14 Oct एमएसडीसी की 21वीं बैठक: समुद्री विकास में सहकारी संघवाद का नया अध्याय
✎ भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025 के अंतर्गत वैधानिक सलाहकार निकाय बनी MSDC (गठन 1997) की 21वीं बैठक (13 अक्टूबर 2026, मुंबई) में सहकारी संघवाद के माध्यम से गैर-प्रमुख पत्तनों के मास्टर प्लान, पत्तन-संबद्ध औद्योगिक क्लस्टर, मार्च 2027…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — शासन: संघ-राज्य संबंध, सहकारी संघवाद, वैधानिक निकाय तथा केंद्र-राज्य समन्वय | GS Paper III — अर्थव्यवस्था: अवसंरचना (पत्तन, जलमार्ग, मल्टीमॉडल संयोजकता), विनिर्माण (जहाज़ निर्माण), औद्योगिक गलियारे और क्लस्टर | GS Paper III — पर्यावरण: हरित नौवहन (Green Shipping) और सतत समुद्री विकास
- Prelims: समुद्री राज्य विकास परिषद (Maritime State Development Council – MSDC), गठन 1997, भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025 (Indian Ports Act, 2025), प्रमुख पत्तन प्राधिकरण अधिनियम, 2021 (Major Port Authorities Act, 2021), सातवीं अनुसूची: संघ सूची की प्रविष्टि 27 और समवर्ती सूची की प्रविष्टि 31, समुद्री भारत परिकल्पना 2030 (Maritime India Vision 2030), समुद्री अमृत काल परिकल्पना 2047 (Maritime Amrit Kaal Vision 2047), वन नेशन वन पोर्ट प्रोसेस (ONOP), सागरमाला कार्यक्रम, पोर्ट मास्टर प्लान और राष्ट्रीय पत्तन परिप्रेक्ष्य योजना (National Perspective Plan), पत्तन-संबद्ध औद्योगिक क्लस्टर और ‘प्लग-एंड-प्ले’ अवसंरचना
- Essay: सहकारी संघवाद: साझा विकास के लिए केंद्र और राज्यों की साझेदारी, समुद्री शक्ति और आर्थिक संवृद्धि: भारत के पत्तन-आधारित विकास की संभावनाएँ
त्वरित पुनरावृत्ति: भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025 के अंतर्गत वैधानिक सलाहकार निकाय बनी MSDC (गठन 1997) की 21वीं बैठक (13 अक्टूबर 2026, मुंबई) में सहकारी संघवाद के माध्यम से गैर-प्रमुख पत्तनों के मास्टर प्लान, पत्तन-संबद्ध औद्योगिक क्लस्टर, मार्च 2027 तक ONOP, पत्तन शुल्क का अनिवार्य इलेक्ट्रॉनिक प्रकाशन और जहाज़ निर्माण के लिए क्रेडिट रिस्क इंश्योरेंस (SBPCP, BCSPS) पर निर्णय हुए।
यह खबर चर्चा में क्यों?
13 अक्टूबर 2026 को मुंबई में केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री श्री सर्बानंद सोनोवाल की अध्यक्षता में समुद्री राज्य विकास परिषद (MSDC) की 21वीं बैठक संपन्न हुई। समाचार के अनुसार, 15 मई 2026 को अधिसूचित भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025 के अंतर्गत MSDC को वैधानिक सलाहकार निकाय की मान्यता मिलने के बाद यह उसकी पहली बैठक थी। बैठक में समुद्री भारत परिकल्पना 2030 और समुद्री अमृत काल परिकल्पना 2047 के लक्ष्यों को अपनाया गया। राज्यों से प्रमुख पत्तनों के अतिरिक्त अन्य पत्तनों के लिए पोर्ट मास्टर प्लान बनाने को कहा गया। जहाज़ निर्माण के लिए क्रेडिट रिस्क इंश्योरेंस उत्पाद शुरू किए गए। मार्च 2027 तक सभी पत्तनों पर ONOP सुधार लागू करने और पत्तन शुल्क का इलेक्ट्रॉनिक प्रकाशन अनिवार्य करने का निर्णय भी लिया गया।
पृष्ठभूमि
- पत्तन संवैधानिक रूप से विभाजित विषय हैं। सातवीं अनुसूची की संघ सूची की प्रविष्टि 27 में प्रमुख पत्तन आते हैं, जबकि समवर्ती सूची की प्रविष्टि 31 में प्रमुख पत्तनों से भिन्न पत्तन आते हैं। इसलिए नीति-समन्वय के लिए केंद्र-राज्य मंच आवश्यक है।
