भारत में सार्वभौमिक दिव्यांगता समावेशन का पुनर्गठन मॉडल

भारत में सार्वभौमिक दिव्यांगता समावेशन का पुनर्गठन मॉडल

भारत में सार्वभौमिक दिव्यांगता समावेशन का पुनर्गठन मॉडल

सामान्य अध्ययन-I : भारतीय समाज

चर्चा में क्यों? 

हाल के वर्षों में भारत की दिव्यांगता नीति में एक व्यापक और मौलिक बदलाव आया है। केंद्रीय बजट 2026-27 इस दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुआ है, जो दिव्यांगजनों को केवल ‘कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी’ के बजाय ‘आर्थिक विकास के सक्रिय भागीदार’ के रूप में मान्यता देता है। यह दृष्टिकोण ‘कल्याण-आधारित मॉडल’ से ‘अधिकार-आधारित और सशक्तीकरण-उन्मुख मॉडल’ की ओर एक निर्णायक कदम है। हालाँकि, वास्तविक समावेशन तब तक अधूरा है जब तक कि कौशल विकास और रोज़गार के साथ-साथ सुलभ सार्वजनिक स्थान, निर्बाध आवागमन और समावेशी सामाजिक बुनियादी ढाँचा सुनिश्चित न किया जाए।

संवैधानिक और कानूनी ढाँचा : 

भारत में दिव्यांगजनों के अधिकार किसी मानवीय दया पर नहीं, बल्कि सुदृढ़ संवैधानिक और कानूनी स्तंभों पर टिके हैं:
• संवैधानिक प्रावधान: यद्यपि संविधान में ‘दिव्यांग’ शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध), अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोज़गार में अवसर की समानता) और अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) उनके अधिकारों का आधार बनते हैं। साथ ही, राज्य के नीति निदेशक तत्वों (DPSP) के तहत अनुच्छेद 38 और 41 राज्य को दिव्यांगजनों के लिये शिक्षा, काम और सार्वजनिक सहायता सुनिश्चित करने का निर्देश देते हैं।
• दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD Act), 2016: यह मील का पत्थर कानून दिव्यांगता की श्रेणियों को 7 से बढ़ाकर 21 करता है और सरकारी नौकरियों में 4% व उच्च शिक्षा में 5% आरक्षण की गारंटी देता है।
• अन्य कानून: मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम (2017), भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम (1992) और राष्ट्रीय न्यास अधिनियम (1999) मानसिक स्वास्थ्य और विशेष पुनर्वास सेवाओं के मानकीकरण पर बल देते हैं।

संस्थागत संरचना : 

समावेशन के कार्यान्वयन के लिये त्रिस्तरीय ढाँचा कार्यरत है:
1. केंद्रीय स्तर: ‘दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग’ (DEPwD) नीतियों का निर्माण करता है, जबकि ‘मुख्य आयुक्त’ (CCPD) कानूनों के उल्लंघन की शिकायतों का समाधान करते हैं।
2. राज्य स्तर: राज्य आयुक्त और सलाहकार बोर्ड स्थानीय कानूनों के प्रवर्तन की निगरानी करते हैं।
3. ज़िला स्तर: समितियाँ ज़मीनी स्तर पर योजनाओं के क्रियान्वयन और दिव्यांग प्रमाण पत्र जारी करने का कार्य करती हैं.

