12 Aug मुल्लापेरियार बाँध विवाद: तमिलनाडु ने सुप्रीम कोर्ट में केरल के ‘अवरोधक रवैये’ का किया आरोप
Mullaperiyar DamState of KeralaState of Tamil NaduWater level✎ मुल्लापेरियार बांध विवाद अंतर-राज्यीय जल विवादों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के कार्यान्वयन से संबंधित संवैधानिक और संघीय चुनौतियों का एक प्रमुख उदाहरण है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान – संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध, अंतर-राज्यीय जल विवाद | GS Paper III — आपदा प्रबंधन, पर्यावरण
- Prelims: मुल्लापेरियार बांध, पेरियार नदी, अंतर-राज्यीय जल विवाद, अनुच्छेद 262, अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956, सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार
- Essay: भारत में संघवाद की चुनौतियाँ: अंतर-राज्यीय विवादों का प्रबंधन, जल सुरक्षा और अंतर-राज्यीय सहयोग: एक विकासात्मक अनिवार्यता
त्वरित पुनरावृत्ति: मुल्लापेरियार बांध विवाद अंतर-राज्यीय जल विवादों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के कार्यान्वयन से संबंधित संवैधानिक और संघीय चुनौतियों का एक प्रमुख उदाहरण है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
तमिलनाडु सरकार ने मुल्लापेरियार बांध को मजबूत करने के उपायों में केरल के ‘बाधा डालने वाले रवैये’ की शिकायत करते हुए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया है। तमिलनाडु ने आरोप लगाया है कि केरल बांध की संरचनात्मक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण सुदृढीकरण कार्यों में सहयोग नहीं कर रहा है, जिससे सर्वोच्च न्यायालय के 2014 के फैसले का कार्यान्वयन बाधित हो रहा है, जिसमें तमिलनाडु को जलाशय के जल स्तर को 142 फीट तक बढ़ाने की अनुमति दी गई थी।
पृष्ठभूमि
- मुल्लापेरियार बांध केरल के इडुक्की जिले में पेरियार नदी पर स्थित है, लेकिन इसका स्वामित्व और संचालन तमिलनाडु सरकार द्वारा किया जाता है।
- यह बांध 1886 के पेरियार झील पट्टा समझौते के तहत निर्मित किया गया था और 1895 में पूरा हुआ था।
- तमिलनाडु और केरल के बीच बांध की सुरक्षा और जल स्तर को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने 7 मई, 2014 को एक संविधान पीठ के फैसले में बांध को संरचनात्मक रूप से सुरक्षित घोषित किया था और तमिलनाडु को जल स्तर 136 फीट से बढ़ाकर 142 फीट करने की अनुमति दी थी।
- तमिलनाडु का कहना है कि 2006 के एक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने बांध के सुदृढीकरण उपायों के पूरा होने के बाद जल स्तर को अंततः 152 फीट तक बढ़ाने की भी अनुमति दी थी।
- वर्तमान विवाद बांध के सुदृढीकरण कार्यों, जैसे कि बेबी बांध, अर्थ बांध और मुख्य बांध की ग्राउटिंग (grouting) के लिए केरल द्वारा आवश्यक अनुमतियों और सहयोग में कथित देरी से संबंधित है।
अंतर-राज्यीय जल विवाद
- भारत के संविधान का अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय नदियों और नदी घाटियों के जल से संबंधित किसी भी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।
- इस अनुच्छेद के तहत, संसद ने अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State River Water Disputes Act, 1956) अधिनियमित किया है।
- यह अधिनियम केंद्र सरकार को अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए एक न्यायाधिकरण (Tribunal) स्थापित करने का अधिकार देता है।
- सर्वोच्च न्यायालय आमतौर पर अंतर-राज्यीय जल विवादों में हस्तक्षेप नहीं करता है, जब तक कि न्यायाधिकरण का निर्णय या संवैधानिक वैधता का प्रश्न न हो, जैसा कि अनुच्छेद 262 (2) में स्पष्ट है।
