16 Oct भारत के रामसर स्थलों की संख्या हुई 103: सुखना आर्द्रभूमि एवं सौज झील शामिल
✎ रामसर अभिसमय (1971) आर्द्रभूमियों पर केंद्रित एक अंतरराष्ट्रीय संधि है; रामसर स्थल का दर्जा अंतरराष्ट्रीय मान्यता देता है, जबकि वास्तविक संरक्षण घरेलू कानून (आर्द्रभूमि नियम, 2017) और प्रबंधन योजना से होता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (बहुपक्षीय संधियाँ और अंतरराष्ट्रीय संगठन; रामसर अभिसमय) | GS Paper III — पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता संरक्षण (आर्द्रभूमि प्रबंधन, संरक्षण के कानूनी ढाँचे) | GS Paper III — आपदा प्रबंधन और जलवायु अनुकूलन (आर्द्रभूमि की बाढ़-नियंत्रण और जल-सुरक्षा भूमिका)
- Prelims: रामसर अभिसमय (Ramsar Convention), 1971, ईरान के रामसर शहर में अपनाया गया, भारत द्वारा रामसर अभिसमय का अनुसमर्थन (1982), रामसर स्थल का चयन: कम से कम एक मानदंड (Ramsar Criteria) की पूर्ति आवश्यक, मॉन्ट्रो रिकॉर्ड (Montreux Record): संकटग्रस्त या बदलते पारिस्थितिक स्वरूप वाले रामसर स्थलों की सूची, आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 — पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत, राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम (National Wetland Conservation Programme) और जलीय पारिस्थितिक तंत्र संरक्षण की राष्ट्रीय योजना (National Plan for Conservation of Aquatic Ecosystems), चिल्का झील (ओडिशा) — एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की लैगून और भारत का प्रारंभिक रामसर स्थल, रामसर स्थल और राष्ट्रीय उद्यान/वन्यजीव अभयारण्य में अंतर (एक ही क्षेत्र दोनों श्रेणियों में हो सकता है)
- Essay: आर्द्रभूमि: जल-सुरक्षा, जलवायु अनुकूलन और स्थानीय आजीविका का संगम, संरक्षण बनाम विकास: पारिस्थितिक सेवाओं के आर्थिक मूल्य को नीति में कैसे शामिल करें
त्वरित पुनरावृत्ति: रामसर अभिसमय (1971) आर्द्रभूमियों पर केंद्रित एक अंतरराष्ट्रीय संधि है; रामसर स्थल का दर्जा अंतरराष्ट्रीय मान्यता देता है, जबकि वास्तविक संरक्षण घरेलू कानून (आर्द्रभूमि नियम, 2017) और प्रबंधन योजना से होता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने घोषणा की कि चंडीगढ़ की सुखना आर्द्रभूमि और उत्तर प्रदेश की सौज झील को नवीनतम रामसर स्थलों के रूप में सूची में जोड़ा गया है, जिसके बाद भारत में रामसर स्थलों की कुल संख्या 103 हो गई है। यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि भारत आर्द्रभूमि संरक्षण को जैव विविधता, जल एवं जलवायु सुरक्षा और स्थानीय आजीविका से जोड़कर देख रहा है। प्रासंगिक दृष्टि से यह बिंदु महत्वपूर्ण है कि रामसर स्थल का दर्जा किसी क्षेत्र को स्वतः कानूनी संरक्षित क्षेत्र का दर्जा नहीं देता; उसके लिए घरेलू कानूनी ढाँचे और प्रबंधन योजना की आवश्यकता होती है।
पृष्ठभूमि
- रामसर अभिसमय 1971 में ईरान के रामसर शहर में अपनाया गया, जो किसी एक पारिस्थितिक तंत्र पर केंद्रित प्रमुख अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संधियों में से एक है। इसमें नदी, झील, दलदल, मैंग्रोव, मूंगा भित्तियाँ और मानव-निर्मित जलाशय भी शामिल हैं।
- भारत ने 1982 में रामसर अभिसमय का अनुसमर्थन किया और तभी से इसके अंतर्गत स्थलों को नामित किया जा रहा है।
- आर्द्रभूमि संरक्षण के घरेलू ढाँचे में पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत बने आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 की केंद्रीय भूमिका है, जिसमें राज्य स्तर पर आर्द्रभूमि प्राधिकरण और प्रबंधन योजनाओं का प्रावधान है।
- जलीय पारिस्थितिक तंत्रों के संरक्षण हेतु राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम और जलीय पारिस्थितिक तंत्र संरक्षण की राष्ट्रीय योजना जैसी नीतिगत पहलें भी लागू हैं।
- आर्द्रभूमियों के क्षरण के प्रमुख कारण अतिक्रमण, प्रदूषण, जल-प्रवाह में बदलाव और शहरी अपशिष्ट हैं, इसलिए रामसर स्थल नामांकन के साथ स्थानीय प्रबंधन की निरंतरता पर बल दिया जाता है।
रामसर स्थल क्या है?
