23 Oct उत्तराखंड राज्यपाल की पीएम मोदी से महत्वपूर्ण बैठक: जानिए मुख्य बिंदु
✎ राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख है जो राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त होता है और सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य करता है (अनुच्छेद 163)।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — Polity and Governance (राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति, केंद्र-राज्य संबंध, संघवाद) | GS Paper II — Polity and Governance (संवैधानिक पद और उनकी कार्यप्रणाली)
- Prelims: अनुच्छेद 153 (प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल), अनुच्छेद 155 और 156 (राज्यपाल की नियुक्ति और कार्यकाल; राष्ट्रपति की प्रसादपर्यंत), अनुच्छेद 163 (मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह), अनुच्छेद 200 (विधेयक पर अनुमति, रोक, पुनर्विचार या राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करना), अनुच्छेद 213 (राज्यपाल द्वारा अध्यादेश जारी करना), उत्तराखंड राज्य का गठन (9 नवंबर 2000, उत्तर प्रदेश से पृथक होकर), सरकारिया आयोग (1988) और पुंछी आयोग (2010) की राज्यपाल संबंधी सिफारिशें
- Essay: संवैधानिक पद और सहयोगी संघवाद: राज्यपाल केंद्र और राज्य के बीच सेतु के रूप में, राज्यपाल की भूमिका: औपचारिक प्रमुख या विवेकाधीन शक्तियों वाला संवैधानिक प्राधिकारी?
त्वरित पुनरावृत्ति: राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख है जो राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त होता है और सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य करता है (अनुच्छेद 163)।
यह खबर चर्चा में क्यों?
प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने एक्स पर साझा की गई पोस्ट और प्रेस सूचना (PIB) के माध्यम से बताया कि उत्तराखंड के राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से भेंट की। विज्ञप्ति में भेंट का कोई विशेष विषय या एजेंडा नहीं बताया गया है, इसलिए इसे एक सामान्य शिष्टाचार भेंट के रूप में समझना उचित है। ऐसी भेंटें संवैधानिक व्यवस्था में केंद्र और राज्य के बीच नियमित संवाद का हिस्सा होती हैं। UPSC की दृष्टि से इस समाचार का महत्व किसी एक घटना से अधिक इस बात में है कि राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद की भूमिका, उसकी जवाबदेही और केंद्र-राज्य संवाद की संस्थागत प्रकृति को कैसे समझा जाए।
पृष्ठभूमि
- भारत में राज्यपाल संघीय ढांचे में राज्य के संवैधानिक प्रमुख होते हैं, परंतु वे राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते हैं और राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर रहते हैं (अनुच्छेद 156)। इसी कारण उनकी भूमिका को केंद्र और राज्य दोनों के संदर्भ में देखा जाता है।
- उत्तराखंड 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों से गठित होकर भारत का 27वां राज्य बना। नए राज्यों में राज्यपाल की भूमिका प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करने और संवैधानिक तंत्र को चलाने में भी महत्वपूर्ण रही है।
- सरकारिया आयोग (1988) ने सुझाव दिया था कि राज्यपाल ऐसे व्यक्ति हों जो सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित हों और सक्रिय राजनीति से दूर रहे हों, तथा नियुक्ति से पहले मुख्यमंत्री से परामर्श किया जाए। पुंछी आयोग (2010) ने विधेयकों पर अनुमति की समयसीमा और राज्यपाल के विवेकाधिकार के सीमित उपयोग जैसे विषयों पर सिफारिशें दीं।
- सर्वोच्च न्यायालय ने शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974) में स्पष्ट किया कि राज्यपाल सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य करते हैं, जबकि कुछ मामलों में उनका विवेकाधिकार संविधान द्वारा सीमित रूप में मान्य है। नबाम रेबिया मामले (2016) में भी राज्यपाल के विवेकाधिकार की सीमाओं पर चर्चा हुई।
राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति क्या है?
