06 Nov वज्र-सैट अभ्यास: पशुधन सुरक्षा हेतु भारत की तैयारियों का सुदृढ़ीकरण
✎ FMD दो खुरों वाले पशुओं का विषाणुजनित रोग है; इसके सीरोटाइप अलग-अलग हैं, इसलिए सही सीरोटाइप की प्रयोगशाला पुष्टि और कम्पार्टमेंटलाइजेशन जैसी जैव-सुरक्षा प्रणालियाँ रोकथाम और पशु-व्यापार दोनों के लिए अनिवार्य हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — कृषि (पशुपालन, पशु स्वास्थ्य और पशुधन प्रबंधन) | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा और सीमा प्रबंधन (सीमा पार पशु रोगों की रोकथाम) | GS Paper II — शासन (केंद्र-राज्य समन्वय, अंतर-एजेंसी तालमेल और आपदा-पूर्व तैयारी) | GS Paper III — पर्यावरण एवं स्वास्थ्य (जूनोटिक और पशु रोगों से जैव-सुरक्षा)
- Prelims: खुरपका और मुंहपका रोग (FMD): पिकोर्नाविरिडे परिवार का विषाणु, दो खुरों वाले पशुओं (गाय, भैंस, भेड़, बकरी, सूअर) में संक्रामक रोग, FMD सीरोटाइप: O, A, C, SAT-1, SAT-2, SAT-3 तथा Asia-1; सीरोटाइप के अनुसार टीके की प्रभाविता बदलती है, SAT (Southern African Territories) प्रकार का मूल संबंध अफ्रीका से है; प्रसार पश्चिम एशिया तक हुआ है, कम्पार्टमेंटलाइजेशन (Compartmentalisation): जैव-सुरक्षित इकाइयों में विभाजन कर व्यापार जारी रखने की विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (WOAH) द्वारा मान्य पद्धति, WOAH (World Organisation for Animal Health): पशु रोगों की सूचना और स्वास्थ्य-स्थिति की अंतरराष्ट्रीय मान्यता देने वाला संगठन, राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (NADCP): FMD और ब्रुसेलोसिस पर केंद्रित, पशुपालन एवं डेयरी विभाग द्वारा संचालित, ICAR-NIVEDI, बेंगलुरु: पशु चिकित्सा महामारी विज्ञान और रोग सूचना विज्ञान संस्थान; ICAR-NIFMD: FMD पर केंद्रित राष्ट्रीय संस्थान, टेबलटॉप अभ्यास (Tabletop Exercise): वास्तविक संकट के बिना काल्पनिक परिदृश्य पर आधारित आपदा-तैयारी अभ्यास
- Essay: सीमा-पार पशु रोग: वैश्विक आवाजाही के युग में जैव-सुरक्षा की चुनौती, पशुधन स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और किसान की आजीविका: रोग-निवारण से समृद्धि तक
त्वरित पुनरावृत्ति: FMD दो खुरों वाले पशुओं का विषाणुजनित रोग है; इसके सीरोटाइप अलग-अलग हैं, इसलिए सही सीरोटाइप की प्रयोगशाला पुष्टि और कम्पार्टमेंटलाइजेशन जैसी जैव-सुरक्षा प्रणालियाँ रोकथाम और पशु-व्यापार दोनों के लिए अनिवार्य हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
पशुपालन एवं डेयरी विभाग (DAHD) ने ICAR-NIVEDI, बेंगलुरु के समन्वय से 4-5 नवंबर 2026 को FMD सीरोटाइप SAT-1 की तैयारी पर दो दिवसीय राष्ट्रीय टेबलटॉप अभ्यास ‘वज्र-सैट’ आयोजित किया। इसमें 25 राज्यों, तीन केंद्र शासित प्रदेशों और प्रमुख राष्ट्रीय संस्थानों के 83 प्रतिभागी शामिल हुए। भारत में SAT-1 का कोई मामला अभी दर्ज नहीं हुआ है, किंतु अफ्रीका से पश्चिम एशिया के कुछ भागों तक इसके प्रसार को देखते हुए यह निवारक तैयारी की गई। अभ्यास में प्रारंभिक पहचान, प्रयोगशाला पुष्टि, महामारी विज्ञान जांच, पशु आवाजाही नियंत्रण, आपातकालीन टीकाकरण और जोखिम संचार जैसे बिंदुओं पर चर्चा हुई। इसके साथ वीर्य उत्पादन केंद्रों और वीर्य बैंकों के FMD-मुक्त कम्पार्टमेंटलाइजेशन पर अलग तकनीकी बैठक भी हुई, ताकि रोकथाम, आनुवंशिक संसाधनों की सुरक्षा और सुरक्षित पशु व्यापार सुनिश्चित हो सके।
