02 Dec ऊर्जा सुरक्षा के लिये कोयला संक्रमण का मार्गदर्शन
ऊर्जा सुरक्षा के लिये कोयला संक्रमण का मार्गदर्शन
सामान्य अध्ययन-III : भारतीय अर्थव्यवस्था समावेशी विकास औद्योगिक नीति
प्रिलिम्स के लिये: भारतीय गुणवत्ता परिषद, खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957, अवसादी चट्टान, GST, कोयला गैसीकरण, कोकिंग कोल, फ्लू गैस डिसल्फराइज़ेशन (FGD), बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली।
मेन्स के लिये: कोयला क्षेत्र के बारे में मुख्य तथ्य और भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका महत्त्व, भारत के कोयला क्षेत्र के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ और कमियाँ तथा आगे की राह।
चर्चा में क्यों?
खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 की धारा 4 की उप-धारा (1) के दूसरे प्रावधान के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, सरकार ने भारतीय गुणवत्ता परिषद (QCI) द्वारा विधिवत मान्यता प्राप्त निजी संस्थाओं को मान्यता प्राप्त पूर्वेक्षण एजेंसियों (APA) के रूप में कार्य करने की अनुमति दे दी है। इससे कोयले की उपलब्धता बढ़ेगी, ऊर्जा सुरक्षा मज़बूत होगी तथा अधिक पारदर्शी और कुशल खनिज अन्वेषण ढाँचे के माध्यम से भारत के आर्थिक विकास को समर्थन मिलेगा।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा में कोयले की क्या भूमिका है?
ऊर्जा सुरक्षा का आधार: कोयला ऊर्जा सुरक्षा के लिये आवश्यक बना हुआ है, यह भारत के ऊर्जा मिश्रण में 55% का योगदान देता है तथा 74% से अधिक विद्युत उत्पादन को ईंधन प्रदान करता है।
आंतरायिक नवीकरणीय ऊर्जा के विपरीत, कोयला आधारित विद्युत संयंत्र स्थिर और विश्वसनीय विद्युत प्रदान करते हैं, जो ग्रिड स्थिरता और भारत की निरंतर विद्युत मांग को पूरा करने के लिये आवश्यक है।
अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण चालक: कोयला क्षेत्र रॉयल्टी, GST और लेवी के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकारों के लिये सालाना 70,000 करोड़ रुपये से अधिक उत्पन्न करता है। भारतीय रेलवे के लिये कोयला परिवहन की जाने वाली सबसे बड़ी वस्तु है (जो माल ढुलाई से होने वाली कुल आय का 49% है)। इस राजस्व से यात्री किराये में भी सहायता मिलती है, जो कोयले को पूरे परिवहन पारिस्थितिकी तंत्र के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण बना देता है।
कोर उद्योगों के लिये मुख्य इनपुट: कोकिंग कोयला इस्पात उत्पादन के लिये आवश्यक है, जो इस्पात लागत का लगभग 42% है, जबकि कोयला सीमेंट भट्टों को भी ईंधन प्रदान करता है, जो इसे निर्माण और बुनियादी ढाँचे के लिये महत्त्वपूर्ण बनाता है।
रोज़गार का प्रमुख स्रोत: कोल इंडिया लिमिटेड (Coal India Limited) प्रत्यक्ष रूप से 2.39 लाख से अधिक लोगों को रोज़गार प्रदान करता है और लाखों लोग अप्रत्यक्ष रूप से ठेकेदारी, परिवहन, उपकरण निर्माण और संबंधित सेवाओं में कार्यरत हैं।
स्थायित्व की नींव: सरकार 8,500 करोड़ रुपये के प्रोत्साहन के माध्यम से कोयला गैसीकरण को बढ़ावा दे रही है, जिससे कोयले को स्वच्छ ईंधन के लिये सिंथेटिक गैस और मेथनॉल में परिवर्तित किया जा रहा है, जिससे इसके कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी।
कोयले से प्राप्त राजस्व नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार में सहायक है, NTPC ने वर्ष 2032 तक 60 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता की योजना बनाई है, जो उसके कुल उत्पादन का लगभग 45% है।
भारत में कोयला क्षेत्र के संबंध में मुख्य तथ्य क्या हैं?
