11 Aug अरावली पर रिपोर्ट प्रस्तुत करने से पहले सभी जिलों का दौरा करें: एवीजेए
✎ अरावली पर्वत श्रृंखला भारत की सबसे पुरानी वलित पर्वत श्रृंखला है, जो पारिस्थितिक और पर्यावरणीय रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है, और इसका संरक्षण सतत विकास के लिए आवश्यक है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भारत का भूगोल) | GS Paper II — शासन (सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप), न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका) | GS Paper III — पर्यावरण (पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण और निम्नीकरण, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन)
- Prelims: अरावली पर्वत श्रृंखला, सर्वोच्च न्यायालय की उच्चाधिकार प्राप्त समिति, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, खनन विनियमन, सतत विकास, जनभागीदारी
- Essay: पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन: भारत के संदर्भ में चुनौतियाँ, न्यायपालिका की भूमिका: पर्यावरणीय शासन और जनहित की रक्षा
त्वरित पुनरावृत्ति: अरावली पर्वत श्रृंखला भारत की सबसे पुरानी वलित पर्वत श्रृंखला है, जो पारिस्थितिक और पर्यावरणीय रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है, और इसका संरक्षण सतत विकास के लिए आवश्यक है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
अरावली विरासत जन अभियान (AVJA) नामक पर्यावरणविदों और कार्यकर्ताओं के एक गठबंधन ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त अरावली पर उच्चाधिकार प्राप्त समिति (HPC) से आग्रह किया है कि वह सभी प्रभावित जिलों का दौरा किए बिना और स्थानीय समुदायों से परामर्श किए बिना अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत न करे। अभियान का दावा है कि समिति ने खनन-प्रभावित गांवों का दौरा नहीं किया है और सार्वजनिक सुनवाई शहरी केंद्रों में आयोजित की गई हैं, जिससे ग्रामीण समुदायों की भागीदारी बाधित हुई है।
पृष्ठभूमि
- यह क्षेत्र जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण है और दिल्ली-NCR क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण ‘हरित फेफड़े’ (Green Lungs) के रूप में कार्य करता है, साथ ही भूजल पुनर्भरण और मरुस्थलीकरण को रोकने में भी सहायक है।
- अवैध खनन और शहरीकरण के दबाव के कारण अरावली के पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर खतरा है, जिससे पर्यावरण निम्नीकरण और स्थानीय समुदायों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधियों को विनियमित करने और इसके संरक्षण के लिए कई बार हस्तक्षेप किया है, जिसके तहत वर्तमान उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन किया गया है।
- समिति का मुख्य कार्य अरावली क्षेत्र में खनन और अन्य गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन करना और इसके संरक्षण के लिए सिफारिशें प्रस्तुत करना है।
- जनभागीदारी और स्थानीय समुदायों के साथ परामर्श पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment – EIA) और किसी भी संरक्षण योजना की सफलता के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
अरावली पर्वत श्रृंखला और इसका महत्व
- अरावली पर्वत श्रृंखला एक प्राचीन वलित पर्वत श्रृंखला है जो लगभग 692 मिलियन वर्ष पुरानी मानी जाती है, जो इसे भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक बनाती है।
- यह दक्षिण-पश्चिम दिशा में लगभग 670 किलोमीटर तक फैली हुई है, जो दिल्ली से शुरू होकर हरियाणा, राजस्थान से होते हुए गुजरात में समाप्त होती है।
- अरावली क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण नदियाँ जैसे बनास, लूनी, साबरमती और माही का उद्गम होता है, जो पश्चिमी भारत के जल विज्ञान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- यह पश्चिमी राजस्थान में थार मरुस्थल के पूर्व की ओर विस्तार को रोकने में एक प्राकृतिक बाधा के रूप में कार्य करती है।
- अरावली क्षेत्र विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों और जीवों का घर है, जिसमें कई स्थानिक प्रजातियाँ भी शामिल हैं, जो इसे एक महत्वपूर्ण जैव विविधता हॉटस्पॉट बनाती हैं।
- यह दिल्ली-NCR क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण जल पुनर्भरण क्षेत्र और वायु प्रदूषण को कम करने में सहायक ‘हरित गलियारा’ (Green Corridor) है।
- अवैध खनन, अतिक्रमण और अनियोजित शहरीकरण के कारण इस पर्वत श्रृंखला का तेजी से क्षरण हो रहा है, जिससे पारिस्थितिक असंतुलन और पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।
- इसके संरक्षण के लिए विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी संगठन प्रयास कर रहे हैं, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप भी शामिल है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| अरावली पर्वत श्रृंखला | भारत की सबसे पुरानी वलित पर्वत श्रृंखला; दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश के 64 जिलों से होकर गुजरती है। |