पृष्ठभूमि
- FMD एक अत्यंत संक्रामक विषाणु-जनित रोग है, जिसकी आर्थिक हानि दूध उत्पादन में गिरावट, कार्य-क्षमता में कमी, मृत्यु दर (विशेषकर युवा पशुओं में) और व्यापार प्रतिबंधों के रूप में होती है।
- FMD के सीरोटाइप एक-दूसरे से भिन्न होते हैं; किसी एक सीरोटाइप के विरुद्ध दिया गया टीका दूसरे सीरोटाइप पर प्रभावी नहीं होता, इसलिए सीरोटाइप-विशेष की निगरानी और टीका-मिलान आवश्यक है।
- भारत में FMD नियंत्रण के लिए चरणबद्ध टीकाकरण और निगरानी कार्यक्रम चलाए जाते रहे हैं, और राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (NADCP) के अंतर्गत इसे संस्थागत रूप दिया गया है।
- पशुधन रोग सीमाओं की परवाह नहीं करते; इसलिए अंतर-राज्यीय और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर पशु आवाजाही नियंत्रण, सीमा सतर्कता और रक्षा तथा सीमा सुरक्षा एजेंसियों की भागीदारी महत्वपूर्ण है।
- पशु रोग-मुक्त स्थिति का अंतरराष्ट्रीय मान्यता के आधार पर पशु उत्पादों के निर्यात से सीधा संबंध है, इसलिए कम्पार्टमेंटलाइजेशन जैसी प्रणालियाँ व्यापार और रोकथाम दोनों को साधती हैं।
खुरपका और मुंहपका रोग (FMD) तथा जैव-सुरक्षा तैयारी क्या है?
- FMD दो खुरों वाले पशुओं का विषाणुजनित रोग है, जिसमें मुंह, खुरों और थनों पर फफोले बनते हैं, तेज बुखार होता है और पशु चारा-पानी कम कर देते हैं।
- यह रोग हवा, दूषित चारे-पानी, पशु-आवाजाही, वाहन, चारा-सामग्री और मानव-माध्यम से फैल सकता है, इसलिए आवाजाही नियंत्रण और स्वच्छता इसकी प्रमुख रोकथाम है।
- सीरोटाइप (जैसे O, A, Asia-1, SAT-1, SAT-2, SAT-3) के आधार पर वर्गीकरण होता है; सही सीरोटाइप पहचान और प्रयोगशाला पुष्टि के बिना प्रभावी टीकाकरण संभव नहीं।
- टेबलटॉप अभ्यास में वास्तविक संकट के बिना परिदृश्य आधारित चर्चा होती है, जिससे प्रारंभिक पहचान से लेकर आपातकालीन टीकाकरण तक की प्रक्रियाओं में समन्वय परखा जाता है।
- कम्पार्टमेंटलाइजेशन में किसी सुविधा (जैसे वीर्य केंद्र) को जैव-सुरक्षा उपायों से इस तरह अलग रखा जाता है कि बाहरी संक्रमण का खतरा न्यूनतम रहे और व्यापार बाधित न हो।
- वीर्य बैंक और वीर्य उत्पादन केंद्र पशु-प्रजनन और आनुवंशिक सुधार के आधार हैं; इनका रोग-मुक्त रहना उत्तम नस्ल-संरक्षण और सुरक्षित पशु-व्यापार के लिए अनिवार्य है।
- ICAR-NIVEDI जैसे संस्थान रोग-सूचना और महामारी विज्ञान के आंकड़े जुटाते हैं, जबकि ICAR-NIFMD प्रयोगशाला निदान और टीका-तैयारी पर केंद्रित है; इन संस्थानों का सहयोग राष्ट्रीय नीति को वैज्ञानिक आधार देता है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| आयोजक और स्वरूप | पशुपालन और डेयरी विभाग (DAHD) ने ICAR-राष्ट्रीय पशु चिकित्सा महामारी विज्ञान और रोग सूचना विज्ञान संस्थान (ICAR-NIVEDI), बेंगलुरु के समन्वय से 4-5 नवंबर 2026 को दो दिवसीय राष्ट्रीय टेबलटॉप अभ्यास आयोजित किया। यह वास्तविक रोग प्रकोप के बजाय काल्पनिक परिस्थितियों पर आधारित एक सिमुलेशन अभ्यास था। |
