कर्नाटक के पांच गारंटी योजनाओं का देश में मॉडल: तांगाडगी

Karnataka’s guarantee schemes model for country: Tangadagi — concept mind map

कर्नाटक के पांच गारंटी योजनाओं का देश में मॉडल: तांगाडगी

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Karnataka Guarantee Model

✎ कल्याणकारी योजनाएँ सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण उपकरण हैं, जो समाज के कमजोर वर्गों को सहायता प्रदान करती हैं और आर्थिक असमानताओं को कम करने में मदद करती हैं।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध  |  GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा विकास
  • Prelims: कल्याणकारी योजनाएँ, सामाजिक न्याय, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT), राजकोषीय संघवाद, राज्य वित्त, गरीबी उन्मूलन, आर्थिक संवृद्धि, समावेशी विकास
  • Essay: कल्याणकारी राज्य की अवधारणा और भारत में इसकी प्रासंगिकता, सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को दूर करने में सरकारी योजनाओं की भूमिका

त्वरित पुनरावृत्ति: कल्याणकारी योजनाएँ सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण उपकरण हैं, जो समाज के कमजोर वर्गों को सहायता प्रदान करती हैं और आर्थिक असमानताओं को कम करने में मदद करती हैं।

यह खबर चर्चा में क्यों?

कर्नाटक के पिछड़ा वर्ग कल्याण तथा कन्नड़ एवं संस्कृति मंत्री शिवराज तंगडगी ने हाल ही में कहा कि राज्य की पाँच गारंटी योजनाएँ, जिन पर वार्षिक रूप से ₹50,000 करोड़ से अधिक का व्यय होता है, अन्य राज्यों के लिए एक मॉडल बन गई हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इन योजनाओं ने करोड़ों परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार किया है और आर्थिक तथा सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों को मुख्यधारा में लाने में मदद की है, जिससे सबसे गरीब तबके सम्मान के साथ जीवन जी सकें।

पृष्ठभूमि

  • भारत के संविधान में एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना का लक्ष्य रखा गया है, जहाँ सरकार नागरिकों के सामाजिक और आर्थिक कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाती है।
  • राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (DPSP) संविधान के भाग IV में निहित हैं, जो राज्य को सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करने वाली नीतियाँ बनाने का निर्देश देते हैं।
  • गरीबी उन्मूलन (Poverty Alleviation) और सामाजिक न्याय (Social Justice) भारत में सार्वजनिक नीति के प्रमुख स्तंभ रहे हैं, जिसके लिए केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर विभिन्न योजनाएँ लागू की गई हैं।
  • प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (Direct Benefit Transfer – DBT) एक महत्वपूर्ण तंत्र के रूप में उभरा है, जो बिचौलियों को समाप्त कर लाभार्थियों तक सीधे सहायता पहुँचाता है, जिससे रिसाव कम होता है और दक्षता बढ़ती है।
  • राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) के तहत, राज्य सरकारें अपने नागरिकों की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपनी स्वयं की कल्याणकारी योजनाएँ तैयार और कार्यान्वित करती हैं, जो केंद्र सरकार की योजनाओं के पूरक होती हैं।
  • हाल के वर्षों में, कई राज्यों ने अपने नागरिकों को विभिन्न प्रकार की ‘गारंटी’ प्रदान करने वाली योजनाएँ शुरू की हैं, जिनमें आय सहायता, मुफ्त सार्वजनिक परिवहन या रियायती बिजली शामिल हैं।

कल्याणकारी योजनाएँ और सामाजिक न्याय

  • कल्याणकारी योजनाएँ सरकारी पहलें हैं जिनका उद्देश्य समाज के कमजोर और वंचित वर्गों को सहायता प्रदान करना है, ताकि उन्हें गरीबी से बाहर निकाला जा सके और जीवन की बेहतर गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके।
  • इन योजनाओं का मुख्य लक्ष्य सामाजिक न्याय प्राप्त करना है, जिसका अर्थ है समाज के सभी सदस्यों को समान अवसर और अधिकार प्रदान करना, विशेष रूप से उन लोगों को जो ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे हैं।
  • कर्नाटक की पाँच गारंटी योजनाओं में ‘गृह लक्ष्मी’ (महिलाओं को वित्तीय सहायता), ‘शक्ति’ (महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा), ‘अन्न भाग्य’ (खाद्य सुरक्षा), ‘युवा निधि’ (बेरोजगार युवाओं को सहायता) और ‘गृह ज्योति’ (मुफ्त बिजली) शामिल हैं।
  • ये योजनाएँ अक्सर प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) मॉडल का उपयोग करती हैं, जहाँ वित्तीय सहायता सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में जमा की जाती है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ती है।
  • कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से गरीबी उन्मूलन, आय असमानता को कम करने और मानव विकास संकेतकों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण में सुधार करने का प्रयास किया जाता है।
  • इन योजनाओं के कार्यान्वयन में राज्य के वित्त पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है, और इसलिए राजकोषीय विवेक (Fiscal Prudence) और दीर्घकालिक स्थिरता बनाए रखना एक चुनौती हो सकती है।
  • सामाजिक न्याय की अवधारणा भारतीय संविधान की प्रस्तावना में निहित है, जो सभी नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करने का वादा करती है।
  • कल्याणकारी योजनाएँ समावेशी विकास (Inclusive Growth) के लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, यह सुनिश्चित करती हैं कि आर्थिक संवृद्धि के लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँचें।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
गारंटी योजनाएँ आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को सहायता और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती हैं।
प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) बिचौलियों को समाप्त कर लाभार्थियों तक सीधे लाभ पहुँचाना, पारदर्शिता बढ़ाना।
महिला सशक्तिकरण महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा जैसी योजनाएँ उनकी गतिशीलता और आर्थिक भागीदारी बढ़ाती हैं।
खाद्य सुरक्षा गरीबों को खाद्यान्न या वित्तीय सहायता प्रदान कर भूख और कुपोषण से लड़ना।
बेरोजगारी भत्ता युवाओं को रोजगार मिलने तक वित्तीय सहायता प्रदान कर उन्हें सहारा देना।