| पारिस्थितिक महत्व | मरुस्थलीकरण को रोकती है, भूजल पुनर्भरण में सहायक, जैव विविधता का भंडार। |
| खनन गतिविधियाँ | अरावली क्षेत्र में अवैध और अनियंत्रित खनन से पर्यावरण और स्थानीय समुदायों पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव। |
| सर्वोच्च न्यायालय-नियुक्त समिति | अरावली क्षेत्र में खनन और संरक्षण से संबंधित मुद्दों की जांच के लिए गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति। |
| जनभागीदारी का अभाव | समिति द्वारा जन सुनवाई में स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित न होने और जमीनी हकीकत को समझने में कमी। |
महत्व
पर्यावरण और पारिस्थितिकी
- अरावली पर्वत श्रृंखला उत्तरी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक अवरोधक है, जो थार रेगिस्तान के विस्तार को रोकती है।
- यह क्षेत्र कई स्थानिक वनस्पतियों और जीवों का घर है, जो जैव विविधता संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है।
- अरावली क्षेत्र दिल्ली-NCR सहित आसपास के क्षेत्रों में भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharging) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
सामाजिक और मानवीय
- खनन गतिविधियों से प्रभावित ग्रामीण समुदायों को स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याओं (जैसे अस्थमा, श्वसन संबंधी बीमारियाँ) का सामना करना पड़ रहा है।
- स्थानीय निवासियों की आजीविका और जीवन की गुणवत्ता खनन के कारण नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है।
- पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करने में स्थानीय समुदायों की भागीदारी आवश्यक है।
शासन और न्यायपालिका
- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित समिति का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास सुनिश्चित करना है।
- समिति की रिपोर्ट और सिफारिशें अरावली क्षेत्र के भविष्य के लिए नीतिगत निर्णयों को प्रभावित करेंगी।
- न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) और सक्रिय न्यायपालिका (Judicial Activism) पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
चुनौतियाँ
1. अवैध खनन और पर्यावरण क्षरण
- अरावली क्षेत्र में बड़े पैमाने पर अवैध खनन से वनों की कटाई, मृदा अपरदन और जल निकायों का प्रदूषण होता है।
- खनन से उत्पन्न धूल और प्रदूषण से स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण; प्रदूषण
2. जनभागीदारी का अभाव
- सर्वोच्च न्यायालय-नियुक्त समिति द्वारा आयोजित जन सुनवाई शहरी केंद्रों में हुई, जिससे ग्रामीण और खनन-प्रभावित समुदायों की पहुँच सीमित रही।
- स्थानीय पंचायतों और ग्राम प्रधानों को जन सुनवाई की जानकारी का अभाव था, जिससे उनकी भागीदारी बाधित हुई।
यूपीएससी लिंक: शासन; नागरिक सहभागिता
3. सतत खनन की चुनौती
- समिति द्वारा ‘सतत खनन’ की बात की जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत में ऐसा कोई सतत खनन नहीं हो रहा है।
- सतत खनन के सिद्धांतों को व्यवहार में लागू करना एक बड़ी चुनौती है, खासकर जब अवैध गतिविधियों का बोलबाला हो।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण नैतिकता; सतत विकास
4. स्वास्थ्य और आजीविका पर प्रभाव
- खनन और स्टोन-क्रशर गतिविधियों से उत्पन्न प्रदूषण के कारण स्थानीय लोगों में श्वसन और त्वचा संबंधी बीमारियाँ बढ़ रही हैं।
- पर्यावरण क्षरण से कृषि और पशुपालन जैसी पारंपरिक आजीविकाएँ प्रभावित हो रही हैं।
यूपीएससी लिंक: मानव विकास; सामाजिक न्याय
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| समिति का दौरा | समिति ने खनन-प्रभावित गाँवों का दौरा नहीं किया, जिससे जमीनी हकीकत की समझ का अभाव। |
| जन सुनवाई की पहुँच | जन सुनवाई शहरी केंद्रों में हुई, ग्रामीण समुदायों के लिए पहुँच मुश्किल। |
| सूचना का प्रसार | जन सुनवाई की जानकारी स्थानीय समाचार पत्रों, रेडियो या पंचायत कार्यालयों में ठीक से प्रसारित नहीं की गई। |
| सतत खनन की अवधारणा | जमीनी स्तर पर ‘सतत खनन’ का अभाव, केवल कागजों तक सीमित। |
| स्वास्थ्य समस्याएँ | खनन गतिविधियों से श्वसन और त्वचा संबंधी बीमारियों में वृद्धि। |
आगे की राह
- सर्वोच्च न्यायालय-नियुक्त समिति को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने की समय सीमा बढ़ाने के लिए अनुरोध करना चाहिए।
- समिति को अरावली श्रृंखला से गुजरने वाले सभी 64 जिलों में खनन-प्रभावित गाँवों का दौरा करना चाहिए।
- जन सुनवाई को स्थानीय और ग्रामीण स्तर पर आयोजित किया जाना चाहिए, जिससे प्रभावित समुदायों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित हो सके।
- जन सुनवाई और समिति के कार्यकलापों से संबंधित जानकारी का व्यापक प्रचार-प्रसार स्थानीय भाषाओं में किया जाना चाहिए।