- राज्यपाल राज्य की कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख होता है; राज्य की कार्यपालिका शक्ति उसमें निहित होती है (अनुच्छेद 154)।
- राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं (अनुच्छेद 155); उनके लिए न्यूनतम आयु 35 वर्ष और किसी लाभ के पद पर न होना जैसी अर्हताएं हैं (अनुच्छेद 157 और 158)।
- राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करते हैं और उनकी सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करते हैं (अनुच्छेद 164); सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह मान्य होती है (अनुच्छेद 163)।
- राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक पर राज्यपाल अनुमति दे सकते हैं, रोक सकते हैं, पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं या राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित कर सकते हैं (अनुच्छेद 200)।
- विधानमंडल के सत्र में न होने पर राज्यपाल अध्यादेश जारी कर सकते हैं (अनुच्छेद 213); यह शक्ति भी मंत्रिपरिषद की सलाह से प्रयोग होती है।
- केंद्र और राज्य के बीच संवाद में राज्यपाल एक संस्थागत कड़ी के रूप में कार्य करते हैं, परंतु उनकी भूमिका संविधान की सीमाओं के भीतर ही है।
- प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रियों से राज्यपालों की भेंट एक सामान्य प्रशासनिक और शिष्टाचार व्यवस्था है; इसका कोई अलग संवैधानिक प्रावधान नहीं है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| घटना का स्वरूप | राज्यपाल और प्रधानमंत्री के बीच सामान्य शिष्टाचार-भेंट। स्रोत में भेंट का कोई विशेष विषय या एजेंडा उल्लिखित नहीं है, इसलिए इसे किसी नीतिगत निर्णय से जोड़ना उचित नहीं है। |
| संवैधानिक पद | राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है (अनुच्छेद 153)। सामान्यतः वह मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य करता है, किंतु संविधान में कुछ विवेकाधीन क्षेत्र भी निर्दिष्ट हैं। |
| नियुक्ति और कार्यकाल | राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर बना रहता है (अनुच्छेद 156)। इसी कारण राज्यपाल और केंद्र के बीच संवाद की संस्थागत परंपरा बनी है। |
| सूचना का स्रोत | यह जानकारी PIB की विज्ञप्ति के रूप में जारी हुई, जो प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) की एक्स (X) पोस्ट पर आधारित थी। सरकारी सूचना के प्रसार में PIB की भूमिका का यह एक सामान्य उदाहरण है। |
| राज्य का संदर्भ | उत्तराखंड 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के अंतर्गत अस्तित्व में आया। राज्यपाल का पद इसी संवैधानिक ढाँचे का हिस्सा है। |
महत्व
संवैधानिक-प्रशासनिक
- राज्यपाल राज्य में संवैधानिक व्यवस्था की धुरी है और उसका केंद्र से संवाद प्रशासनिक निरंतरता के लिए उपयोगी माना जाता है।
- मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य करने का सिद्धांत (अनुच्छेद 163) यह दर्शाता है कि राज्यपाल की भूमिका औपचारिक और विवेकाधीन दोनों रूपों में परिभाषित है।
संघीय ढाँचा (केंद्र-राज्य संबंध)
- भारत का संघवाद सहयोगात्मक संवाद पर आधारित है। राज्यपाल और प्रधानमंत्री के बीच भेंट इस संस्थागत संवाद का एक सामान्य रूप है।
- अंतरराज्यीय परिषद (अनुच्छेद 263) और नीति आयोग की शासी परिषद जैसे मंच भी केंद्र-राज्य समन्वय के औपचारिक माध्यम हैं, जिनकी तुलना में ऐसी व्यक्तिगत भेंटें अनौपचारिक संपर्क का काम करती हैं।
शासन में पारदर्शिता
- PIB और PMO द्वारा ऐसी भेंटों की सूचना सार्वजनिक करना शासन में सूचना के प्रसार का एक नियमित तरीका है।
