04 Aug लोकसभा में कराधान विधेयक पेश करेगी सीतारमण; कांग्रेस ने दलबदल कानून पर बहस की मांग की
✎ दल-बदल कानून, जो संविधान की दसवीं अनुसूची में निहित है, राजनीतिक अस्थिरता को रोकने और अवसरवादी दल-बदल पर अंकुश लगाने के लिए बनाया गया है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर इसके प्रभाव को लेकर लगातार बहस होती रहती…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान, संसद और राज्य विधायिका – संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय। | GS Paper II — सरकार की नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।
- Prelims: दल-बदल कानून, दसवीं अनुसूची, अयोग्यता, अध्यक्ष/सभापति की भूमिका, निर्वाचन आयोग, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम
- Essay: भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक नैतिकता और जवाबदेही, दल-बदल: भारतीय राजनीति के लिए एक चुनौती
त्वरित पुनरावृत्ति: दल-बदल कानून, जो संविधान की दसवीं अनुसूची में निहित है, राजनीतिक अस्थिरता को रोकने और अवसरवादी दल-बदल पर अंकुश लगाने के लिए बनाया गया है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर इसके प्रभाव को लेकर लगातार बहस होती रहती है।
पूर्व में पूछा गया: Asked in UPSC Prelims 2018; Asked in UPSC Mains 2019
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने लोकसभा में दल-बदल कानून (Anti-defection law) पर चर्चा की मांग करते हुए स्थगन प्रस्ताव (Adjournment motion) का नोटिस दिया। उन्होंने प्रश्नकाल, शून्यकाल और दिन के अन्य सभी सूचीबद्ध कार्यों को निलंबित करने की मांग की, ताकि अवसरवाद से प्रेरित ‘बड़े पैमाने पर राजनीतिक दल-बदल’ पर अंकुश लगाने के लिए एक नए दल-बदल कानून की आवश्यकता पर चर्चा की जा सके। यह मांग ऐसे समय में आई है जब राम मंदिर दान विवाद को लेकर विपक्षी सांसदों ने सदन में हंगामा किया, जिसके कारण लोकसभा और राज्यसभा दोनों को स्थगित करना पड़ा।
पृष्ठभूमि
- भारतीय संविधान में दल-बदल विरोधी कानून को 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ा गया था।
- यह कानून संसद और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों को एक राजनीतिक दल से दूसरे राजनीतिक दल में दल-बदल करने से रोकने के लिए बनाया गया था।
- यह कानून संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) में निहित है, जिसमें दल-बदल के आधार पर अयोग्यता से संबंधित प्रावधान शामिल हैं।
- इस कानून का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता को कम करना और निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपने जनादेश के प्रति जवाबदेह बनाना था।
- कानून के तहत, दल-बदल के मामलों में अयोग्यता पर निर्णय सदन के पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष या सभापति) द्वारा लिया जाता है।
- समय-समय पर इस कानून की प्रभावशीलता और इसमें सुधार की आवश्यकता पर बहस होती रही है, खासकर ‘बड़े पैमाने पर दल-बदल’ के मामलों में।
दल-बदल कानून क्या है?