- रामसर स्थल वह आर्द्रभूमि है जिसे रामसर अभिसमय के मानदंडों के आधार पर अंतरराष्ट्रीय महत्व का मानकर सूची में शामिल किया गया हो।
- नामांकन का अधिकार संबंधित देश (Contracting Party) के पास होता है; अभिसमय का सचिवालय स्विट्ज़रलैंड के ग्लैंड में स्थित है।
- आर्द्रभूमि की परिभाषा अभिसमय में व्यापक है: इसमें प्राकृतिक और मानव-निर्मित, स्थायी और मौसमी, दोनों प्रकार की जल-आच्छादित भूमि शामिल है।
- किसी स्थल को सूची में जोड़ने के लिए कम से कम एक मानदंड पूरा होना आवश्यक है, जैसे दुर्लभ या संकटग्रस्त प्रजातियों का आवास, या जैविक विविधता के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र।
- रामसर स्थल का दर्जा अंतरराष्ट्रीय सहयोग और विशेषज्ञता के माध्यम से संरक्षण को प्रोत्साहित करता है, परंतु सुरक्षा के लिए घरेलू कानून और प्रबंधन योजना अनिवार्य है।
- ‘बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग’ (Wise Use) की अवधारणा रामसर दर्शन का मूल है, जिसका अर्थ है कि आर्द्रभूमियों का उपयोग इस प्रकार हो कि उनकी पारिस्थितिक विशेषताएँ बनी रहें।
- रामसर स्थल और संरक्षित क्षेत्र अलग-अलग कानूनी श्रेणियाँ हैं; एक ही आर्द्रभूमि राष्ट्रीय उद्यान या वन्यजीव अभयारण्य भी हो सकती है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| रामसर सम्मेलन (Ramsar Convention) | आर्द्रभूमियों के संरक्षण और विवेकपूर्ण उपयोग के लिए 1971 में ईरान के रामसर नगर में अपनाई गई अंतरराष्ट्रीय संधि है। भारत इसका पक्षकार है और इसी के अंतर्गत रामसर स्थल घोषित किए जाते हैं। |
| रामसर स्थल का चयन | किसी आर्द्रभूमि को रामसर स्थल तब घोषित किया जाता है जब वह सम्मेलन में निर्धारित मानदंडों में से कम से कम एक पर खरी उतरे। मानदंडों में दुर्लभ या संकटग्रस्त पारिस्थितिक तंत्र, जैव विविधता और जलपक्षियों के आवास जैसे पहलू शामिल हैं। |
| सुखना आर्द्रभूमि (चंडीगढ़) | शिवालिक की तलहटी में स्थित यह मानव-निर्मित जलाशय है, जो चंडीगढ़ की जल आवश्यकता और स्थानीय जैव विविधता दोनों से जुड़ा है। इसे रामसर स्थल की सूची में जोड़ना शहरी क्षेत्र में आर्द्रभूमि संरक्षण का उदाहरण है। |
| सौज झील (उत्तर प्रदेश) | उत्तर प्रदेश की यह झील स्थानीय जलाशय और आर्द्रभूमि पारिस्थितिक तंत्र के रूप में जैव विविधता और स्थानीय आजीविका दोनों को सहारा देती है। इसके रामसर स्थल बनने से राज्य में संरक्षित आर्द्रभूमियों की संख्या बढ़ी है। |
| भारत के रामसर स्थलों की संख्या | इस घोषणा के साथ भारत के कुल रामसर स्थल 103 हो गए हैं। इसका अर्थ है कि भारत ने वैश्विक जल-पारिस्थितिक संरक्षण में अपनी सक्रिय भागीदारी को और मजबूत किया है। |
महत्व
पारिस्थितिक महत्व
- आर्द्रभूमियाँ जैव विविधता का समृद्ध आश्रय हैं और इनमें प्रवासी जलपक्षियों सहित कई प्रजातियों के प्रजनन और विश्राम स्थल होते हैं।
- आर्द्रभूमियाँ भूजल पुनर्भरण, बाढ़ नियंत्रण और तलछट के नियंत्रण में प्राकृतिक भूमिका निभाती हैं।
- ये कार्बन भंडारण में सहायक हैं, इसलिए जलवायु परिवर्तन के शमन में इनका महत्व है।
जल एवं जलवायु सुरक्षा
- आर्द्रभूमियाँ वर्षा जल को संचित कर शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की जल आपूर्ति को सहारा देती हैं।