कोयला: कोयला एक ज्वलनशील काला या भूरा-काला अवसादी चट्टान है जो अधिकांशतः कार्बन से बना होता है तथा इसे जीवाश्म ईंधन माना जाता है क्योंकि इसका निर्माण प्राचीन पौधों के अवशेषों के द्वारा होता है। लाखों सालों तक, ज़मीन के अंदर तलछट की परतों के भारी दबाव और गर्मी के कारण, मूल जैविक पदार्थ (पीट) से पानी और गैसें बाहर निकल गईं। इससे उसमें कार्बन की मात्रा बढ़ती गई, और वह धीरे-धीरे कोयले के अलग-अलग प्रकारों में बदल गया।
कोयले के ग्रेड: कोयले को इसकी कार्बन सामग्री, तापमान और ऊर्जा उत्पादन के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है, जिनमें मुख्य प्रकार हैं:
एन्थ्रेसाइट: इसमें 86%-97% कार्बन होता है और सभी प्रकार के कोयले में इसका तापन मान सबसे अधिक होता है। यह मुख्यतः जम्मू और कश्मीर में पाया जाता है।
बिटुमिनस: इसमें 45%-86% कार्बन होता है। यह मुख्यतः झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में पाया जाता है।
सब बिटुमिनस: इसमें आमतौर पर 35%-45% कार्बन होता है और इसका तापन मूल्य बिटुमिनस कोयले की तुलना में कम होता है।
लिग्नाइट (भूरा कोयला): इसमें 25%-35% कार्बन होता है। इसमें उच्च आर्द्रता (30-55%), उच्च वाष्पशील पदार्थ और कम राख होती है, जिससे यह उच्च श्रेणी के कोयले की तुलना में तापनमान और स्थिरता में कमज़ोर होता है।
यह हल्का, छिद्रयुक्त और भुरभुरा होता है तथा स्वतः दहन के जोखिम के कारण इसे लंबी दूरी तक नहीं ले जाया जा सकता।
तमिलनाडु, पुदुचेरी, गुजरात, राजस्थान और जम्मू और कश्मीर में पाया जाता है।
भारत में कोयला भंडार: भारत में 5वाँ सबसे बड़ा कोयला भंडार है और यह विश्व स्तर पर दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है।
शीर्ष तीन राज्य – ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ – देश के कुल कोयला भंडार का लगभग 69% हिस्सा रखते हैं।
भारत का कोयला उत्पादन: वित्त वर्ष 2024-25 में कोयला उत्पादन 1,047 मिलियन टन (MT) तक पहुँच गया, जो पिछले वर्ष के 997 मीट्रिक टन से 4.99% की वृद्धि दर्शाता है।
कोयला आयात: अप्रैल-दिसंबर 2024 में कोयला आयात 8.4% घटकर 183 मीट्रिक टन रह गया, जिससे विदेशी मुद्रा में 5.43 बिलियन अमेरिकी डॉलर की बचत हुई।
भारत के कोयला क्षेत्र के सामने मुख्य चुनौतियाँ क्या हैं?
पर्यावरणीय क्षति: कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र (TPP) औद्योगिक क्षेत्र की तुलना में असमान रूप से अधिक उत्सर्जन करते हैं, जो PM का 60%, SO₂ का 45%, NO₂ का 30% तथा पारा (Hg) का 80% योगदान करते हैं।
ग्रीनपीस के अनुसार, भारत में सभी विद्युत संयंत्र 251 मिलियन लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये पर्याप्त जल का उपयोग करते हैं।
गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य परिणाम: द लैंसेट काउंटडाउन 2025 के अनुसार, वर्ष 2022 में भारत में जीवाश्म ईंधन वायु प्रदूषण के कारण 1.72 मिलियन मौतें हुईं और अस्थमा, श्वसन और हृदय संबंधी बीमारियों के लाखों मामले सामने आए।
उच्च श्रेणी के कोयले के लिये आयात पर निर्भरता: भारत उच्च श्रेणी के कोकिंग और थर्मल कोयले हेतु आयात पर निर्भर करता है, 85% कोकिंग कोयला आयात किया जाता है, जिससे अर्थव्यवस्था मूल्य अस्थिरता और विदेशी मुद्रा बहिर्वाह के संपर्क में आती है।
फँसी हुई परिसंपत्तियों का जोखिम: सौर और पवन ऊर्जा की लागत में गिरावट के साथ, नए कोयला संयंत्रों का निर्माण करना अलाभकारी होता जा रहा है तथा मौजूदा संयंत्र फँसी हुई परिसंपत्तियों के रूप में परिवर्तित हो जाएंगे।
ग्रीनपीस के अनुसार, भारत की लगभग दो-तिहाई कोयला बिजली अब नवीकरणीय ऊर्जा से अधिक महँगी है, जिससे देश को प्रतिवर्ष अरबों का नुकसान हो रहा है।
दीर्घकालिक परिवर्तन चुनौती: कोयले को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना, इस क्षेत्र पर निर्भर लाखों श्रमिकों और समुदायों के लिये न्यायोचित परिवर्तन सुनिश्चित करने हेतु एक महत्त्वपूर्ण चुनौती है, जिसके लिये पुनः कौशलीकरण और वैकल्पिक रोज़गार की आवश्यकता है।
भारत कोयले से नवीकरणीय ऊर्जा प्रधान भविष्य की ओर न्यायोचित परिवर्तन किस प्रकार कर सकता है?
