बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई में वर्सोवा-माध कनेक्टर पुल निर्माण को हरी झंडी, 1237 मैंग्रोव वृक्षों की कटाई को मंजूरी

Versova-Madh connector a ‘respite’ from traffic jams: HC as it cleared felling of mangroves — labelled illustration

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई में वर्सोवा-माध कनेक्टर पुल निर्माण को हरी झंडी, 1237 मैंग्रोव वृक्षों की कटाई को मंजूरी

✎ बॉम्बे उच्च न्यायालय ने वर्सोवा-माध कनेक्टर परियोजना को मैंग्रोव काटने की अनुमति दी है, जिसमें सार्वजनिक हित और पर्यावरणीय शमन उपायों के बीच संतुलन स्थापित किया गया है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — पर्यावरण और पारिस्थितिकी, अवसंरचना  |  GS Paper II — शासन, न्यायपालिका
  • Prelims: वर्सोवा-माध कनेक्टर, मैंग्रोव वन, बॉम्बे उच्च न्यायालय, तटीय विनियमन क्षेत्र, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, सार्वजनिक हित याचिका
  • Essay: विकास बनाम पर्यावरण संरक्षण: एक सतत बहस, शहरीकरण और अवसंरचना विकास की चुनौतियाँ

त्वरित पुनरावृत्ति: बॉम्बे उच्च न्यायालय ने वर्सोवा-माध कनेक्टर परियोजना को मैंग्रोव काटने की अनुमति दी है, जिसमें सार्वजनिक हित और पर्यावरणीय शमन उपायों के बीच संतुलन स्थापित किया गया है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) ने वर्सोवा-माध कनेक्टर पुल (Versova-Madh connector bridge) के निर्माण को मंजूरी दे दी है, जिसके लिए 1,237 मैंग्रोव (mangroves) को काटना आवश्यक है। न्यायालय ने इस परियोजना को मुंबईवासियों के लिए यातायात जाम से राहत प्रदान करने वाला एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक हित का कार्य बताया है, साथ ही मैंग्रोव के पुनर्रोपण और संरक्षण के लिए बृहन्मुंबई नगर निगम (Brihanmumbai Municipal Corporation – BMC) द्वारा प्रस्तावित शमन उपायों (mitigation measures) को भी स्वीकार किया है।

पृष्ठभूमि

  • मुंबई के वर्सोवा और माध द्वीप को जोड़ने वाले इस ₹2,395 करोड़ के केबल-स्टेयड फ्लाईओवर (cable-stayed flyover) का उद्देश्य पश्चिमी उपनगरों में कनेक्टिविटी में सुधार करना है।
  • यह परियोजना मालाड क्रीक (Malad Creek) पर 2,064 मीटर लंबे पुल के निर्माण से संबंधित है, जिसके लिए 1,237 मैंग्रोव को काटना होगा।
  • उच्च न्यायालय के 2018 के एक फैसले के अनुसार, सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए मैंग्रोव काटने हेतु न्यायालय की अनुमति अनिवार्य है।
  • न्यायालय ने इस परियोजना को किसी निजी वाणिज्यिक उद्देश्य के बजाय व्यापक सार्वजनिक हित में माना है, क्योंकि यह यात्रा की दूरी को 22 किलोमीटर से घटाकर 1.5 किलोमीटर कर देगा।
  • BMC ने 9 हेक्टेयर निम्नीकृत मैंग्रोव वन भूमि पर 39,000 मैंग्रोव लगाने और 10 साल के लिए उनके रोपण, सुरक्षा तथा रखरखाव के लिए ₹1.42 करोड़ जमा करने का प्रस्ताव दिया है।
  • इसके अतिरिक्त, 2.5 हेक्टेयर क्षेत्र का उपयोग निर्माण के बाद इन-सीटू मैंग्रोव बहाली (in-situ mangrove restoration) के लिए किया जाएगा, जिसमें केवल 0.2 हेक्टेयर मैंग्रोव स्थायी रूप से नष्ट होंगे।