- तापमान नियमन और सूक्ष्म जलवायु संतुलन में इनका योगदान जलवायु अनुकूलन की दृष्टि से उपयोगी है।
सामाजिक-आर्थिक महत्व
- मत्स्य पालन, कृषि, पर्यटन और जल-आधारित हस्तशिल्प जैसी स्थानीय आजीविकाएँ आर्द्रभूमि पर निर्भर हैं।
- रामसर स्थल का दर्जा पारिस्थितिक पर्यटन को बढ़ावा देकर स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा दे सकता है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता
- रामसर सम्मेलन के अंतर्गत नए स्थलों को जोड़ना भारत की जैव विविधता और सतत विकास संबंधी वैश्विक प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है।
- रामसर स्थलों की बढ़ती संख्या भारत की पर्यावरणीय कूटनीति में उसकी सक्रिय भूमिका को भी दर्शाती है।
चुनौतियाँ
1. शहरी दबाव और अतिक्रमण
- शहरीकरण के कारण आर्द्रभूमियों के आसपास निर्माण और भूमि उपयोग परिवर्तन बढ़ता है, जिससे उनका प्राकृतिक क्षेत्रफल घटता है।
- अतिक्रमण और कचरा निपटान की समस्या सीधे जल गुणवत्ता को प्रभावित करती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: पर्यावरण संरक्षण और शहरीकरण का प्रभाव
2. तलछट जमाव और जल-ग्रहण क्षेत्र का क्षरण
- जलाशयों में गाद जमा होने से उनकी जल-धारण क्षमता और जैव विविधता दोनों घटती हैं।
- जल-ग्रहण क्षेत्र में मृदा अपरदन और वनों की कटाई गाद जमाव का मुख्य कारण है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: जल संसाधन प्रबंधन और मृदा संरक्षण
3. प्रदूषण और जल गुणवत्ता
- घरेलू और औद्योगिक अपशिष्ट जल के प्रवाह से पोषक तत्वों का अतिरिक्त भार बढ़ता है, जिससे सुपोषण (Eutrophication) की स्थिति बनती है।
- जलकुंभी जैसी आक्रामक वनस्पति जल सतह को ढककर जलीय जीवन को प्रभावित करती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: पर्यावरण प्रदूषण और जल प्रबंधन
4. प्रशासनिक समन्वय की चुनौती
- आर्द्रभूमि प्रबंधन में केंद्र, राज्य, नगर निकाय और स्थानीय समुदायों के बीच समन्वय आवश्यक है, जबकि अधिकार क्षेत्र बँटे हुए हैं।
- रामसर दर्जे के बाद प्रबंधन योजना और निगरानी तंत्र को लगातार लागू रखना एक निरंतर प्रशासनिक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: केंद्र-राज्य समन्वय और पर्यावरणीय शासन
5. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
- वर्षा के असमान वितरण और तापमान वृद्धि से आर्द्रभूमियों का जल-स्तर और जैविक संतुलन प्रभावित होता है।
- अनियमित मानसून और सूखे की अवधि बढ़ने से स्थानीय आजीविकाएँ अस्थिर होती हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-3: जलवायु परिवर्तन और अनुकूलन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| अतिक्रमण और शहरी विस्तार | आर्द्रभूमि का क्षेत्रफल घटना और पारिस्थितिक तंत्र का खंडित होना |
| गाद जमाव | जलाशय की जल-धारण क्षमता और जैव विविधता में कमी |
| जल प्रदूषण और सुपोषण | जलीय जीवन और जल गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव |
| आक्रामक जलीय वनस्पति | मूल प्रजातियों का ह्रास और जल सतह का ढक जाना |
| बहु-स्तरीय प्रशासन | केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के बीच समन्वय की कमी |
| जलवायु परिवर्तन | जल-स्तर में उतार-चढ़ाव और स्थानीय आजीविका पर दबाव |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- राष्ट्रीय जलीय पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण योजना (National Plan for Conservation of Aquatic Ecosystems – NPCA)
