कार्यस्थल पर लैंगिक समानता (Gender Equality at Workplace)

कार्यस्थल पर लैंगिक समानता (Gender Equality at Workplace)

कार्यस्थल पर लैंगिक समानता : भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षा की कुंजी 

  पाठ्यक्रम –  जीएस 1 : भारतीय समाज

प्रस्तावना :

भारत की आर्थिक विकास की यात्रा में लैंगिक समानता एक महत्वपूर्ण कारक है। नीति आयोग और भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) द्वारा हाल ही में जारी रिपोर्ट ‘फ्रॉम इंटेंट टू इम्पैक्ट’ कार्यस्थलों में लैंगिक समानता सुनिश्चित करने के लिए एक रणनीतिक रोडमैप प्रस्तुत करती है। यह रिपोर्ट वर्ष 2047 तक भारत को 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य को प्राप्त करने पर जोर देती है, जिसके लिए लगभग 14.5 करोड़ महिलाओं को कार्यबल में शामिल करना आवश्यक है। साथ ही, यह संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDG-5: लैंगिक समानता और SDG-8: सम्मानजनक कार्य एवं आर्थिक संवृद्धि) से जुड़ी हुई है।

लैंगिक समानता की आवश्यकता : आर्थिक एवं सामाजिक संदर्भ

भारत में महिलाओं की कार्यबल भागीदारी दर (LFPR) वैश्विक औसत से काफी कम है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, यह दर मात्र 25-30% के आसपास है, जबकि पुरुषों की 80% से अधिक है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जाए, तो GDP में 2-3% की अतिरिक्त वृद्धि संभव है। वर्ष 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए महिलाओं को STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) जैसे क्षेत्रों में अधिक अवसर प्रदान करना होगा। उदाहरणस्वरूप, STEM स्नातकों में महिलाओं का अनुपात 43% है, लेकिन कार्यबल में केवल 27%। यह असमानता न केवल आर्थिक हानि का कारण है, बल्कि सामाजिक न्याय को भी प्रभावित करती है। SDG-5 के तहत लैंगिक समानता सुनिश्चित करना भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता है, जो पांचवीं अनुसूची और महिला सशक्तिकरण योजनाओं से जुड़ी हुई है।

प्रमुख बाधाएं: संरचनात्मक एवं सामाजिक अवरोध  

रिपोर्ट में कार्यस्थलों में लैंगिक समानता की बाधाओं को चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:

कार्यबल में प्रवेश संबंधी बाधाएं: भर्ती प्रक्रिया में अचेतन पूर्वाग्रह (Unconscious Bias) प्रमुख है। रूढ़िवादी सोच के कारण कुछ नौकरियां केवल पुरुषों के लिए मानी जाती हैं। उदाहरण के लिए, महिलाओं को इंजीनियरिंग या निर्माण क्षेत्र में कम अवसर मिलते हैं।
नौकरी जारी रखने की चुनौतियां: मातृत्व के कारण ‘मातृत्व दंड’ (Maternity Penalty) का सामना करना पड़ता है। रिपोर्ट के अनुसार, 75% कामकाजी माताओं को करियर में बाधा आती है। अवैतनिक देखभाल कार्य (Unpaid Care Work) का 76% बोझ महिलाओं पर है, जो उनकी उत्पादकता को प्रभावित करता है।
विकास एवं प्रगति में बाधाएं: अनौपचारिक नेटवर्क जैसे ‘ओल्ड बॉयज़ क्लब’ से महिलाओं को बाहर रखा जाता है। नेतृत्व विकास कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी कम है, जिससे वरिष्ठ पदों पर पहुंचना कठिन होता है।
व्यवस्थागत समस्याएं: कानूनी एवं संस्थागत ढांचे की कमी, जैसे समान वेतन और बाल देखभाल सुविधाओं का अभाव। ये बाधाएं न केवल व्यक्तिगत स्तर पर प्रभावित करती हैं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक संवृद्धि को बाधित करती हैं।

ये बाधाएं पितृसत्तात्मक समाज, सांस्कृतिक मानदंडों और नीतिगत कमियों से उपजी हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और 15 (भेदभाव निषेध) के विपरीत हैं।

आगे की राह: जीवन-चक्र दृष्टिकोण आधारित समाधान

रिपोर्ट एक संपूर्ण जीवन-चक्र दृष्टिकोण सुझाती है, जो प्रवेश, निरंतरता, विकास और संस्कृति पर केंद्रित है:

प्रवेश को प्रोत्साहन: लिंग-तटस्थ भर्ती प्रक्रियाएं अपनानी चाहिए, जैसे ब्लाइंड स्क्रीनिंग (नाम, लिंग छिपाकर कौशल आधारित चयन)। कंपनियां जैसे कैपजेमिनी और यूनिलीवर AI टूल्स का उपयोग कर विविध प्रतिभाओं को आकर्षित करती हैं। विशेष भर्ती अभियान चलाए जाने चाहिए।
निरंतरता सुनिश्चित करना: समावेशी पितृत्व अवकाश (Parental Leave), लचीले कार्य घंटे और बाल देखभाल सुविधाएं। नेटफ्लिक्स की असीमित अवकाश नीति एक उदाहरण है। भारत में मातृत्व लाभ अधिनियम (2017) को मजबूत किया जा सकता है।
विकास एवं प्रगति: महिलाओं के लिए नेतृत्व कार्यक्रम जैसे PropelHER और SheLeads, जो समझौता कौशल और रणनीतिक सोच सिखाते हैं।
समावेशी संस्कृति: कंपनियां जैसे टेक महिंद्रा और जेनपैक्ट निदेशक मंडलों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करती हैं।

ये समाधान नीतिगत स्तर पर लागू करने योग्य हैं, जैसे राष्ट्रीय महिला नीति (2001) को अद्यतन करना।

केस स्टडीज: वैश्विक एवं भारतीय सर्वोत्तम प्रणालियां

रिपोर्ट में वैश्विक उदाहरण दिए गए हैं जो भारत के लिए प्रेरणा स्रोत हो सकते हैं:
समान वेतन: जर्मनी का पारिश्रमिक पारदर्शिता अधिनियम और न्यूजीलैंड का समान वेतन संशोधन अधिनियम वेतन डेटा की पारदर्शिता सुनिश्चित करते हैं।
साझा देखभाल:नॉर्वे  में पिता के लिए अनिवार्य पितृत्व अवकाश और स्पेन में 16 सप्ताह का समान अवकाश।

लचीले कार्य: यूनाइटेड किंगडम में विधिक अधिकार और भारत में टाटा एवं एक्सेंचर के ‘रिटर्न टू वर्क’ कार्यक्रम।
संस्थागत सहायता: डेनमार्क की सब्सिडी युक्त बाल देखभाल और फ्रांस की क्रेच सुविधाएं।

भारत में कंपनियां जैसे टाटा और एक्सेंचर इन प्रणालियों को अपनाकर सफल हो रही हैं, लेकिन सरकारी स्तर पर राष्ट्रीय बाल देखभाल नीति की आवश्यकता है।

चुनौतियां एवं सुझाव : 

चुनौतियां में ग्रामीण-शहरी विभाजन, MSME क्षेत्र में जागरूकता की कमी और प्रवर्तन तंत्र की कमजोरी शामिल हैं।
नीति आयोग को CII के साथ मिलकर पायलट प्रोजेक्ट चलाना।
कंपनियों को लैंगिक समानता सूचकांक (Gender Parity Index) पर रैंकिंग देना।
शिक्षा में लिंग संवेदनशीलता को शामिल करना।

निष्कर्ष :

कार्यस्थल पर लैंगिक समानता न केवल नैतिक दायित्व है, बल्कि आर्थिक अनिवार्यता भी। ‘फ्रॉम इंटेंट टू इम्पैक्ट’ रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण कदम है, जो इच्छा से क्रियान्वयन की ओर ले जाती है। भारत को विकसित राष्ट्र बनने के लिए महिलाओं को सशक्त बनाना होगा, जैसा कि संविधान की भावना में निहित है। UPSC परीक्षा के संदर्भ में, यह विषय महिला सशक्तिकरण, आर्थिक विकास और शासन से जुड़ा है

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q. नीति आयोग और CII की रिपोर्ट ‘फ्रॉम इंटेंट टू इम्पैक्ट’ का मुख्य उद्देश्य क्या है?
(a) भारत को 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना
(b) ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की शिक्षा बढ़ाना
(c) पर्यावरण संरक्षण के लिए रोडमैप बनाना
(d) डिजिटल इंडिया को मजबूत करना
उत्तर: (a) भारत को 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q. कार्यस्थलों में लैंगिक समानता सुनिश्चित करने में आने वाली बाधाओं की चर्चा कीजिए तथा नीति आयोग की ‘फ्रॉम इंटेंट टू इम्पैक्ट’ रिपोर्ट के सुझावों के आधार पर समाधान सुझाइए।  (250 शब्दों में)

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