05 Aug सरकार परिसीमन बिल पर विशेष सत्र बुलाने की तैयारी: रिजिजू ने राहुल से बात की
✎ परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण कर 'एक व्यक्ति, एक वोट' सिद्धांत को सुनिश्चित करता है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि न्यायपालिका की दक्षता और न्याय तक पहुँच को बढ़ाती है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
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- Prelims: परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या, न्यायिक स्वतंत्रता, संसदीय विशेष सत्र
- Essay: भारतीय लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका और चुनौतियाँ, संघवाद, प्रतिनिधित्व और समावेशी शासन
त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण कर ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ सिद्धांत को सुनिश्चित करता है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि न्यायपालिका की दक्षता और न्याय तक पहुँच को बढ़ाती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, सरकार द्वारा परिसीमन (Delimitation) पर चर्चा के लिए संसद का एक विशेष सत्र बुलाने की संभावना व्यक्त की गई है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इस मुद्दे पर विपक्षी सांसदों से मुलाकात की। ये दोनों घटनाक्रम भारतीय संवैधानिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
पृष्ठभूमि
- परिसीमन का अर्थ निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है ताकि जनसंख्या में परिवर्तन के कारण सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या लगभग समान हो सके।
- भारत में परिसीमन का कार्य एक उच्च-शक्ति वाले निकाय, परिसीमन आयोग द्वारा किया जाता है, जिसके आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत संसद प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाती है, और अनुच्छेद 170 के तहत राज्यों को भी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन की अनुमति है।
- भारत में अब तक चार परिसीमन आयोगों का गठन किया गया है: 1952, 1963, 1973 और 2002 में।
- न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का प्रावधान संसद को सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 के तहत प्राप्त है, जिसमें समय-समय पर संशोधन किया जाता है।
- न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि का उद्देश्य मामलों के बढ़ते बोझ को कम करना और न्याय तक पहुँच में सुधार करना है।
परिसीमन और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि
- परिसीमन: यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत किसी देश या प्रांत में विधायी निकाय के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत को बनाए रखना है, ताकि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में जनसंख्या का अनुपात यथासंभव समान रहे।
- परिसीमन आयोग: यह भारत में परिसीमन का कार्य करता है। यह एक स्वतंत्र निकाय है जिसके आदेश अंतिम होते हैं और इन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। आयोग में सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और संबंधित राज्य के निर्वाचन आयुक्त पदेन सदस्य होते हैं।
- संवैधानिक प्रावधान: संविधान का अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 170 राज्यों को विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन की अनुमति देता है। वर्तमान में, 2002 के परिसीमन अधिनियम के तहत, लोकसभा और विधानसभा सीटों का अगला परिसीमन 2026 के बाद पहली जनगणना के आँकड़ों के आधार पर होगा।
- परिसीमन का महत्त्व: यह लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की समानता सुनिश्चित करता है, विभिन्न क्षेत्रों के हितों का उचित प्रतिनिधित्व करता है और जनसंख्या परिवर्तन के कारण होने वाली असमानताओं को दूर करता है।
- सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(1) के तहत, सर्वोच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश और तब तक सात से अधिक अन्य न्यायाधीश नहीं होंगे जब तक कि संसद कानून द्वारा अधिक संख्या निर्धारित न करे।
- न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि का कारण: मामलों के बढ़ते बोझ, लंबित मामलों की संख्या में कमी लाने और न्यायपालिका की कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए समय-समय पर न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई जाती है। यह न्यायिक प्रणाली की क्षमता को मजबूत करने में सहायक होता है।
