियम, 2012 बालकों को लैंगिक अपराधों से संरक्षण देता है (c-3)। मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 NHRC का वैधानिक आधार है (d-1)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ बालिकाओं की बिक्री, तस्करी और वाणिज्यिक यौन शोषण के लिए उनके उपयोग की घटनाएँ संवैधानिक मूल्यों और विधिक ढांचे के समक्ष गंभीर चुनौती प्रस्तुत करती हैं। इस संदर्भ में अनुच्छेद 23 और बाल-संरक्षण विधियों की पर्याप्तता का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्वतः संज्ञान शक्ति और उसकी सिफारिशी प्रकृति ऐसी समस्या के समाधान में कितनी प्रभावी हो सकती है? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल उत्तर के बिंदु:
1. संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 23 (मानव तस्करी और बेगार का निषेध, निजी व्यक्तियों पर भी लागू, पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ, 1982); अनुच्छेद 21 (गरिमा सहित जीवन का अधिकार); अनुच्छेद 15(3) (महिलाओं और बालकों के लिए विशेष उपबंध); अनुच्छेद 39(e) और 39(f) (बालकों के शोषण से संरक्षण और स्वस्थ विकास के अवसर, राज्य के नीति-निदेशक तत्व)।
2. विधिक ढांचा: भारतीय न्याय संहिता, 2023 में मानव तस्करी से संबंधित प्रावधान (धारा 143); अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956; किशोर न्याय अधिनियम, 2015 (बालकों की बिक्री और क्रय से संबंधित दंड); लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO); दत्तक ग्रहण के लिए केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) की भूमिका। व्यापक मानव तस्करी-रोधी विधि के प्रस्ताव लंबे समय से विचाराधीन रहने का तथ्य भी उल्लेखनीय है।
3. न्यायिक दृष्टांत: बिशाल जीत बनाम भारत संघ (1990), जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने बाल वेश्यावृत्ति की रोकथाम हेतु उपाय सुझाए; गौरव जैन बनाम भारत संघ (1997), जिसमें वेश्यावृत्ति में लगी महिलाओं की संतानों के संरक्षण और पुनर्वास पर निर्देश दिए गए; बुधादेब कर्मस्कर बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2022), जिसमें सहमति से कार्यरत वयस्कों की गरिमा और पुनर्वास पर बल दिया गया, परंतु बालकों और तस्करी के मामलों को उससे अलग रखा गया।
4. NHRC की भूमिका: मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 12 के अंतर्गत स्वतः संज्ञान और धारा 13 के अंतर्गत जांच की शक्तियाँ; मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों को नोटिस और दो सप्ताह में रिपोर्ट मांगना; सिफारिशी और सलाहकारी प्रकृति की सीमा; राज्य मानवाधिकार आयोगों (SHRC) के साथ समन्वय; NHRC प्रवर्तन एजेंसी नहीं है, इसलिए कार्रवाई पुलिस और न्यायपालिका पर निर्भर है।
5. संस्थागत और प्रशासनिक उपाय: उज्ज्वला योजना (महिला एवं बाल विकास मंत्रालय) द्वारा रोकथाम, बचाव और पुनर्वास; मिशन शक्ति के अंतर्गत सुरक्षा और सहायता; राज्य-स्तरीय एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट और अंतर-राज्यीय समन्वय; राज्यों के बीच सीमावर्ती क्षेत्रों में खुफिया तंत्र और पुलिस सहयोग; फर्जी दस्तावेजों और पहचान परिवर्तन पर डिजिटल निगरानी।
6. सामाजिक-आर्थिक आयाम: गरीबी, ऋणग्रस्तता और सूचना के अभाव के कारण माता-पिता द्वारा बच्चियों की बिक्री; शिक्षा, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की पहुँच; प्रवासन और बिचौलियों का नेटवर्क; पीड़िताओं का पुनर्वास और कानूनी सहायता।
7. संतुलित दृष्टिकोण: एक मत यह है कि कठोर दंडात्मक कानून और सख्त प्रवर्तन ही समाधान है; दूसरा मत यह है कि मूल कारण गरीबी और सामाजिक असुरक्षा हैं, अतः अधिकार-आधारित कल्याण नीति अधिक प्रभावी होगी; तीसरा दृष्टिकोण पीड़ित-केंद्रित न्याय और पुनर्वास पर बल देता है। निष्कर्ष में यह तर्क दिया जा सकता है कि NHRC का स्वतः संज्ञान एक प्रभावी जागरूकता और जवाबदेही उपकरण है, परंतु वास्तविक परिणाम के लिए पुलिस प्रवर्तन, न्यायिक सक्रियता और सामाजिक-आर्थिक हस्तक्षेप का समन्वित होना आवश्यक है।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)

Maharashtra PCS (MPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) द्वारा मध्य प्रदेश और राजस्थान के सीमावर्ती जिलों से महाराष्ट्र के शहरों में बालिकाओं की बिक्री और तस्करी की खबरों पर स्वत: संज्ञान लेने के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?

1. NHRC का यह कदम मानव तस्करी और बाल श्रम के खिलाफ संवैधानिक प्रावधानों और कानूनों को लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
2. महाराष्ट्र राज्य महिला आयोग ने भी इस मामले में NHRC के साथ मिलकर जांच शुरू की है।
3. यह मुद्दा मुख्य रूप से महाराष्ट्र के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में गरीबी और अशिक्षा से जुड़ा है।

  1. A. केवल 1
  2. B. केवल 1 और 2
  3. C. केवल 2 और 3
  4. D. 1, 2 और 3

उत्तर: A. केवल 1 — दिए गए विषय के अनुसार, केवल NHRC द्वारा स्वत: संज्ञान लेने का उल्लेख है, अन्य कथन विषय से सीधे संबंधित नहीं हैं।

Mains: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) द्वारा मध्य प्रदेश और राजस्थान के सीमावर्ती जिलों से महाराष्ट्र के शहरों में बालिकाओं की बिक्री और तस्करी की खबरों पर स्वत: संज्ञान लेने के निहितार्थों का विश्लेषण करें। महाराष्ट्र राज्य के संदर्भ में, इस समस्या के मूल कारणों और इसे रोकने के लिए प्रभावी उपायों पर चर्चा करें।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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