19 Aug मानसून सत्र 2026: संसद की सबसे कम उत्पादकता, फिर भी 11 विधेयक पारित
✎ संसदीय उत्पादकता और विधायी प्रक्रिया भारतीय लोकतंत्र के सुचारु संचालन के लिए आवश्यक हैं, और इन पर व्यवधानों का प्रभाव विधायी गुणवत्ता तथा सरकार की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न उठाता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान—ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना। | GS Paper II — संसद और राज्य विधायिका—संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।
- Prelims: संसद सत्र, लोकसभा, राज्यसभा, प्रश्नकाल, शून्यकाल, विधायी प्रक्रिया, अध्यादेश, संसदीय समितियाँ
- Essay: भारतीय लोकतंत्र में संसदीय कार्यवाही की महत्ता और चुनौतियाँ, संसदीय उत्पादकता: लोकतंत्र के सुचारु संचालन का आधार
त्वरित पुनरावृत्ति: संसदीय उत्पादकता और विधायी प्रक्रिया भारतीय लोकतंत्र के सुचारु संचालन के लिए आवश्यक हैं, और इन पर व्यवधानों का प्रभाव विधायी गुणवत्ता तथा सरकार की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न उठाता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त, 2026 को समाप्त हो गया, जिसमें दोनों सदनों की उत्पादकता में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। राज्यसभा की उत्पादकता 33% रही, जो 2023 के बजट सत्र (24%) के बाद सबसे कम है। सत्र के दौरान व्यवधानों के बावजूद, कुल 11 विधेयक पारित किए गए, जिनमें से नौ पर लोकसभा में किसी भी सांसद द्वारा चर्चा नहीं की गई। यह स्थिति संसदीय कार्यवाही की प्रभावशीलता और विधायी प्रक्रिया की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
पृष्ठभूमि
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 79 के तहत संसद का प्रावधान किया गया है, जिसमें राष्ट्रपति और दो सदन—लोकसभा व राज्यसभा—शामिल हैं।
- संसद के मुख्य कार्य कानून बनाना, सरकार पर नियंत्रण रखना, बजट पारित करना और सार्वजनिक मुद्दों पर चर्चा करना है।
- संसद के सत्र राष्ट्रपति द्वारा आहूत किए जाते हैं, और दो सत्रों के बीच अधिकतम छह महीने का अंतराल हो सकता है। सामान्यतः तीन सत्र होते हैं—बजट, मानसून और शीतकालीन।
- प्रश्नकाल (Question Hour) और शून्यकाल (Zero Hour) संसदीय कार्यवाही के महत्त्वपूर्ण भाग हैं, जहाँ सांसद सार्वजनिक महत्त्व के मुद्दों पर प्रश्न उठाते हैं और सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं।
- विधायी प्रक्रिया में विधेयक का परिचय, विभिन्न चरणों में चर्चा, मतदान और अंततः राष्ट्रपति की सहमति शामिल होती है, जिसके बाद वह कानून बन जाता है।
- संसदीय समितियाँ विधेयकों की विस्तृत जाँच और सार्वजनिक परामर्श के लिए महत्त्वपूर्ण होती हैं, जिससे कानूनों की गुणवत्ता में सुधार होता है।
संसदीय उत्पादकता और विधायी प्रक्रिया
- संसदीय उत्पादकता से तात्पर्य संसद के निर्धारित समय का उपयोग विधायी, वित्तीय और विचार-विमर्श संबंधी कार्यों को पूरा करने में कितना प्रभावी ढंग से किया गया है।
- विधायी प्रक्रिया किसी विधेयक को कानून बनाने की चरण-दर-चरण प्रक्रिया है, जिसमें प्रथम वाचन (परिचय), द्वितीय वाचन (विस्तृत चर्चा और संशोधन), समिति चरण (यदि संदर्भित हो), तृतीय वाचन (अंतिम मतदान) और दूसरे सदन में पारित होना शामिल है।
- प्रश्नकाल संसद के कामकाज का पहला घंटा होता है, जिसमें सांसद मंत्रियों से प्रश्न पूछते हैं और मौखिक उत्तर प्राप्त करते हैं। यह सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक महत्त्वपूर्ण तंत्र है।
- शून्यकाल प्रश्नकाल के तुरंत बाद शुरू होता है, जहाँ सांसद बिना पूर्व सूचना के सार्वजनिक महत्त्व के तत्काल मामलों को उठा सकते हैं। यह भारतीय संसदीय नवाचार है।
- विधेयकों पर चर्चा और बहस लोकतंत्र के लिए आवश्यक है, क्योंकि यह विभिन्न दृष्टिकोणों को सामने लाती है, संभावित कमियों को उजागर करती है और कानून को अधिक समावेशी व प्रभावी बनाती है।
- संसदीय व्यवधानों के कारण उत्पादकता में कमी आती है, जिससे महत्त्वपूर्ण विधायी कार्य और सार्वजनिक मुद्दों पर चर्चा बाधित होती है।
- अनेक विधेयकों का बिना चर्चा के पारित होना विधायी गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है और लोकतंत्र में जन प्रतिनिधित्व के सिद्धांत को कमजोर कर सकता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| सत्र की उत्पादकता | लोकसभा में 15% और राज्यसभा में 33% रही, जो हाल के वर्षों में सबसे कम है। |
