24 Dec अरावली बचाओ अभियान : अरावली पहाड़ियों का संरक्षण
अरावली बचाओ अभियान : अरावली पहाड़ियों का संरक्षण
पाठ्यक्रम : सामान्य अध्ययन-III – भारत का भूगोल पर्यावरण प्रदूषण संरक्षण पर्यावरण प्रदूषण और गिरावट
प्रिलिम्स के लिये: अरावली पहाड़ियाँ, भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद, अरावली ग्रीन वॉल पहल
मेन्स के लिये: पर्यावरण शासन और न्यायपालिका की भूमिका, खनन विनियमन बनाम पारिस्थितिक संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण
चर्चा में क्यों?

- केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने कहा कि अरावली की नई परिभाषा उसके 90% से अधिक क्षेत्र के संरक्षण में सहायक सिद्ध होगी
नवंबर 2025 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने अरावली पहाड़ियों की एक समान परिभाषा अपनाई, जिसके अनुसार स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों को पहाड़ी माना गया। इस निर्णय से यह आशंका जताई गई कि इससे अरावली पर्वतमाला को मिलने वाला कानूनी संरक्षण कमज़ोर हो सकता है और इसके बड़े हिस्से खनन तथा निर्माण गतिविधियों के लिये संवेदनशील हो सकते हैं। - इस निर्णय के बाद जन-आंदोलन, राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ और #SaveAravalli अभियान शुरू हुए। नए खनन पट्टों पर रोक लगाई और सतत खनन योजना को अनिवार्य किया। कि यह ढाँचा संरक्षण को मज़बूत करता है, मुख्य क्षेत्रों में खनन पर प्रतिबंध लगाता है और अवैध खनन पर अंकुश लगाने पर केंद्रित है।
आलोचकों का मानना है कि 100 मीटर का नियम बड़े क्षेत्रों को बाहर कर सकता है, जिससे भूजल, जैव विविधता और मरुस्थलीकरण नियंत्रण पर खतरा बढ़ सकता है तथा यह परिदृश्य-स्तरीय पुनर्स्थापन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
अरावली की नई परिभाषा पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय का क्या निर्णय है?
उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ समिति द्वारा अनुशंसित अरावली पहाड़ियों की एक समान परिभाषा को स्वीकार कर लिया है। साथ ही, कई अन्य महत्वपूर्ण निर्देश भी जारी किए हैं। यह परिभाषा ‘भू-परिदृश्य स्तर’ पर संरक्षण प्रदान करती है। इसमें अरावली को अलग-अलग पहाड़ियों के रूप में नहीं, बल्कि एक निरंतर भूगर्भीय कटक (geological ridge) के रूप में माना गया है।
परिचय: सर्वोच्च न्यायालय ने खनन को विनियमित करने और पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा के उद्देश्य से पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) के अंतर्गत गठित एक समिति द्वारा प्रस्तावित अरावली पहाड़ियों एवं पर्वतमालाओं की एक समान, वैज्ञानिक परिभाषा को स्वीकार किया।
सर्वोच्च न्यायालय ने संरक्षित क्षेत्रों, पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों, टाइगर रिज़र्व और आर्द्रभूमियों जैसे मुख्य/अस्पर्शनीय क्षेत्रों में खनन पर प्रतिबंध लगा दिया। हालाँकि, परमाणु खनिजों (प्रथम अनुसूची का भाग-B), महत्त्वपूर्ण एवं रणनीतिक खनिजों (भाग-D) तथा खान एवं खनन (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 की सातवीं अनुसूची में सूचीबद्ध खनिजों के लिये सीमित अपवाद की अनुमति दी गई है।
अरावली पहाड़ियाँ: किसी भी ऐसे स्थलरूप के रूप में परिभाषित की गई हैं जो आसपास के स्थानीय भू-भाग से 100 मीटर या उससे अधिक ऊँचाई तक उठता हो।
स्थानीय उच्चावच का निर्धारण उस स्थलरूप को घेरने वाली सबसे निचली समोच्च रेखा (Contour line) के आधार पर किया जाता है।