| लक्षित रोग और सीरोटाइप | खुरपका और मुंहपका रोग (Foot-and-Mouth Disease: FMD) के SAT-1 सीरोटाइप की तैयारी। SAT-1 उन सात सीरोटाइप में से एक है जो इस विषाणु रोग के लिए जाने जाते हैं। भारत में इस सीरोटाइप का कोई मामला अब तक सामने नहीं आया है। |
| भागीदारी | 25 राज्यों, तीन केंद्र शासित प्रदेशों और प्रमुख राष्ट्रीय संस्थानों के 83 प्रतिभागी शामिल हुए। इनमें पशुपालन विभाग, ICAR संस्थान, पशु चिकित्सा निदान प्रयोगशालाएँ, पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय, वैक्सीन निर्माता और रक्षा एवं सीमा सुरक्षा एजेंसियाँ सम्मिलित थीं। इससे केंद्र, राज्य और सुरक्षा एजेंसियों के बीच अंतर-एजेंसी समन्वय का परीक्षण हुआ। |
| अभ्यास के चरण | प्रारंभिक पहचान, प्रयोगशाला पुष्टि, महामारी विज्ञान जाँच, पशुओं की आवाजाही नियंत्रण, आपातकालीन टीकाकरण तैयारी, जोखिम संचार और समन्वित प्रतिक्रिया जैसे चरणों पर विचार-विमर्श हुआ। इससे रोग प्रकोप की स्थिति में प्रतिक्रिया-क्रम की व्यावहारिक समझ विकसित होती है। |
| विषय-वाक्य | ‘जल्दी पता लगाएं, तेजी से पुष्टि करें, एक साथ रखें’ थीम यह दर्शाती है कि पशु रोग नियंत्रण में समय पर पहचान और तीव्र प्रयोगशाला पुष्टि सबसे निर्णायक कारक हैं। |
| कंपार्टमेंटलाइजेशन बैठक | 5 नवंबर 2026 को अपर सचिव (पशुधन स्वास्थ्य) और पशुपालन आयुक्त की सह-अध्यक्षता में अलग तकनीकी बैठक हुई। इसका केंद्र वीर्य उत्पादन केंद्रों और वीर्य बैंकों का FMD-मुक्त विभाजन था, जिससे मूल्यवान आनुवंशिक संसाधनों की सुरक्षा और सुरक्षित पशु व्यापार सुनिश्चित हो सके। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- भारत विश्व में दूध उत्पादन में अग्रणी है, और पशुधन क्षेत्र लाखों छोटे किसानों व भूमिहीन परिवारों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत है। FMD का प्रकोप दूध उत्पादन में गिरावट, पशुओं की मृत्यु और उत्पादकता हानि के रूप में सीधे किसानों की आजीविका को प्रभावित करता है।
- FMD-मुक्त दर्जा प्राप्त होने पर पशु और पशु उत्पादों के निर्यात की संभावनाएँ बढ़ती हैं, क्योंकि कई देश केवल रोग-मुक्त क्षेत्रों या इकाइयों से आयात की अनुमति देते हैं।
स्वास्थ्य एवं पशु-कल्याण
- FMD एक अत्यंत संक्रामक रोग है जो गोवंश, भैंस, भेड़, बकरी और सूअर जैसे खुर वाले पशुओं को प्रभावित करता है। समय पर पहचान से संक्रमण का विस्तार रोका जा सकता है और पशु-कल्याण सुनिश्चित होता है।
- जोखिम संचार (Risk Communication) के माध्यम से पशुपालकों को जागरूक करना और बीमारी की सूचना देने की संस्कृति विकसित करना नियंत्रण का आवश्यक अंग है।
रणनीतिक एवं सीमा-सुरक्षा आयाम