प्रमुख सरकारी पहलें और सुधार :

सरकार ने दिव्यांगजनों को मुख्यधारा में लाने के लिये बहुआयामी प्रयास किये हैं:
• भौतिक सुगमता: ‘सुगम्य भारत अभियान’ के तहत रेलवे, हवाई अड्डों और सार्वजनिक भवनों का नवीनीकरण किया जा रहा है। केंद्र की 1,030 से अधिक इमारतों का जीर्णोद्धार किया जा चुका है, जहाँ केवल रैंप ही नहीं बल्कि सुलभ शौचालय और स्पर्शनीय पथ भी सुनिश्चित किये जा रहे हैं।
• आर्थिक सशक्तीकरण और कौशल विकास: बजट 2026-27 में 200 करोड़ रुपये के साथ ‘दिव्यांगजन कौशल योजना’ शुरू की गई है, जो AI, IT और गेमिंग (AVGC) जैसे उच्च-विकास क्षेत्रों पर केंद्रित है। साथ ही, NDFDC ने ₹1,330.22 करोड़ के रियायती ऋण वितरित कर उद्यमशीलता को बढ़ावा दिया है।
• डिजिटल एक्सेस और डेटा: ‘UDID’ कार्ड के माध्यम से प्रमाणीकरण का डिजिटलीकरण किया जा रहा है, जिससे 1.25 करोड़ से अधिक कार्ड बनाने का लक्ष्य है ताकि लाभ राज्य की सीमाओं के पार ले जाए जा सकें। ‘सुगम्य भारत ऐप’ और WCAG मानकों का पालन डिजिटल सेवाओं को सुलभ बना रहा है。
• शिक्षा और खेल: भारतीय सांकेतिक भाषा (ISL) में 3,189 से अधिक ई-कंटेंट वीडियो और 24/7 ISL समर्पित टीवी चैनल ‘PM e-VIDYA’ शैक्षिक बाधाओं को तोड़ रहे हैं। खेलों में, ‘खेलो भारत नीति 2025’ और ‘TOPS’ योजना के तहत पैरा-एथलीटों को विश्वस्तरीय प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

विद्यमान चुनौतियाँ और संरचनात्मक कमियाँ : 

इतने प्रयासों के बावजूद, धरातल पर कई गंभीर समस्याएँ मौजूद हैं:
1. सांख्यिकीय अदृश्यता: जनगणना के आँकड़ों और वास्तविक संख्या के बीच बड़ा अंतर है। अनुमान के अनुसार दिव्यांगजनों की आबादी 300 मिलियन तक हो सकती है, लेकिन डेटा की कमी बजट आवंटन को प्रभावित करती है।
2. रेट्रोफिट टोकनिज़्म: कई बार सुलभता के नाम पर केवल औपचारिक खानापूर्ति की जाती है। CAG की रिपोर्ट के अनुसार, 170 पुनर्निर्मित सरकारी भवनों में से केवल 34 का ही पूर्व-पहुँच ऑडिट किया गया था।
3. डिजिटल रंगभेद: ई-गवर्नेंस के दौर में भी कई बैंकिंग और स्वास्थ्य ऐप्स दिव्यांगजनों के लिये दुर्गम हैं। सामग्री प्रबंधन ढाँचे के तहत केवल 95 सरकारी वेबसाइटों को ही अब तक पूर्णतः सुलभ बनाया गया है।
4. आर्थिक बहिष्कार: निजी क्षेत्र में दिव्यांगजनों का प्रतिनिधित्व 1% से भी कम है और 37.9% संगठनों में कोई स्थायी दिव्यांग कर्मचारी नहीं है।
5. अंतर्संबंधीयता और लैंगिक मुद्दे: दिव्यांग महिलाओं को 10 गुना अधिक हिंसा का सामना करना पड़ता है और उनकी विशिष्ट प्रजनन आवश्यकताओं पर नीतिगत ध्यान कम है।
6. ग्रामीण-शहरी विभाजन: ग्रामीण क्षेत्रों में पुनर्वास सेवाएँ (फिजियोथेरेपी/स्पीच थेरेपी) लगभग नगण्य हैं, जिससे एक ‘थेरैप्यूटिक डेजर्ट’ की स्थिति पैदा हो गई है।
7. जलवायु भेद्यता: आपदा प्रबंधन प्रोटोकॉल में दिव्यांगजनों के लिये सुलभ चेतावनी और निकासी प्रणाली का अभाव है, जिससे वे आपदाओं के दौरान ‘जीवन रक्षा दंड’ झेलते हैं。