- दल-बदल कानून भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में वर्णित एक प्रावधान है, जिसे 1985 में 52वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा शामिल किया गया था।
- इसका प्राथमिक उद्देश्य सांसदों और विधायकों को एक राजनीतिक दल से दूसरे दल में दल-बदल करने से रोकना है, जिससे सरकारों की स्थिरता बनी रहे और अवसरवादी राजनीति पर अंकुश लगे।
- यह कानून उन सदस्यों को अयोग्य घोषित करता है जो स्वेच्छा से अपनी मूल पार्टी की सदस्यता छोड़ देते हैं, या पार्टी व्हिप (Party Whip) के विपरीत मतदान करते हैं या मतदान से अनुपस्थित रहते हैं।
- एक निर्वाचित सदस्य को अयोग्य घोषित नहीं किया जाता है यदि उसकी पार्टी का किसी अन्य पार्टी में विलय हो जाता है और वह उस विलय का हिस्सा होता है, बशर्ते मूल पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सदस्य विलय के लिए सहमत हों।
- दल-बदल के मामलों में अयोग्यता पर अंतिम निर्णय लोकसभा में अध्यक्ष (Speaker) और राज्य विधानसभाओं में सभापति (Chairman) द्वारा लिया जाता है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने ‘किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू’ (1992) मामले में पीठासीन अधिकारी के निर्णय की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की अनुमति दी थी।
- इस कानून की आलोचना अक्सर इस आधार पर की जाती है कि यह सदस्यों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करता है और पार्टी नेतृत्व को अत्यधिक शक्ति प्रदान करता है।
- कानून में सुधार के लिए विभिन्न समितियों और आयोगों ने सुझाव दिए हैं, जिनमें पीठासीन अधिकारी के बजाय राष्ट्रपति/राज्यपाल या निर्वाचन आयोग (Election Commission) द्वारा निर्णय लेने का प्रस्ताव भी शामिल है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| दल-बदल विरोधी कानून में संशोधन की मांग | राजनीतिक अवसरवाद पर आधारित सामूहिक दल-बदल को रोकने और विधायकों के लिए सैद्धांतिक असहमति व्यक्त करने के लिए जगह सुनिश्चित करने हेतु महत्वपूर्ण। |
| कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 | भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007, आयकर अधिनियम, 2025 और वित्त अधिनियम, 2026 में संशोधन का प्रस्ताव करता है, जो देश की आर्थिक और वित्तीय नीतियों को प्रभावित करेगा। |
| प्रश्नकाल और शून्यकाल को निलंबित करने का प्रस्ताव | दल-बदल विरोधी कानून पर तत्काल सार्वजनिक महत्व के एक निश्चित मामले पर चर्चा करने के लिए संसदीय प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण कदम। |
| सदन में गृह मंत्री की उपस्थिति की मांग | विपक्ष द्वारा महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार से जवाबदेही की मांग को दर्शाता है। |
महत्व
राजनीतिक महत्व
- दल-बदल विरोधी कानून में संशोधन की मांग भारतीय राजनीति में नैतिक आचरण और लोकतांत्रिक सिद्धांतों को बनाए रखने की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है। यह राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र और असहमति के अधिकार के महत्व को भी रेखांकित करता है।
- सामूहिक दल-बदल पर अंकुश लगाने से राजनीतिक स्थिरता बढ़ सकती है और निर्वाचित प्रतिनिधियों की जवाबदेही सुनिश्चित हो सकती है, जिससे मतदाताओं का विश्वास मजबूत होगा।
आर्थिक महत्व
- कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 का परिचय देश की वित्तीय और कराधान नीतियों में संभावित बदलावों का संकेत देता है। इन संशोधनों का अर्थव्यवस्था, निवेश और व्यापारिक माहौल पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
- भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 में संशोधन से डिजिटल भुगतान परिदृश्य और वित्तीय समावेशन पर असर पड़ सकता है।
संसदीय महत्व
- प्रश्नकाल और शून्यकाल को निलंबित करने का प्रस्ताव संसदीय प्रक्रियाओं के लचीलेपन और तत्काल सार्वजनिक महत्व के मामलों पर चर्चा करने की क्षमता को दर्शाता है।