- सीमा पार पशु रोगों के प्रसार को रोकने में रक्षा एवं सीमा सुरक्षा एजेंसियों की भागीदारी से सीमावर्ती क्षेत्रों में जैव-सुरक्षा (Biosecurity) और निगरानी सुदृढ़ होती है।
- राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के उल्लेख से स्पष्ट है कि पशु रोग को सीमा-प्रबंधन और अंतर-एजेंसी समन्वय के व्यापक ढाँचे में देखा जा रहा है।
वैज्ञानिक एवं प्रशासनिक सुधार
- क्षेत्रीय FMD प्रयोगशालाओं और क्षेत्रीय रोग नैदानिक प्रयोगशालाओं (RDDL) के सुदृढ़ीकरण से प्रयोगशाला क्षमता बढ़ती है और तेज निदान संभव होता है।
- रोग निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली पर बल देने से आँकड़ा-आधारित नीति-निर्माण को बढ़ावा मिलता है।
चुनौतियाँ
1. सीरोटाइप-विशिष्ट वैक्सीन की उपलब्धता
- FMD के विभिन्न सीरोटाइप के लिए अलग-अलग टीके चाहिए। वर्तमान टीका-भंडार का मिलान नए या उभरते सीरोटाइप से हो, यह सुनिश्चित करना चुनौती है।
- आपातकाल में पर्याप्त मात्रा में टीका उत्पादन और वितरण की क्षमता पर इस अभ्यास में भी विचार किया गया।
यूपीएससी लिंक: GS-3: कृषि, पशुपालन और खाद्य सुरक्षा से संबंधित जैव-सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
2. सीमा-पार रोग प्रसार
- अफ्रीका से पश्चिम एशिया के कुछ भागों तक SAT-1 का भौगोलिक प्रसार पाया गया है। पशुओं, चारे और पशु उत्पादों की अवैध आवाजाही इसका संभावित मार्ग बन सकती है।
- सीमा के दोनों ओर निगरानी और समन्वय के बिना रोकथाम अधूरी रहती है, इसलिए सीमावर्ती राज्यों और सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका निर्णायक है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: आंतरिक सुरक्षा में सीमा प्रबंधन की चुनौतियाँ; GS-2: भारत के पड़ोसी देशों के साथ सहयोग
3. केंद्र-राज्य समन्वय
- पशु रोग नियंत्रण में राज्य सरकारों की प्रत्यक्ष भूमिका है, जबकि नीति, वित्त-पोषण और राष्ट्रीय रणनीति का दायित्व केंद्र के पास है।
- आवाजाही नियंत्रण, क्वारंटीन और टीकाकरण जैसे कार्यों के लिए राज्यों के बीच एकरूप प्रोटोकॉल आवश्यक हैं, ताकि अंतर-राज्यीय पशु व्यापार में बाधा न आए।
यूपीएससी लिंक: GS-2: केंद्र-राज्य संबंध और सहकारी संघवाद; GS-2: विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय
4. प्रयोगशाला क्षमता और निदान अवसंरचना
- कई राज्यों में पशु चिकित्सा निदान प्रयोगशालाओं की संख्या और तकनीकी क्षमता असमान है। तेज पुष्टि के बिना समय पर प्रतिक्रिया संभव नहीं होती।
- प्रशिक्षित पशु चिकित्सकों और तकनीशियनों की कमी प्रारंभिक पहचान और निगरानी को प्रभावित कर सकती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: कृषि क्षेत्र में तकनीकी हस्तक्षेप और अवसंरचना विकास
5. पशुपालकों की भागीदारी और जागरूकता
- छोटे और सीमांत पशुपालक प्रायः रोग की सूचना देने में हिचकते हैं, क्योंकि आवाजाही प्रतिबंध या पशु-हानि की आशंका से उनकी आजीविका प्रभावित होती है।
- जोखिम संचार की प्रभावी रणनीति और क्षतिपूर्ति तंत्र के बिना सक्रिय निगरानी कमजोर रहती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: सामाजिक क्षेत्र की योजनाएँ और उनका कार्यान्वयन; GS-3: ग्रामीण आजीविका
