07 Aug लोकसभा ने पास किया कराधान एवं अन्य कानून (संशोधन) विधेयक 2026, जानिए मुख्य बदलाव

✎ कराधान विधेयक सरकार को राजस्व जुटाने की शक्ति देते हैं, जबकि विनियोग विधेयक भारत की संचित निधि से धन के व्यय को अधिकृत करते हैं, और दोनों ही धन विधेयक के रूप में लोकसभा में विशेष शक्तियों के अधीन होते हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय राजव्यवस्था, संसद और राज्य विधायिका—संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय | GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाना, संवृद्धि, विकास तथा रोज़गार
- Prelims: कराधान और अन्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026, भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007, आयकर अधिनियम, 2025, वित्त अधिनियम, 2026, विनियोग विधेयक, भारत की संचित निधि, धन विधेयक, लोकसभा की शक्तियाँ, राज्यसभा की शक्तियाँ
- Essay: भारत में विधायी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक जवाबदेही, आर्थिक विकास में कराधान की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: कराधान विधेयक सरकार को राजस्व जुटाने की शक्ति देते हैं, जबकि विनियोग विधेयक भारत की संचित निधि से धन के व्यय को अधिकृत करते हैं, और दोनों ही धन विधेयक के रूप में लोकसभा में विशेष शक्तियों के अधीन होते हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
संसद के मानसून सत्र के दौरान, लोकसभा ने कराधान और अन्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 (The Taxation and Other Laws (Amendment) Bill, 2026) को बिना किसी बहस के पारित कर दिया। यह विधेयक भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 और वित्त अधिनियम, 2026 में संशोधन करना चाहता है। इसके साथ ही, राज्यसभा ने विनियोग (संख्या 3) विधेयक, 2026 (Appropriation (No.3) Bill, 2026) को लोकसभा को वापस कर दिया, जिसे लोकसभा ने पहले ही अनुमोदित कर दिया था।
पृष्ठभूमि
- भारतीय संविधान के तहत, कराधान (Taxation) और विनियोग (Appropriation) से संबंधित विधेयक महत्वपूर्ण वित्तीय विधान होते हैं।
- कराधान विधेयक सरकार को राजस्व जुटाने की शक्ति प्रदान करते हैं, जबकि विनियोग विधेयक सरकार को भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) से धन निकालने और खर्च करने की अनुमति देते हैं।
- ये दोनों प्रकार के विधेयक धन विधेयक (Money Bill) की श्रेणी में आते हैं, जिनके संबंध में लोकसभा को राज्यसभा की तुलना में अधिक शक्तियाँ प्राप्त हैं।
- धन विधेयक केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किए जा सकते हैं और राज्यसभा को इन पर केवल सिफारिशें करने का अधिकार होता है, जिन्हें मानना या न मानना लोकसभा के विवेक पर निर्भर करता है।
- संसद में विधेयकों पर बहस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक अनिवार्य हिस्सा है, जो पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करती है।
- हाल ही में, संसद में महत्वपूर्ण विधेयकों पर बिना बहस के पारित होने की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की गई है, क्योंकि यह विधायी जांच की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।
कराधान और विनियोग विधेयक क्या हैं?
