29 Jul सुप्रीम कोर्ट ने 2021 के आदेश को खारिज किया, पर्यावरण मंजूरी में पूर्वव्यापी शक्ति पर रोक लगाई
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — शासन, संविधान और राजव्यवस्था | GS Paper III — पर्यावरण और पारिस्थितिकी
- Prelims: पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA), पूर्वव्यापी पर्यावरण मंज़ूरी, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, अनुच्छेद 14 और 21, न्यायिक समीक्षा, प्रशासनिक आदेश, प्रतिनिहित विधान (Delegated Legislation)
- Essay: सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण: संतुलन की चुनौतियाँ, न्यायपालिका की भूमिका: पर्यावरण शासन और संवैधानिक नैतिकता
त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय ने प्रशासनिक आदेशों के माध्यम से ‘पूर्वव्यापी’ पर्यावरण मंज़ूरी की स्थायी व्यवस्था को रद्द कर दिया है, लेकिन ‘अतिव्यापी सार्वजनिक हित’ में तर्कसंगत ‘माफी योजनाओं’ की केंद्र की शक्ति को बरकरार रखा है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने 2021 के एक कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum – OM) को रद्द कर दिया है, जो अवसंरचना परियोजनाओं को ‘पूर्वव्यापी’ (ex post facto) पर्यावरण मंज़ूरी प्रदान करने की अनुमति देता था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार केवल प्रशासनिक आदेशों के माध्यम से पर्यावरण सुरक्षा संबंधी महत्त्वपूर्ण प्रावधानों को मौलिक रूप से नहीं बदल सकती। हालांकि, न्यायालय ने ‘माफी योजनाओं’ (amnesty schemes) के माध्यम से कुछ विशेष परिस्थितियों में पूर्वव्यापी मंज़ूरी देने की केंद्र की शक्ति को बरकरार रखा है।
पृष्ठभूमि
- पर्यावरण मंज़ूरी किसी भी बड़ी परियोजना को शुरू करने से पहले अनिवार्य होती है, ताकि उसके पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन किया जा सके।
- पर्यावरण प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment – EIA) अधिसूचना, 2006, बड़े पैमाने की परियोजनाओं के लिए अनिवार्य और पूर्व पर्यावरण मंज़ूरी का प्रावधान करती है। यह एक ‘प्रतिनिहित विधान’ (delegated legislation) है।
- यह अनिवार्य मंज़ूरी राजमार्गों, हवाई अड्डों, रियल एस्टेट, खनन, ऊर्जा और भारी उद्योग जैसे विभिन्न क्षेत्रों की परियोजनाओं पर लागू होती है।
- 2017 में, केंद्र सरकार ने एक ‘एकमुश्त माफी’ योजना के तहत उन परियोजनाओं को पूर्वव्यापी मंज़ूरी दी थी जो बिना पूर्व मंज़ूरी के शुरू हो गई थीं।
- 2021 का कार्यालय ज्ञापन एक ‘स्थायी व्यवस्था’ प्रदान करता था, जिसके तहत बिना पूर्व पर्यावरण मंज़ूरी के शुरू की गई परियोजनाओं को भी बाद में मंज़ूरी दी जा सकती थी।
- सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि 2021 का OM ‘पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986’ के उद्देश्यों के ‘अल्ट्रा वायर्स’ (ultra vires) था और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन करता था।
‘पूर्वव्यापी’ पर्यावरण मंज़ूरी क्या है?