आगे की राह
- रामसर स्थलों के लिए विस्तृत प्रबंधन योजना बनाई जाए और उसके क्रियान्वयन की नियमित समीक्षा हो।
- जल-ग्रहण क्षेत्र में वनीकरण और मृदा संरक्षण उपायों को अपनाकर गाद जमाव को नियंत्रित किया जाए।
- अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र स्थापित कर घरेलू और औद्योगिक प्रदूषण को आर्द्रभूमि में प्रवेश से रोका जाए।
- स्थानीय समुदायों को संरक्षण प्रक्रिया में शामिल कर मत्स्य पालन और पारिस्थितिक पर्यटन जैसी टिकाऊ आजीविकाएँ विकसित की जाएँ।
- आर्द्रभूमि एटलस और उपग्रह आधारित निगरानी का नियमित उपयोग कर जल-क्षेत्र में होने वाले परिवर्तनों पर नज़र रखी जाए।
- केंद्र, राज्य और नगर निकायों के बीच स्पष्ट भूमिकाएँ और समन्वय तंत्र स्थापित किया जाए।
- आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017 के प्रावधानों का प्रभावी प्रवर्तन सुनिश्चित किया जाए।
- जलवायु परिवर्तन अनुकूलन योजनाओं में आर्द्रभूमि आधारित समाधानों को शामिल किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
आर्द्रभूमि संरक्षण · रामसर सम्मेलन (Ramsar Convention) · रामसर स्थल (Ramsar Site) · बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग (Wise Use) · आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017 · पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 · राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम (National Wetland Conservation Programme) · जैव विविधता · जल एवं जलवायु सुरक्षा · स्थानीय आजीविका · सामुदायिक सहभागिता · पारिस्थितिक तंत्र सेवाएँ
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 48A: राज्य का पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण का दायित्व
- अनुच्छेद 51A(छ): झीलों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा का मूल कर्तव्य
अवधारणा प्रवाह
रामसर सम्मेलन के मानदंडों पर किसी आर्द्रभूमि का मूल्यांकन और प्रस्ताव → केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा सूची में नए रामसर स्थलों का समावेश → भारत के रामसर स्थलों की कुल संख्या 103 होना → जैव विविधता, जल सुरक्षा और स्थानीय आजीविका पर सकारात्मक प्रभाव की संभावना → प्रबंधन योजना, निगरानी और समुदाय की भागीदारी द्वारा दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित करना
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रामसर सम्मेलन वर्ष 1971 में ईरान के रामसर शहर में अंगीकृत हुआ था।
2. भारत इस सम्मेलन का पक्षकार वर्ष 1982 में बना।
3. रामसर सम्मेलन का सचिवालय यूनेस्को (UNESCO) के अंतर्गत पेरिस में स्थित है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: रामसर सम्मेलन 1971 में ईरान के रामसर में अंगीकृत हुआ और 1975 में प्रभावी हुआ। कथन 2 सही है: भारत 1982 में इसका पक्षकार बना। कथन 3 गलत है, क्योंकि रामसर सम्मेलन एक स्वतंत्र अंतरसरकारी संधि है, जिसका सचिवालय स्विट्जरलैंड के ग्लैंड (Gland) में है, यूनेस्को के अधीन नहीं।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन (A) और तर्क (R) के संबंध में सही है?