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| सीरोटाइप-विशिष्ट टीका | SAT-1 के लिए पर्याप्त टीका भंडार और उत्पादन-क्षमता आपात स्थिति में निर्णायक होगी। |
| सीमा-पार प्रसार | अफ्रीका से पश्चिम एशिया तक फैलाव के कारण अवैध पशु-आवाजाही से संक्रमण का खतरा बना रहता है। |
| केंद्र-राज्य समन्वय | राज्यों की अलग-अलग तैयारी और एकरूप प्रोटोकॉल की कमी से प्रतिक्रिया में विलंब हो सकता है। |
| प्रयोगशाला अवसंरचना | राज्यस्तरीय निदान क्षमता में असमानता से तेज पुष्टि प्रभावित होती है। |
| पशुपालकों की सहभागिता | रोग की सूचना देने में हिचक से प्रारंभिक पहचान कमजोर होती है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (National Animal Disease Control Programme)
आगे की राह
- SAT-1 सहित सभी संभावित सीरोटाइप के लिए टीका-भंडार, उत्पादन-क्षमता और आपातकालीन वितरण योजना को नियमित रूप से अद्यतन किया जाए।
- सीमावर्ती राज्यों में पशु आवाजाही की निगरानी के लिए सीमा सुरक्षा बलों, राज्य पशुपालन विभागों और सीमा-शुल्क एजेंसियों के बीच संयुक्त प्रोटोकॉल बनाए जाएँ।
- क्षेत्रीय FMD प्रयोगशालाओं और RDDL के नेटवर्क को सुदृढ़ करके राज्यस्तरीय प्रयोगशाला-क्षमता में समरूपता लाई जाए।
- रोग-निगरानी को आँकड़ा-आधारित बनाया जाए और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को डिजिटल रिपोर्टिंग से जोड़ा जाए।
- पशुपालकों को रोग की तत्काल सूचना देने के लिए जोखिम संचार अभियान चलाए जाएँ तथा सूचना देने पर क्षति-सहायता का स्पष्ट तंत्र बनाया जाए।
- कंपार्टमेंटलाइजेशन (Compartmentalisation) की प्रक्रिया को वीर्य केंद्रों से आगे बढ़ाकर अन्य पशु-व्यापार इकाइयों तक विस्तारित करने की संभावना का मूल्यांकन किया जाए।
- FMD-मुक्त दर्जे की मान्यता के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों (World Organisation for Animal Health: WOAH के दिशा-निर्देश) के अनुरूप प्रमाणन और दस्तावेजीकरण सुदृढ़ किया जाए।
- अभ्यास की सिफारिशों के कार्यान्वयन की समय-सीमा और जवाबदेही तय करके उनकी प्रगति की नियमित समीक्षा की जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
खुरपका और मुंहपका रोग (Foot-and-Mouth Disease, FMD) · सीरोटाइप (Serotype) · सीमा-पार पशु रोग (Transboundary Animal Diseases) · कंपार्टमेंटलाइजेशन (Compartmentalisation) · टेबलटॉप अभ्यास (Tabletop Exercise) · प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) · पशुधन स्वास्थ्य (Livestock Health) · जैव-सुरक्षा (Biosecurity) · आवाजाही नियंत्रण (Movement Control) · खुरपका-मुंहपका रोग नियंत्रण हेतु राष्ट्रीय कार्य योजना (National Action Plan for Control of FMD) · सैनिटरी एवं फाइटोसैनिटरी उपाय (SPS Measures) · संघीय ढांचा और राज्य सूची की प्रविष्टि 15 (Federal Structure and State List Entry 15)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 246 और सातवीं अनुसूची: पशु रोग रोकथाम का राज्य सूची में होना, केंद्र-राज्य समन्वय की आवश्यकता