संरक्षण पूरे पहाड़ी तंत्र तक विस्तारित होगा, जिसमें सहायक ढालें और संबंधित स्थलरूप शामिल हैं, चाहे उनकी ऊँचाई कुछ भी हो।
अरावली पर्वतमालाएँ: दो या दो से अधिक ऐसी पहाड़ियों के समूह के रूप में परिभाषित की गई हैं, जो एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर स्थित हों। इन पहाड़ियों के बीच का पूरा मध्यवर्ती क्षेत्र, जिसमें ढालें और छोटी पहाड़ियाँ भी शामिल हैं, पर्वतमाला का हिस्सा माना जाएगा।इस परिभाषा का उद्देश्य अरावली परिदृश्य में खनन जैसी गतिविधियों के नियमन हेतु स्पष्टता और वस्तुनिष्ठता प्रदान करना था।
SC के निर्देश: न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि इस परिभाषा के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में नए खनन पट्टों के जारी करने पर अस्थायी रोक लगाई जाए, जब तक कि भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) द्वारा सतत खनन प्रबंधन योजना (MPSM) तैयार नहीं कर ली जाती।
इस योजना में खनन-निषिद्ध क्षेत्र, कड़े रूप से विनियमित खनन क्षेत्र, संवेदनशील आवास एवं वन्यजीव गलियारों की पहचान करना, संचयी पारिस्थितिक प्रभावों एवं वहन क्षमता का आकलन करना तथा पुनर्स्थापन और पुनर्वास उपायों का निर्धारण अनिवार्य होगा। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि पूर्ण या समग्र प्रतिबंध कई बार अवैध खनन को प्रोत्साहित कर देते हैं। इसी कारण उसने एक संतुलित और विवेकपूर्ण नीति अपनाई, जिसके तहत मौजूदा वैध खनन गतिविधियों को कड़े नियामक प्रावधानों के अंतर्गत सीमित रूप से जारी रखने, नए खनन कार्यों पर रोक लगाने तथा पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को स्थायी संरक्षण प्रदान करने पर बल दिया गया।
अरावली मुद्दे पर सरकार का रुख :
केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुमोदित ढाँचा अरावली के संरक्षण को कमज़ोर नहीं करता और न ही बड़े पैमाने पर खनन की अनुमति देता है।
सतत खनन प्रबंधन योजना को अंतिम रूप दिये जाने तक किसी भी नए खनन पट्टे को मंज़ूरी नहीं दी जाएगी।
सरकार ने अवैध खनन को मुख्य खतरा बताया है और ड्रोन व निगरानी तकनीकों के उपयोग सहित कड़े निगरानी एवं प्रवर्तन उपायों के समर्थन की बात कही है।
अरावली पर्वतमाला के संरक्षण और पुनर्स्थापन हेतु पूर्व हस्तक्षेप :
MoEF की सीमाएँ (1990 के दशक): पर्यावरण मंत्रालय ने अरावली पर्वतमाला में खनन को केवल स्वीकृत परियोजनाओं तक सीमित करने हेतु प्रतिबंध लगाए।
हालाँकि, राज्यों द्वारा कमज़ोर प्रवर्तन के कारण खनन नियमों का बड़े पैमाने पर उल्लंघन हुआ।
अरावली पहाड़ियों की परिभाषा: पहले केवल राजस्थान में अरावली क्षेत्र में खनन को विनियमित करने हेतु औपचारिक रूप से अधिसूचित परिभाषा मौजूद थी। यह वर्ष 2002 की राज्य समिति की रिपोर्ट पर आधारित थी, जिसमें रिचर्ड मर्फी के स्थलरूप वर्गीकरण का उपयोग किया गया था। इसके अनुसार, स्थानीय भू-उच्चावच से 100 मीटर ऊँचाई तक उठने वाले स्थलरूपों को पहाड़ी माना गया और पहाड़ियों तथा उनकी सहायक ढालों पर खनन को प्रतिबंधित किया गया था।
खनन पर सर्वोच्च न्यायालय का प्रतिबंध (2009): हरियाणा के फरीदाबाद, गुरुग्राम और मेवात ज़िलों में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया।
वर्ष 2024 में न्यायालय ने अरावली पर्वतमाला के पूरे क्षेत्र में नए खनन पट्टों के आवंटन और उनके नवीनीकरण पर रोक लगा दी तथा केंद्रीय सशक्त समिति (CEC) को विस्तृत जाँच करने का निर्देश दिया।
CEC की सिफारिशें (2024): इसने सभी राज्यों में फैली अरावली पर्वतमाला का पूर्ण वैज्ञानिक मानचित्रण करने की सिफारिश की।