| विधेयकों का पारित होना | कुल 11 विधेयक पारित हुए, जिनमें से 9 पर लोकसभा में कोई चर्चा नहीं हुई। |
| चर्चा का अभाव | कई विधेयक बिना किसी सांसद की भागीदारी के पारित हुए, कुछ तो पाँच मिनट से भी कम समय में। |
| प्रश्नकाल की दक्षता | लोकसभा में 1% से भी कम और राज्यसभा में लगभग 12% रही, जो 2019 के बाद सबसे कम है। |
| सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 | यह एकमात्र विधेयक था जिस पर विस्तृत चर्चा हुई (लोकसभा में 11 घंटे, राज्यसभा में 7 घंटे)। |
महत्व
लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर प्रभाव
- संसद में चर्चा और बहस का अभाव विधायी प्रक्रिया की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।
- जनप्रतिनिधियों द्वारा विधेयकों की जांच न होने से कानून निर्माण में जनता की भागीदारी कम होती है।
शासन और जवाबदेही
- प्रश्नकाल की कम दक्षता सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने में बाधा डालती है।
- बिना चर्चा के विधेयक पारित होने से सरकार की नीतियों पर पर्याप्त संसदीय निगरानी नहीं हो पाती।
विधायी गुणवत्ता
- पर्याप्त बहस के बिना पारित कानून में खामियां रह सकती हैं, जिससे भविष्य में कानूनी चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं।
- यह सुनिश्चित करने के लिए कि कानून सभी हितधारकों के विचारों को प्रतिबिंबित करें, व्यापक चर्चा आवश्यक है।
चुनौतियाँ
1. संसदीय कार्यवाही में व्यवधान
- विपक्षी दलों के विरोध प्रदर्शनों के कारण सदन की कार्यवाही बार-बार बाधित हुई।
- यह व्यवधान महत्वपूर्ण विधायी कार्यों और चर्चाओं को रोकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संसद और कार्यप्रणाली
2. विधायी जांच का अभाव
- अधिकांश विधेयकों पर लोकसभा में कोई चर्चा नहीं हुई, जिससे उनकी गहन जांच नहीं हो पाई।
- यह कानून निर्माण की गुणवत्ता और प्रभावशीलता को प्रभावित करता है।
यूपीएससी लिंक: संसद की विधायी शक्तियाँ
3. प्रश्नकाल की गिरती दक्षता
- प्रश्नकाल का बहुत कम समय उपयोग किया गया, जिससे सरकार से सवाल पूछने का अवसर कम हो गया।
- यह संसदीय निगरानी और सरकार की जवाबदेही को कमजोर करता है।
यूपीएससी लिंक: संसदीय उपकरण और प्रक्रियाएँ
4. संसदीय समितियों की भूमिका
- कई विधेयकों को संसदीय समितियों के पास भेजे बिना पारित किया गया, जिससे विशेषज्ञ जांच का अवसर छूट गया।
- समितियाँ विधेयकों की विस्तृत जांच और सार्वजनिक परामर्श के लिए महत्वपूर्ण हैं।
यूपीएससी लिंक: संसदीय समितियाँ
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| कम उत्पादकता | संसद का मुख्य कार्य, यानी कानून बनाना और सरकार पर नियंत्रण रखना, बाधित होता है। |
| चर्चा के बिना विधेयक पारित | कानूनों की गुणवत्ता और वैधता पर सवाल उठते हैं, लोकतांत्रिक सिद्धांतों का उल्लंघन होता है। |
| प्रश्नकाल का अप्रभावी होना | सरकार की जवाबदेही कम होती है और जनता के मुद्दों को उठाने का मंच कमजोर होता है। |
| विपक्षी विरोध प्रदर्शन | संसदीय समय और संसाधनों का अपव्यय होता है, जिससे महत्वपूर्ण कार्य लंबित रह जाते हैं। |
आगे की राह
- संसदीय कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाने के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आम सहमति और सहयोग बढ़ाना।
- विधेयकों को पर्याप्त चर्चा और जांच के लिए संसदीय समितियों के पास भेजने की प्रथा को मजबूत करना।
- प्रश्नकाल और अन्य संसदीय उपकरणों के प्रभावी उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए नियमों का सख्ती से पालन करना।
- सांसदों को विधेयकों पर चर्चा करने और अपने विचार व्यक्त करने के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करना।
- संसदीय बहस की गुणवत्ता में सुधार के लिए सांसदों के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना।
- संसदीय कार्यवाही के दौरान व्यवधानों को कम करने के लिए एक आचार संहिता विकसित करना और उसका पालन करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
संसदीय कार्यवाही · विधायी प्रक्रिया · प्रश्नकाल · संसदीय उत्पादकता · कानून निर्माण · विधेयक पारित करना · संसदीय अवरोध · लोकतंत्र में संसद की भूमिका