- हालांकि, मुल्लापेरियार जैसे मामलों में, जहां सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही निर्णय दिया है और उसके कार्यान्वयन में बाधा आ रही है, न्यायालय अपनी अवमानना क्षेत्राधिकार (Contempt Jurisdiction) का प्रयोग कर सकता है।
- ये विवाद अक्सर राज्यों के बीच जल संसाधनों, सिंचाई, बिजली उत्पादन और बाढ़ नियंत्रण जैसे मुद्दों पर उत्पन्न होते हैं।
- इन विवादों का समाधान संघवाद की भावना और राष्ट्रीय हित में राज्यों के बीच सहयोग के लिए महत्वपूर्ण है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| मुल्लापेरियार बांध का स्थान | केरल के इडुक्की जिले में स्थित, लेकिन तमिलनाडु द्वारा संचालित और अनुरक्षित। |
| स्वामित्व और संचालन | तमिलनाडु के स्वामित्व और संचालन में, पेरियार झील पट्टा समझौते (Periyar Lake Lease Agreement) के तहत। |
| बांध की संरचना | 1886 के पेरियार झील पट्टा समझौते के तहत निर्मित चिनाई का ढांचा। |
| जल स्तर का मुद्दा | सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु को जलाशय का जल स्तर 142 फीट तक बढ़ाने की अनुमति दी है। |
| सुरक्षा और सुदृढ़ीकरण कार्य | बांध की संरचनात्मक सुरक्षा के लिए बेबी बांध, अर्थ बांध और मुख्य बांध के ग्राउटिंग कार्य महत्वपूर्ण हैं। |
| अंतर-राज्यीय विवाद | केरल और तमिलनाडु के बीच बांध के संचालन, रखरखाव और सुरक्षा को लेकर लंबे समय से विवाद। |
महत्व
अंतर-राज्यीय संबंध
- यह विवाद संघवाद (Federalism) और अंतर-राज्यीय जल विवादों के प्रबंधन में राज्यों के बीच सहयोग के महत्व को दर्शाता है।
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का पालन न करने से राज्यों के बीच अविश्वास बढ़ सकता है और संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन हो सकता है।
न्यायिक सर्वोच्चता
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का पालन सुनिश्चित करना न्यायिक सर्वोच्चता (Judicial Supremacy) और कानून के शासन (Rule of Law) को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
- राज्यों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन न करना न्यायिक प्रणाली की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
आपदा प्रबंधन और सुरक्षा
- बांध की संरचनात्मक सुरक्षा लाखों लोगों के जीवन और संपत्ति के लिए महत्वपूर्ण है, विशेषकर केरल के निचले इलाकों में रहने वालों के लिए।
- सुरक्षा उपायों को लागू करने में देरी से संभावित आपदा का जोखिम बढ़ जाता है, जिससे आपदा प्रबंधन (Disaster Management) की चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।
जल संसाधन प्रबंधन
- यह विवाद जल संसाधनों के कुशल और न्यायसंगत प्रबंधन की आवश्यकता को उजागर करता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ पानी की कमी है।
- जल संसाधनों पर निर्भरता और सुरक्षा चिंताओं के बीच संतुलन बनाना एक जटिल नीतिगत चुनौती है।
चुनौतियाँ
1. अंतर-राज्यीय सहयोग का अभाव
- केरल द्वारा सुरक्षा कार्यों में सहयोग न करने से परियोजना में देरी हो रही है।
- पेड़ काटने और ग्राउटिंग सामग्री के परिवहन जैसी अनुमतियों में बाधाएँ उत्पन्न की जा रही हैं।
यूपीएससी लिंक: संघवाद, अंतर-राज्यीय संबंध
2. न्यायिक निर्णयों का क्रियान्वयन
- सर्वोच्च न्यायालय के 2014 के निर्णय के बावजूद जल स्तर बढ़ाने और सुदृढ़ीकरण कार्य पूरे नहीं हुए हैं।
- राज्यों द्वारा न्यायिक निर्देशों का पालन न करना न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की प्रभावशीलता को चुनौती देता है।
यूपीएससी लिंक: न्यायिक सक्रियता, संवैधानिक शासन
3. बांध की संरचनात्मक सुरक्षा