- **कराधान विधेयक:** ये ऐसे विधेयक होते हैं जो सरकार को कर लगाने, संशोधित करने या समाप्त करने का अधिकार देते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य सरकार के लिए राजस्व जुटाना होता है ताकि वह सार्वजनिक व्यय को वित्तपोषित कर सके।
- **विनियोग विधेयक:** ये विधेयक सरकार को भारत की संचित निधि से धन निकालने और खर्च करने के लिए अधिकृत करते हैं। संविधान के अनुच्छेद 114 के तहत, संसद द्वारा पारित विनियोग अधिनियम के बिना संचित निधि से कोई भी धन नहीं निकाला जा सकता।
- **धन विधेयक:** भारतीय संविधान के अनुच्छेद 110 में धन विधेयक की परिभाषा दी गई है। इसमें करों के अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन; भारत सरकार द्वारा धन उधार लेने या कोई गारंटी देने का विनियमन; भारत की संचित निधि या आकस्मिकता निधि की अभिरक्षा; और भारत की संचित निधि पर भारित व्यय की घोषणा जैसे विषय शामिल होते हैं।
- **लोकसभा की भूमिका:** धन विधेयक केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किए जा सकते हैं। लोकसभा अध्यक्ष यह प्रमाणित करता है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, और उनका निर्णय अंतिम होता है।
- **राज्यसभा की भूमिका:** राज्यसभा धन विधेयक को अधिकतम 14 दिनों तक रोक सकती है और उस पर अपनी सिफारिशें दे सकती है। लोकसभा इन सिफारिशों को स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए स्वतंत्र है। यदि राज्यसभा 14 दिनों के भीतर विधेयक को वापस नहीं करती है, तो उसे दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है।
- **भारत की संचित निधि:** यह भारत सरकार की सबसे बड़ी निधि है, जिसमें सरकार द्वारा प्राप्त सभी राजस्व, लिए गए सभी ऋण और ऋणों की अदायगी से प्राप्त धन जमा होता है। सरकार के सभी व्यय इसी निधि से किए जाते हैं, सिवाय कुछ अपवादों के।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| कराधान और अन्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 | यह विधेयक भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007, आयकर अधिनियम, 2025 और वित्त अधिनियम, 2026 में संशोधन का प्रस्ताव करता है। यह देश की कराधान और वित्तीय प्रणालियों में महत्वपूर्ण बदलाव लाएगा। |
| विनियोग (संख्या 3) विधेयक, 2026 | यह विधेयक वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) से कुछ अतिरिक्त राशियों के भुगतान और विनियोग को अधिकृत करता है। यह सरकार के व्यय को कानूनी वैधता प्रदान करता है। |
| संसद में बिना बहस के पारित | लोकसभा में कराधान विधेयक बिना किसी बहस के पारित हो गया, जो विधायी प्रक्रिया में विपक्ष की भूमिका और संसदीय चर्चा की गुणवत्ता पर सवाल उठाता है। |
| जम्मू-कश्मीर का मुद्दा | वित्त मंत्री ने जम्मू-कश्मीर के केंद्रीय प्रशासन के तहत किए गए कार्यों पर प्रकाश डाला, जो अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद के वित्तीय और विकासात्मक पहलुओं को दर्शाता है। |
| भारत-बांग्लादेश फरक्का संधि, 1996 | इस संधि के नवीनीकरण पर चिंता व्यक्त की गई है, विशेषकर बिहार के हितों और भूजल (Groundwater) की कमी के संबंध में। यह अंतर-राज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय जल-साझाकरण समझौतों के महत्व को दर्शाता है। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- कराधान विधेयक का पारित होना देश की राजस्व नीतियों और वित्तीय ढांचे को प्रभावित करेगा, जिससे निवेश, उपभोग और आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) पर असर पड़ सकता है।
- विनियोग विधेयक सरकार को वित्तीय वर्ष के लिए आवश्यक व्यय करने की अनुमति देता है, जो सार्वजनिक सेवाओं और विकासात्मक परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण है।
विधायी और संवैधानिक महत्व
- कराधान विधेयक का बिना बहस के पारित होना संसदीय लोकतंत्र में विधायी जांच (Legislative Scrutiny) और विपक्ष की भूमिका पर बहस छेड़ता है।
- विनियोग विधेयक का पारित होना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 114 के तहत सरकार के व्यय को कानूनी वैधता प्रदान करता है, जो वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
