01 Jul भारत में किशोर कुपोषण की समस्या : मुख्य चुनौतियाँ और रणनीतिक समाधान
प्रारंभिक परीक्षा के – राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम, यूनिसेफ, विश्व स्वास्थ्य संगठन, जनसांख्यिकीय लाभांश, एनीमिया, कुपोषण’ खण्ड से संबंधित।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा मुख्य परीक्षा हेतु –
GS Paper – II : स्वास्थ्य, पोषण एवं सामाजिक न्याय
GS Paper – III : मानव संसाधन, समावेशी विकास एवं जनसांख्यिकीय लाभांश
Essay : मानव पूंजी, पोषण एवं सतत् विकास। खण्ड से संबंधित।
खबरों में क्यों ?

- हाल ही में प्रकाशित राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों तथा सर्वेक्षणों ने यह साफ संकेत दिया है कि भारत के बड़ी जनसंख्या में किशोर एनीमिया (रक्तअल्पता), सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, अल्पपोषण तथा बढ़ते मोटापे जैसी समस्याओं से एक साथ प्रभावित हैं, जिसे कुपोषण का दोहरा बोझ (Double Burden of Malnutrition) कहा जाता है।
- वर्ष 2025 – 26 में भारत में किशोर स्वास्थ्य एवं पोषण का मुद्दा पुनः चर्चा के केंद्र में है। इसी पृष्ठभूमि में भारत सरकार ने सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.0, राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK), साप्ताहिक आयरन-फोलिक एसिड अनुपूरण (WIFS), एनीमिया मुक्त भारत अभियान तथा स्कूल स्वास्थ्य एवं कल्याण कार्यक्रम जैसी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर विशेष बल दिया है।
- राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5), व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण (CNNS), यूनिसेफ (UNICEF) एवं विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्टों ने यह रेखांकित किया है कि किशोरों में पोषण सुधार केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) को आर्थिक विकास में परिवर्तित करने की आधारशिला है। यही कारण है कि वर्तमान समय में किशोरों के स्वास्थ्य एवं पोषण का विषय नीति निर्माण और समसामयिक विमर्श में विशेष महत्त्व प्राप्त कर रहा है।
कुपोषण की अवधारणा क्या है ?
- किशोरावस्था (10 से 19 वर्ष) मानव जीवन चक्र की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील अवस्था होती है। यह वह समय है जब एक बच्चा वयस्कता की ओर कदम बढ़ाता है और उसके शरीर में तीव्र शारीरिक व जैविक विकास होता है। जैविक दृष्टि से, इस छोटी सी अवधि में व्यक्ति अपनी अंतिम वयस्क ऊँचाई का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा और अपने अंतिम वयस्क भार का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त करता है। इस दौरान शरीर के भीतर तीव्र उपापचयी (Metabolic) परिवर्तन होते हैं, जिसके कारण ऊर्जा, प्रोटीन और अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की माँग अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाती है। यदि इस अवस्था में सही पोषण न मिले, तो विकास की यह खिड़की हमेशा के लिए बंद हो जाती है।
किशोरों में कुपोषण मुख्य रूप से दो रूपों में प्रकट होता है:
- अल्पपोषण (Undernutrition) : इसके अंतर्गत तीन मुख्य स्थितियाँ शामिल हैं। पहली, उम्र के अनुपात में कम वजन होना (Underweight); दूसरी, दीर्घकालिक कुपोषण के कारण शरीर और हड्डियों का विकास रुक जाना जिसे अवरुद्ध वृद्धि (Stunting) कहते हैं; और तीसरी, भोजन की तात्कालिक कमी या गंभीर भुखमरी के कारण शरीर का अत्यधिक कमजोर हो जाना, जिसे दुबलापन (Wasting) कहा जाता है।
- छिपी हुई भूख (Hidden Hunger) : यह कुपोषण का एक ऐसा अदृश्य रूप है जिसमें किशोरों का पेट तो भर जाता है, लेकिन उनके भोजन में शरीर के लिए अनिवार्य सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे आयरन, जिंक, विटामिन A, विटामिन D, विटामिन B12 और फोलिक एसिड की भारी कमी बनी रहती है।