कोयले पर निर्भरता में चरणबद्ध कमी: कोयला विद्युत को धीरे-धीरे समाप्त करना, अकुशल, उच्च प्रदूषणकारी संयंत्रों को बंद करना तथा संक्रमण के दौरान उत्सर्जन को कम करने के लिये चयनात्मक उत्प्रेरक न्यूनीकरण (SCR) और इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रीसिपिटेटर ESP) जैसी स्वच्छ प्रौद्योगिकियों को अपनाना।
उन्नत प्रदूषण नियंत्रण प्रौद्योगिकियाँ: सभी ताप विद्युत संयंत्रों में फ्लू गैस डीसल्फराइजेशन (FGD) सिस्टम और अन्य उत्सर्जन-नियंत्रण तकनीकों को अनिवार्य रूप से स्थापित कर उनकी नियमित निगरानी सुनिश्चित करना। ये प्रणालियाँ फ्लू गैस से SO₂ को हटाकर वायु गुणवत्ता में सुधार लाती हैं और श्वसन संबंधी रोग उत्पन्न करने वाले प्रमुख प्रदूषकों को कम करती हैं।
नवीकरणीय-केंद्रित प्रणाली में तेज़ी लाना: भारत के प्राकृतिक लाभों का लाभ उठाते हुए, सौर और पवन ऊर्जा का तेज़ी से विस्तार करना। भारत का लक्ष्य वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म क्षमता हासिल करना तथा वर्ष 2025 के मध्य तक सौर, पवन, जलविद्युत और परमाणु ऊर्जा में 190 गीगावाट को पार कर चुका है।
मज़बूत ऊर्जा भंडारण का निर्माण करना: नवीकरणीय ऊर्जा संचारित करने के लिये हरित ऊर्जा गलियारे में निवेश कर और ग्रिड स्थिरता के लिये बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) और पंप हाइड्रो का समर्थन करना।
BESS के विकास के लिये सरकार की व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF) योजना के तहत वर्ष 2030-31 तक 4,000 मेगावाट घंटा BESS की योजना बनाई गई है, जिसके लिये पूंजीगत लागत का 40% तक वित्तपोषण किया जाएगा।
ग्रिड स्थिरता के लिये कोयले का लाभ उठाना: कोयला आधारित विद्युत संयंत्रों को रणनीतिक रूप से पुनः स्थापित करना ताकि वे फ्लेक्सिबल पीकिंग विद्युत स्रोतों के रूप में कार्य कर सकें, जिन्हें नवीकरणीय उत्पादन कम होने पर (जैसे, रात में या मानसून के दौरान) तेजी से बढ़ाया जा सके, जिससे ग्रिड स्थिरता और विश्वसनीय 24/7 विद्युत् आपूर्ति सुनिश्चित हो सके।
निष्कर्ष :
भारत का कोयला क्षेत्र ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिये आज भी महत्त्वपूर्ण बना हुआ है, लेकिन यह अस्थिर पर्यावरणीय तथा आर्थिक लागतों का सामना कर रहा है। भविष्य इस द्वैध-रणनीति पर निर्भर करता है, कोयले का ज़िम्मेदार प्रबंधन करना ताकि यह संक्रमणकालीन एवं लचीले ऊर्जा स्रोत के रूप में उपयोग हो सके, साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा व ऊर्जा भंडारण को तेज़ी से बढ़ाना ताकि एक सतत् और आत्मनिर्भर ऊर्जा भविष्य सुनिश्चित किया जा सके।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q . निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2019)
1.भारत सरकार द्वारा कोयला क्षेत्र का राष्ट्रीयकरण इंदिरा गांधी के कार्यकाल में किया गया था।
2.वर्तमान में, कोयला खंडों का आवंटन लॉटरी के आधार पर किया जाता है।
3.भारत हाल के समय तक घरेलू आपूर्ति की कमी को पूरा करने के लिये कोयले का आयात करता था, किंतु अब भारत कोयला उत्पादन में आत्मनिर्भर है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a)
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q. “कोयला भारत की ऊर्जा सुरक्षा का आधार है, लेकिन इसकी लंबे समय तक चलने वाली सस्टेनेबिलिटी पर प्रश्न है।” भारत के विकास और पर्यावरणीय लक्ष्यों के संदर्भ में इसका आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये।
- भारत में सार्वभौमिक दिव्यांगता समावेशन का पुनर्गठन मॉडल - February 10, 2026
- भारत-मलेशिया संबंध : व्यापक रणनीतिक साझेदारी के नए आयाम - February 10, 2026
- दसवीं अनुसूची : दल-बदल विरोधी कानून - February 9, 2026

No Comments