अंतर्राष्ट्रीय संबंध और संघीय महत्व
- फरक्का संधि के नवीनीकरण पर बहस भारत-बांग्लादेश संबंधों और गंगा नदी के जल-साझाकरण के संवेदनशील मुद्दे को उजागर करती है, जिसका बिहार जैसे राज्यों पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
- जम्मू-कश्मीर पर वित्त मंत्री का बयान केंद्र-राज्य संबंधों और विशेष दर्जा समाप्त होने के बाद के क्षेत्र के विकास पर केंद्र के दृष्टिकोण को दर्शाता है।
चुनौतियाँ
1. संसदीय बहस और विधायी जांच का अभाव
- लोकसभा में महत्वपूर्ण कराधान विधेयक का बिना बहस के पारित होना विधायी प्रक्रिया की गुणवत्ता और लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाता है।
- यह सरकार की जवाबदेही को कम कर सकता है और ऐसे कानूनों को जन्म दे सकता है जिनमें पर्याप्त सार्वजनिक या विशेषज्ञ इनपुट का अभाव हो।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संसद और उसकी कार्यप्रणाली
2. अंतर-राज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय जल विवाद
- फरक्का संधि के नवीनीकरण पर बिहार द्वारा उठाई गई चिंताएं अंतर-राज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय जल-साझाकरण समझौतों की जटिलताओं को दर्शाती हैं।
- भूजल की कमी का मुद्दा जल सुरक्षा और सतत विकास (Sustainable Development) के लिए एक बड़ी चुनौती है, जिसके लिए व्यापक नीतिगत समाधानों की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: भारत में जल संसाधन और विवाद
3. केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध
- जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में केंद्र द्वारा किए गए वित्तीय हस्तक्षेप और ‘ओवरहैंग्स’ को साफ करने का दावा केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों में केंद्र के प्रभुत्व और राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता पर बहस को जन्म देता है।
- यह विशेष रूप से अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद केंद्र शासित प्रदेशों के वित्तीय प्रबंधन के मॉडल पर सवाल उठाता है।
यूपीएससी लिंक: केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध
4. कानून और व्यवस्था तथा नागरिक स्वतंत्रता
- जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई पर विपक्ष की चिंता कानून और व्यवस्था बनाए रखने और नागरिक स्वतंत्रता (Civil Liberties) के अधिकार के बीच संतुलन की चुनौती को दर्शाती है।
- यह विरोध प्रदर्शनों से निपटने में राज्य की भूमिका और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के संरक्षण पर सवाल उठाता है।
यूपीएससी लिंक: कानून और व्यवस्था, मौलिक अधिकार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| कराधान विधेयक का बिना बहस के पारित होना | संसदीय जांच का अभाव, विधायी गुणवत्ता पर संभावित नकारात्मक प्रभाव, विपक्ष की भूमिका का क्षरण। |
| फरक्का संधि का नवीनीकरण | बिहार के हितों पर संभावित प्रतिकूल प्रभाव, गंगा नदी के जल-साझाकरण पर विवाद, भूजल की कमी। |
| जम्मू-कश्मीर में केंद्रीय प्रशासन के तहत वित्तीय प्रबंधन | केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों में असंतुलन, राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता पर प्रभाव, अनुच्छेद 370 के बाद की स्थिति। |
| प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई | नागरिक स्वतंत्रता का उल्लंघन, विरोध के अधिकार पर प्रतिबंध, कानून और व्यवस्था बनाए रखने में अत्यधिक बल का प्रयोग। |
आगे की राह
- संसदीय प्रक्रियाओं में सुधार किया जाए ताकि महत्वपूर्ण विधेयकों पर पर्याप्त बहस और जांच सुनिश्चित हो सके, जिससे विधायी गुणवत्ता बढ़े।
- विपक्ष को विधायी प्रक्रिया में रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए पर्याप्त अवसर और सम्मान दिया जाए, जिससे लोकतंत्र मजबूत हो।
- अंतर-राज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय जल-साझाकरण समझौतों की समीक्षा करते समय सभी हितधारकों, विशेषकर राज्यों के हितों को ध्यान में रखा जाए।
- जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) के लिए व्यापक और एकीकृत नीतियां लागू की जाएं।
- केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाई जाए, जिससे राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता का सम्मान हो।
- विरोध प्रदर्शनों से निपटने में पुलिस बल के प्रयोग के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश स्थापित किए जाएं, ताकि नागरिक स्वतंत्रता का उल्लंघन न हो।
- जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में विकास और वित्तीय प्रबंधन के लिए एक समावेशी दृष्टिकोण अपनाया जाए, जिसमें स्थानीय आबादी की भागीदारी सुनिश्चित हो।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
कराधान विधेयक · विनियोग विधेयक · संसद की विधायी प्रक्रिया · धन विधेयक · लोकसभा की शक्तियाँ · राज्यसभा की भूमिका · भारत की संचित निधि · संसदीय संप्रभुता · राजकोषीय नीति · संवैधानिक प्रावधान
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 114: विनियोग विधेयक (Appropriation Bill) से संबंधित, सरकार के व्यय को कानूनी वैधता प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 265: कराधान (Taxation) के संबंध में, कहता है कि कानून के प्राधिकार के बिना कोई कर नहीं लगाया जाएगा और न ही एकत्र किया जाएगा।
- अनुच्छेद 246: संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के तहत विधायी शक्तियों का वितरण, कराधान और जल जैसे विषयों से संबंधित।
- अनुच्छेद 370: जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे से संबंधित (अब निरस्त), जिसके बाद केंद्र का वित्तीय प्रबंधन चर्चा में आया।
- अनुच्छेद 19: भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech and Expression) तथा शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने का अधिकार, विरोध प्रदर्शनों से संबंधित।
अवधारणा प्रवाह
कराधान विधेयक लोकसभा में बिना बहस के पारित हुआ। → यह विधायी जांच और संसदीय लोकतंत्र की गुणवत्ता पर सवाल उठाता है। → सरकार की जवाबदेही कम हो सकती है और कानून की वैधता पर संदेह पैदा हो सकता है। → विपक्ष की भूमिका कमजोर होती है, जिससे नीति निर्माण में जनभागीदारी घटती है। → अंततः, यह सुशासन (Good Governance) और संवैधानिक मूल्यों के लिए चुनौती बन सकता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कराधान और अन्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 को लोकसभा में बिना किसी बहस के पारित किया गया।
2. विनियोग (संख्या 3) विधेयक, 2026 को राज्यसभा ने लोकसभा को लौटा दिया।
3. फरक्का संधि, 1996, जो भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल-बंटवारे से संबंधित है, 2026 में समाप्त हो जाएगी।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि समाचार के अनुसार, कराधान और अन्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 को लोकसभा में बिना किसी बहस के पारित किया गया था। कथन 2 सही है क्योंकि विनियोग (संख्या 3) विधेयक, 2026 को राज्यसभा ने लोकसभा को लौटा दिया था। कथन 3 सही है क्योंकि फरक्का संधि, 1996, जो भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल-बंटवारे से संबंधित है, 2026 में समाप्त हो जाएगी, जैसा कि एक सांसद ने राज्यसभा में उल्लेख किया था।
Q2. अभिकथन (A): विनियोग विधेयक को राज्यसभा में पारित होने के बाद लोकसभा को लौटा दिया जाता है।
कारण (R): विनियोग विधेयक एक ‘धन विधेयक’ (Money Bill) है, और धन विधेयक के संबंध में राज्यसभा की शक्तियाँ सीमित हैं।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि विनियोग विधेयक एक धन विधेयक होता है और इसे लोकसभा में पारित होने के बाद राज्यसभा में भेजा जाता है, जहाँ से इसे सिफारिशों के साथ या बिना सिफारिशों के लोकसभा को लौटा दिया जाता है। कारण (R) भी सही है क्योंकि विनियोग विधेयक अनुच्छेद 110 के तहत एक धन विधेयक है, और धन विधेयक के संबंध में राज्यसभा की शक्तियाँ अनुच्छेद 109 के तहत सीमित हैं। राज्यसभा इसे केवल 14 दिनों के लिए रोक सकती है या सिफारिशें कर सकती है, जिन्हें लोकसभा स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है। इस प्रकार, R, A की सही व्याख्या है।
Q3. भारत के संविधान के संदर्भ में, ‘धन विधेयक’ के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही नहीं है?