- सातवीं अनुसूची, राज्य सूची की प्रविष्टि 15: पशु-संपदा संरक्षण और पशु रोगों की रोकथाम
- अनुच्छेद 48: कृषि और पशुपालन के वैज्ञानिक संगठन का राज्य का नीति-निर्देश
अवधारणा प्रवाह
SAT-1 सीरोटाइप का अफ्रीका से पश्चिम एशिया तक भौगोलिक प्रसार दर्ज हुआ। → भारत में मामले न होने पर भी सीमा-पार जोखिम को देखते हुए सक्रिय तैयारी की आवश्यकता बनी। → DAHD और ICAR-NIVEDI ने टेबलटॉप अभ्यास के माध्यम से पहचान, पुष्टि, आवाजाही नियंत्रण और टीकाकरण की प्रक्रिया का परीक्षण किया। → अभ्यास से निकली सिफारिशें राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय तैयारियों तथा समन्वित प्रतिक्रिया तंत्र में प्रयोग होंगी। → वीर्य केंद्रों व वीर्य बैंकों के FMD-मुक्त विभाजन से रोग-नियंत्रण और सुरक्षित पशु-व्यापार की दिशा में कदम बढ़ाया गया। → अंततः पशुधन स्वास्थ्य, किसानों की आजीविका और आर्थिक संवृद्धि की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए, जो खुरपका और मुंहपका रोग (FMD) से संबंधित हैं:
1. यह रोग पिकोर्नाविरिडी (Picornaviridae) परिवार के एक विषाणु से होता है।
2. यह रोग केवल गाय और भैंसों को प्रभावित करता है, भेड़ और बकरियों को नहीं।
3. इसे विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (WOAH) द्वारा सीमा-पार फैलने वाले रोगों की श्रेणी में रखा गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: FMD विषाणु पिकोर्नाविरिडी परिवार के एफथोवायरस (Aphthovirus) वंश का है। कथन 2 गलत है, क्योंकि यह भेड़, बकरी, सूअर और अन्य खुर वाले (cloven-hoofed) पशुओं को भी प्रभावित करता है। कथन 3 सही है, क्योंकि WOAH इसे सीमा-पार फैलने वाला और सूचित किए जाने योग्य रोग मानता है। अतः सही उत्तर ‘केवल दो’ है।
Q2. निम्नलिखित प्रकथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए:
प्रकथन (A): भारत में FMD के सीरोटाइप SAT-1 का कोई मामला दर्ज न होने के बावजूद इसके लिए तैयारी-अभ्यास आयोजित किए जाते हैं।
कारण (R): पशुओं की सीमा-पार आवाजाही और पशु उत्पादों के व्यापार से रोग के नए सीरोटाइप देश में प्रवेश करने का जोखिम बना रहता है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (b) (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (c) (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
- (d) (A) गलत है, परंतु (R) सही है।
उत्तर: (a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — प्रकथन (A) सही है, क्योंकि ‘वज्र-सैट’ अभ्यास भारत में SAT-1 के मामले न होने की स्थिति में ही सक्रिय तैयारी के रूप में आयोजित हुआ। कारण (R) भी सही है, क्योंकि सीमा-पार पशु आवाजाही और व्यापार ही रोग-प्रवेश का प्रमुख मार्ग हैं। (R) यह बताता है कि पूर्व-तैयारी क्यों आवश्यक है, इसलिए (R), (A) की सही व्याख्या है।
Q3. स्तंभ I और स्तंभ II को सही मिलान कीजिए:
स्तंभ I
1. सीरोटाइप
2. कंपार्टमेंटलाइजेशन
3. टेबलटॉप अभ्यास