- भारत की तटरेखा लगभग 11,000 किमी लंबी है। देश के 12 प्रमुख पत्तन केंद्र सरकार के अधीन हैं, जबकि 200 से अधिक गैर-प्रमुख पत्तन तटीय राज्यों के समुद्री बोर्डों या राज्य प्राधिकरणों के अधीन हैं।
- MSDC का गठन 1997 में केंद्रीय नौवहन मंत्री की अध्यक्षता वाले शीर्ष सलाहकार निकाय के रूप में हुआ था। इसका उद्देश्य तटीय राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्र सरकार के बीच समुद्री विकास पर समन्वय बनाना था। अब तक यह प्रशासनिक व्यवस्था के रूप में कार्य करता रहा।
- पुराने भारतीय पत्तन अधिनियम, 1908 के स्थान पर भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025 संसद द्वारा पारित किया गया। इसका उद्देश्य पत्तन प्रशासन का आधुनिकीकरण, राज्य समुद्री बोर्डों को वैधानिक आधार देना, पत्तन-विषयक समन्वय को सुदृढ़ करना और अंतरराष्ट्रीय समुद्री दायित्वों के अनुपालन को सुनिश्चित करना है। इसी अधिनियम के अंतर्गत MSDC को वैधानिक दर्जा मिला है।
- प्रमुख पत्तनों के लिए शासन-व्यवस्था पहले ही प्रमुख पत्तन प्राधिकरण अधिनियम, 2021 द्वारा बदली जा चुकी है। इसने 1963 के प्रमुख पत्तन न्यास अधिनियम का स्थान लिया और पत्तन प्राधिकरण बोर्डों को अधिक स्वायत्तता दी।
- समुद्री भारत परिकल्पना 2030 (2020 में प्रस्तुत) और समुद्री अमृत काल परिकल्पना 2047 (2023 में प्रस्तुत) दीर्घकालिक राष्ट्रीय रूपरेखाएँ हैं। सागरमाला कार्यक्रम पत्तन-आधारित विकास की पूर्ववर्ती पहल है। इन सबके क्रियान्वयन के लिए राज्यों की सहभागिता अनिवार्य है।
समुद्री राज्य विकास परिषद (MSDC) क्या है?
- MSDC तटीय राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्र सरकार के बीच समुद्री विकास पर नीतिगत समन्वय का राष्ट्रीय मंच है। इसकी अध्यक्षता पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री करते हैं।
- भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025 के अंतर्गत इसे वैधानिक सलाहकार निकाय का दर्जा मिला है। इसका कार्य एकीकृत समुद्री विकास, समन्वित नीति-निर्माण और समुद्री अवसंरचना के नियोजित विकास को बढ़ावा देना है। परिषद की भूमिका सलाहकारी है, अतः उसके निर्णय राज्यों पर बाध्यकारी आदेश नहीं हैं।
- बैठक में तटीय राज्यों के मंत्री, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासक, राज्य समुद्री बोर्डों के अधिकारी, प्रमुख पत्तनों के अध्यक्ष और नौसेना, तटरक्षक बल, नीति आयोग तथा DPIIT जैसी संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल हुए। इससे यह बहु-हितधारक संस्थागत मंच सिद्ध होता है।
- पत्तन नियोजन: राज्यों और राज्य समुद्री बोर्डों से कहा गया कि वे प्रमुख पत्तनों के अतिरिक्त अन्य पत्तनों के लिए भी पोर्ट मास्टर प्लान तैयार करें। इसके लिए पत्तन मंत्रालय ने वही मानक प्रारूप उपलब्ध कराया जिसका उपयोग प्रमुख पत्तन करते हैं। साथ ही परिषद ने राष्ट्रीय पत्तन परिप्रेक्ष्य योजना की प्राथमिकताओं का समर्थन किया और सड़क, रेल, अंतर्देशीय जलमार्ग, पाइपलाइन तथा कन्वेयर से मल्टीमॉडल संयोजकता परियोजनाओं में तेज़ी लाने का आग्रह किया।