- इसे केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है।
- इसे राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश पर ही पेश किया जा सकता है।
- राज्यसभा इसे अधिकतम 14 दिनों के लिए रोक सकती है।
- राज्यसभा इसे संशोधित या अस्वीकृत कर सकती है।
उत्तर: राज्यसभा इसे संशोधित या अस्वीकृत कर सकती है। — धन विधेयक के संबंध में राज्यसभा की शक्तियाँ सीमित हैं। राज्यसभा इसे संशोधित या अस्वीकृत नहीं कर सकती, बल्कि केवल सिफारिशें कर सकती है, जिन्हें लोकसभा स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए स्वतंत्र है। अन्य सभी कथन सही हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ हाल ही में लोकसभा द्वारा कराधान और अन्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 को बिना बहस के पारित किया गया। भारत में विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में, धन विधेयक के रूप में कराधान विधेयकों की प्रकृति और संसद के दोनों सदनों की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर कंकाल:
1. **परिचय:** कराधान और अन्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 के पारित होने का संदर्भ दें और धन विधेयक के रूप में कराधान विधेयकों के महत्व को संक्षिप्त में बताएं।
2. **धन विधेयक की परिभाषा और संवैधानिक प्रावधान:**
* अनुच्छेद 110 के तहत धन विधेयक की परिभाषा के प्रमुख बिंदु (कर लगाना, विनियमित करना, भारत की संचित निधि से धन का विनियोग आदि)।
* अनुच्छेद 109 और 110 के तहत धन विधेयक से संबंधित प्रक्रियात्मक प्रावधान।
3. **लोकसभा की भूमिका और शक्तियाँ:**
* धन विधेयक केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है।
* लोकसभा अध्यक्ष का यह निर्णय अंतिम होता है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं।
* लोकसभा की सर्वोच्चता, विशेषकर वित्तीय मामलों में।
4. **राज्यसभा की भूमिका और सीमाएँ:**
* राज्यसभा धन विधेयक को संशोधित या अस्वीकृत नहीं कर सकती।
* यह केवल 14 दिनों के भीतर सिफारिशें कर सकती है, जिन्हें लोकसभा स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए स्वतंत्र है।
* राज्यसभा की सीमित भूमिका के पीछे का तर्क (प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सदन का वित्तीय मामलों पर नियंत्रण)।
5. **समालोचनात्मक परीक्षण:**
* **सकारात्मक पहलू:** वित्तीय मामलों में सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करना, त्वरित निर्णय लेने में मदद करना।
* **नकारात्मक पहलू/चिंताएँ:**
* विधेयकों को ‘धन विधेयक’ के रूप में गलत तरीके से वर्गीकृत करने की प्रवृत्ति (उदाहरण: आधार विधेयक, 2016)।
* राज्यसभा की भूमिका को कमजोर करना और द्विसदनीयता के सिद्धांत पर प्रभाव।
* विस्तृत बहस और जांच की कमी, जैसा कि वर्तमान विधेयक के मामले में देखा गया।
* विपक्ष की आवाज को दबाने की संभावना।
* न्यायिक समीक्षा की भूमिका (हालांकि धन विधेयक पर अध्यक्ष का निर्णय अंतिम है, कुछ मामलों में अदालतों ने हस्तक्षेप किया है)।
6. **निष्कर्ष:** भारत में विधायी प्रक्रिया में धन विधेयकों के महत्व को स्वीकार करते हुए, यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दें कि इसका दुरुपयोग न हो और संसदीय जांच और बहस की भावना बनी रहे। सुधारों और संवैधानिक संतुलन बनाए रखने के सुझाव दें।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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