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 107’, ‘note’: ‘विधेयकों को पेश करने और पारित करने की प्रक्रिया’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 118’, ‘note’: ‘संसद के प्रत्येक सदन की प्रक्रिया के नियम’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 122’, ‘note’: ‘अदालतों द्वारा संसदीय कार्यवाही की जांच न करना’}
अवधारणा प्रवाह
संसदीय सत्र में व्यवधान → उत्पादकता में कमी → विधेयकों पर चर्चा का अभाव → कम विधायी जांच → कानूनों की गुणवत्ता पर प्रभाव → लोकतांत्रिक जवाबदेही में कमी
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संसद में प्रश्नकाल की दक्षता का अर्थ है आवंटित समय का प्रभावी ढंग से उपयोग होना।
2. किसी विधेयक पर चर्चा के बिना उसे पारित करना संसदीय कार्यवाही की उत्पादकता को बढ़ाता है।
3. लोकसभा में प्रश्नकाल राज्यसभा की तुलना में अधिक प्रभावी होता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल एक — कथन 1 सही है क्योंकि दक्षता का अर्थ ही प्रभावी उपयोग है। कथन 2 गलत है क्योंकि चर्चा के बिना विधेयक पारित करना संसदीय प्रक्रिया की गुणवत्ता को कम करता है, भले ही संख्यात्मक उत्पादकता बढ़े। कथन 3 गलत है क्योंकि हाल के सत्रों में लोकसभा में प्रश्नकाल की दक्षता राज्यसभा की तुलना में काफी कम रही है।
Q2. अभिकथन (A): भारतीय संसद में विधायी प्रक्रिया के दौरान विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा आवश्यक है।
कारण (R): पर्याप्त चर्चा से कानूनों की गुणवत्ता सुनिश्चित होती है और लोकतांत्रिक सिद्धांतों का पालन होता है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा लोकतंत्र का आधार है। कारण (R) भी सही है क्योंकि यह चर्चा कानूनों की गुणवत्ता और लोकतांत्रिक सिद्धांतों को बनाए रखने में मदद करती है। R, A की सही व्याख्या भी है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ हाल के संसदीय सत्रों में विधायी प्रक्रिया की गुणवत्ता में गिरावट देखी गई है, जहाँ कई विधेयक बिना पर्याप्त चर्चा के पारित किए गए हैं। इस प्रवृत्ति के कारणों का विश्लेषण कीजिए और भारतीय लोकतंत्र पर इसके संभावित प्रभावों की विवेचना कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** हाल के संसदीय सत्रों में विधायी प्रक्रिया में गिरावट की वर्तमान स्थिति का संक्षिप्त उल्लेख करें (जैसे कम उत्पादकता, बिना चर्चा के विधेयक पारित होना)।
2. **गिरावट के कारण:**
* **संसदीय अवरोध और व्यवधान:** विपक्ष द्वारा विभिन्न मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन, जिसके कारण सदन की कार्यवाही बाधित होती है।
* **सरकार की रणनीति:** महत्वपूर्ण विधेयकों को बिना पर्याप्त बहस के पारित करने की प्रवृत्ति।
* **विधेयकों की संख्या और जटिलता:** कम समय में अधिक विधेयकों को निपटाने का दबाव।
* **संसदीय समितियों की भूमिका में कमी:** विधेयकों को स्थायी समितियों के पास भेजने की प्रवृत्ति में कमी।
* **प्रश्नकाल और शून्यकाल का कम उपयोग:** महत्वपूर्ण संसदीय साधनों की दक्षता में गिरावट।
* **सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवादहीनता:** राजनीतिक ध्रुवीकरण और आम सहमति की कमी।
3. **भारतीय लोकतंत्र पर संभावित प्रभाव:**
* **कानूनों की गुणवत्ता पर प्रभाव:** बिना चर्चा के पारित कानूनों में खामियां होने की संभावना।
* **जवाबदेही में कमी:** कार्यपालिका पर विधायी नियंत्रण कमजोर होना।
* **लोकतांत्रिक सिद्धांतों का क्षरण:** ‘चर्चा, बहस और सहमति’ के मूलभूत सिद्धांतों का उल्लंघन।
* **जनता का विश्वास कम होना:** संसद की प्रभावशीलता और प्रासंगिकता पर सवाल।
* **न्यायिक सक्रियता में वृद्धि:** अदालतों द्वारा विधायी रिक्तता को भरने की संभावना।
* **संघवाद पर प्रभाव:** राज्यों से संबंधित विधेयकों पर अपर्याप्त विचार-विमर्श।
4. **निष्कर्ष:** संसदीय कार्यवाही की गुणवत्ता में सुधार के लिए सुझाव (जैसे समितियों की भूमिका बढ़ाना, सार्थक चर्चा को बढ़ावा देना, सर्वदलीय बैठकों का प्रभावी उपयोग) और लोकतंत्र के लिए इसके महत्व पर जोर।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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