- सार्वजनिक विज्ञप्ति में उद्देश्य का उल्लेख न होना यह बताता है कि सूचना की सीमाएँ समझना और विवरण की पुष्टि करना भी अध्ययन का हिस्सा है।
चुनौतियाँ
1. भेंट के उद्देश्य की अस्पष्टता
- स्रोत में भेंट का विषय नहीं बताया गया है, इसलिए किसी निर्णय या नीति से इसका संबंध जोड़ना अनुमान पर आधारित होगा।
- परीक्षा में ऐसे प्रसंगों का विश्लेषण करते समय तथ्य और अनुमान को अलग रखना आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: शासन और लोक प्रशासन में सूचना की पारदर्शिता और तथ्य-आधारित विश्लेषण
2. राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों की व्याख्या
- राज्यपाल के विवेकाधीन क्षेत्र और उनकी सीमाएँ संविधान में स्पष्ट हैं, परंतु उनके प्रयोग की व्याख्या समय-समय पर न्यायिक समीक्षा और सार्वजनिक चर्चा का विषय बनती रही है।
- विधेयकों पर सहमति से जुड़े अनुच्छेद 200 और 201 इस विवेक के व्यावहारिक पक्ष हैं।
यूपीएससी लिंक: संविधान का राज्य कार्यपालिका और राज्यपाल की भूमिका से संबंधित खंड
3. केंद्र-राज्य समन्वय की संस्थागत चुनौती
- राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र करता है, जबकि राज्य सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है। इस द्वैत को संतुलित रखना संघीय शासन की चुनौती है।
- औपचारिक मंचों के बजाय व्यक्तिगत संपर्क पर निर्भरता से नीति-समन्वय में पारदर्शिता कम हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: संघवाद और केंद्र-राज्य संबंधों के संवैधानिक एवं संस्थागत पक्ष
4. सूचना की संक्षिप्तता और जनसमझ
- विज्ञप्ति केवल भेंट के तथ्य बताती है, इसलिए जनता के लिए इसके प्रभाव का आकलन कठिन होता है।
- सरकारी सूचना को संदर्भ सहित समझने और उसकी सीमाएँ पहचानने की क्षमता नागरिक शिक्षा का आवश्यक अंग है।
यूपीएससी लिंक: प्रशासन में जवाबदेही, सूचना का अधिकार और सार्वजनिक संवाद
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| भेंट का उद्देश्य | स्रोत में स्पष्ट नहीं है; इसलिए किसी नीति या निर्णय से सीधा संबंध सिद्ध नहीं होता। |
| राज्यपाल की विवेकाधीन भूमिका | अनुच्छेद 163 और अनुच्छेद 200 के अंतर्गत विवेक का प्रयोग संवैधानिक व्याख्या का विषय रहा है। |
| केंद्र-राज्य समन्वय | राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र द्वारा होने से राज्य की स्वायत्तता और संवाद के संतुलन की आवश्यकता बनी रहती है। |
| सूचना की सीमा | संक्षिप्त विज्ञप्ति से जनता के लिए प्रभाव का आकलन कठिन होता है, जिससे सही समझ पर असर पड़ सकता है। |
आगे की राह
- राज्यपाल और केंद्र के बीच संवाद के मानक प्रक्रियागत ढाँचे को स्पष्ट और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाए।
- विवेकाधीन शक्तियों के प्रयोग पर न्यायिक निर्णयों और संवैधानिक परंपराओं का अध्ययन नियमित रूप से किया जाए, ताकि व्याख्या में एकरूपता बनी रहे।
- अंतरराज्यीय परिषद जैसे औपचारिक मंचों को सक्रिय रखा जाए, ताकि व्यक्तिगत भेंटों पर निर्भरता कम हो।
- सरकारी विज्ञप्तियों में भेंट के विषय और निर्णयों का संक्षिप्त संदर्भ दिया जाए, जिससे जनता को सूचना का सही आशय समझ में आए।
- नागरिक शिक्षा में राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका और केंद्र-राज्य संबंधों को तथ्य-आधारित रूप में पढ़ाया जाए।