- ‘पूर्वव्यापी’ पर्यावरण मंज़ूरी का अर्थ है किसी परियोजना के शुरू होने या उसके एक निश्चित चरण तक पहुँचने के बाद उसे पर्यावरणीय मंज़ूरी प्रदान करना।
- सामान्य प्रक्रिया में, किसी भी बड़ी परियोजना को शुरू करने से पहले ‘पर्यावरण प्रभाव आकलन’ (EIA) प्रक्रिया से गुजरना होता है और ‘पूर्व’ (prior) पर्यावरण मंज़ूरी प्राप्त करनी होती है।
- यह मंज़ूरी परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों का मूल्यांकन करने और उन्हें कम करने के उपायों को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
- पूर्वव्यापी मंज़ूरी उन परियोजनाओं को वैध बनाने का प्रयास करती है जो बिना आवश्यक पूर्व मंज़ूरी के शुरू हो गई थीं, अक्सर पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन करते हुए।
- सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे प्रशासनिक आदेशों को अवैध ठहराया है जो पूर्वव्यापी मंज़ूरी को एक स्थायी व्यवस्था बनाते हैं, क्योंकि यह पर्यावरण संरक्षण के सिद्धांतों को कमजोर करता है।
- हालांकि, न्यायालय ने यह भी माना कि केंद्र सरकार ‘माफी योजनाओं’ के माध्यम से कुछ विशेष परिस्थितियों में पूर्वव्यापी मंज़ूरी दे सकती है, बशर्ते ऐसी योजनाएँ ‘अतिव्यापी सार्वजनिक हित’ (supervening public interest) पर आधारित हों और तर्कसंगत मानदंड निर्धारित करें।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक आदेशों से मूल कानून (जैसे 2006 की अधिसूचना) को बदला नहीं जा सकता, जिसे केवल उचित विधायी प्रक्रिया या उचित ‘माफी अधिसूचना’ के माध्यम से ही संशोधित किया जा सकता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| 2021 कार्यालय ज्ञापन (OM) रद्द | सर्वोच्च न्यायालय ने ‘पूर्वव्यापी पर्यावरण मंज़ूरी’ (ex post facto environmental clearance) देने वाले 2021 के OM को रद्द किया, यह दर्शाता है कि केंद्र सरकार केवल प्रशासनिक आदेशों से पर्यावरण सुरक्षा संबंधी प्रावधानों को नहीं बदल सकती। |
| केंद्र की ‘एमनेस्टी योजना’ (amnesty schemes) की शक्ति बरकरार | न्यायालय ने केंद्र सरकार की ‘एमनेस्टी योजना’ प्रदान करने की शक्ति को बरकरार रखा, लेकिन यह स्पष्ट किया कि ऐसी योजनाएँ ‘अतिव्यापी सार्वजनिक हित’ (supervening public interest) से जुड़ी होनी चाहिए और उनमें चयन के लिए एक सुसंगत अंतर (intelligible differentia) होना चाहिए। |
| 2006 की अधिसूचना का महत्व | 2006 की अधिसूचना के तहत ‘पूर्व पर्यावरण मंज़ूरी’ की अनिवार्यता को अनिवार्य प्रकृति का बताया गया, जो बड़े पैमाने की परियोजनाओं के लिए आवश्यक है। |
| प्रशासनिक आदेश द्वारा कानून में बदलाव की अस्वीकृति | न्यायालय ने कहा कि एक प्रशासनिक आदेश (2021 OM) के माध्यम से प्रत्यायोजित विधान (delegated legislation) (2006 की अधिसूचना) को प्रतिस्थापित करना कानून में अस्वीकार्य है। |
| अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन | न्यायालय ने पाया कि 2021 का OM तर्कसंगतता और आनुपातिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता और अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता) तथा अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण) का उल्लंघन करता है। |
| पूर्वव्यापी प्रभाव से रद्द करने से इनकार | न्यायालय ने 2021 के OM को संभावित रूप से (prospectively) रद्द किया ताकि चल रही परियोजनाओं पर तत्काल प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। |
महत्व
पर्यावरण शासन पर प्रभाव
- यह निर्णय पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 (Environmental Protection Act, 1986) के उद्देश्यों को मजबूत करता है, जिसमें एहतियाती सिद्धांत (precautionary principle) और सतत विकास (sustainable development) के माध्यम से पर्यावरण का संरक्षण शामिल है।
- यह ‘पूर्व पर्यावरण मंज़ूरी’ के महत्व को पुनः स्थापित करता है, जो बड़ी परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करने के लिए एक महत्वपूर्ण तंत्र है।
- यह प्रशासनिक मनमानी पर रोक लगाता है और यह सुनिश्चित करता है कि पर्यावरण संबंधी नियमों में बदलाव विधायी प्रक्रिया के अनुसार ही हों।
कानूनी और संवैधानिक निहितार्थ
- यह निर्णय ‘प्रत्यायोजित विधान’ और ‘प्रशासनिक आदेशों’ के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है, यह रेखांकित करता है कि प्रशासनिक आदेश कानून का स्थान नहीं ले सकते।
- यह अनुच्छेद 14 और 21 के तहत नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है, यह सुनिश्चित करता है कि सरकार के कार्य तर्कसंगत और आनुपातिक हों।