- पत्तन-आधारित औद्योगीकरण: राज्य केंद्र के साथ मिलकर पत्तन-संबद्ध औद्योगिक क्लस्टर विकसित करेंगे। इनमें भूमि की उपलब्धता, ‘प्लग-एंड-प्ले’ अवसंरचना और शीघ्र मंज़ूरी की व्यवस्था होगी। इन्हें पत्तन क्षमता-वृद्धि और संयोजकता परियोजनाओं से जोड़ा जाएगा।
- ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस: मार्च 2027 तक सभी पत्तनों पर वन नेशन वन पोर्ट प्रोसेस (ONOP) सुधार लागू होंगे, जिनका उद्देश्य पत्तन प्रक्रियाओं में एकरूपता लाना है। पारदर्शिता के लिए पत्तन शुल्क का इलेक्ट्रॉनिक प्रकाशन अनिवार्य किया गया है।
- जहाज़ निर्माण को प्रोत्साहन: ‘शिपबिल्डिंग प्रोजेक्ट क्रेडिट रिस्क इंश्योरेंस पॉलिसी’ (SBPCP) और ‘बिज़नेस क्रेडिट शील्ड पॉलिसी-शिपबिल्डर्स’ (BCSPS) शुरू की गईं। ये क्रेडिट रिस्क इंश्योरेंस उत्पाद हैं, जो जहाज़ निर्माताओं के वित्तीय जोखिम को घटाकर इस उद्योग में ऋण-प्रवाह को सुगम बनाने का प्रयास करते हैं।
- परिषद ने 500 से अधिक पहलों वाले दोनों दीर्घकालिक लक्ष्यों (2030 और 2047) को अपनाया। ये पहलें पत्तन, नौवहन, अंतर्देशीय जलमार्ग, जहाज़ निर्माण, हरित नौवहन और वैश्विक सहयोग से जुड़ी हैं। केंद्रीय मंत्री ने इसे समुद्री सुशासन में सहकारी संघवाद का उत्कृष्ट उदाहरण बताया।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्त्व |
|---|---|
| समुद्री राज्य विकास परिषद (Maritime State Development Council – MSDC) को वैधानिक दर्जा | 1997 में गठित परिषद को भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025 (15 मई 2026 को अधिसूचित) के अंतर्गत वैधानिक सलाहकार निकाय की मान्यता मिली। इससे केंद्र-राज्य समन्वय एक प्रशासनिक व्यवस्था से बढ़कर कानूनी ढाँचे का हिस्सा बन गया। यह दर्जा मिलने के बाद यह परिषद की पहली बैठक थी। |
| समुद्री भारत परिकल्पना 2030 और समुद्री अमृत काल परिकल्पना 2047 को अपनाना | बंदरगाह, नौवहन, अंतर्देशीय जलमार्ग, जहाज निर्माण, हरित नौवहन और वैश्विक सहयोग से जुड़ी 500 से अधिक पहलों पर राज्यों की सहमति बनी। इससे राष्ट्रीय लक्ष्यों और राज्यों की योजनाओं में तालमेल आएगा। |
| गैर-प्रमुख बंदरगाहों के लिए बंदरगाह मास्टर प्लान (Port Master Plan) | राज्यों और राज्य समुद्री बोर्डों को प्रमुख बंदरगाहों वाला मानक प्रारूप दिया गया है। इससे गैर-प्रमुख बंदरगाहों की योजना राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना के अनुरूप बनेगी और भूमि, क्षमता तथा संपर्क का नियोजन व्यवस्थित होगा। |
| जहाज निर्माण के लिए ऋण जोखिम बीमा उत्पादों का शुभारंभ | ‘शिपबिल्डिंग प्रोजेक्ट क्रेडिट रिस्क इंश्योरेंस पॉलिसी’ और ‘बिजनेस क्रेडिट शील्ड पॉलिसी-शिपबिल्डर्स’ से जहाज निर्माताओं के लिए ऋण की उपलब्धता आसान होगी और बैंकों व वित्तदाताओं का जोखिम घटेगा। जहाज निर्माण पूँजी-प्रधान और लंबी अवधि का उद्योग है, इसलिए यह कदम इसकी बड़ी बाधा को दूर करता है। |
| ‘वन नेशन वन पोर्ट प्रोसेस’ (ONOP) और शुल्क की पारदर्शिता | मार्च 2027 तक सभी बंदरगाहों पर प्रक्रियाओं का मानकीकरण होगा। बंदरगाह शुल्क को इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रकाशित करना अनिवार्य किया गया है। इससे लेन-देन लागत और विलंब घटेंगे तथा कारोबार सुगमता बढ़ेगी। |
| बंदरगाह से जुड़े औद्योगिक क्लस्टर | राज्य और केंद्र मिलकर भूमि, ‘प्लग-एंड-प्ले’ अवसंरचना और तेज़ मंज़ूरी वाले क्लस्टर विकसित करेंगे। इन्हें बंदरगाह क्षमता और बहु-मॉडल संपर्क परियोजनाओं से जोड़ा जाएगा। इससे बंदरगाह-आधारित औद्योगीकरण को गति मिलेगी। |