- विपक्ष द्वारा महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की मांग और सरकार से जवाबदेही की अपेक्षा संसदीय लोकतंत्र की जीवंतता को दर्शाती है।
चुनौतियाँ
1. दल-बदल विरोधी कानून का कमजोर क्रियान्वयन
- वर्तमान दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) अक्सर राजनीतिक अवसरवाद को पूरी तरह से रोकने में विफल रहता है, जिससे बड़े पैमाने पर दल-बदल होते हैं।
- अध्यक्ष या सभापति की भूमिका पर अक्सर सवाल उठते हैं, क्योंकि उनके निर्णय राजनीतिक रूप से प्रेरित हो सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान, संसद और राज्य विधानमंडल
2. विधायकों के असहमति के अधिकार का हनन
- दल-बदल विरोधी कानून कभी-कभी विधायकों को अपनी पार्टी के रुख से ईमानदारी से असहमत होने या महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने से रोकता है।
- यह आंतरिक पार्टी लोकतंत्र को कमजोर कर सकता है और विधायकों को केवल पार्टी के निर्देशों का पालन करने के लिए मजबूर कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान, संसद और राज्य विधानमंडल
3. संसदीय कार्यवाही में व्यवधान
- विपक्ष द्वारा लगातार विरोध और नारेबाजी से संसद की कार्यवाही बाधित होती है, जिससे महत्वपूर्ण विधायी कार्यों और चर्चाओं में देरी होती है।
- यह सार्वजनिक धन के नुकसान और शासन में अक्षमता की ओर ले जाता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संसद की कार्यप्रणाली
4. वित्तीय विधेयकों का प्रभाव
- कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक जैसे वित्तीय विधेयकों में संशोधन से अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर अप्रत्याशित परिणाम हो सकते हैं, जिसके लिए गहन विश्लेषण और विचार-विमर्श की आवश्यकता होती है।
- इन विधेयकों का उचित मूल्यांकन न होने पर आर्थिक अस्थिरता या असमानता बढ़ सकती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय अर्थव्यवस्था, सरकारी बजट
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| सामूहिक राजनीतिक दल-बदल | राजनीतिक अस्थिरता, मतदाताओं के जनादेश का उल्लंघन और लोकतांत्रिक सिद्धांतों का क्षरण। |
| दल-बदल विरोधी कानून का दुरुपयोग | विधायकों के असहमति के अधिकार को दबाना और अध्यक्ष/सभापति की भूमिका में राजनीतिक पूर्वाग्रह। |
| संसदीय गतिरोध | महत्वपूर्ण विधायी कार्यों में बाधा, सार्वजनिक धन का अपव्यय और शासन में अक्षमता। |
| नए कराधान विधेयक का प्रभाव | अर्थव्यवस्था, निवेश और नागरिकों पर संभावित अप्रत्याशित परिणाम। |
आगे की राह
- दल-बदल विरोधी कानून को मजबूत करना: राजनीतिक अवसरवाद पर आधारित सामूहिक दल-बदल को रोकने के लिए कानून में स्पष्ट और कड़े प्रावधान किए जाने चाहिए।
- अध्यक्ष/सभापति की भूमिका में निष्पक्षता: दल-बदल के मामलों में अध्यक्ष या सभापति के निर्णयों की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि निष्पक्षता बनी रहे।
- आंतरिक पार्टी लोकतंत्र को बढ़ावा देना: राजनीतिक दलों को अपने भीतर असहमति और स्वतंत्र विचार व्यक्त करने के लिए पर्याप्त जगह देनी चाहिए, ताकि विधायकों को दल-बदल के लिए मजबूर न होना पड़े।
- संसदीय कार्यवाही में सुधार: सदन में सार्थक चर्चा और बहस के लिए एक रचनात्मक माहौल बनाने हेतु सभी राजनीतिक दलों को मिलकर काम करना चाहिए।
- वित्तीय विधेयकों पर गहन विचार-विमर्श: कराधान और अन्य महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करने से पहले व्यापक सार्वजनिक और विशेषज्ञ परामर्श सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- नागरिक समाज की भागीदारी: दल-बदल जैसे मुद्दों पर सार्वजनिक बहस को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि नागरिकों को लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में अधिक जागरूक और सक्रिय भागीदार बनाया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