मैंग्रोव वन और उनका पर्यावरणीय महत्व

  • मैंग्रोव उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के तटीय खारे पानी में उगने वाले झाड़ियों और पेड़ों का एक समूह है।
  • ये पारिस्थितिक तंत्र तटीय क्षेत्रों को कटाव (erosion) से बचाते हैं, तूफानों और सुनामी के प्रभाव को कम करते हैं।
  • मैंग्रोव कई समुद्री प्रजातियों के लिए नर्सरी मैदान और आवास प्रदान करते हैं, जिससे जैव विविधता (biodiversity) बनी रहती है।
  • ये कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide) के महत्वपूर्ण सिंक (sink) के रूप में कार्य करते हैं, जलवायु परिवर्तन (climate change) के शमन में योगदान करते हैं।
  • भारत में मैंग्रोव मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, गुजरात, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा और केरल के तटीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
  • मैंग्रोव वन तटीय समुदायों के लिए आजीविका का स्रोत भी हैं, जो मछली पकड़ने और वानिकी उत्पादों का समर्थन करते हैं।
  • भारत सरकार ने मैंग्रोव संरक्षण के लिए कई पहलें की हैं, जैसे ‘मैंग्रोव फॉर द फ्यूचर’ (Mangroves for the Future – MFF) पहल और ‘तटीय विनियमन क्षेत्र’ (Coastal Regulation Zone – CRZ) अधिसूचना।
  • मैंग्रोव वनों को अक्सर ‘तटीय प्रहरी’ (coastal sentinels) कहा जाता है क्योंकि वे तटीय पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
वर्सोवा-माध कनेक्टर पुल मुंबई में वर्सोवा और माध द्वीप के बीच कनेक्टिविटी में सुधार करेगा।
परियोजना लागत ₹2,395 करोड़ की अनुमानित लागत वाली एक केबल-स्टेयड फ्लाईओवर परियोजना।
मैंग्रोव की कटाई परियोजना के लिए 1,237 मैंग्रोव काटने की अनुमति दी गई है।
यात्रा दूरी में कमी यात्रा की दूरी 22 किलोमीटर से घटकर 1.5 किलोमीटर हो जाएगी।
पर्यावरणीय शमन 9 हेक्टेयर निम्नीकृत मैंग्रोव वन भूमि में 39,000 मैंग्रोव लगाए जाएंगे।
सार्वजनिक हित बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इसे व्यापक सार्वजनिक हित में माना है।

महत्व

शहरी विकास और अवसंरचना

  • यह परियोजना मुंबई जैसे घनी आबादी वाले शहर में यातायात की भीड़ को कम करने और यात्रा के समय को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
  • बेहतर कनेक्टिविटी से शहरी क्षेत्रों के बीच आवागमन सुगम होगा, जिससे आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।
  • यह आधुनिक इंजीनियरिंग और शहरी नियोजन का एक उदाहरण है, जो भविष्य की शहरी परियोजनाओं के लिए एक मॉडल प्रस्तुत करता है।

पर्यावरणीय संतुलन और सतत विकास

  • परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए मैंग्रोव वृक्षारोपण और बहाली के उपाय किए जा रहे हैं, जो सतत विकास (Sustainable Development) के सिद्धांतों के अनुरूप है।
  • न्यायालय द्वारा निर्धारित शमन उपायों का पालन यह सुनिश्चित करता है कि विकास पर्यावरणीय संरक्षण की कीमत पर न हो।
  • मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र के महत्व को स्वीकार करते हुए, परियोजना के साथ-साथ उनके संरक्षण के लिए भी कदम उठाए जा रहे हैं।

न्यायिक सक्रियता और सार्वजनिक हित

  • बॉम्बे उच्च न्यायालय का निर्णय सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के महत्व को दर्शाता है, विशेषकर जब पर्यावरण संबंधी चिंताएं शामिल हों।
  • न्यायालय ने सार्वजनिक हित और पर्यावरणीय संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया है, यह सुनिश्चित करते हुए कि विकास आवश्यक हो लेकिन जिम्मेदारी से हो।
  • यह निर्णय भविष्य में ऐसी अन्य परियोजनाओं के लिए एक मिसाल कायम करेगा जहां विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना आवश्यक होगा।

चुनौतियाँ

1. पर्यावरणीय प्रभाव

  • मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र का नुकसान, भले ही शमन उपाय किए गए हों, स्थानीय जैव विविधता और तटीय सुरक्षा पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है।
  • मैंग्रोव समुद्री जीवन के लिए नर्सरी के रूप में कार्य करते हैं और तटीय कटाव को रोकने में मदद करते हैं, जिनकी क्षति का पारिस्थितिक संतुलन पर असर पड़ सकता है।