भविष्य की राह: एक नया मॉडल

समावेशन को प्रभावी बनाने के लिये निम्नलिखित उपायों की आवश्यकता है:
• स्मार्ट गवर्नेंस और ऑडिट: नगर निकायों को ‘डिजिटल भवन योजना अनुमोदन प्रणाली’ में AI-आधारित एक्सेसिबिलिटी ऑडिट को अनिवार्य करना चाहिये। गैर-अनुपालन पर स्वचालित नोटिस की व्यवस्था होनी चाहिये।
• विकेंद्रीकृत स्वास्थ्य सेवा (CBR 2.0): ग्रामीण क्षेत्रों के लिये आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को ‘दिव्यांग मित्र’ के रूप में प्रशिक्षित किया जाना चाहिये, ताकि वे पंचायत स्तर पर ही पुनर्वास सेवाएँ प्रदान कर सकें।
• कॉर्पोरेट समावेशन: निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिये ‘डाइवर्सिटी क्रेडिट’ व्यवस्था लागू की जानी चाहिये, जहाँ भर्ती और प्रतिधारण दर के आधार पर कर प्रोत्साहन दिये जाएं।
• ‘फिजीटल’ शिक्षा और सहायक तकनीक: स्कूलों में सहायक तकनीक (AT) प्रयोगशालाएँ स्थापित की जानी चाहिये और सामान्य शिक्षकों के लिये ‘सह-शिक्षण मॉड्यूल’ को B.Ed. पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहिये।
• आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DiDRR): आपदाओं के दौरान निकासी के लिये दिव्यांगजनों की जियो-टैग्ड रजिस्ट्री बनाई जानी चाहिये और अलर्ट प्रणालियों को कंपन व सांकेतिक भाषा के अनुकूल बनाया जाना चाहिये।
• वित्तीय और सार्वजनिक क्रय शक्ति: IRDAI को मानकीकृत बीमा उत्पाद अनिवार्य करने चाहिये। साथ ही, सरकार को केवल उन्हीं सॉफ्टवेयर और उपकरणों की खरीद करनी चाहिये जो ‘यूनिवर्सल डिज़ाइन’ के अनुरूप हों।

निष्कर्ष :

भारत अब ‘सहानुभूति’ से ‘सक्षमता’ और ‘दया’ से ‘अधिकार’ की ओर बढ़ रहा है। हालाँकि, कानून और नीतियों का अस्तित्व मात्र पर्याप्त नहीं है। वास्तविक सफलता तब मिलेगी जब समाज का दृष्टिकोण बदलेगा और हमारे बुनियादी ढाँचे ‘दिव्यांगता’ को एक बाधा के बजाय मानवीय विविधता के एक हिस्से के रूप में स्वीकार करेंगे। सार्वजनिक स्थानों, डिजिटल प्रणालियों और कार्यस्थलों को सार्वभौमिक रूप से सुलभ बनाकर ही हम ‘विकसित भारत’ के सपने को समावेशी और गरिमापूर्ण बना सकते हैं।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q. भारत लाखों दिव्यांग जनों का घर है। कानून के अंतर्गत उन्हें क्या लाभ उपलब्ध हैं? (2011)
1.सरकारी स्कूलों में 18 साल की उम्र तक मुफ्त स्कूली शिक्षा।
2.व्यवसाय स्थापित करने के लिये भूमि का अधिमान्य आवंटन। सार्वजनिक भवनों में रैंप।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)

 मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q.बजट 2026 किस प्रकार दिव्यांग जनों के प्रति कल्याण-आधारित दृष्टिकोण से अधिकार-आधारित दृष्टिकोण की ओर परिवर्तन को दर्शाता है, इसका आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये औत उन संरचनात्मक तथा नीतिगत कमियाँ की पहचान कीजिये, जो अभी भी विद्यमान हैं।   ( शब्द सीमा – 250, अंक – 15 )

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