भारत में सामाजिक आधुनिकीकरण : आर्थिक विकास बनाम सामाजिक समानता

भारत में सामाजिक आधुनिकीकरण : आर्थिक विकास बनाम सामाजिक समानता

मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र – 1 – के अंतर्गत ‘ भारतीय समाज, भारतीय सामाजिक मुद्दे’ और सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र – 3 – के अंतर्गत ‘ भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास, सामाजिक  न्याय ’ से संबंधित।

प्रारंभिक परीक्षा के अंतर्गत – ‘ सामाजिक न्याय, आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS), सतत विकास लक्ष्यों (SDGs), विकसित भारत @ 2047, गृहस्थ उपभोग व्यय सर्वेक्षण, सामाजिक संबंध (अंतर्विवाह) बनाम आर्थिक भूमिका (श्रम विभाजन), अवैतनिक श्रम, भेदभाव-रोधी कानूनों का सख्त प्रवर्तन ’ से संबंधित।

 

ख़बरों में क्यों ?

 

 

  • हाल ही में जारी आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2023-24 और उपभोग सर्वेक्षणों से स्पष्ट होता है कि भारत में GDP में वृद्धि के बावजूद आय, रोज़गार और अवसरों में असमानताएँ बनी हुई हैं।
  • भारत की तेज़ आर्थिक वृद्धि और 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य के बीच आर्थिक प्रगति और सामाजिक आधुनिकीकरण के असंतुलन को लेकर यह मुद्दा चर्चा में है। 
  • भारत में जाति-आधारित विषमताएँ और श्रम बाज़ार की अनौपचारिकता विकास के लाभों के समान वितरण में बाधा डाल रही हैं, जिससे दीर्घकालिक एवं सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) पर प्रश्नचिह्न खड़ा हो रहा है और सामाजिक न्याय की कमी के कारण भारत के दीर्घकालिक व सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति में यह एक प्रमुख बाधा बनकर उभरी है।

 

सामाजिक आधुनिकीकरण की परिभाषा :

 

  • भारतीय संदर्भ में सामाजिक आधुनिकीकरण वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से एक पारंपरिक समाज जो ऐतिहासिक रूप से कठोर जाति-आधारित पदानुक्रम और अंतर्विवाह (एंडोगैमी) पर आधारित रहा है, जो एक ऐसे आधुनिक, समेकित समाज में रूपांतरित होता है, जो व्यक्तिगत योग्यता, सामाजिक गतिशीलता और भ्रातृत्व के मूल्यों पर टिका हो।
    यह जन्म-आधारित ‘श्रमिकों के विभाजन (Division of Labourers)’ से हटकर चयन और कौशल पर आधारित ‘श्रम के विभाजन (Division of Labour)’ की ओर संक्रमण को दर्शाता है। वास्तविक सामाजिक आधुनिकीकरण तब संभव होता है, जब सामाजिक संपर्क व अवसर वंशानुगत पहचानों से ऊपर उठते हैं, जिसका प्रमुख संकेत अंतर्जातीय विवाहों की बढ़ती स्वीकृति और आर्थिक अवसरों तक समान पहुँच है।

 

भारत में सामाजिक असमानता की पृष्ठभूमि एवं ऐतिहासिक संदर्भ :

 

  • भारत में सामाजिक असमानता की जड़ें पारंपरिक जाति-व्यवस्था में निहित हैं, जिसने ऐतिहासिक रूप से सामाजिक संबंधों (अंतर्विवाह) और आर्थिक भूमिकाओं (श्रम विभाजन) दोनों को निर्धारित किया है।
  • औपनिवेशिक शासन के दौरान हुए औपचारिकीकरण : ब्रिटिश शासन के दौरान हजारों जातियों को जनगणना में दर्ज कर तथा हिंदू कानून के अंतर्गत जाति-आधारित विवाह को न्यायिक रूप से लागू कर पारंपरिक विभाजनों को औपचारिक स्वरूप दिया गया। इस काल में अंतर्जातीय विवाह प्रायः धर्म-परिवर्तन से जुड़ा होता था।
  • प्रारंभिक सुधार प्रयास : भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन ने अस्पृश्यता-निवारण को राष्ट्रीय पहचान का मूल स्तंभ माना। विठ्ठलभाई पटेल जैसे सुधारकों ने इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में अंतर्जातीय विवाह को वैध बनाने के प्रयास किए, किंतु प्रारंभ में वे सफल नहीं हो सके।
  • स्वतंत्रता के बाद हुए विधायी परिवर्तन : हिंदू विवाह अधिनियम के माध्यम से एक बड़ा कानूनी परिवर्तन हुआ, जिसने अंतर्जातीय विवाहों पर कानूनी प्रतिबंध समाप्त किया। हालांकि, सामाजिक व्यवहार कानूनी सिद्धांतों की तुलना में धीमी गति से बदला।