महत्व

सामाजिक-आर्थिक समावेशन

  • गारंटी योजनाएँ आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों को मुख्यधारा में लाने में मदद करती हैं।
  • ये योजनाएँ गरीबी उन्मूलन और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

राजकोषीय संघवाद

  • राज्यों द्वारा ऐसी योजनाओं का कार्यान्वयन राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) के तहत उनकी स्वायत्तता को दर्शाता है।
  • अन्य राज्यों द्वारा कर्नाटक मॉडल का अनुकरण राज्यों के बीच नीतिगत नवाचार और सीखने को बढ़ावा देता है।

कल्याणकारी राज्य की अवधारणा

  • ये योजनाएँ भारतीय संविधान में निहित कल्याणकारी राज्य (Welfare State) की अवधारणा को साकार करती हैं।
  • नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार और उन्हें गरिमापूर्ण जीवन जीने में सक्षम बनाना इनका मुख्य उद्देश्य है।

चुनौतियाँ

1. राजकोषीय स्थिरता

  • बड़ी संख्या में गारंटी योजनाओं के लिए ₹50,000 करोड़ से अधिक का वार्षिक व्यय राज्य के राजकोषीय स्वास्थ्य पर दबाव डाल सकता है।
  • राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) बढ़ने और ऋण-से-GDP अनुपात में वृद्धि का जोखिम हो सकता है।
  • दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए राजस्व सृजन के स्थायी स्रोतों की आवश्यकता है।

2. लक्षित वितरण और रिसाव

  • योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में यह सुनिश्चित करना एक चुनौती है कि लाभ केवल पात्र लाभार्थियों तक ही पहुँचे।
  • अपात्र लाभार्थियों को लाभ मिलने या वास्तविक लाभार्थियों तक लाभ न पहुँचने का जोखिम (रिसाव) हो सकता है।

3. मुद्रास्फीति का दबाव

  • आय हस्तांतरण योजनाओं से लोगों की क्रय शक्ति बढ़ती है, जिससे वस्तुओं और सेवाओं की मांग बढ़ सकती है।
  • मांग में वृद्धि यदि आपूर्ति से अधिक हो, तो मुद्रास्फीति (Inflation) का दबाव बढ़ सकता है।

4. दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव

  • इन योजनाओं का दीर्घकालिक आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) और उत्पादकता पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका मूल्यांकन महत्वपूर्ण है।
  • क्या ये योजनाएँ केवल उपभोग को बढ़ावा देती हैं या पूंजी निर्माण और निवेश को भी प्रोत्साहित करती हैं, यह देखना होगा।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
उच्च व्यय राज्य के बजट पर दबाव और राजकोषीय घाटे में वृद्धि का जोखिम।
लक्षित वितरण अपात्र लाभार्थियों को लाभ मिलने या वास्तविक लाभार्थियों तक लाभ न पहुँचने का जोखिम।
मुद्रास्फीति बढ़ी हुई क्रय शक्ति के कारण मांग-प्रेरित मुद्रास्फीति की संभावना।
दीर्घकालिक स्थिरता राजस्व सृजन के स्थायी स्रोतों के बिना योजनाओं की निरंतरता पर प्रश्न।
उत्पादकता क्या ये योजनाएँ केवल उपभोग को बढ़ावा देती हैं या उत्पादकता और निवेश को भी प्रोत्साहित करती हैं।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • गृह लक्ष्मी योजना
  • शक्ति योजना
  • अन्न भाग्य योजना
  • युवा निधि योजना
  • गृह ज्योति योजना
  • अमृत 2.0 योजना