- स्थानीय समुदायों, विशेषकर महिलाओं और कमजोर वर्गों की चिंताओं और सुझावों को गंभीरता से सुना और शामिल किया जाना चाहिए।
- अवैध खनन गतिविधियों पर प्रभावी ढंग से रोक लगाने के लिए कठोर प्रवर्तन तंत्र (Enforcement Mechanism) स्थापित किए जाने चाहिए।
- सतत खनन प्रथाओं को बढ़ावा देने और पर्यावरण बहाली (Environmental Restoration) के प्रयासों को तेज करने की आवश्यकता है।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
अरावली पर्वत श्रृंखला · पर्यावरण संरक्षण · खनन गतिविधियाँ · उच्चाधिकार प्राप्त समिति · न्यायिक सक्रियता · सतत विकास · जनभागीदारी · पर्यावरणीय प्रभाव आकलन · संविधान का अनुच्छेद 21 · पारिस्थितिक संतुलन · स्थानीय समुदाय · खनन विनियमन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 21: जीवन का अधिकार (स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार)
- अनुच्छेद 48A: पर्यावरण का संरक्षण और सुधार
- अनुच्छेद 51A(g): प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार
अवधारणा प्रवाह
अरावली पर्वत श्रृंखला में खनन गतिविधियाँ → पर्यावरण क्षरण और प्रदूषण में वृद्धि → स्थानीय समुदायों के स्वास्थ्य और आजीविका पर नकारात्मक प्रभाव → सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन → समिति द्वारा जनभागीदारी के बिना रिपोर्ट तैयार करने का आरोप → पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के लक्ष्यों पर प्रश्नचिह्न
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अरावली पर्वत श्रृंखला भारत के पांच राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में फैली हुई है।
2. अरावली पर्वत श्रृंखला को भारत की सबसे पुरानी वलित पर्वत श्रृंखला माना जाता है।
3. अरावली पर्वत श्रृंखला में अवैध खनन से भूजल स्तर में गिरावट और जैव विविधता को नुकसान हुआ है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 गलत है क्योंकि अरावली पर्वत श्रृंखला दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश (पांच राज्य और एक केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली) में फैली हुई है, न कि पांच राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में। कथन 2 और 3 सही हैं।
Q2. अरावली पर्वत श्रृंखला के संदर्भ में, निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
1. सर्वोच्च बिंदु: गुरु शिखर
2. प्रमुख खनिज: संगमरमर और ग्रेनाइट
3. भौगोलिक विस्तार: दिल्ली से गुजरात तक
उपरोक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — युग्म 1 सही है, गुरु शिखर अरावली का सर्वोच्च बिंदु है। युग्म 2 सही है, अरावली क्षेत्र में संगमरमर और ग्रेनाइट जैसे खनिज पाए जाते हैं। युग्म 3 भी सही है, अरावली पर्वत श्रृंखला दिल्ली से गुजरात तक फैली हुई है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ अरावली पर्वत श्रृंखला के पर्यावरणीय महत्व पर चर्चा कीजिए। साथ ही, अवैध खनन और विकास परियोजनाओं के कारण उत्पन्न चुनौतियों का विश्लेषण करते हुए, इन चुनौतियों से निपटने में न्यायिक हस्तक्षेप की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। (15 अंक)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: अरावली पर्वत श्रृंखला का संक्षिप्त परिचय और उसका भौगोलिक विस्तार।
2. पर्यावरणीय महत्व: अरावली के पारिस्थितिकीय, जलवैज्ञानिक और जलवायु संबंधी महत्व पर प्रकाश डालें। दिल्ली-एनसीआर के लिए ‘ग्रीन लंग्स’ के रूप में इसकी भूमिका, भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता संरक्षण और मरुस्थलीकरण को रोकने में इसकी भूमिका का उल्लेख करें।
3. चुनौतियाँ: अवैध खनन, शहरीकरण, बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं और वनों की कटाई जैसी चुनौतियों का विस्तृत विश्लेषण करें। इन गतिविधियों के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों (जैसे भूजल की कमी, वायु प्रदूषण, स्वास्थ्य समस्याएँ, जैव विविधता का नुकसान) पर चर्चा करें।
4. न्यायिक हस्तक्षेप की भूमिका: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित समितियों, विभिन्न निर्णयों (जैसे खनन पर प्रतिबंध, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन का महत्व) और जनहित याचिकाओं के माध्यम से अरावली संरक्षण में न्यायिक सक्रियता का मूल्यांकन करें। हालिया समाचारों में उल्लिखित उच्चाधिकार प्राप्त समिति और जनभागीदारी की कमी के मुद्दे को शामिल करें।
5. आगे की राह/निष्कर्ष: सतत खनन प्रथाओं, प्रभावी विनियमन, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, वैज्ञानिक अध्ययन और सख्त प्रवर्तन के माध्यम से अरावली के संरक्षण के लिए एक समग्र दृष्टिकोण का सुझाव दें। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार का उल्लेख करें।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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