4. सीमा-पार पशु रोग
स्तंभ II
A. ऐसा रोग जो पशुओं या पशु-उत्पादों की आवाजाही से देशों की सीमाओं के पार फैलता है
B. किसी बड़े क्षेत्र के भीतर जैव-सुरक्षा उपायों के साथ रोग-मुक्त उप-जनसंख्या का प्रबंधन
C. बिना क्षेत्र-परिनियोजन के परिदृश्य-आधारित चर्चा द्वारा प्रतिक्रिया का अनुकरण
D. किसी विषाणु की प्रजाति के भीतर प्रतिरक्षात्मक रूप से भिन्न प्रकार, जिसकी पहचान एंटीबॉडी प्रतिक्रिया से होती है
सही कूट चुनिए:
- (a) 1-D, 2-B, 3-C, 4-A
- (b) 1-B, 2-D, 3-A, 4-C
- (c) 1-D, 2-C, 3-B, 4-A
- (d) 1-C, 2-A, 3-D, 4-B
उत्तर: (a) 1-D, 2-B, 3-C, 4-A — सीरोटाइप किसी विषाणु प्रजाति के भीतर प्रतिरक्षात्मक रूप से भिन्न प्रकार है (1-D)। कंपार्टमेंटलाइजेशन में जैव-सुरक्षा के साथ रोग-मुक्त उप-जनसंख्या का प्रबंधन होता है (2-B)। टेबलटॉप अभ्यास परिदृश्य-आधारित चर्चा है, जिसमें क्षेत्र-परिनियोजन नहीं होता (3-C)। सीमा-पार पशु रोग देशों की सीमाओं के पार फैलते हैं (4-A)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ खुरपका और मुंहपका रोग (FMD) जैसे सीमा-पार पशु रोग भारत में उपस्थित न होने पर भी पशुधन स्वास्थ्य और व्यापार के लिए गंभीर खतरा बने रहते हैं। इन रोगों के प्रति पूर्व-तैयारी में आने वाली संस्थागत और संघीय चुनौतियों की विवेचना कीजिए। साथ ही परीक्षण कीजिए कि क्या कंपार्टमेंटलाइजेशन व्यापक पशु-वध या व्यापार-प्रतिबंध के बिना पशुधन व्यापार को बनाए रख सकता है। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर-संरचना (मॉडल उत्तर के मुख्य बिंदु):
1. परिचय: FMD एक अत्यधिक संक्रामक विषाणु-जनित रोग है, जो खुर वाले पशुओं (गाय, भैंस, भेड़, बकरी, सूअर) को प्रभावित करता है और इसके सात सीरोटाइप (O, A, C, Asia1, SAT1, SAT2, SAT3) ज्ञात हैं। ‘वज्र-सैट’ अभ्यास (4-5 नवंबर 2026, बेंगलुरु) में 25 राज्यों, 3 केंद्र शासित प्रदेशों के 83 प्रतिभागी शामिल हुए, जबकि भारत में SAT-1 का कोई मामला नहीं आया।
2. भाग-1: संस्थागत चुनौतियाँ
– ICAR-NIVEDI (बेंगलुरु) द्वारा महामारी विज्ञान निगरानी और जोखिम-आधारित निगरानी; ICAR-NIFMD द्वारा प्रयोगशाला निदान और टीका-तैयारी; क्षेत्रीय FMD प्रयोगशालाएँ और क्षेत्रीय रोग नैदानिक प्रयोगशालाएँ (RDDL) की भूमिका।
– खुरपका-मुंहपका रोग नियंत्रण हेतु राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCP-FMD, 2019) के लक्ष्य और उनकी प्रगति की समीक्षा।
– पशुपालन आयुक्त, DAHD और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के बीच अंतर-एजेंसी समन्वय; सीमा सतर्कता में रक्षा और सीमा सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका।
– प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और समय पर रिपोर्टिंग में कमियाँ; निदान-क्षमता और टीका-उत्पादन की सीमाएँ।
3. भाग-2: संघीय आयाम
– पशु स्वास्थ्य और पशु रोगों की रोकथाम संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 15 में आती है, इसलिए मुख्य क्रियान्वयन राज्य सरकारों के पास है।