आगे की राह

  • राजकोषीय विवेक बनाए रखने के लिए राजस्व सृजन के नए और स्थायी तरीकों की पहचान करना।
  • योजनाओं के लक्षित वितरण को सुनिश्चित करने के लिए आधार (Aadhaar) और अन्य डिजिटल प्रौद्योगिकियों का प्रभावी उपयोग करना।
  • योजनाओं के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का नियमित मूल्यांकन करना और आवश्यकतानुसार सुधार करना।
  • मुद्रास्फीति के दबावों को नियंत्रित करने के लिए आपूर्ति-पक्ष के उपायों पर ध्यान केंद्रित करना।
  • कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ पूंजीगत व्यय और उत्पादक निवेश को भी बढ़ावा देना।
  • राज्यों के बीच सर्वोत्तम प्रथाओं (Best Practices) का आदान-प्रदान और नीतिगत सीखने को प्रोत्साहित करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

कल्याणकारी योजनाएँ · राजकोषीय संघवाद · राजकोषीय घाटा · सामाजिक न्याय · आर्थिक संवृद्धि · प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण · राज्य वित्त · गरीबी उन्मूलन · समावेशी विकास · गारंटी योजनाएँ

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 38’, ‘note’: ‘कल्याणकारी राज्य की स्थापना का लक्ष्य’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 39’, ‘note’: ‘आजीविका के पर्याप्त साधन का अधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 41’, ‘note’: ‘बेरोजगारी, बुढ़ापे आदि में सहायता’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 47’, ‘note’: ‘पोषण स्तर और जीवन स्तर में सुधार’}

अवधारणा प्रवाह

गारंटी योजनाओं की घोषणा  →  बड़ा वित्तीय परिव्यय  →  लाभार्थियों को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण  →  सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार  →  राजकोषीय स्थिरता पर संभावित दबाव  →  अन्य राज्यों द्वारा मॉडल का अनुकरण

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान के तहत, राज्य सरकारें अपने नागरिकों के कल्याण के लिए योजनाएँ बनाने और लागू करने के लिए स्वतंत्र हैं।
2. प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (Direct Benefit Transfer – DBT) योजनाएँ केंद्र सरकार द्वारा ही लागू की जा सकती हैं, राज्य सरकारों द्वारा नहीं।
3. राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) का अर्थ है केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय शक्तियों और जिम्मेदारियों का वितरण।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि संविधान राज्यों को अपने अधिकार क्षेत्र में कल्याणकारी योजनाएँ बनाने की शक्ति देता है। कथन 2 गलत है क्योंकि DBT योजनाएँ केंद्र और राज्य दोनों सरकारों द्वारा लागू की जा सकती हैं। कथन 3 सही है क्योंकि राजकोषीय संघवाद केंद्र और राज्य सरकारों के बीच राजस्व और व्यय की शक्तियों के वितरण से संबंधित है।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा ‘राजकोषीय घाटा’ (Fiscal Deficit) का सबसे सटीक वर्णन करता है?

  1. सरकार की कुल प्राप्तियों और कुल व्यय के बीच का अंतर।
  2. सरकार की राजस्व प्राप्तियों और राजस्व व्यय के बीच का अंतर।
  3. सरकार के कुल व्यय और ऋण को छोड़कर कुल प्राप्तियों के बीच का अंतर।
  4. सरकार के पूंजीगत व्यय और पूंजीगत प्राप्तियों के बीच का अंतर।

उत्तर: सरकार के कुल व्यय और ऋण को छोड़कर कुल प्राप्तियों के बीच का अंतर। — राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय और ऋण को छोड़कर कुल प्राप्तियों के बीच का अंतर होता है। यह दर्शाता है कि सरकार को अपने खर्चों को पूरा करने के लिए कितनी उधारी की आवश्यकता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ कल्याणकारी योजनाओं के सफल कार्यान्वयन में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) की भूमिका का परीक्षण कीजिए। साथ ही, ऐसी योजनाओं के वित्तीय निहितार्थों और राजकोषीय संघवाद पर उनके प्रभाव पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: कल्याणकारी योजनाओं और DBT का संक्षिप्त परिचय।
2. DBT की भूमिका: DBT के माध्यम से पारदर्शिता, दक्षता, लीकेज में कमी और लाभार्थियों तक सीधी पहुँच जैसे लाभों का उल्लेख। कर्नाटक की गारंटी योजनाओं जैसे उदाहरणों का प्रयोग।
3. वित्तीय निहितार्थ: योजनाओं पर होने वाले व्यय (जैसे कर्नाटक का ₹50,000 करोड़ से अधिक का वार्षिक व्यय), राजकोषीय घाटे पर संभावित प्रभाव, राज्यों के ऋण भार में वृद्धि, और वित्तीय स्थिरता पर चिंताएँ।
4. राजकोषीय संघवाद पर प्रभाव: केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों पर तनाव, राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता, केंद्र से अधिक वित्तीय सहायता की अपेक्षा, और नीतिगत समन्वय की आवश्यकता पर चर्चा।
5. निष्कर्ष: कल्याणकारी योजनाओं के महत्व को स्वीकार करते हुए, वित्तीय विवेक और दीर्घकालिक स्थिरता के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर बल।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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