महत्व
आर्थिक आयाम
- भारत का अधिकांश विदेशी व्यापार मात्रा के हिसाब से समुद्र के रास्ते होता है। बंदरगाहों की दक्षता बढ़ने से रसद लागत घटती है और निर्यात की प्रतिस्पर्धा सुधरती है।
- बंदरगाह से जुड़े औद्योगिक क्लस्टर विनिर्माण, भंडारण और मूल्य-वर्धन को तटीय क्षेत्रों में केंद्रित करते हैं, जिससे रोज़गार सृजन और क्षेत्रीय विकास को बल मिलता है।
- ऋण जोखिम बीमा से जहाज निर्माण में निजी निवेश और बैंक ऋण आकर्षित होंगे। इससे आयातित जहाजों पर निर्भरता और विदेशी मुद्रा का बहिर्गमन घटाने में मदद मिल सकती है।
संघीय और शासन आयाम
- परिषद सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का संस्थागत मंच है, जहाँ केंद्र, तटीय राज्य, केंद्र शासित प्रदेश और राज्य समुद्री बोर्ड एक साथ नीति बनाते हैं।
- प्रमुख बंदरगाह संघ के अधीन हैं, जबकि गैर-प्रमुख बंदरगाहों पर राज्यों का प्रभावी नियंत्रण है। साझा मास्टर प्लान और ONOP से इस द्वैध व्यवस्था की विसंगतियाँ कम होती हैं।
- शुल्क का इलेक्ट्रॉनिक प्रकाशन और प्रक्रियाओं का मानकीकरण पारदर्शिता तथा उत्तरदायित्व बढ़ाता है और विवेकाधीन हस्तक्षेप की गुंजाइश घटाता है।
सामरिक आयाम
- मज़बूत बंदरगाह, जहाज निर्माण क्षमता और व्यापारिक बेड़ा समुद्री आपूर्ति शृंखला की सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता के लिए आवश्यक हैं।
- बैठक में भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल की उपस्थिति बंदरगाह विकास में तटीय सुरक्षा के समावेशन को दर्शाती है।
- समुद्री अमृत काल परिकल्पना 2047 भारत को वैश्विक समुद्री शक्ति के रूप में स्थापित करने की दीर्घकालिक दृष्टि प्रस्तुत करती है।
पर्यावरणीय आयाम
- परिकल्पना में हरित नौवहन शामिल है, जिससे बंदरगाह संचालन और नौवहन में उत्सर्जन घटाने की दिशा में नियोजित कदम उठाए जा सकेंगे।
- सड़क, रेल, अंतर्देशीय जलमार्ग, पाइपलाइन और कन्वेयर के ज़रिए बहु-मॉडल संपर्क से माल ढुलाई का बड़ा हिस्सा कम उत्सर्जन वाले साधनों पर जा सकता है।
चुनौतियाँ
1. केंद्र-राज्य समन्वय की सीमाएँ
- परिषद की भूमिका सलाहकार है। इसलिए राज्यों पर इसकी सिफारिशों का पालन करवाना कठिन हो सकता है।
- बंदरगाह समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए राज्यों की प्राथमिकताएँ और राजस्व हित राष्ट्रीय योजना से भिन्न हो सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-2: संघीय ढाँचा, केंद्र-राज्य संबंध, अंतर-राज्यीय परिषद जैसे मंच
2. गैर-प्रमुख बंदरगाहों की क्षमता और योजना
- राज्य समुद्री बोर्डों के पास तकनीकी विशेषज्ञता, वित्त और मानव संसाधन की कमी हो सकती है।
- मानक प्रारूप के बावजूद योजनाओं की गुणवत्ता और समयबद्धता राज्यों में असमान रहने की आशंका है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: अवसंरचना, योजना और संस्थागत क्षमता
3. भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण-सामाजिक प्रभाव
- औद्योगिक क्लस्टर के लिए भूमि की उपलब्धता कठिन है, क्योंकि तटीय क्षेत्र घनी आबादी वाले हैं और मछुआरा समुदायों की आजीविका इन पर निर्भर है।
- तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) नियमों, मैंग्रोव और तटीय पारिस्थितिकी का संरक्षण विकास के साथ संतुलित करना होगा। ‘तेज़ मंज़ूरी’ से पर्यावरणीय जाँच कमज़ोर नहीं होनी चाहिए।