 

सामाजिक आधुनिकीकरण का महत्व :

 

 

  • आर्थिक उत्पादकता : सामाजिक विकास केवल कल्याणकारी उपाय नहीं है; अधिक श्रमिकों और उद्यमियों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़कर यह तेज़ और समावेशी आर्थिक वृद्धि को प्रोत्साहित करता है। जाति-आधारित पेशागत कठोरताओं को तोड़ने से श्रम गतिशीलता और दक्षता बढ़ती है।
  • सामाजिक संपर्क एवं राष्ट्रीय एकीकरण : अंतर्जातीय संपर्क और एकीकरण सामाजिक विश्वास, भ्रातृत्व और लोकतांत्रिक स्थिरता को सुदृढ़ करते हैं। एक सुसंगठित समाज विविधता का बेहतर प्रबंधन कर सकता है और सामाजिक संघर्षों को रोक सकता है।
  • मानव पूंजी का सर्वोत्तम उपयोग : गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल और रोजगार तक समान पहुँच देश को अपनी जनसांख्यिकीय लाभांश का पूर्ण उपयोग करने में सक्षम बनाती है, विशेषकर दलितों और आदिवासियों के लिए, जो कुल जनसंख्या का लगभग एक-चौथाई हैं।
  • संरचनात्मक असमानता में कमी : सामाजिक आधुनिकीकरण गहराई से जमी पदानुक्रमित संरचनाओं को तोड़ता है, जिससे आय, उपभोग और अवसरों की खाइयाँ कम होती हैं और आर्थिक वृद्धि न्यायसंगत विकास में परिवर्तित होती है।
  • संवैधानिक मूल्यों का सुदृढ़ीकरण : समानता, गरिमा और भ्रातृत्व को बढ़ावा देकर सामाजिक आधुनिकीकरण संविधान के आदर्शों की वास्तविकता को गहरा करता है और गणराज्य की नैतिक व लोकतांत्रिक नींव को मज़बूत करता है।

 

सामाजिक आधुनिकीकरण की प्रमुख चुनौतियाँ : 

 

  • जाति-आधारित अंतर्विवाह (Endogamy) की निरंतरता : कानूनी और शैक्षिक प्रगति के बावजूद, भारत में विवाह आज भी काफी हद तक जाति की सीमाओं में सिमटे हुए हैं। सर्वेक्षणों के अनुसार, केवल 5 – 6% विवाह ही अंतर्जातीय होते हैं। यह स्थिति सामाजिक संपर्क को सीमित करती है और जातिगत अलगाव को पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनाए रखती है।
  • संस्थागत भेदभाव एवं मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव : उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव के प्रकरण यह दर्शाते हैं कि कानूनी समानता और सामाजिक व्यवहार के बीच गहरा अंतर बना हुआ है। रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसी त्रासद घटनाएँ इस बात को उजागर करती हैं कि भेदभाव केवल सामाजिक या आर्थिक नहीं, बल्कि गंभीर मनोवैज्ञानिक संकट भी उत्पन्न करता है, जिसे समाजशास्त्र में “जन्म का घातक संयोग” कहा जाता है।
  • पेशागत जाल : यद्यपि व्यवसाय चयन में संवैधानिक स्वतंत्रता है, फिर भी अनुसूचित जातियाँ (SC) आज भी आनुपातिक रूप से मैला ढोने और कचरा प्रबंधन जैसे कलंकित व निम्न श्रेणी के कार्यों में अधिक संलग्न हैं। यह ‘पेशागत गतिशीलता’ (Occupational Mobility) के अभाव को दर्शाता है।
  • आदिवासी समुदायों का अलगाव : अनुसूचित जनजातियाँ (ST) भौगोलिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर मुख्यधारा से कटी हुई हैं। जिससे आर्थिक मुख्यधारा, औपचारिक रोज़गार और राजनीतिक निर्णय-प्रक्रिया से काफी हद तक अलग-थलग बनी हुई हैं। बड़ी संख्या में आदिवासी पारिवारिक या घरेलू उद्यमों में अवैतनिक अथवा अल्प-भुगतान श्रम तक सीमित रह जाते हैं, जिससे उनकी उत्पादकता और सामाजिक सुरक्षा दोनों प्रभावित होती हैं।
  • श्रम बाज़ार की अनौपचारिकता और अधिकार : भारतीय कार्यबल में व्याप्त अनौपचारिकता सामाजिक रूप से हाशिए पर स्थित समुदायों को सबसे अधिक चोट पहुँचाती है:
  • अनुबंध का अभाव : 58% नियमित वेतनभोगी कर्मचारियों के पास लिखित अनुबंध नहीं है।
  • सामाजिक सुरक्षा की कमी : 53% श्रमिक भविष्य निधि या बीमा जैसी सुरक्षा से वंचित हैं।
  • सवेतन अवकाश : 47.3% श्रमिकों को बीमारी या व्यक्तिगत कारणों हेतु सवेतन अवकाश नहीं मिलता, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सदैव अस्थिर बनी रहती है।