खनन गतिविधियों के लिये व्यापक पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) कराने का सुझाव दिया।
मानचित्रण और प्रभाव आकलन पूर्ण होने तक किसी भी नए खनन पट्टे के आवंटन या नवीनीकरण की अनुमति न देने की सिफारिश की।
अरावली ग्रीन वॉल पहल: अफ्रीका की ग्रेट ग्रीन वॉल से प्रेरित, अरावली ग्रीन वॉल पहल एक परिदृश्य-स्तरीय पारिस्थितिक पुनर्स्थापन कार्यक्रम है, जिसका नेतृत्व पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) द्वारा किया जा रहा है। इसका उद्देश्य भूमि क्षरण को रोकना, पारिस्थितिक अनुकूलन मज़बूत करना तथा अरावली पर्वतमाला में मरुस्थलीकरण को रोकना है। इस पहल के तहत अरावली पर्वतमाला के साथ 1,400 किमी लंबी और 5 किमी चौड़ी हरित पट्टी विकसित करने का प्रस्ताव है, जो गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक विस्तृत होगी। इसमें अरावली का मुख्य क्षेत्र तथा उसके आसपास के बफर ज़ोन भी शामिल होंगे।
इस पहल का लक्ष्य वर्ष 2027 तक पारिस्थितिक अंतरालों को भरकर और प्राकृतिक वनस्पति को पुनर्जीवित करके अरावली पहाड़ियों में 1.1 मिलियन हेक्टेयर से अधिक क्षतिग्रस्त भूमि का पुनर्स्थापन करना है। यह ग्रीन वॉल रेत और धूल भरी ऑंधियों को कम करने, वायु गुणवत्ता में सुधार लाने तथा विशेष रूप से दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में सूक्ष्म-जलवायवीय तनाव को कम करने में सहायक होने की अपेक्षा है।

अरावली पर्वतों की नई परिभाषा के संबंध में आलोचनाएँ क्या हैं?
अधिकांश परिदृश्य का बहिष्कार: भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के एक आंतरिक मूल्यांकन से पता चलता है कि 100 मीटर की ऊँचाई की सीमा नई परिभाषा से अरावली प्रणाली के 90% से अधिक हिस्से को बाहर कर देती है।
यह विशेष रूप से दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के लिये गंभीर पारिस्थितिक, पर्यावरणीय और शासन संबंधी चिंताएँ उत्पन्न करता है, क्योंकि अरावली शृंखला प्राकृतिक धूल तथा प्रदूषण अवशोषक के रूप में कार्य करती है, वायु गुणवत्ता नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण एवं जलवायु विनियमन का समर्थन करती है।
खनन के विस्तार का खतरा: नई परिभाषा के बाहर आने वाले क्षेत्र खनन, निर्माण और शहरी विस्तार के लिये संवेदनशील हो सकते हैं, जिससे दशकों से किये गए संरक्षण प्रयासों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।
पारिस्थितिक निरंतरता की अनदेखी: अरावली एक निरंतर पारिस्थितिक प्रणाली के रूप में कार्य करती है, लेकिन यह परिभाषा शिखर-केंद्रित मानी जा रही है, जो तलहटी, घाटियों और जुड़ने वाली चोटियों की पारिस्थितिक भूमिका को नज़रअंदाज़ करती है।
भूजल पुनर्भरण का जोखिम: निचले पहाड़ और ढलान वर्षा जल के रिसाव तथा भूमिगत जल स्त्रोत के पुनर्भरण के लिये महत्त्वपूर्ण हैं तथा इनका हनन राजस्थान, हरियाणा, गुजरात एवं दिल्ली-एनसीआर में जलस्तर घटा सकता है।
मरुस्थलीकरण में तेज़ी: अरावली बाधा कमज़ोर होने से थार रेगिस्तान पूर्व की ओर बढ़ सकता है, जिससे धूल भरी ऑंधियाँ, भूमि क्षरण और शुष्कता बढ़ सकती है तथा यह भारत के मरुस्थलीकरण से निपटने हेतु संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन की प्रतिबद्धताओं को कमज़ोर कर सकता है।
क्रियान्वयन और प्रवर्तन की चुनौतियाँ: व्यापक मानचित्रण और कड़ाई से निगरानी के बिना, नई परिभाषा नियामक अंतर उत्पन्न कर सकती है, जिससे अवैध खनन को रोकना कठिन हो जाएगा।
अरावली शृंखला के प्रमुख तथ्य क्या हैं?