2. पुनर्वास और मुआवजा

  • हालांकि खबर में इसका सीधा उल्लेख नहीं है, बड़ी अवसंरचना परियोजनाओं में अक्सर स्थानीय समुदायों के पुनर्वास और उचित मुआवजे का मुद्दा एक चुनौती होता है।
  • यह सुनिश्चित करना कि प्रभावित लोगों को न्यायसंगत मुआवजा मिले और उनका पुनर्वास सम्मानजनक तरीके से हो, महत्वपूर्ण है।

3. परियोजना का कार्यान्वयन और निगरानी

  • परियोजना के समय पर और लागत प्रभावी ढंग से पूरा होने को सुनिश्चित करना एक चुनौती हो सकती है, विशेषकर भारत में बड़ी अवसंरचना परियोजनाओं के इतिहास को देखते हुए।
  • मैंग्रोव वृक्षारोपण और बहाली उपायों की प्रभावी निगरानी और दीर्घकालिक रखरखाव सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है।

4. न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा

  • सार्वजनिक परियोजनाओं में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा और विकास बनाम पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करने में न्यायालयों की भूमिका हमेशा बहस का विषय रही है।
  • यह सुनिश्चित करना कि न्यायिक निर्णय विकास परियोजनाओं में अनावश्यक देरी न करें, जबकि पर्यावरणीय चिंताओं को भी संबोधित करें, एक नाजुक संतुलन है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
मैंग्रोव की कटाई स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता पर नकारात्मक प्रभाव।
पर्यावरणीय शमन की प्रभावशीलता लगाए गए मैंग्रोव के जीवित रहने और विकसित होने की दर पर अनिश्चितता।
परियोजना की लागत और समय-सीमा बड़ी परियोजनाओं में अक्सर लागत में वृद्धि और देरी का जोखिम।
सार्वजनिक विरोध की संभावना पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय समुदायों से संभावित विरोध।
दीर्घकालिक रखरखाव पुल और मैंग्रोव बहाली दोनों के लिए दीर्घकालिक रखरखाव की आवश्यकता।

आगे की राह

  • पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment – EIA) प्रक्रियाओं को और अधिक मजबूत बनाना तथा उनके कार्यान्वयन में पारदर्शिता सुनिश्चित करना।
  • मैंग्रोव वृक्षारोपण और बहाली परियोजनाओं की नियमित और स्वतंत्र निगरानी सुनिश्चित करना, जिसमें विशेषज्ञों और स्थानीय समुदायों की भागीदारी हो।
  • शहरी नियोजन में हरित अवसंरचना (Green Infrastructure) और प्रकृति-आधारित समाधानों (Nature-based Solutions) को प्राथमिकता देना।
  • विकास परियोजनाओं के लिए वैकल्पिक मार्गों और डिजाइनों का पता लगाना जो पर्यावरणीय क्षति को कम करें।
  • सार्वजनिक परियोजनाओं में हितधारकों, विशेषकर स्थानीय समुदायों और पर्यावरण विशेषज्ञों के साथ व्यापक परामर्श सुनिश्चित करना।
  • पर्यावरणीय क्षति के लिए ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ (Polluter Pays Principle) को सख्ती से लागू करना।
  • तकनीकी नवाचारों का उपयोग करके अवसंरचना परियोजनाओं के पर्यावरणीय पदचिह्न को कम करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

पर्यावरण संरक्षण · सतत विकास · बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ · न्यायिक समीक्षा · मैंग्रोव संरक्षण · जनहित याचिका · बॉम्बे उच्च न्यायालय · शहरी नियोजन · पर्यावरण प्रभाव आकलन · क्षतिपूर्ति वनीकरण

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और सुधार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 51A(g)’, ‘note’: ‘पर्यावरण की रक्षा और सुधार का कर्तव्य’}

अवधारणा प्रवाह

शहरीकरण और जनसंख्या वृद्धि  →  यातायात की भीड़ और यात्रा में देरी  →  बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की आवश्यकता  →  पर्यावरणीय प्रभाव और चिंताएं  →  न्यायिक समीक्षा और संतुलन  →  विकास और पर्यावरणीय शमन