कथन (A): किसी आर्द्रभूमि को रामसर स्थल घोषित किए जाने से उसमें सभी मानवीय गतिविधियों पर स्वतः पूर्ण प्रतिबंध नहीं लग जाता।
तर्क (R): रामसर सूची में सम्मिलन एक अंतरराष्ट्रीय मान्यता है, और उसके संरक्षण हेतु घरेलू विधिक उपायों तथा प्रबंधन योजना की आवश्यकता होती है।
- A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
- A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
- A सही है, परंतु R गलत है
- A गलत है, परंतु R सही है
उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है — रामसर सम्मेलन सूची में सम्मिलन एक अंतरराष्ट्रीय मान्यता और दायित्व है, जबकि प्रतिबंध और प्रबंधन घरेलू विधि से लागू होते हैं। भारत में इसके लिए आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017 जैसे उपाय लागू होते हैं। अतः रामसर सूची-सम्मिलन स्वतः पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाता, और तर्क इसी स्थिति की व्याख्या करता है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलों पर विचार कीजिए:
सूची-I (संस्था/साधन)
1. रामसर सम्मेलन
2. आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम
3. राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम
4. जैविक विविधता पर सम्मेलन (CBD)
सूची-II (वर्ष)
A. 1992
B. 1971
C. 2017
D. 1987
सही सुमेलन चुनिए:
- 1-A, 2-B, 3-C, 4-D
- 1-B, 2-C, 3-D, 4-A
- 1-C, 2-D, 3-A, 4-B
- 1-D, 2-A, 3-B, 4-C
उत्तर: 1-B, 2-C, 3-D, 4-A — रामसर सम्मेलन 1971 में अंगीकृत हुआ (1-B)। आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम 2017 में पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत बनाए गए (2-C)। राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम 1987 में आरंभ हुआ (3-D)। जैविक विविधता पर सम्मेलन 1992 के पृथ्वी शिखर सम्मेलन में अंगीकृत हुआ (4-A)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ आर्द्रभूमियों को ‘जल, जैव विविधता और जलवायु के संतुलन’ का आधार माना जाता है, फिर भी उनका क्षरण तीव्र गति से हो रहा है। रामसर स्थल के रूप में सूचीबद्ध किया जाना प्रायः संरक्षण की सफलता माना जाता है, किंतु केवल सूची में सम्मिलन से संरक्षण सुनिश्चित नहीं होता। आर्द्रभूमि संरक्षण के संदर्भ में भारत की विधिक और संस्थागत व्यवस्था का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही यह भी बताइए कि स्थानीय समुदायों की आजीविका और संरक्षण के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जा सकता है। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संकेत-बिंदु:
1. भूमिका: सुखना आर्द्रभूमि (चंडीगढ़) और सौज झील (उत्तर प्रदेश) के सम्मिलन के साथ भारत के रामसर स्थलों की संख्या 103 होना (पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, 15 अक्टूबर 2026)। आर्द्रभूमि की परिभाषा: रामसर सम्मेलन के अनुच्छेद 1.1 के अनुसार दलदल, पीटलैंड और जल-क्षेत्र (प्राकृतिक या कृत्रिम, स्थायी या अस्थायी, स्थिर या प्रवाहित)।
2. रामसर सम्मेलन की संरचना: 1971 में अंगीकृत, 1975 में प्रभावी, भारत 1982 से पक्षकार। तीन स्तंभ: (क) बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग (Wise Use), (ख) अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों की सूची, (ग) अंतरराष्ट्रीय सहयोग। रामसर स्थल चयन के नौ मानदंड (Criteria) में से कम से कम एक का पूरा होना आवश्यक। मॉन्ट्रो रिकॉर्ड (Montreux Record) का उद्देश्य पारिस्थितिकीय चरित्र में परिवर्तन वाले स्थलों पर ध्यान देना।