कुपोषण से जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ एवं उसमें अंतर्निहित प्रमुख कारण :

आज हमारे देश के किशोरों के सामने पोषण से जुड़ी कई गंभीर चुनौतियाँ हैं, जो निम्नलिखित है –
- एनीमिया की महामारी : राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के आंकड़े एक डरावनी सच्चाई को सामने लाते हैं। इसके अनुसार, भारत में 15 से 19 वर्ष की आधी से अधिक किशोर लड़कियाँ एनीमिया (रक्तअल्पता) से पीड़ित हैं। शरीर में खून की यह कमी न केवल उनके संज्ञानात्मक विकास (सोचने-समझने की क्षमता) को बाधित करती है, बल्कि भविष्य में उनके मातृत्व स्वास्थ्य को भी गंभीर खतरे में डालती है।
- आहार विविधता का अभाव : इस महामारी का सबसे बड़ा कारण आहार विविधता (Diet Diversity) का अभाव है। हमारे समाज में दैनिक भोजन मुख्य रूप से केवल कार्बोहाइड्रेट (जैसे गेहूं और चावल) पर अत्यधिक निर्भर है। दैनिक आहार में प्रोटीन, आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों, हरी पत्तेदार सब्जियों और मौसमी फलों का समावेश अत्यंत कम या न के बराबर होता है, जिससे शरीर खोखला होने लगता है।
- सामाजिक-आर्थिक कारण : गरीबी और कुपोषण का आपस में चोली-दामन का साथ है। सघन गरीबी के कारण आज भी देश के एक बड़े हिस्से की पौष्टिक खाद्य पदार्थों तक पहुँच बेहद सीमित है। इसके साथ ही, बाल विवाह और कम उम्र में गर्भधारण की कुप्रथा के कारण कुपोषण का एक ऐसा दुष्चक्र (Intergenerational Cycle of Malnutrition) चल पड़ता है, जहाँ एक कुपोषित और कमजोर किशोरी एक कमजोर बच्चे को जन्म देती है और यह समस्या पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती है।
- आधुनिक जीवनशैली से जुड़े कारण : शहरी और संपन्न परिवारों के किशोरों में एक अलग प्रकार की समस्या देखी जा रही है। आधुनिक जीवनशैली, बढ़ता स्क्रीन टाइम और शारीरिक निष्क्रियता के कारण किशोरों का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है। टेलीविजन और सोशल मीडिया पर भ्रामक विज्ञापनों के प्रभाव में आकर किशोर उच्च वसा, अत्यधिक चीनी और नमक वाले (HFSS) प्रोसेस्ड व जंक फूड का अधिक सेवन कर रहे हैं, जो उन्हें मोटापे और ‘छिपी हुई भूख’ की ओर धकेल रहा है।
सामाजिक, संस्थागत और प्रशासनिक बाधाएँ :
नीतियों के स्तर पर भी कई ऐसी बाधाएँ हैं जो इस समस्या को और जटिल बना देती हैं:
- लैंगिक असमानता : हमारे समाज में आज भी पितृसत्तात्मक सोच हावी है, जिसके कारण परिवारों के भीतर भोजन और पोषण के वितरण में लैंगिक भेदभाव किया जाता है। लड़कों की तुलना में लड़कियों के खान-पान और स्वास्थ्य पर कम ध्यान दिया जाता है।
- शिक्षा से अलगाव : प्राथमिक स्तर पर तो बच्चे सरकारी योजनाओं से जुड़े रहते हैं, लेकिन माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने वाले किशोर सरकारी कल्याणकारी योजनाओं (जैसे PM-POSHAN या मिड-डे मील) के सुरक्षा कवच से बाहर हो जाते हैं।
- प्रशासनिक समन्वय की कमी : कुपोषण से लड़ने के लिए जिम्मेदार विभिन्न मंत्रालयों (जैसे स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय, तथा महिला एवं बाल विकास मंत्रालय) के बीच जमीनी स्तर पर बहु-विभागीय समन्वय की भारी कमी दिखाई देती है, जिससे बिखर जाती हैं।
- सुदृढ़ निगरानी प्रणाली का अभाव होना : वर्तमान समय में धरातल पर किस किशोर को क्या पोषण मिल रहा है, इसकी वास्तविक समय (Real-time) में डिजिटल निगरानी करने वाली किसी सुदृढ़ प्रणाली का अभाव है, जिससे समय रहते इससे संबंधित सुधारात्मक कदम उठा पाना संभव नहीं हो पाता है।
कुपोषण से जुड़ी प्रमुख सरकारी पहलें :
| योजना / कार्यक्रम | मुख्य उद्देश्य | प्रमुख विशेषताएँ |
| सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.0 | कुपोषण दर में कमी लाना | पूरक पोषण, डिजिटल ग्रोथ ट्रैकिंग (पोषण ट्रैकर), व्यवहार परिवर्तन। |
| राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK) | किशोरों का समग्र विकास | पोषण, मानसिक स्वास्थ्य, प्रजनन स्वास्थ्य तथा नशामुक्ति पर ध्यान। |
| एनीमिया मुक्त भारत (AMB) | एनीमिया के प्रसार को कम करना | 6X6X6 रणनीति: IFA सप्लीमेंटेशन, कृमि नियंत्रण (Deworming), डिजिटल टेस्टिंग। |
| साप्ताहिक आयरन-फोलिक एसिड अनुपूरण (WIFS) | आयरन की कमी की रोकथाम | स्कूलों और आंगनवाड़ियों के माध्यम से साप्ताहिक IFA टैबलेट का वितरण। |
| स्कूल स्वास्थ्य एवं कल्याण कार्यक्रम | स्वास्थ्य शिक्षा | ‘हेल्थ एंड वेलनेस एम्बेसेडर’ के माध्यम से व्यावहारिक चेतना, स्वास्थ्य परीक्षण। |
| पीएम पोषण (PM-POSHAN) | स्कूली बच्चों का पोषण स्तर सुधारना | विद्यालयों में गर्म पका हुआ संतुलित भोजन और पोषण वाटिका को बढ़ावा। |
रणनीतिक समाधान एवं आगे की राह :

- जीवन-चक्र आधारित समग्र पोषण दृष्टिकोण : किशोर कुपोषण की समस्या का स्थायी समाधान केवल किशोरावस्था में हस्तक्षेप से संभव नहीं है। इसके लिए गर्भावस्था, जन्म, शैशवावस्था, प्रारंभिक बाल्यावस्था और किशोरावस्था तक पोषण एवं स्वास्थ्य सेवाओं की निरंतर एवं समन्वित श्रृंखला विकसित करना आवश्यक है। मातृ पोषण, स्तनपान, पूरक आहार, नियमित टीकाकरण तथा किशोर स्वास्थ्य सेवाओं को एकीकृत कर जीवन-चक्र आधारित मॉडल अपनाया जाना चाहिए।
- पोषण-सुरक्षित एवं विविधतापूर्ण खाद्य प्रणाली का विकास : सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), पीएम पोषण (PM POSHAN) योजना तथा आंगनवाड़ी सेवाओं में स्थानीय एवं पोषक मोटे अनाज (श्री अन्न) जैसे – रागी, बाजरा, ज्वार और कोदो को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही, चावल, गेहूँ का आटा, दूध, खाद्य तेल एवं नमक जैसे आवश्यक खाद्य पदार्थों का आयरन, फोलिक एसिड, विटामिन-A, विटामिन-D तथा अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों से वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप फोर्टिफिकेशन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- विद्यालय आधारित समग्र पोषण एवं स्वास्थ्य मॉडल : विद्यालयों को केवल शिक्षा का केंद्र न मानकर पोषण संवर्धन का प्रमुख मंच बनाया जाए। प्रत्येक विद्यालय में ‘पोषण क्लब’ का गठन, ‘पोषण वाटिका’ का विकास, नियमित पोषण एवं स्वास्थ्य शिक्षा, मासिक स्वास्थ्य परीक्षण तथा विद्यालय परिसर एवं उसके आसपास जंक फूड की बिक्री पर प्रभावी नियंत्रण हेतु ‘स्वस्थ विद्यालय कैंटीन नीति’ लागू की जानी चाहिए।
- डिजिटल निगरानी एवं अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग : कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), बिग डेटा एनालिटिक्स तथा डिजिटल हेल्थ प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हुए एकीकृत ‘राष्ट्रीय किशोर पोषण ट्रैकर’ विकसित किया जाए। इसके माध्यम से प्रत्येक किशोर की ऊँचाई, वजन, BMI, एनीमिया की स्थिति तथा पोषण संकेतकों की नियमित डिजिटल निगरानी की जाए, जिससे उच्च जोखिम वाले किशोरों की शीघ्र पहचान कर समयबद्ध हस्तक्षेप सुनिश्चित किया जा सके।
- व्यवहार परिवर्तन एवं जन-जागरूकता अभियान (SBCC) : केवल पोषण उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है; स्वस्थ खान-पान संबंधी व्यवहार विकसित करना भी आवश्यक है। इसके लिए व्यवहार परिवर्तन एवं जन-जागरूकता अभियान (SBCC) के माध्यम से लैंगिक भेदभाव समाप्त करने, किशोरियों के पोषण, मासिक धर्म स्वच्छता, संतुलित आहार तथा स्थानीय एवं पारंपरिक पौष्टिक खाद्य पदार्थों – जैसे आँवला, अमरूद, सहजन, बाजरा आदि के उपभोग को बढ़ावा देने हेतु व्यापक सामुदायिक अभियान चलाए जाने चाहिए।