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में मैंग्रोव वनों को कानूनी रूप से संरक्षित दर्जा प्राप्त है।
2. किसी भी सार्वजनिक परियोजना के लिए मैंग्रोव काटना उच्च न्यायालय की अनुमति के बिना संभव नहीं है।
3. मैंग्रोव तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे सुनामी और चक्रवातों से बचाव करते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। भारत में मैंग्रोव वन पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 और तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) अधिसूचनाओं के तहत संरक्षित हैं। कथन 2 सही है। बॉम्बे उच्च न्यायालय के 2018 के एक फैसले के अनुसार, महाराष्ट्र में किसी भी सार्वजनिक परियोजना के लिए मैंग्रोव काटने हेतु न्यायालय की अनुमति अनिवार्य है। कथन 3 सही है। मैंग्रोव तटीय क्षेत्रों को प्राकृतिक आपदाओं जैसे सुनामी और चक्रवातों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, साथ ही समुद्री जैव विविधता के लिए नर्सरी का कार्य करते हैं।

Q2. अभिकथन (A): बॉम्बे उच्च न्यायालय ने वर्सोवा-माध कनेक्टर परियोजना के लिए मैंग्रोव काटने की अनुमति दी है।
कारण (R): न्यायालय ने माना कि यह परियोजना मुंबई के पश्चिमी उपनगरों में कनेक्टिविटी में सुधार करेगी और यातायात भीड़ को कम करेगी।
उपर्युक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?

  1. A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सही है, लेकिन R गलत है।
  4. A गलत है, लेकिन R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि बॉम्बे उच्च न्यायालय ने वास्तव में वर्सोवा-माध कनेक्टर परियोजना के लिए मैंग्रोव काटने की अनुमति दी है। कारण (R) भी सही है क्योंकि न्यायालय ने अपने निर्णय में यह स्पष्ट रूप से कहा कि यह परियोजना कनेक्टिविटी में सुधार करेगी और यातायात भीड़ से राहत प्रदान करेगी, जो कि उसके निर्णय का एक महत्वपूर्ण आधार था। इसलिए, R, A की सही व्याख्या है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के कार्यान्वयन में पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करने में न्यायपालिका की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, ‘क्षतिपूर्ति वनीकरण’ के महत्व पर भी प्रकाश डालिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच द्वंद्व को संक्षेप में परिभाषित करें और न्यायपालिका की भूमिका का उल्लेख करें।
2. **न्यायपालिका की भूमिका:**
* **पर्यावरण संरक्षण के संरक्षक:** अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार की व्याख्या।
* **पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) का प्रवर्तन:** परियोजनाओं की पर्यावरणीय व्यवहार्यता सुनिश्चित करना।
* **जनहित याचिकाओं (PILs) के माध्यम से हस्तक्षेप:** पर्यावरणीय कानूनों के उल्लंघन पर संज्ञान लेना।
* **संतुलनकारी कार्य:** विकास परियोजनाओं को अनुमति देते समय पर्यावरणीय क्षति को कम करने के उपायों पर जोर देना (जैसे वर्सोवा-माध कनेक्टर मामला)।
* **न्यायिक सक्रियता बनाम न्यायिक संयम:** इस संतुलन को बनाए रखने में चुनौतियाँ।
3. **’क्षतिपूर्ति वनीकरण’ का महत्व:**
* **पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति:** विकास परियोजनाओं के कारण हुए वन और पारिस्थितिक तंत्र के नुकसान की भरपाई।
* **जैव विविधता का संरक्षण:** खोई हुई प्रजातियों और आवासों को बहाल करने का प्रयास।
* **कार्बन पृथक्करण:** जलवायु परिवर्तन शमन में योगदान।
* **स्थानीय समुदायों पर प्रभाव:** विस्थापित या प्रभावित समुदायों के लिए वैकल्पिक आजीविका और संसाधनों का प्रावधान।
* **चुनौतियाँ:** वनीकरण की सफलता दर, प्रजाति चयन, दीर्घकालिक रखरखाव और निगरानी।
4. **निष्कर्ष:** न्यायपालिका की भूमिका को स्वीकार करते हुए, पर्यावरण और विकास के बीच सतत संतुलन प्राप्त करने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दें, जिसमें नीति-निर्माण, प्रभावी कार्यान्वयन और सामुदायिक भागीदारी शामिल हो।

स्रोत: The Indian Express


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