3. भारत की विधिक-संस्थागत व्यवस्था: पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017, जिसमें राष्ट्रीय आर्द्रभूमि समिति और राज्य स्तरीय प्राधिकरणों की व्यवस्था है; राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम (1987); राष्ट्रीय आर्द्रभूमि एटलस (ISRO-SAC) से मानचित्रण और निगरानी। सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आर्द्रभूमि-संबंधी निर्देशों का उल्लेख, जिनमें राज्यों द्वारा नियमों के क्रियान्वयन पर बल दिया गया।
4. समालोचनात्मक परीक्षण: (क) सूची-सम्मिलन केवल मान्यता है, सुरक्षा नहीं; वास्तविक संरक्षण राज्य-स्तरीय प्रबंधन योजनाओं, अतिक्रमण-नियंत्रण और जल-आगम (inflow) के रखरखाव पर निर्भर। (ख) शहरी अपशिष्ट, कृषि रसायन, अतिक्रमण और जलवायु-जनित सूखे जैसे दबाव। (ग) नियमों का राज्यवार असमान क्रियान्वयन और निधि-अभाव। (घ) सीमित डेटा और निगरानी की कमी।
5. संतुलन का प्रश्न: बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग की अवधारणा के अनुसार आर्द्रभूमि का उपयोग पारिस्थितिकीय चरित्र बनाए रखते हुए हो। मत्स्यन, पर्यटन, कृषि और चरागाह जैसी आजीविकाओं को विनियमित और सहभागी प्रबंधन से जोड़ना; स्थानीय समुदायों को निर्णय-प्रक्रिया में शामिल करना; पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं (जल-भंडारण, बाढ़-नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण) के आर्थिक मूल्यांकन द्वारा संरक्षण को आजीविका-लाभ से जोड़ना। विद्वानों के मत: संरक्षण-केंद्रित दृष्टिकोण बनाम सहभागी-संरक्षण दृष्टिकोण; दोनों के समन्वय की आवश्यकता।
6. निष्कर्ष: रामसर सूची को प्रबंधन-योजना, विधिक प्रवर्तन और सामुदायिक सहभागिता से जोड़ना आवश्यक; रामसर स्थल संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है उनकी पारिस्थितिकीय अखंडता का बने रहना।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
Uttar Pradesh PCS (UPPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: उत्तर प्रदेश की पहली रामसर स्थल ‘सौज झील’ को हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। इसके संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. सौज झील उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में स्थित है। 2. सौज झील को रामसर सूची में शामिल करने से राज्य में आर्द्रभूमि संरक्षण के प्रयासों को बढ़ावा मिलेगा। 3. सौज झील उत्तर प्रदेश की दूसरी रामसर स्थल है। उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: केवल 1 और 2 — सौज झील उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में स्थित है तथा इसे रामसर सूची में शामिल करने से राज्य में आर्द्रभूमि संरक्षण को बल मिलेगा। यह राज्य की पहली रामसर स्थल है, न कि दूसरी।
Mains: उत्तर प्रदेश में रामसर स्थलों की संख्या बढ़ाने के लिए राज्य सरकार द्वारा उठाए जाने वाले आवश्यक कदमों का वर्णन कीजिए। साथ ही, इन आर्द्रभूमियों के संरक्षण एवं प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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