यूपीएससी लिंक: GS-3: पर्यावरण प्रभाव आकलन, तटीय पारिस्थितिकी; GS-2: विस्थापन और पुनर्वास
4. जहाज निर्माण उद्योग की संरचनात्मक कमज़ोरियाँ
- पूँजी की ऊँची लागत, इस्पात और उपकरणों के लिए आयात पर निर्भरता तथा सहायक उद्योगों का सीमित आधार चुनौती हैं।
- केवल बीमा से प्रतिस्पर्धा नहीं बनेगी। कुशल श्रमबल, प्रौद्योगिकी और वैश्विक ऑर्डर बुक भी आवश्यक हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-3: विनिर्माण क्षेत्र, औद्योगिक नीति
5. ONOP और डिजिटल पारदर्शिता का क्रियान्वयन
- अलग-अलग बंदरगाहों की पुरानी प्रणालियों और निजी टर्मिनल संचालकों के बीच प्रक्रियाओं का एकीकरण तकनीकी रूप से जटिल है।
- मार्च 2027 की समय-सीमा तभी पूरी होगी जब सीमा-शुल्क, बंदरगाह स्वास्थ्य और अन्य नियामक एजेंसियाँ भी साथ जुड़ें।
यूपीएससी लिंक: GS-2/3: ई-गवर्नेंस, कारोबार सुगमता, रसद दक्षता
6. अंतिम छोर का संपर्क और बहु-मॉडल एकीकरण
- बंदरगाहों तक रेल और सड़क संपर्क में अवरोध तथा अंतर्देशीय जलमार्गों की सीमित नौवहन गहराई माल ढुलाई को बाधित करते हैं।
- कई मंत्रालयों और एजेंसियों की परियोजनाओं के बीच तालमेल की कमी से विलंब और लागत वृद्धि होती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: परिवहन अवसंरचना, रसद
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| परिषद की सलाहकार प्रकृति | सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं, इसलिए क्रियान्वयन राज्यों की इच्छा और क्षमता पर निर्भर रहता है। |
| राजस्व और शुल्क में एकरूपता | शुल्क का प्रकाशन पारदर्शिता लाता है, परन्तु बंदरगाहों के बीच शुल्क-प्रतिस्पर्धा और राज्यों के राजस्व हितों में टकराव संभव है। |
| तटीय पारिस्थितिकी | तेज़ मंज़ूरी वाले क्लस्टर CRZ मानदंडों और स्थानीय समुदायों की आजीविका पर दबाव डाल सकते हैं। |
| वित्तीय व्यवहार्यता | ऋण जोखिम बीमा का प्रीमियम, बीमाकर्ताओं की जोखिम-वहन क्षमता और परियोजनाओं का जोखिम-मूल्यांकन महत्त्वपूर्ण हैं। |
| समय-सीमा का दबाव | मार्च 2027 तक सभी बंदरगाहों पर ONOP लागू करना डिजिटल एकीकरण और संस्थागत तैयारी की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण है। |
| अंतर-एजेंसी समन्वय | बंदरगाह, रेलवे, सड़क, जलमार्ग और सुरक्षा एजेंसियों के बीच तालमेल के बिना बहु-मॉडल संपर्क अधूरा रहेगा। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- सागरमाला कार्यक्रम (Sagarmala Programme): बंदरगाह-आधारित विकास, तटीय आर्थिक क्षेत्र और बंदरगाह संपर्क का राष्ट्रीय कार्यक्रम, जो बंदरगाह से जुड़े औद्योगिक क्लस्टर की अवधारणा से सीधे जुड़ा है।
- समुद्री भारत परिकल्पना 2030 (Maritime India Vision 2030): बंदरगाह, नौवहन, जलमार्ग, जहाज निर्माण और हरित नौवहन में दशकीय रूपरेखा, जिसे परिषद ने अपनाया।
- समुद्री अमृत काल परिकल्पना 2047 (Maritime Amrit Kaal Vision 2047): 2047 तक की दीर्घकालिक रणनीति।
- वन नेशन वन पोर्ट प्रोसेस (ONOP): सभी बंदरगाहों पर प्रक्रियाओं का मानकीकरण, जिसकी समय-सीमा मार्च 2027 है।
- राष्ट्रीय पत्तन परिप्रेक्ष्य योजना (National Perspective Plan): बंदरगाह क्षमता, संपर्क और औद्योगिक विकास की प्राथमिकताएँ तय करने वाली योजना।
आगे की राह