यह विश्व की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। ये प्री-कैम्ब्रियन युग के पर्वत हैं, जो हिमालय से भी प्राचीन हैं।
इसका विस्तार 800 किमी से अधिक क्षेत्र में है। यह गुजरात, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा तक विस्तारित है।
सबसे ऊँची चोटी: गुरु शिखर (माउंट आबू)।
भूवैज्ञानिक उत्पत्ति और विकास: अरावली शृंखला विश्व की सबसे पुरानी पर्वत प्रणालियों में से एक और भारत की सबसे पुरानी पर्वत शृंखला है, जो लगभग 2,000 मिलियन वर्ष पूर्व प्री-कैम्ब्रियन युग में अस्तित्व में आई थी।
यह अरावली–दिल्ली ओरोजेनी के दौरान टेक्टोनिक प्लेटों के टकराव के कारण बनी थी। वर्तमान अरावली एक बहुत बड़े प्रागैतिहासिक पर्वत प्रणाली के अत्यधिक क्षतिग्रस्त अवशेष हैं, जिन्हें मौसम और अपरदन के कारण लाखों वर्षों में कम कर दिया गया है। माउंट आबू पर गुरु शिखर चोटी अरावली शृंखला की सबसे ऊँची चोटी है (1,722 मीटर)।
भौगोलिक विस्तार: यह गुजरात से दिल्ली तक (राजस्थान और हरियाणा होते हुए) 800 किमी से अधिक फैली हुई है।
जलवायु और पारिस्थितिक महत्त्व: अरावली थार रेगिस्तान के उत्तर-पश्चिमी भारत में फैलाव के खिलाफ एक प्राकृतिक बाधा के रूप में कार्य करती है।
निर्वनीकरण और भूमि क्षरण ने कई अंतराल उत्पन्न किये हैं। जिससे रेगिस्तानी रेत उपजाऊ मैदानों की ओर बहती है और वायु प्रदूषण तथा धूल भरी ऑंधियों की समस्या बढ़ती है।
जल प्रणाली में योगदान: अर्द्ध-शुष्क क्षेत्र में स्थित, जहाँ वार्षिक वर्षा 500–700 मिमी होती है, अरावली शृंखला प्रमुख जलग्रहण क्षेत्र के रूप में कार्य करती है और बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर के जल निकासी क्षेत्रों को अलग करती है।
जैव विविधता और वन्यजीव महत्त्व: अरावली परिदृश्य शुष्क पर्णपाती वन, घास के मैदान और आर्द्रभूमि का समर्थन करता है, जिसमें सहारा, प्रायद्वीपीय तथा ओरिएंटल जैव विविधता का अनोखा मिश्रण पाया जाता है। यहाँ 22 वन्यजीव अभयारण्यों और तीन बाघ अभयारण्य हैं तथा यह बाघ, तेंदुआ, भारतीय भेड़िया, स्लॉथ बियर तथा ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जैसी संकटग्रस्त प्रजातियों के लिये आवास प्रदान करता है।
कृषि, आजीविका और पशुपालन: अरावली क्षेत्र में कृषि वर्षा-निर्भर और जीविकोपार्जन-आधारित है, जिसमें बाज़रा, मक्का, गेहूँ, सरसों तथा दलहन उगाई जाती हैं। वहीं बड़े पैमाने पर पशुपालन और वन संसाधनों पर निर्भरता ग्रामीण आजीविकाओं के लिये पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य को अत्यंत महत्त्वपूर्ण बनाती है।