- न्यायिक स्वतंत्रता: न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि न्यायिक स्वतंत्रता को प्रभावित नहीं करती, बल्कि यह न्यायपालिका को अधिक प्रभावी ढंग से कार्य करने में सक्षम बनाती है, जिससे नागरिकों को त्वरित और सुलभ न्याय मिल सके।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| परिसीमन विधेयक | लोकसभा और विधानसभा सीटों का पुनर्गठन, जनसंख्या परिवर्तन के आधार पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना। |
| उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक | उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि, लंबित मामलों के निपटान में तेजी लाना। |
| बैंकर्स बुक्स एविडेंस विधेयक, 2026 | बैंकों के डिजिटल रिकॉर्ड को कानूनी साक्ष्य के रूप में मान्यता, न्यायिक प्रक्रिया को आधुनिक बनाना। |
| विशेष सत्र | महत्वपूर्ण विधायी कार्यों पर चर्चा और पारित करने के लिए संसद का असाधारण सत्र। |
महत्व
राजनीतिक महत्व
- परिसीमन विधेयक का संभावित विशेष सत्र राजनीतिक दलों के बीच सीटों के पुनर्गठन और प्रतिनिधित्व पर व्यापक चर्चा को दर्शाता है, जो भारतीय संघवाद (Federalism) के लिए महत्वपूर्ण है।
- उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि न्यायिक प्रणाली की दक्षता और न्याय तक पहुंच में सुधार के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
विधायी महत्व
- बैंकर्स बुक्स एविडेंस विधेयक, 2026 जैसे पुराने कानूनों का प्रतिस्थापन आधुनिक डिजिटल युग में कानूनी ढांचे को अद्यतन करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
- संसद के विशेष सत्र बुलाने की संभावना महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर त्वरित विधायी कार्रवाई की आवश्यकता को दर्शाती है।
न्यायिक महत्व
- उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़कर 38 होने से देश की शीर्ष अदालत पर बढ़ते कार्यभार को कम करने में मदद मिलेगी, जिससे मामलों का तेजी से निपटारा संभव होगा।
- बैंकों के डिजिटल रिकॉर्ड को कानूनी साक्ष्य के रूप में मान्यता देने से न्यायिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ेगी, विशेषकर वित्तीय मामलों में।
चुनौतियाँ
1. परिसीमन पर राजनीतिक सहमति का अभाव
- परिसीमन एक संवेदनशील मुद्दा है क्योंकि यह विभिन्न राज्यों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधित्व को सीधे प्रभावित करता है।
- कांग्रेस और विपक्ष का ‘पहले जैसा रुख’ दर्शाता है कि इस विधेयक को पारित करने में सरकार को महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान-संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
2. संसदीय कार्यवाही में व्यवधान
- विपक्षी सांसदों द्वारा विरोध प्रदर्शन और वॉकआउट जैसी घटनाएं विधायी प्रक्रिया में बाधा डालती हैं और महत्वपूर्ण विधेयकों पर सार्थक चर्चा को रोकती हैं।
- बिना चर्चा के ध्वनिमत से विधेयकों का पारित होना संसदीय लोकतंत्र की भावना के प्रतिकूल है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान-संसद, संसदीय कार्यप्रणाली
3. न्यायिक कार्यभार और रिक्तियां
- न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि के बावजूद, न्यायिक रिक्तियों को भरना और लंबित मामलों के विशाल ढेर को कम करना एक सतत चुनौती बनी हुई है।
- केवल संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है; न्यायिक प्रक्रिया में सुधार और बुनियादी ढांचे को मजबूत करना भी आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान-न्यायपालिका, न्यायिक सुधार
4. कानूनी आधुनिकीकरण की गति
- 135 साल पुराने कानून को बदलने में इतना समय लगना दर्शाता है कि भारत में कानूनी ढांचे को आधुनिक बनाने की प्रक्रिया धीमी है।
- डिजिटल युग की आवश्यकताओं के अनुरूप कानूनों को अद्यतन करने की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान-कानून और न्याय
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| परिसीमन विधेयक | विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व पर प्रभाव, राजनीतिक असहमति। |
| संसदीय विरोध | विधायी प्रक्रिया में बाधा, महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा का अभाव। |
| न्यायिक रिक्तियां | न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि के बावजूद लंबित मामलों का बोझ। |