 

शासन एवं वर्तमान नीतिगत हस्तक्षेप : 

 

  • सरकार ने इन विसंगतियों को दूर करने के लिए कुछ कदम उठाए हैं, जिनका प्रभाव मिश्रित रहा है:
  • अंतर्जातीय विवाह प्रोत्साहन : डॉ. अंबेडकर योजना सामाजिक एकीकरण के उद्देश्य से लागू की गई, परंतु सामाजिक प्रतिरोध और सीमित जागरूकता के कारण इसका प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित रहा है।
  • यूजीसी (UGC) के नए विनियम : विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव के विरुद्ध ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति और निगरानी तंत्र को मजबूत करने पर बल दिया गया है।
  • आरक्षण की प्रासंगिकता पर विमर्श : उच्च नौकरशाही और प्रबंधन पदों में उच्च जातियों के निरंतर वर्चस्व को देखते हुए, समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए सीमित अवधि तक जाति-आधारित आरक्षण आज भी एक आवश्यक नीतिगत साधन बना हुआ है।

 

नैतिक एवं लोकतांत्रिक चिंताएँ :

 

  • देश में अनुसूचित जातियों (दलितों) के प्रति निरंतर भेदभाव और अनुसूचित जनजातियों (आदिवासियों) का अलगाव समानता के संवैधानिक वादे की विफलता को दर्शाता है। जब आबादी का बड़ा हिस्सा विकास के लाभों से वंचित रहता है या हिंसा का सामना करता है, तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होती है। वास्तविक आधुनिकीकरण के लिए सत्ता और प्रशासन में बैठे वर्गों की मानसिकता में परिवर्तन आवश्यक है।

 

समाधान / आगे की राह : 

 

  1. गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा तक समान पहुँच सुनिश्चित करना : असमानता घटाने की कुंजी शिक्षा है। उच्च शिक्षा से निम्न जाति वर्गों और आदिवासियों के बीच आय-अंतर में उल्लेखनीय कमी आती है; अतः छात्रवृत्ति, मेंटरशिप और संस्थागत समर्थन को मज़बूत किया जाए।
  2. SC/ST एवं अल्पसंख्यक उद्यमिता को समर्थन देना :  शासन को केवल वेतन-आधारित रोज़गार से आगे बढ़कर SC/ST-नेतृत्व वाले स्टार्टअप्स को पूंजी, बाज़ार-लिंकज और मार्गदर्शन उपलब्ध कराना चाहिए, ताकि पारंपरिक आर्थिक अवरोध टूटें।
  3. कार्यबल का औपचारिकीकरण करना : वर्ष 2047 की ओर बढ़ते हुए रोज़गार सृजन के साथ श्रमिक अधिकार, लिखित अनुबंध, सामाजिक सुरक्षा और सवेतन अवकाश अनिवार्य किए जाएँ, ताकि विकास समावेशी बने।
  4. सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देना : नीतियाँ केवल आर्थिक प्रोत्साहनों तक सीमित न रहें; सामाजिक संपर्क बढ़ाने के लिए सक्रिय हस्तक्षेप हों। अंतर्जातीय विवाह को समाज के अधिक पूर्ण आधुनिकीकरण के रूप में देखा जाए।
  5. भेदभाव-रोधी कानूनों का सख्त प्रवर्तन सुनिश्चित करना : हालिया नियामक उपायों का संस्थानीकरण किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि शैक्षणिक परिसरों एवं कार्यस्थलों पर सुरक्षित और समावेशी वातावरण हो।