- नीतिगत एवं संस्थागत सुधार : देश में किशोरों की विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए एक समर्पित ‘राष्ट्रीय किशोर पोषण एवं स्वास्थ्य नीति’ तैयार की जानी चाहिए। इसके अंतर्गत विद्यालयों एवं समुदाय स्तर पर वार्षिक सार्वभौमिक स्वास्थ्य एवं पोषण स्क्रीनिंग को अनिवार्य बनाया जाए। साथ ही, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा उच्च वसा, उच्च चीनी एवं उच्च नमक (HFSS) युक्त अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों के विज्ञापनों, विशेषकर बच्चों एवं किशोरों को लक्षित प्रचार, पर कठोर नियामक नियंत्रण लागू किया जाए।
- बहु-क्षेत्रीय समन्वय एवं सामुदायिक सहभागिता : किशोर कुपोषण की समस्या का समाधान केवल स्वास्थ्य विभाग के प्रयासों से संभव नहीं है। स्वास्थ्य, शिक्षा और महिला एवं बाल विकास जैसे विभिन्न विभागों का आपस में समन्वय स्थापित कर स्वयं सहायता समूहों व स्थानीय निकायों की मदद से पोषण को ‘जन-आंदोलन’ का स्वरूप प्रदान किया जाना चाहिए।
- अनुसंधान, नवाचार एवं साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण : किशोर पोषण से संबंधित नवीन अनुसंधानों, स्थानीय पोषण मॉडलों, बायोफोर्टिफाइड फसलों, डिजिटल स्वास्थ्य समाधानों तथा क्षेत्रीय पोषण असमानताओं पर नियमित अध्ययन को प्रोत्साहित किया जाए। नीति निर्माण एवं संसाधन आवंटन में वास्तविक समय डेटा एवं वैज्ञानिक साक्ष्यों को आधार बनाया जाए, जिससे योजनाओं की प्रभावशीलता एवं जवाबदेही में वृद्धि हो सके।
निष्कर्ष :
- कुपोषण केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि मानव संसाधन की गंभीर क्षति और आर्थिक प्रगति की सबसे बड़ी बाधा है। वर्तमान में भारत जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) के एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। ऐसे में किशोर पोषण को महज एक स्वास्थ्य कार्यक्रम के दायरे से बाहर निकालकर, एक बहुआयामी राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में देखना होगा।
- संपूर्ण सरकार (Whole-of-Government) और संपूर्ण समाज (Whole-of-Society) के एकीकृत दृष्टिकोण को अपनाकर ही कुपोषण के इस दुष्चक्र को तोड़ा जा सकता है। आज की स्वस्थ, सुपोषित और ऊर्जावान किशोर आबादी ही वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के भव्य संकल्प को साकार करने की सबसे मजबूत आधारशिला सिद्ध होगी। यह एक ऐसी सामाजिक और आर्थिक चुनौती है, जिस पर तुरंत और समेकित रूप से कदम उठाना देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए अनिवार्य है।
स्त्रोत – पी. आई. बी. एवं द हिन्दू।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
- 1. भारत में किशोरों में कुपोषण की चुनौतियों और सरकारी पहलों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, भारत में 15 से 19 वर्ष की आधी से अधिक किशोर लड़कियाँ एनीमिया (रक्तअल्पता) से पीड़ित हैं।
- राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK) का मुख्य उद्देश्य ‘6X6X6 रणनीति’ के माध्यम से एनीमिया के प्रसार को कम करना और IFA सप्लीमेंटेशन देना है।
- माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने वाले किशोर अक्सर ‘पीएम पोषण’ जैसी योजनाओं के सुरक्षा कवच से बाहर हो जाते हैं।
उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 1 और 3
(C) केवल 2 और 3
(D) 1, 2 और 3
उत्तर – (B) केवल 1 और 3
व्याख्या : कथन 1 और 3 सही हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि ‘6X6X6 रणनीति’ और IFA सप्लीमेंटेशन ‘एनीमिया मुक्त भारत (AMB)’ अभियान की प्रमुख विशेषता है, न कि राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK) की विशेषता है। राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK) का ध्यान पोषण के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य, प्रजनन स्वास्थ्य और नशामुक्ति पर केंद्रित है।
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.1. “क्या कुपोषण केवल स्वास्थ्य समस्या है अथवा यह मानव पूँजी, आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए भी एक गंभीर चुनौती है? स्पष्ट कीजिए।” ( शब्द सीमा – 250 अंक – 15 )

No Comments