- यह ‘न्यायिक समीक्षा’ (judicial review) की शक्ति को मजबूत करता है, जिसके तहत न्यायालय विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों की संवैधानिकता की जांच कर सकते हैं।
विकास और निवेश पर प्रभाव
- यह निर्णय परियोजनाओं के लिए एक स्पष्ट और अनुमानित नियामक ढाँचा प्रदान करता है, जिससे निवेशकों को भविष्य की परियोजनाओं की योजना बनाने में मदद मिलेगी।
- यह उन परियोजनाओं को हतोत्साहित करेगा जो पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करके शुरू की जाती हैं, जिससे दीर्घकालिक ‘सतत विकास’ को बढ़ावा मिलेगा।
- हालांकि, ‘एमनेस्टी योजना’ की शक्ति को बरकरार रखने से कुछ मामलों में सार्वजनिक हित में परियोजनाओं को राहत मिल सकती है, बशर्ते वे निर्धारित मानदंडों को पूरा करें।
चुनौतियाँ
1. पर्यावरण मंज़ूरी प्रक्रिया में देरी
- पर्यावरण मंज़ूरी प्रक्रिया में अक्सर नौकरशाही की बाधाओं और जटिलताओं के कारण देरी होती है।
- यह देरी परियोजनाओं की लागत बढ़ा सकती है और उनके कार्यान्वयन को बाधित कर सकती है।
यूपीएससी लिंक: शासन, पर्यावरण
2. पर्यावरण नियमों का प्रभावी प्रवर्तन
- पर्यावरण नियमों का प्रवर्तन अक्सर कमजोर होता है, जिससे उल्लंघनकर्ताओं को दंडित करना मुश्किल हो जाता है।
- पर्याप्त निगरानी तंत्र और मानव संसाधनों की कमी एक बड़ी चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: शासन, पर्यावरण
3. सतत विकास और आर्थिक संवृद्धि के बीच संतुलन
- विकास परियोजनाओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना एक जटिल कार्य है।
- अक्सर आर्थिक संवृद्धि को पर्यावरण संबंधी चिंताओं पर प्राथमिकता दी जाती है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण, अर्थव्यवस्था
4. प्रशासनिक आदेशों का दुरुपयोग
- प्रशासनिक आदेशों का उपयोग कानून को दरकिनार करने या उसमें बदलाव करने के लिए किया जा सकता है, जैसा कि इस मामले में देखा गया।
- यह ‘कानून के शासन’ (rule of law) और ‘शक्तियों के पृथक्करण’ (separation of powers) के सिद्धांतों को कमजोर करता है।
यूपीएससी लिंक: राजव्यवस्था, शासन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| पूर्वव्यापी मंज़ूरी | यह पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोकने के बजाय उसे स्वीकार करने जैसा है, जिससे ‘एहतियाती सिद्धांत’ का उल्लंघन होता है। |
| प्रशासनिक आदेशों द्वारा कानून में बदलाव | यह ‘प्रत्यायोजित विधान’ के दायरे से बाहर है और ‘शक्तियों के पृथक्करण’ के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। |
| सार्वजनिक हित का निर्धारण | ‘अतिव्यापी सार्वजनिक हित’ की अस्पष्ट परिभाषा का दुरुपयोग हो सकता है, जिससे पर्यावरण संरक्षण कमजोर पड़ सकता है। |
| अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन | गैर-तर्कसंगत और गैर-आनुपातिक प्रशासनिक कार्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करते हैं। |
| नियामक अनिश्चितता | बार-बार नियमों में बदलाव या अस्पष्टता निवेशकों और परियोजना डेवलपर्स के लिए अनिश्चितता पैदा करती है। |
| पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) की गुणवत्ता | पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्टों की गुणवत्ता और निष्पक्षता पर अक्सर सवाल उठते हैं। |
आगे की राह
- पर्यावरण मंज़ूरी प्रक्रिया को सुव्यवस्थित और पारदर्शी बनाया जाए ताकि अनावश्यक देरी को कम किया जा सके, लेकिन पर्यावरण सुरक्षा से समझौता न हो।
- पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) की गुणवत्ता और विश्वसनीयता में सुधार किया जाए, जिसमें स्वतंत्र विशेषज्ञों की भागीदारी सुनिश्चित हो।
- पर्यावरण नियमों के प्रभावी प्रवर्तन के लिए नियामक निकायों को मजबूत किया जाए और उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
- केंद्र सरकार द्वारा ‘एमनेस्टी योजना’ जारी करने के लिए स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ मानदंड स्थापित किए जाएं, जो ‘अतिव्यापी सार्वजनिक हित’ और ‘पर्यावरण संरक्षण’ के बीच संतुलन बनाए रखें।
- प्रशासनिक आदेशों की शक्ति को विधायी सीमाओं के भीतर रखा जाए ताकि वे प्रत्यायोजित विधान का अतिक्रमण न करें।
- जनता की भागीदारी और जागरूकता को बढ़ावा दिया जाए ताकि पर्यावरण संरक्षण प्रयासों में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाई जा सके।
- पर्यावरण संबंधी विवादों के शीघ्र समाधान के लिए न्यायिक और अर्ध-न्यायिक तंत्रों को मजबूत किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