 

निष्कर्ष : 

 

 

  • भारत में सामाजिक आधुनिकीकरण का लक्ष्य केवल आर्थिक वृद्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुँचें। सामाजिक समानता के बिना आर्थिक प्रगति अधूरी है और इन दोनों के संतुलन से ही एक समावेशी एवं न्यायपूर्ण भारत का निर्माण संभव है।
  • भारत ‘विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य तभी साकार होगा जब आर्थिक आधुनिकीकरण के साथ-साथ सामाजिक आधुनिकीकरण भी समान गति से आगे बढ़े। शिक्षा, कौशल, सामाजिक संपर्क और संवैधानिक मूल्योंसमानता, गरिमा और भ्रातृत्व के सुदृढ़ीकरण के माध्यम से ही यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि किसी नागरिक की प्रगति जन्म की दुर्घटना नहीं, बल्कि उसकी योग्यता और आकांक्षाओं से निर्धारित हो।
  • भारतीय अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण, भारतीय समाज के आधुनिकीकरण के बिना अधूरा है। विकास के लिए अवसंरचना और GDP महत्वपूर्ण हैं, परंतु सामाजिक विकास के प्रमुख साधन शिक्षा, कौशल-विकास और सदियों पुराने सामाजिक विभाजनों को तोड़ना ही होगा। 
  • विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को पाने के लिए यह आवश्यक है कि किसी भी नागरिक की प्रगति उसके जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी आकांक्षाओं और कौशल से निर्धारित हो। आर्थिक वृद्धि को संविधान के भ्रातृत्व और समानता जैसे मूल्यों के साथ संरेखित कर भारत एक वास्तविक अर्थों में समावेशी और सतत भविष्य का निर्माण कर सकता है।
  • सामाजिक आधुनिकीकरण तभी सार्थक होगा जब आर्थिक विकास के साथ समावेशी नीतियाँ, सामाजिक सुधार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, जागरूकता और प्रभावी शासन को समान प्राथमिकता दी जाए। आर्थिक प्रगति को सामाजिक न्याय से जोड़कर ही भारत वास्तविक अर्थों में आधुनिक, समतामूलक और सशक्त समाज का निर्माण कर सकता है।

 

स्त्रोत – इंडियन एक्सप्रेस एवं सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार की आधिकारिक वेबसाईट। 

 

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न : 

 

Q.1. भारत में सामाजिक आधुनिकीकरण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. सामाजिक आधुनिकीकरण का अर्थ है जाति-आधारित श्रमिकों के विभाजन से कौशल-आधारित श्रम-विभाजन की ओर संक्रमण।
  2. हिंदू विवाह अधिनियम ने स्वतंत्रता के बाद अंतर्जातीय विवाहों पर कानूनी प्रतिबंध लगाया।
  3. आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (Periodic Labour Force Survey – PLFS) 2023 – 24 उच्च जातियों और अनुसूचित जनजातियों के बीच नियमित वेतन/रोज़गार में उल्लेखनीय असमानता दर्शाता है।
  4. रोज़गार की अनौपचारिकता सामाजिक रूप से हाशिए पर स्थित समुदायों को असमान रूप से प्रभावित करती है।

उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

A. केवल कथन 1, 3 और 4

B. केवल कथन 1 और 2

C. केवल कथन 2 और 3

D. कथन 1, 2, 3 और 4 सभी। 

उत्तर – A

 

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न : 

 

Q.1. चर्चा कीजिए कि भारत में आर्थिक विकास यदि सामाजिक आधुनिकीकरण के समानांतर न हो, तो वह किस प्रकार संरचनात्मक असमानताओं को गहरा कर सकता है? निरंतर बनी जातिगत विषमताओं तथा श्रम बाज़ार की व्यापक अनौपचारिकता के संदर्भ में सामाजिक आधुनिकीकरण की प्रमुख चुनौतियों का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए तथा वर्ष 2047 तक समावेशी विकास सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक नीतिगत उपाय सुझाइए। ( शब्द सीमा – 250 अंक – 15 )

Dr. Akhilesh Kumar Shrivastava
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