आर्थिक और खनिज महत्त्व: अरावली क्षेत्र खनिजों में समृद्ध है, जिसमें 70 से अधिक वाणिज्यिक रूप से मूल्यवान खनिज शामिल हैं, जैसे जिंक, सीसा, चाँदी, टंगस्टन, संगमरमर और ग्रेनाइट। खनन एक प्रमुख आर्थिक गतिविधि के रूप में उभरा है, विशेषकर राजस्थान में, जो इस शृंखला का लगभग 80% हिस्सा रखता है।
औद्योगिक विकास और शहरी दबाव: अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण अरावली बेल्ट में गुरुग्राम, फरीदाबाद, जयपुर, अलवर और अजमेर जैसे प्रमुख औद्योगिक तथा शहरी केंद्र स्थित हैं। यह IT और वस्त्र उद्योग से लेकर ऑटोमोबाइल, रसायन और इस्पात उद्योग तक का समर्थन करता है।
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्त्व: अरावली शृंखला में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल जैसे चित्तौड़गढ़ और कुंभलगढ़ किले स्थित हैं।
यह पुष्कर, अजमेर शरीफ, माउंट आबू और रानकपुर जैसे प्रमुख धार्मिक केंद्रों का भी क्षेत्र है, जो इसे हिंदू, इस्लामी एवं जैन परंपराओं के लिये पवित्र बनाते हैं तथा इसकी सभ्यतागत महत्ता को मज़बूत करते हैं।
क्षरण और पर्यावरणीय गिरावट: दशकों के दौरान, अरावली शृंखला ने गंभीर निर्वनीकरण, खनन, शहरीकरण और चराई के दबाव का सामना किया है।
कई पहाड़ पूरी तरह से नष्ट हो गए हैं, वन आवरण में तीव्र गिरावट आई है तथा वर्षा की अवधि काफी कम हो गई है।
इन परिवर्तनों ने मृदा क्षरण, भूमिगत जल स्त्रोतों को नुकसान, मरुस्थलीय अंतराल का विस्तार और वायु प्रदूषण की स्थिति को खराब कर दिया है, जो विशेष रूप से दिल्ली-एनसीआर को प्रभावित करता है।
विशेषज्ञ समिति की मुख्य सिफारिशों पर एक नजर :
परिचालन संबंधी परिभाषाएं: समिति ने अरावली पहाड़ियों और श्रृंखला दोनों को परिभाषित किया है।
अरावली पहाड़ियां: अरावली जिलों में स्थित कोई भी ऐसा भू-भाग, जिसकी ऊंचाई स्थानीय धरातल से 100 मीटर या उससे अधिक हो।
अरावली श्रृंखला: एक-दूसरे से 500 मीटर के दायरे में स्थित दो या दो से अधिक अरावली पहाड़ियां।
कोर/ अलंघनीय क्षेत्र सुरक्षा: संरक्षित क्षेत्रों, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESZ), टाइगर रिज़र्व, आर्द्रभूमियों और प्रतिपूरक वनरोपण प्रबंधन एवं नियोजन प्राधिकरण कोष (CAMPA) वृक्षारोपण स्थलों में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध होगा।
उच्चतम न्यायालय के प्रमुख निर्देश :
सतत खनन के लिए प्रबंधन योजना (MPSM): भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) संपूर्ण अरावली क्षेत्र के लिए एक प्रबंधन योजना तैयार करेगा।
नए खनन पट्टों (Leases) पर रोक: जब तक झारखंड के सारंडा वन के लिए MPSM की तर्ज पर ICFRE द्वारा अरावली के लिए भी MPSM तैयार नहीं कर ली जाती, तब तक नए खनन पट्टों पर रोक रहेगी।
अरावली पर्वतमाला की सुरक्षा को मज़बूत करने के लिये कौन-से उपाय आवश्यक हैं?