- बेबी बांध, अर्थ बांध और मुख्य बांध के ग्राउटिंग जैसे सुदृढ़ीकरण कार्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- इन कार्यों में देरी से बांध की संरचनात्मक अखंडता पर जोखिम बढ़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: आपदा प्रबंधन, अवसंरचना सुरक्षा
4. पर्यावरणीय अनुमतियाँ
- पेड़ काटने की अनुमति और राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (National Board for Wild Life) की स्थायी समिति की मंजूरी जैसे पर्यावरणीय मुद्दे विवाद का कारण बन रहे हैं।
- पर्यावरणीय चिंताओं और विकास परियोजनाओं के बीच संतुलन बनाना एक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण, वन अधिकार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| केरल का ‘अवरोधक रवैया’ | तमिलनाडु द्वारा सुरक्षा और सुदृढ़ीकरण कार्यों को पूरा करने में बाधाएँ। |
| सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का क्रियान्वयन | 12 साल पुराने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बावजूद जल स्तर बढ़ाने और सुरक्षा कार्यों में देरी। |
| संरचनात्मक सुरक्षा कार्य | बेबी बांध, अर्थ बांध और मुख्य बांध के ग्राउटिंग जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में बाधा। |
| पेड़ काटने की अनुमति | सुरक्षा कार्यों के लिए आवश्यक पेड़ों को काटने की अनुमति देने में केरल की अनिच्छा। |
| सामग्री परिवहन की अनुमति | ग्राउटिंग सामग्री और मशीनरी के परिवहन के लिए अनुमति देने में केरल द्वारा देरी। |
| दोहरे मापदंड का आरोप | तमिलनाडु द्वारा केरल पर अदालत में दिए गए बयान और वास्तविक कार्रवाई में विरोधाभास का आरोप। |
आगे की राह
- सर्वोच्च न्यायालय को अपने पूर्व निर्णयों के शीघ्र और प्रभावी क्रियान्वयन के लिए स्पष्ट निर्देश जारी करने चाहिए।
- केंद्र सरकार को अंतर-राज्यीय जल विवादों को सुलझाने के लिए एक तटस्थ मध्यस्थ के रूप में कार्य करना चाहिए।
- दोनों राज्यों को तकनीकी विशेषज्ञों की एक संयुक्त समिति गठित करनी चाहिए ताकि सुरक्षा कार्यों की प्रगति की निगरानी की जा सके।
- पर्यावरणीय अनुमतियों से संबंधित मुद्दों को राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति के माध्यम से तेजी से हल किया जाना चाहिए।
- राज्यों को जल संसाधन प्रबंधन और आपदा जोखिम न्यूनीकरण (Disaster Risk Reduction) के लिए एक सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
- अंतर-राज्यीय परिषद (Inter-State Council) जैसे संवैधानिक निकायों का उपयोग विवाद समाधान के लिए किया जा सकता है।
- बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021 (Dam Safety Act, 2021) के प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए ताकि बांधों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मुल्लापेरियार बांध विवाद · अंतर-राज्यीय जल विवाद · सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय · संघवाद · सहकारी संघवाद · अंतर-राज्यीय परिषद · अनुच्छेद 262 · जल विवाद अधिनियम · बांध सुरक्षा · राज्य नीति
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 262’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय जल विवादों का न्यायनिर्णयन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 263’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय परिषद का गठन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 142’, ‘note’: ‘सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का प्रवर्तन’}
अवधारणा प्रवाह
मुल्लापेरियार बांध की सुरक्षा और जल स्तर बढ़ाने का मुद्दा → तमिलनाडु द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में केरल के ‘अवरोधक रवैये’ की शिकायत → सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का क्रियान्वयन न होना → बांध की संरचनात्मक सुरक्षा और पर्यावरणीय अनुमतियों पर विवाद → राज्यों के बीच सहयोग का अभाव और न्यायिक सर्वोच्चता को चुनौती → आपदा जोखिम और अंतर-राज्यीय संबंधों पर प्रभाव