- बंदरगाह मास्टर प्लान की तैयारी में राज्य समुद्री बोर्डों को तकनीकी सहायता, प्रशिक्षण और वित्तीय सहयोग दिया जाए, तथा उनकी प्रगति की नियमित समीक्षा हो।
- ONOP के लिए एकीकृत डिजिटल मंच पर सीमा-शुल्क, बंदरगाह स्वास्थ्य, निजी टर्मिनल और अन्य नियामक एजेंसियों को जोड़ा जाए तथा चरणबद्ध लक्ष्य तय किए जाएँ।
- बंदरगाह शुल्क के प्रकाशन के साथ प्रदर्शन-सूचक (टर्नअराउंड समय, ठहराव समय) भी सार्वजनिक किए जाएँ, ताकि बंदरगाहों की दक्षता की तुलना संभव हो।
- औद्योगिक क्लस्टर की योजना में CRZ, पारिस्थितिकी और मछुआरा समुदायों की सहमति तथा पुनर्वास को शुरू से शामिल किया जाए। मंज़ूरी की गति बढ़ाने के लिए एकल खिड़की प्रणाली अपनाई जाए, पर पर्यावरणीय मानदंड बने रहें।
- जहाज निर्माण में बीमा के साथ कुशल श्रमबल, सहायक उद्योग, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और घरेलू आपूर्ति शृंखला पर समान ध्यान दिया जाए।
- बहु-मॉडल संपर्क परियोजनाओं के लिए रेलवे, सड़क और जलमार्ग मंत्रालयों के साथ साझा समयबद्ध कार्ययोजना बने और परियोजनाओं की निगरानी एकीकृत हो।
- परिषद के निर्णयों के अनुपालन की वार्षिक प्रगति-रिपोर्ट प्रकाशित की जाए, ताकि सलाहकार भूमिका के बावजूद उत्तरदायित्व बना रहे।
- हरित नौवहन के लिए बंदरगाहों में तट-आधारित विद्युत आपूर्ति, स्वच्छ ईंधन और उत्सर्जन निगरानी की व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) · समुद्री राज्य विकास परिषद (MSDC) – वैधानिक सलाहकार निकाय · भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025 · प्रमुख पत्तन और गैर-प्रमुख पत्तन · समवर्ती सूची की प्रविष्टि 31 · पत्तन मास्टर प्लान · राष्ट्रीय पत्तन परिप्रेक्ष्य योजना · वन नेशन वन पोर्ट प्रोसेस (ONOP) · पत्तन-आधारित औद्योगीकरण · समुद्री भारत परिकल्पना 2030 और समुद्री अमृत काल परिकल्पना 2047 · बहुविध संपर्कता (मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी) · जहाज़ निर्माण के लिए ऋण जोखिम बीमा
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- सातवीं अनुसूची, संघ सूची की प्रविष्टि 27: प्रमुख बंदरगाहों पर केंद्र का अधिकार
- सातवीं अनुसूची, समवर्ती सूची की प्रविष्टि 31: गैर-प्रमुख बंदरगाहों पर साझा अधिकार
- अनुच्छेद 246: संसद और राज्य विधानमंडलों की विधायी शक्तियों का वितरण
अवधारणा प्रवाह
भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025 ने समुद्री राज्य विकास परिषद को वैधानिक सलाहकार दर्जा दिया → केंद्र, तटीय राज्य और राज्य समुद्री बोर्ड एक मंच पर आए और 2030 तथा 2047 की परिकल्पनाएँ अपनाई गईं → गैर-प्रमुख बंदरगाहों के लिए मास्टर प्लान और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना के अनुरूप नियोजन शुरू हुआ → ONOP और शुल्क के इलेक्ट्रॉनिक प्रकाशन से प्रक्रियाएँ मानक बनीं और पारदर्शिता बढ़ी → बहु-मॉडल संपर्क और बंदरगाह-आधारित औद्योगिक क्लस्टर से रसद लागत घटने और निवेश बढ़ने की संभावना बनी → ऋण जोखिम बीमा से जहाज निर्माण में वित्त की उपलब्धता बढ़ी → परिणाम: समुद्री क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा, रोज़गार और आत्मनिर्भरता में वृद्धि की संभावना