– अंतर-राज्यीय संक्रामक रोगों के विस्तार की रोकथाम का प्रावधान समवर्ती सूची में है; अतः केंद्र की भूमिका समन्वय, मानक-निर्धारण और सहायता तक है।
– अनुच्छेद 246 के अंतर्गत विधायी शक्तियों का वितरण; राज्यों की वित्तीय और तकनीकी क्षमता में अंतर से तैयारी में असमानता।
– पशुपालन और डेयरी विभाग तथा राज्य पशुपालन विभागों के बीच नीति-समन्वय की व्यावहारिक चुनौतियाँ।
4. भाग-3: कंपार्टमेंटलाइजेशन का मूल्यांकन
– परिभाषा: एक सुपरिभाषित उप-जनसंख्या (जैसे वीर्य उत्पादन केंद्र और वीर्य बैंक) को जैव-सुरक्षा नियंत्रण के साथ रोग-मुक्त रखना, भले ही व्यापक क्षेत्र में रोग हो।
– विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (WOAH) के अंतरराष्ट्रीय पशु स्वास्थ्य कोड में क्षेत्रीकरण और कंपार्टमेंटलाइजेशन की मान्यता।
– WTO के सैनिटरी एवं फाइटोसैनिटरी (SPS) समझौते के अंतर्गत विज्ञान-आधारित उपाय अपनाने और अनावश्यक व्यापार-प्रतिबंध से बचने का सिद्धांत।
– पक्ष में तर्क: आनुवंशिक संसाधनों (वीर्य) की सुरक्षा, सुरक्षित व्यापार, किसानों की आजीविका की रक्षा। विपक्ष में तर्क: व्यापक बाड़ेबंदी और निगरानी की लागत, अनुपालन की कमी, राज्यों के बीच निगरानी-स्तर में अंतर।
5. भाग-4: संतुलित निष्कर्ष और सुझाव
– आपातकालीन टीकाकरण, आवाजाही नियंत्रण और जोखिम-संचार का एकीकृत ढाँचा; राज्यों के साथ सहकारी संघवाद के माध्यम से क्षमता-निर्माण।
– कंपार्टमेंटलाइजेशन को विज्ञान-आधारित, सत्यापन-युक्त और राज्य-स्तरीय क्रियान्वयन के साथ अपनाने पर बल; पूर्ण व्यापार-प्रतिबंध को अंतिम विकल्प मानना।
– स्पष्ट निष्कर्ष दीजिए: कंपार्टमेंटलाइजेशन सीमित परंतु प्रभावी उपाय है, जो मजबूत निगरानी और प्रयोगशाला-क्षमता पर निर्भर है।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
Karnataka PCS (KPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: हाल ही में बेंगलुरु में संपन्न हुए राष्ट्रीय अभ्यास ‘वज्र-सैट’ का प्राथमिक उद्देश्य क्या था?
- भारत में साइबर सुरक्षा बुनियादी ढांचे को मजबूत करना।
- मवेशियों में खुरपका और मुंहपका रोग के लिए भारत की तैयारियों का आकलन और सुदृढीकरण करना।
- कर्नाटक में कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए नई तकनीकों का प्रदर्शन करना।
- अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में भारत की क्षमताओं का परीक्षण करना।
उत्तर: मवेशियों में खुरपका और मुंहपका रोग के लिए भारत की तैयारियों का आकलन और सुदृढीकरण करना। — राष्ट्रीय अभ्यास ‘वज्र-सैट’ का मुख्य उद्देश्य मवेशियों में खुरपका और मुंहपका रोग से निपटने के लिए भारत की तैयारियों को मजबूत करना था।
Mains: राष्ट्रीय अभ्यास ‘वज्र-सैट’ के संदर्भ में, मवेशियों में खुरपका और मुंहपका रोग के प्रबंधन में कर्नाटक राज्य की भूमिका और इस तरह के अभ्यासों से राज्य की पशुधन अर्थव्यवस्था को कैसे लाभ हो सकता है, इसका विश्लेषण करें।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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