- परीक्षा की तैयारी में ऐसी सूचनाओं को संवैधानिक प्रावधान से जोड़कर विश्लेषण करने का अभ्यास किया जाए, न कि अनुमान के आधार पर।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राज्यपाल (Governor) · अनुच्छेद 153-162 (संवैधानिक पद) · अनुच्छेद 163 (मंत्रिपरिषद की सलाह) · अनुच्छेद 200 (विधेयक पर अनुमति) · अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) · सरकारिया आयोग (Sarkaria Commission, 1988) · संघवाद (Federalism) · एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) · राज्यपाल की विवेकाधीन शक्ति (Discretionary Power of Governor) · संवैधानिक तंत्र की विफलता (Failure of Constitutional Machinery) · केंद्र-राज्य संबंध (Centre-State Relations)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 153: राज्यपाल के पद का संवैधानिक आधार
- अनुच्छेद 156: राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत कार्यकाल
- अनुच्छेद 163: मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य
अवधारणा प्रवाह
राज्यपाल (संवैधानिक प्रमुख) केंद्र सरकार के प्रधानमंत्री से भेंट करते हैं। → भेंट की सूचना PMO द्वारा एक्स पर साझा की जाती है। → PIB संबंधित विज्ञप्ति जारी करता है, जिसमें भेंट का तथ्य दर्ज होता है। → विज्ञप्ति के आधार पर जनता और मीडिया को सूचना मिलती है। → भेंट का वास्तविक उद्देश्य और परिणाम स्रोत में उल्लिखित न होने से विश्लेषण तथ्य तक सीमित रहता है। → संवैधानिक ढाँचे (अनुच्छेद 153, 156, 163) के संदर्भ में ऐसी भेंट केंद्र-राज्य संवाद की संस्थागत प्रक्रिया के रूप में समझी जाती है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 155 के अंतर्गत की जाती है।
2. राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त पद धारण करता है (अनुच्छेद 156(1))।
3. राज्यपाल का चुनाव राज्य विधानमंडल के सदस्यों द्वारा किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 155 के अंतर्गत होती है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 156(1) के अनुसार राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त पद पर रहता है। कथन 3 गलत है: राज्यपाल का चुनाव नहीं होता, वह नियुक्त किया जाता है।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों में से प्रत्येक को ध्यान से पढ़िए:
अभिकथन (A): संविधान के अनुच्छेद 200 में राज्यपाल द्वारा विधेयक पर अनुमति देने के लिए कोई स्पष्ट समय-सीमा नहीं लिखी गई है।
कारण (R): सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर अनिश्चितकाल तक निर्णय लंबित रखने को संवैधानिक दृष्टि से अनुचित माना है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अनुच्छेद 200 के पाठ में विधेयक पर अनुमति की कोई निश्चित समय-सीमा नहीं दी गई है, अतः (A) सही है। सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब मामले (2023) में कहा कि राज्यपाल विधेयकों को अनिश्चित काल तक लंबित नहीं रख सकता, इसलिए (R) भी सही है और यही शून्यता को व्याख्या से भरने का आधार है।
Q3. निम्नलिखित सूचियों को सुमेलित कीजिए:
सूची-I (आयोग/निर्णय)
A. सरकारिया आयोग (1988)
B. पुंछी आयोग (2010)
C. एस.आर. बोम्मई मामला (1994)
D. रामेश्वर प्रसाद मामला (2006)
सूची-II (मुख्य विषय)
1. अनुच्छेद 356 की उद्घोषणा न्यायिक समीक्षा के अधीन है; बहुमत का परीक्षण आवश्यक है
2. बिहार विधानसभा के विघटन की उद्घोषणा को असंवैधानिक ठहराया गया
3. राज्यपाल राज्य से बाहर का प्रतिष्ठित व्यक्ति हो और सक्रिय राजनीति से दूर रहे
4. केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा हेतु गठित आयोग, जिसने राज्यपाल की भूमिका पर भी विचार किया
सही सुमेलन चुनिए:
- A-3, B-4, C-1, D-2
- A-1, B-2, C-3, D-4
- A-2, B-3, C-4, D-1
- A-4, B-1, C-2, D-3