दल-बदल कानून · दसवीं अनुसूची · संसदीय लोकतंत्र · अवसरवादी दल-बदल · सदन की कार्यवाही · अध्यक्ष की भूमिका · संवैधानिक प्रावधान · करधान विधेयक · लोकसभा · राज्यसभा · संसदीय सत्र · विधायी प्रक्रिया
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 102 (2)’, ‘note’: ‘संसद सदस्यों की अयोग्यता’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 191 (2)’, ‘note’: ‘राज्य विधानमंडल सदस्यों की अयोग्यता’}
- {‘article’: ‘दसवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘दल-बदल विरोधी कानून’}
अवधारणा प्रवाह
राजनीतिक अवसरवाद के कारण सामूहिक दल-बदल → दल-बदल विरोधी कानून में संशोधन की मांग → संसद में चर्चा और बहस की आवश्यकता → कराधान विधेयक का परिचय और आर्थिक प्रभाव → संसदीय कार्यवाही में व्यवधान और गतिरोध → लोकतांत्रिक मूल्यों और शासन पर प्रभाव
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. दल-बदल विरोधी कानून को 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा संविधान में जोड़ा गया था।
2. यह कानून केवल संसद सदस्यों पर लागू होता है, राज्य विधानसभाओं के सदस्यों पर नहीं।
3. दल-बदल के मामलों में अंतिम निर्णय लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति द्वारा लिया जाता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। दल-बदल विरोधी कानून को 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा संविधान की दसवीं अनुसूची में जोड़ा गया था। कथन 2 गलत है। यह कानून संसद सदस्यों के साथ-साथ राज्य विधानसभाओं के सदस्यों पर भी लागू होता है। कथन 3 सही है। दल-बदल के मामलों में अंतिम निर्णय सदन के पीठासीन अधिकारी (लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति) द्वारा लिया जाता है।
Q2. अभिकथन (A): दल-बदल विरोधी कानून का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक अवसरवाद पर अंकुश लगाना और सरकारों में स्थिरता सुनिश्चित करना है।
कारण (R): यह कानून सदस्यों को नैतिक या वैचारिक मतभेदों के आधार पर दल बदलने से पूरी तरह प्रतिबंधित करता है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A सत्य है, लेकिन R असत्य है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि दल-बदल विरोधी कानून का प्राथमिक लक्ष्य राजनीतिक अवसरवाद को रोकना और राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना है। कारण (R) असत्य है क्योंकि यह कानून कुछ विशेष परिस्थितियों में दल-बदल की अनुमति देता है, जैसे कि किसी राजनीतिक दल का विलय, और यह सदस्यों को नैतिक या वैचारिक मतभेदों के आधार पर दल बदलने से पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं करता, बल्कि यह ‘सामूहिक दल-बदल’ को हतोत्साहित करता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ दल-बदल विरोधी कानून के प्रावधानों पर चर्चा कीजिए और भारतीय राजनीति में अवसरवादी दल-बदल को रोकने में इसकी प्रभावशीलता का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना: उत्तर में दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के मुख्य प्रावधानों (दसवीं अनुसूची, अयोग्यता के आधार, अपवाद) का उल्लेख होना चाहिए। इसके बाद, भारतीय राजनीति में अवसरवादी दल-बदल (opportunistic defections) को रोकने में इसकी प्रभावशीलता का समालोचनात्मक परीक्षण किया जाना चाहिए। इसमें कानून की सफलताओं (राजनीतिक स्थिरता में वृद्धि) और सीमाओं/कमजोरियों (जैसे अध्यक्ष की भूमिका पर विवाद, सामूहिक दल-बदल के लिए loopholes, आंतरिक असंतोष को दबाना) दोनों को शामिल किया जाना चाहिए। हाल के न्यायिक निर्णयों (जैसे किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू मामला) और विभिन्न समितियों (जैसे दिनेश गोस्वामी समिति, विधि आयोग) की सिफारिशों का भी उल्लेख किया जा सकता है। निष्कर्ष में कानून में सुधार के लिए सुझाव दिए जा सकते हैं।
स्रोत: Hindustan Times
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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