| पुराने कानूनों का प्रतिस्थापन | कानूनी आधुनिकीकरण की धीमी गति, डिजिटल युग की चुनौतियों का सामना। |
आगे की राह
- परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीतिक दलों के बीच व्यापक सहमति बनाने के लिए संवाद और परामर्श को बढ़ावा देना चाहिए।
- संसदीय कार्यवाही में व्यवधानों को कम करने और सार्थक बहस सुनिश्चित करने के लिए सभी हितधारकों को रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए।
- न्यायिक रिक्तियों को समयबद्ध तरीके से भरने और न्यायिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
- कानूनी ढांचे को डिजिटल युग की आवश्यकताओं के अनुरूप तेजी से अद्यतन किया जाना चाहिए, ताकि न्याय प्रणाली अधिक कुशल बन सके।
- विधेयकों को बिना पर्याप्त चर्चा के पारित करने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए, ताकि संसदीय लोकतंत्र की गरिमा बनी रहे।
- सरकार और विपक्ष दोनों को राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सहयोग करना चाहिए, भले ही उनके राजनीतिक मतभेद हों।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
परिसीमन · परिसीमन आयोग · संसद का विशेष सत्र · न्यायाधीशों की संख्या · उच्चतम न्यायालय · अनुच्छेद 82 · अनुच्छेद 170 · लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम · संघवाद · संसदीय संप्रभुता
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 82’, ‘note’: ‘प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 170’, ‘note’: ‘विधानसभाओं के लिए परिसीमन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 124’, ‘note’: ‘उच्चतम न्यायालय की स्थापना और गठन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 124(1)’, ‘note’: ‘उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या’}
अवधारणा प्रवाह
जनसंख्या परिवर्तन → परिसीमन की आवश्यकता → परिसीमन विधेयक का प्रस्ताव → राजनीतिक सहमति का अभाव → विशेष सत्र की संभावना
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. परिसीमन आयोग का गठन भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।
2. परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
3. भारत में अब तक चार परिसीमन आयोगों का गठन किया गया है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। परिसीमन आयोग का गठन राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है। कथन 2 सही है। परिसीमन आयोग के आदेश अंतिम होते हैं और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। कथन 3 गलत है। भारत में अब तक चार परिसीमन आयोगों का गठन 1952, 1963, 1973 और 2002 में किया गया है।
Q2. भारत के उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की शक्ति किसमें निहित है?
- भारत के राष्ट्रपति
- भारत के मुख्य न्यायाधीश
- संसद
- विधि आयोग
उत्तर: संसद — संविधान के अनुच्छेद 124(1) के तहत, संसद को कानून द्वारा उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करने का अधिकार है। हाल ही में, संसद ने एक विधेयक पारित कर उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 कर दी है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ परिसीमन की प्रक्रिया का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए और चर्चा कीजिए कि यह भारत में संघीय ढांचे तथा लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को कैसे प्रभावित करती है। (15 Marks)
रूपरेखा: परिसीमन की परिभाषा और संवैधानिक आधार (अनुच्छेद 82, 170) से शुरुआत करें। परिसीमन आयोग के गठन, शक्तियों और कार्यों का उल्लेख करें। इसकी प्रक्रिया में शामिल सिद्धांतों (जनसंख्या अनुपात, भौगोलिक अखंडता) पर प्रकाश डालें। इसके पक्ष में तर्क दें (समान प्रतिनिधित्व, एक व्यक्ति एक वोट)। इसके विपक्ष में आलोचनात्मक बिंदु प्रस्तुत करें (जनसंख्या नियंत्रण वाले राज्यों के लिए दंड, राजनीतिक हेरफेर की संभावना, ‘स्थगित’ परिसीमन के निहितार्थ)। संघीय ढांचे पर इसके प्रभाव (राज्यों के बीच सीटों का असंतुलन, दक्षिणी राज्यों की चिंताएं) और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व पर इसके परिणामों (मतदान शक्ति का पुनर्वितरण) का विश्लेषण करें। अंत में, एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करें जिसमें सुधारों और भविष्य की चुनौतियों का उल्लेख हो।
स्रोत: bhaskar.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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