उत्तर: A-3, B-4, C-1, D-2 — सरकारिया आयोग (1988) ने राज्यपाल के लिए बाहरी, निष्पक्ष और प्रतिष्ठित व्यक्ति की सिफारिश की। पुंछी आयोग (2010) केंद्र-राज्य संबंधों की व्यापक समीक्षा का आयोग था। एस.आर. बोम्मई (1994) ने अनुच्छेद 356 की न्यायिक समीक्षा और बहुमत परीक्षण की व्यवस्था दी। रामेश्वर प्रसाद (2006) में बिहार विधानसभा के विघटन को असंवैधानिक माना गया।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ राज्यपाल संविधान के अनुच्छेद 153 के अंतर्गत राज्य का संवैधानिक प्रमुख होते हुए भी केंद्र और राज्य के बीच की संवैधानिक कड़ी माने जाते हैं। इस दोहरी भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए और हाल के वर्षों में विधेयकों पर अनुमति से जुड़े विवादों के संदर्भ में बताइए कि क्या राज्यपाल की विवेकाधीन शक्ति पर न्यायिक समीक्षा से संवैधानिक संतुलन बना है। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल उत्तर-संरचना: (1) परिचय: राज्यपाल की नियुक्ति अनुच्छेद 155 द्वारा, कार्यकाल अनुच्छेद 156 द्वारा, कार्यकारी शक्तियाँ अनुच्छेद 154 द्वारा; संघीय कड़ी की अवधारणा। (2) संवैधानिक भूमिका: अनुच्छेद 163 के अंतर्गत मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य; अनुच्छेद 200 (विधेयक पर अनुमति, पुनर्विचार हेतु लौटाना या राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित करना); अनुच्छेद 201; अनुच्छेद 356 के अंतर्गत केंद्र को प्रतिवेदन। (3) कड़ी की भूमिका के पक्ष: राष्ट्रीय एकता, संवैधानिक तंत्र की रक्षा, अनुच्छेद 356 में अहम भूमिका; सरकारिया आयोग (1988) द्वारा बाहरी, प्रतिष्ठित और निष्पक्ष व्यक्ति की सिफारिश। (4) आलोचना: ‘केंद्र के एजेंट’ की धारणा, विधेयकों पर विलंब, पुंछी आयोग (2010) की सिफारिशें। (5) न्यायिक दृष्टि: एस.आर. बोम्मई (1994) में अनुच्छेद 356 की न्यायिक समीक्षा और बहुमत परीक्षण; रामेश्वर प्रसाद (2006) में विघटन असंवैधानिक; पंजाब मामला (2023) में अनिश्चितकालीन विलंब अस्वीकार; तमिलनाडु मामला (2025) में समय-सीमा पर विचार। (6) संतुलित निष्कर्ष: विवेकाधीन शक्ति का सीमित और परीक्षणीय प्रयोग; संघवाद की रक्षा हेतु सहयोगी संवाद, सहकारी संघवाद और अंतर-राज्यीय परिषद की भूमिका; व्यक्तिगत विवेक बनाम संस्थागत मर्यादा का संतुलन।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
Uttarakhand PCS (UKPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: उत्तराखंड के राज्यपाल द्वारा हाल ही में प्रधानमंत्री से मुलाकात के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा विषय प्रमुखता से उठाया गया था?
- A. राज्य में चल रहे ‘चार धाम यात्रा’ के दौरान तीर्थयात्रियों की सुरक्षा व्यवस्था
- B. उत्तराखंड में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु राज्य सरकार के प्रयास
- C. राज्य में वनाग्नि की रोकथाम और आपदा प्रबंधन के लिए केंद्र सरकार से अतिरिक्त सहायता
- D. उत्तराखंड पर्यटन को बढ़ावा देने हेतु ‘एक जिला एक उत्पाद’ योजना का विस्तार
उत्तर: C. राज्य में वनाग्नि की रोकथाम और आपदा प्रबंधन के लिए केंद्र सरकार से अतिरिक्त सहायता — राज्यपाल द्वारा प्रधानमंत्री से वनाग्नि और आपदा प्रबंधन हेतु अतिरिक्त सहायता की मांग की गई थी, जो राज्य के लिए एक प्रमुख चिंता का विषय है।
Mains: उत्तराखंड राज्यपाल द्वारा प्रधानमंत्री से वनाग्नि और आपदा प्रबंधन के मुद्दों पर चर्चा की गई। राज्य में वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं के कारण पर्यावरणीय क्षति और जनजीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण करते हुए, राज्यपाल द्वारा उठाए गए प्रमुख मुद्दों और केंद्र सरकार से अपेक्षित सहायता के स्वरूप का वर्णन कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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