वैज्ञानिक पहचान और मानचित्रण: आधिकारिक आँकड़ों का उपयोग करते हुए पहाड़ियों, पर्वत शृंखलाओं, ढलानों, घाटियों, पुनर्भरण क्षेत्रों और वन्यजीव गलियारों का व्यापक, मानकीकृत मानचित्रण करना। खनन गतिविधियों पर श्रेणीबद्ध और जोखिम-आधारित नियंत्रण लागू करना, साथ ही निषेध, विनियमन और निगरानी के लिये स्पष्ट मानदंड भी लागू करना।
अवैध खनन की रोकथाम: संस्थागत समन्वय और प्रौद्योगिकी आधारित उपकरणों के माध्यम से निगरानी, पर्यवेक्षण और प्रवर्तन तंत्र को मज़बूत करना।
अवैध खनन और रेत माफियाओं पर अंकुश लगाने के लिये ड्रोन, सैटेलाइट इमेज़री, CCTV, ई-चालान और ज़िला टास्क फोर्स का उपयोग करना।
पारिस्थितिकी तंत्र का पुनर्स्थापन और प्रबंधन: पारिस्थितिक उपयुक्तता और दीर्घकालिक स्थिरता के आधार पर निम्नीकृत वनों, घास के मैदानों और खनन क्षेत्रों के पुनर्स्थापन को बढ़ावा देना। टांका, झालारा, तालाब-बंदी जैसी स्वदेशी प्रणालियाँ अरावली गाँवों में जल प्रबंधन को मज़बूत करती हैं।
पवन अपरदन और रेत के बहाव पर नियंत्रण: कैलिगोनम और अकेशिया जैसी प्रजातियों का उपयोग करके सतही वनस्पति ने रेत के टीलों को स्थिर किया और पवन अपरदन को कम किया। यह अरावली दर्रों में धूल भरी ऑंधी और मरुस्थलीकरण को नियंत्रित करने में मदद करता है।
पुनर्स्थापन और वैश्विक प्रतिबद्धताएँ: नई दिल्ली घोषणा (UNCCD COP-14) इस बात पर प्रकाश डालती है कि मरुस्थलीकरण आजीविका और विकास को कमज़ोर करता है तथा सतत भूमि प्रबंधन पर जोर देता है। अरावली पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करना जल विनियमन, जैवविविधता, जलवायु अनुकूलन की रक्षा करने और पेरिस समझौते, बॉन चैलेंज और भूमि क्षरण तटस्थता के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के साथ-साथ स्थानीय आजीविका की सुरक्षा के लिये महत्त्वपूर्ण है।
अरावली के संरक्षण के लिए शुरू की गई पहलें :
मातृ वन पहल: ‘एक पेड़ माँ के नाम’ कार्यक्रम के तहत अरावली पहाड़ियों में 750 एकड़ के शहरी वन विकसित करना।
अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट: चार राज्यों में अरावली के आसपास 5 किमी के बफर क्षेत्र को हरा-भरा बनाना।
एम. सी. मेहता बनाम भारत संघ: अपने निर्णयों की श्रृंखला में उच्चतम न्यायालय ने अरावली के महत्त्व को स्वीकार किया है और किसी भी कीमत पर इसके संरक्षण का आग्रह किया है।
निष्कर्ष:
अरावली पर्वतमाला केवल एक भू-वैज्ञानिक संरचना नहीं, बल्कि उत्तर-पश्चिमी भारत के लिये एक जीवन-समर्थन तंत्र है। इसका क्षरण जलवायु स्थिरता और आजीविकाओं के लिये गंभीर खतरा उत्पन्न करता है। इसलिये अरावली का संरक्षण और पुनर्स्थापन पारिस्थितिक, आर्थिक तथा सभ्यतागत अनिवार्यता है, जिसके लिये परिदृश्य-स्तरीय संरक्षण और समुदाय-आधारित पुनर्स्थापन आवश्यक है।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q. अरावली पर्वत श्रृंखला के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1.उच्चतम न्यायालय ने अरावली को अलग-अलग पहाड़ियों के बजाय एक निरंतर भूगर्भीय कटक (Geological Ridge) के रूप में मान्यता दी है।
2.नई परिभाषा के अनुसार, अरावली पहाड़ियां वे भू-भाग हैं जिनकी ऊँचाई स्थानीय धरातल से 100 मीटर या उससे अधिक है।
3.संरक्षित क्षेत्रों, ESZ, टाइगर रिज़र्व, आर्द्रभूमियों और CAMPA वृक्षारोपण स्थलों में खनन की अनुमति दी गई है।
4.भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) को संपूर्ण अरावली क्षेत्र के लिए सतत खनन प्रबंधन योजना (MPSM) तैयार करने का निर्देश दिया गया है।
उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
(a) 1, 2 और 4 केवल
(b) 1 और 3 केवल
(c) 2 और 3 केवल
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (a)
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q. भारत अरावली जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में खनन गतिविधियों और पारिस्थितिक संरक्षण के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित कर सकता है?
Q. “भारत में आधुनिक कानून की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पर्यावरणीय समस्याओं का संविधानीकरण है।” सुसंगत वाद विधियों की सहायता से इस कथन की विवेचना कीजिये। 2022
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