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. समुद्री राज्य विकास परिषद (MSDC) और भारत के पत्तन क्षेत्र के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. MSDC का गठन मूल रूप से 1997 में हुआ था और अब इसे भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025 के अंतर्गत वैधानिक सलाहकार निकाय के रूप में मान्यता मिली है।
2. संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार प्रमुख पत्तन राज्य सूची के विषय हैं।
3. प्रमुख पत्तनों के अतिरिक्त अन्य पत्तन समवर्ती सूची में आते हैं, इसलिए उनके विकास में केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय आवश्यक है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: परिषद 1997 में गठित हुई थी और अब वैधानिक सलाहकार निकाय है। कथन 2 गलत है: प्रमुख पत्तन संघ सूची (प्रविष्टि 27) में हैं। कथन 3 सही है: प्रमुख पत्तनों के अतिरिक्त अन्य पत्तन समवर्ती सूची की प्रविष्टि 31 में हैं।
Q2. अभिकथन (A): परिषद ने राज्यों और राज्य समुद्री बोर्डों से कहा है कि वे प्रमुख पत्तनों के अतिरिक्त अन्य पत्तनों के लिए भी पत्तन मास्टर प्लान तैयार करें।
कारण (R): प्रमुख पत्तनों के अतिरिक्त अन्य पत्तन समवर्ती सूची के अंतर्गत आते हैं और उनका प्रशासन मुख्यतः राज्य समुद्री बोर्ड करते हैं, इसलिए राष्ट्रीय लक्ष्यों के अनुरूप योजना के लिए केंद्र-राज्य तालमेल आवश्यक है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है
- A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
- A सही है, किंतु R गलत है
- A गलत है, किंतु R सही है
उत्तर: A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है — मास्टर प्लान की माँग राज्यों से इसलिए की गई है कि गैर-प्रमुख पत्तनों के विकास में राज्यों की प्रमुख भूमिका है। यह भूमिका समवर्ती सूची की प्रविष्टि 31 से आती है, इसलिए R, A की सही व्याख्या करता है।
Q3. भारत में पत्तनों से संबंधित संवैधानिक स्थिति के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
- सभी पत्तन राज्य सूची के विषय हैं
- प्रमुख पत्तन संघ सूची में हैं और प्रमुख पत्तनों के अतिरिक्त अन्य पत्तन समवर्ती सूची में हैं
- सभी पत्तन केवल संघ सूची में हैं
- पत्तन केवल अनुच्छेद 263 के अंतर्गत अंतर-राज्य परिषद के अधीन हैं
उत्तर: प्रमुख पत्तन संघ सूची में हैं और प्रमुख पत्तनों के अतिरिक्त अन्य पत्तन समवर्ती सूची में हैं — संघ सूची की प्रविष्टि 27 प्रमुख पत्तनों से और समवर्ती सूची की प्रविष्टि 31 अन्य पत्तनों से संबंधित है। इसी कारण MSDC जैसे सहकारी मंच की आवश्यकता पड़ती है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ “पत्तन विकास में केंद्र और राज्यों की साझा भूमिका के कारण समुद्री राज्य विकास परिषद (MSDC) सहकारी संघवाद का एक व्यावहारिक मंच है।” भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025 के अंतर्गत MSDC को मिली वैधानिक मान्यता के संदर्भ में इस कथन का परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि पत्तन-आधारित औद्योगीकरण के लक्ष्यों को पाने में इसकी सीमाएँ क्या हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: भूमिका: MSDC का गठन 1997 में हुआ था और अब यह भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025 के अंतर्गत वैधानिक सलाहकार निकाय है। 21वीं बैठक इस मान्यता के बाद की पहली बैठक थी।