पर्यावरण मंज़ूरी · कार्य-पश्चात मंज़ूरी · पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 · प्रशासनिक आदेश · अधिकारों का प्रत्यायोजन · न्यायिक समीक्षा · सतत विकास · एहतियाती सिद्धांत · अनुच्छेद 14 · अनुच्छेद 21 · जनहित · अल्ट्रा वायर्स
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 14’, ‘note’: ‘विधि के समक्ष समानता का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 51A(g)’, ‘note’: ‘पर्यावरण की रक्षा और संवर्धन’}
अवधारणा प्रवाह
2006 की अधिसूचना ने ‘पूर्व पर्यावरण मंज़ूरी’ अनिवार्य की। → 2021 के OM ने ‘पूर्वव्यापी पर्यावरण मंज़ूरी’ की अनुमति दी। → सर्वोच्च न्यायालय ने 2021 के OM को रद्द किया। → न्यायालय ने प्रशासनिक आदेश द्वारा कानून में बदलाव को अस्वीकार्य बताया। → केंद्र की ‘एमनेस्टी योजना’ की शक्ति को शर्तों के साथ बरकरार रखा। → यह निर्णय पर्यावरण संरक्षण और ‘कानून के शासन’ को मजबूत करता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. सर्वोच्च न्यायालय ने 2021 के कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) को रद्द कर दिया है, जो अवसंरचना परियोजनाओं को कार्य-पश्चात पर्यावरण मंज़ूरी प्रदान करता था।
2. न्यायालय ने माना कि केंद्र सरकार केवल प्रशासनिक आदेश जारी करके पर्यावरण सुरक्षा संबंधी जाँचों में पर्याप्त बदलाव कर सकती है।
3. 2006 की अधिसूचना, जो एक प्रत्यायोजित विधान (delegated legislation) है, के तहत बड़ी परियोजनाओं के लिए अनिवार्य और पूर्व पर्यावरण मंज़ूरी आवश्यक है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2021 के कार्यालय ज्ञापन को रद्द कर दिया है। कथन 2 गलत है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार केवल प्रशासनिक आदेशों के माध्यम से पर्यावरण सुरक्षा संबंधी जाँचों में पर्याप्त बदलाव नहीं कर सकती। कथन 3 सही है। 2006 की अधिसूचना के तहत बड़ी परियोजनाओं के लिए अनिवार्य और पूर्व पर्यावरण मंज़ूरी आवश्यक है।
Q2. कथन (A): सर्वोच्च न्यायालय ने 2021 के कार्यालय ज्ञापन को ‘अल्ट्रा वायर्स’ (ultra vires) घोषित किया है।
कारण (R): यह कार्यालय ज्ञापन पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के उद्देश्यों, विशेषकर एहतियाती सिद्धांत और सतत विकास के साथ संगत नहीं था।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — कथन A सही है क्योंकि न्यायालय ने 2021 के OM को अल्ट्रा वायर्स घोषित किया। कथन R भी सही है और यह A की सही व्याख्या है क्योंकि न्यायालय ने OM को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के उद्देश्यों, विशेषकर एहतियाती सिद्धांत और सतत विकास के सिद्धांतों के विपरीत पाया।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ पर्यावरण मंज़ूरी प्रदान करने में ‘कार्य-पश्चात’ दृष्टिकोण के निहितार्थों का समालोचनात्मक परीक्षण करें। इस संदर्भ में, सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय का विश्लेषण करें कि कैसे यह प्रशासनिक आदेशों के माध्यम से प्रत्यायोजित विधान में परिवर्तन को प्रतिबंधित करता है। (15 अंक)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: कार्य-पश्चात पर्यावरण मंज़ूरी (ex post facto environmental clearance) की अवधारणा और इसके महत्व का संक्षिप्त परिचय।
2. कार्य-पश्चात मंज़ूरी के निहितार्थ: पर्यावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव, नियामक उल्लंघनों को प्रोत्साहन, ‘एहतियाती सिद्धांत’ (precautionary principle) का उल्लंघन, सतत विकास (sustainable development) के लक्ष्यों पर प्रभाव, और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार का हनन।
3. सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय: 2021 के कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) को रद्द करने का संदर्भ।
4. न्यायालय के तर्क: प्रशासनिक आदेशों द्वारा प्रत्यायोजित विधान (delegated legislation) में बदलाव की अस्वीकार्यता, 2006 की अधिसूचना का महत्व, ‘अल्ट्रा वायर्स’ (ultra vires) का सिद्धांत, अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन।
5. ‘माफी योजनाओं’ (amnesty schemes) पर न्यायालय का रुख: केंद्र सरकार की ऐसी योजनाएँ लाने की शक्ति को बरकरार रखना, लेकिन ‘अधिभावी जनहित’ (supervening public interest) के आधार पर विशिष्टता की आवश्यकता पर बल।
6. निष्कर्ष: पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करने में न्यायिक हस्तक्षेप का महत्व, भविष्य की नीति निर्माण के लिए निहितार्थ।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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