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. मुल्लापेरियार बांध के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह बांध केरल के इडुक्की जिले में पेरियार नदी पर स्थित है।
2. बांध का स्वामित्व और संचालन तमिलनाडु राज्य द्वारा किया जाता है।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु को बांध में जल स्तर 142 फीट तक बढ़ाने की अनुमति दी है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि मुल्लापेरियार बांध केरल के इडुक्की जिले में पेरियार नदी पर स्थित है। कथन 2 सही है क्योंकि बांध का स्वामित्व और संचालन तमिलनाडु राज्य द्वारा किया जाता है। कथन 3 सही है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने मई 2014 में तमिलनाडु को बांध में जल स्तर 142 फीट तक बढ़ाने की अनुमति दी थी।
Q2. अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान के लिए भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद संसद को कानून बनाने का अधिकार देता है?
- अनुच्छेद 262
- अनुच्छेद 263
- अनुच्छेद 246
- अनुच्छेद 252
उत्तर: अनुच्छेद 262 — अनुच्छेद 262 अंतर-राज्यीय नदियों या नदी घाटियों के जल से संबंधित विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए संसद को कानून द्वारा प्रावधान करने का अधिकार देता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ अंतर-राज्यीय जल विवाद भारत में सहकारी संघवाद के समक्ष एक महत्वपूर्ण चुनौती प्रस्तुत करते हैं। मुल्लापेरियार बांध विवाद के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए और ऐसे विवादों के समाधान के लिए संवैधानिक और संस्थागत तंत्रों पर प्रकाश डालिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: अंतर-राज्यीय जल विवादों की प्रकृति और भारतीय संघवाद पर उनके प्रभाव का संक्षिप्त परिचय।
2. मुल्लापेरियार बांध विवाद का संदर्भ: केरल और तमिलनाडु के बीच विवाद की पृष्ठभूमि, बांध की सुरक्षा, जल स्तर बढ़ाने की अनुमति और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का उल्लेख। इसमें केरल द्वारा तमिलनाडु के बांध सुदृढ़ीकरण कार्यों में कथित बाधा का भी उल्लेख करें।
3. सहकारी संघवाद पर प्रभाव: बताएं कि कैसे ऐसे विवाद राज्यों के बीच विश्वास और सहयोग को कम करते हैं, जिससे सहकारी संघवाद की भावना कमजोर होती है।
4. संवैधानिक और संस्थागत तंत्र:
क. अनुच्छेद 262: संसद की शक्ति और अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State River Water Disputes Act, 1956) का उल्लेख।
ख. जल विवाद न्यायाधिकरण (Water Disputes Tribunals): उनकी भूमिका और कार्यप्रणाली।
ग. अंतर-राज्यीय परिषद (Inter-State Council) (अनुच्छेद 263): इसकी सलाहकार भूमिका।
घ. सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका: विवादों के न्यायनिर्णयन में सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप और निर्णयों का महत्व।
5. चुनौतियाँ और समाधान: इन तंत्रों के समक्ष आने वाली चुनौतियाँ (जैसे निर्णयों का कार्यान्वयन, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी) और संभावित समाधान (जैसे स्थायी तंत्र, डेटा साझाकरण, राज्यों के बीच संवाद) पर चर्चा।
6. निष्कर्ष: सहकारी संघवाद को मजबूत करने और जल विवादों के स्थायी समाधान के लिए राज्यों के बीच सहयोग और संवैधानिक तंत्रों के प्रभावी कार्यान्वयन के महत्व पर जोर।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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