संवैधानिक आधार: संघ सूची की प्रविष्टि 27 (प्रमुख पत्तन) और समवर्ती सूची की प्रविष्टि 31 (अन्य पत्तन)। इसी साझा क्षेत्राधिकार से समन्वय की आवश्यकता बनती है। सहकारी संघवाद के अन्य मंचों से तुलना: अंतर-राज्य परिषद (अनुच्छेद 263), नीति आयोग की शासी परिषद।
बैठक के परिणाम (पक्ष में तर्क): (1) गैर-प्रमुख पत्तनों के लिए पत्तन मास्टर प्लान, जिसके लिए मंत्रालय ने मानक प्रारूप दिया; (2) राष्ट्रीय पत्तन परिप्रेक्ष्य योजना का समर्थन और सड़क, रेल, अंतर्देशीय जलमार्ग, पाइपलाइन व कन्वेयर के माध्यम से बहुविध संपर्कता; (3) राज्यों और मंत्रालय द्वारा ‘प्लग-एंड-प्ले’ अवसंरचना और तेज़ मंजूरी वाले पत्तन-आधारित औद्योगिक क्षेत्र; (4) मार्च 2027 तक ONOP सुधार और पत्तन शुल्क का इलेक्ट्रॉनिक प्रकाशन अनिवार्य करना, जिससे पारदर्शिता और व्यापार सुगमता बढ़ती है; (5) जहाज़ निर्माण के लिए ऋण जोखिम बीमा उत्पादों (SBPCP, BCSP-Shipbuilders) का शुभारंभ; (6) समुद्री भारत परिकल्पना 2030 और समुद्री अमृत काल परिकल्पना 2047 की 500 से अधिक पहलों को अपनाना।
सीमाएँ (आलोचनात्मक पक्ष): परिषद केवल सलाहकार निकाय है, इसलिए उसके निर्णय राज्यों पर बाध्यकारी नहीं हैं। भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय और तटीय विनियमन मंज़ूरियाँ तथा राज्यों की वित्तीय क्षमता में असमानता बाधक हैं। राज्य समुद्री बोर्डों की क्षमता भी भिन्न-भिन्न है। प्रमुख और गैर-प्रमुख पत्तनों के बीच प्रतिस्पर्धा तथा अंतिम छोर की संपर्कता की कमी भी चुनौती है।
आगे की राह: निगरानी के लिए मापनीय संकेतक और समयसीमा, राज्य बोर्डों का क्षमता निर्माण, डिजिटल एकीकरण, हरित पत्तन मानक, तथा सुझावों को राज्यों के नीतिगत निर्णयों में बदलने के लिए प्रोत्साहन-आधारित ढाँचा।
निष्कर्ष: MSDC सहकारी संघवाद का उपयोगी संस्थागत मंच है, पर उसकी सफलता परामर्श को कार्यान्वयन में बदलने पर निर्भर है।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
Maharashtra PCS (MPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: मुंबई में आयोजित समुद्री राज्य विकास परिषद (एमएसडीसी) की 21वीं बैठक के मुख्य उद्देश्यों में से एक निम्नलिखित में से क्या था?
- महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों में बंदरगाहों के विकास और पर्यावरणीय संरक्षण के लिए रणनीति तैयार करना
- राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए नई योजनाओं की घोषणा करना
- मुंबई महानगर क्षेत्र में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को सुधारने हेतु प्रस्ताव पारित करना
- राज्य सरकार द्वारा विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए नई नीति की रूपरेखा प्रस्तुत करना
उत्तर: महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों में बंदरगाहों के विकास और पर्यावरणीय संरक्षण के लिए रणनीति तैयार करना — एमएसडीसी बैठक का मुख्य फोकस महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों में बंदरगाह विकास और पर्यावरणीय संरक्षण पर केंद्रित होता है।
Mains: महाराष्ट्र के तटीय विकास में समुद्री राज्य विकास परिषद (एमएसडीसी) की भूमिका और महत्व पर प्रकाश डालते हुए, राज्य के आर्थिक विकास में इसके योगदान का विश्लेषण कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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