17 Aug केरल के सीएम ने केंद्र से खनन बिल संशोधन पर पुनर्विचार की अपील की, जानिए पूरा मामला
✎ खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों और संघीय ढांचे में राज्यों की कराधान शक्तियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: संघ एवं राज्यों के कार्य और उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ। | GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों का जुटाना, वृद्धि, विकास तथा रोज़गार।
- Prelims: खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957, सातवीं अनुसूची, राज्य सूची (सूची II), संघ सूची (सूची I), समवर्ती सूची (सूची III), अनुच्छेद 246, सहकारी संघवाद, राजकोषीय संघवाद, खनिज अधिकार, खनिज-युक्त भूमि
- Essay: भारत में सहकारी संघवाद की चुनौतियाँ, राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और संघीय संतुलन, प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन और केंद्र-राज्य संबंध
त्वरित पुनरावृत्ति: खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों और संघीय ढांचे में राज्यों की कराधान शक्तियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 के प्रावधानों पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है। मुख्यमंत्री ने तर्क दिया है कि ये संशोधन राज्यों की खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने की संवैधानिक और राजकोषीय शक्तियों पर दूरगामी प्रभाव डालेंगे, जिससे राज्यों के राजस्व पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
पृष्ठभूमि
- हाल ही में संसद द्वारा पारित खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 की धारा 9D, राज्य सरकारों की खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर किसी भी कर, उपकर या अन्य लेवी लगाने की क्षमता को प्रतिबंधित करती है, सिवाय केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित मापदंडों के भीतर।
- संशोधनों का उद्देश्य खनिज-युक्त भूमि को केंद्र सरकार के विनियमन के दायरे में लाना और कुछ पिछले राज्य लेवी को अमान्य करना है जो अभी तक एकत्र या भुगतान नहीं किए गए हैं।
- केरल के मुख्यमंत्री ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि इन प्रावधानों से संविधान के तहत विधायी और राजकोषीय शक्तियों के संघीय वितरण के संबंध में गंभीर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
- मुख्यमंत्री ने सर्वोच्च न्यायालय के 2024 के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें यह माना गया था कि MMDR अधिनियम के तहत देय रॉयल्टी एक कर नहीं है और सूची II की प्रविष्टि 50 के तहत खनिज अधिकारों पर कर लगाने की राज्यों की विधायी क्षमता की पुष्टि की गई थी।
- सर्वोच्च न्यायालय ने सूची II की प्रविष्टि 49 के तहत खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने की राज्यों की क्षमता को भी मान्यता दी थी, जिसमें खनिज उपज या मूल्य के आधार पर भी कर शामिल था।
- यह मुद्दा केवल खनिज कराधान के तात्कालिक प्रश्न से परे है; यह सहकारी संघवाद के लिए राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और संवैधानिक रूप से सौंपे गए क्षेत्रों के भीतर उनके राजस्व-बढ़ाने की शक्तियों के व्यापक संघीय संतुलन से संबंधित है।
भारत में केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध
- भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के वितरण का प्रावधान करती है, जिसमें कराधान शक्तियाँ भी शामिल हैं।
- सातवीं अनुसूची में तीन सूचियाँ हैं: संघ सूची (सूची I), राज्य सूची (सूची II) और समवर्ती सूची (सूची III)।
- संघ सूची में वे विषय शामिल हैं जिन पर संसद को कानून बनाने की विशेष शक्ति है, जैसे रक्षा, रेलवे और आयकर।
- राज्य सूची में वे विषय शामिल हैं जिन पर राज्य विधानमंडल को कानून बनाने की विशेष शक्ति है, जैसे सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस और भू-राजस्व। खनिज अधिकारों पर कर (प्रविष्टि 50) और भूमि पर कर (प्रविष्टि 49) राज्य सूची के अंतर्गत आते हैं।
- समवर्ती सूची में वे विषय शामिल हैं जिन पर संसद और राज्य विधानमंडल दोनों कानून बना सकते हैं, जैसे शिक्षा, वन और जनसंख्या नियंत्रण।
- अनुच्छेद 246 इन सूचियों के अनुसार संसद और राज्य विधानमंडलों की विधायी शक्तियों का सीमांकन करता है।
- राजकोषीय संघवाद केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों और जिम्मेदारियों के वितरण से संबंधित है, जिसका उद्देश्य राज्यों को उनकी विकासात्मक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त राजस्व सुनिश्चित करना है।
- सहकारी संघवाद एक अवधारणा है जहाँ केंद्र और राज्य सरकारें राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सहयोग करती हैं और एक-दूसरे के साथ समन्वय स्थापित करती हैं, विशेषकर नीति निर्माण और कार्यान्वयन में।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| संशोधित खान और खनिज (विकास और विनियमन) विधेयक, 2026 | राज्यों की खनिज अधिकारों पर कराधान शक्तियों को प्रतिबंधित करता है। |
| धारा 9D | राज्य सरकारों द्वारा खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर, उपकर या अन्य शुल्क लगाने की क्षमता को सीमित करती है। |
| खनिज-युक्त भूमि पर केंद्र सरकार का विनियमन | राज्यों की विधायी और वित्तीय शक्तियों के संघीय वितरण पर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न करता है। |
| सर्वोच्च न्यायालय का 2024 का निर्णय | MMDR अधिनियम के तहत देय रॉयल्टी को कर नहीं माना और राज्यों की कराधान क्षमता को बरकरार रखा। |
| राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता | सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का एक अभिन्न अंग है। |
महत्व
राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता पर प्रभाव
- संशोधित विधेयक राज्यों की खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने की शक्ति को सीमित करता है, जिससे उनके राजस्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
- यह प्रावधान स्थानीय-सरकारी स्तर पर लगने वाले शुल्कों और राजस्व पर भी असर डाल सकता है, जिससे जमीनी स्तर पर विकास परियोजनाओं के लिए धन की कमी हो सकती है।
- राज्यों की राजस्व जुटाने की शक्तियों में कटौती से केंद्र पर उनकी वित्तीय निर्भरता बढ़ सकती है, जो संघीय संतुलन के लिए हानिकारक है।
संघवाद पर निहितार्थ
- संविधान के तहत विधायी और वित्तीय शक्तियों के संघीय वितरण पर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
- राज्यों की कराधान शक्ति का निर्धारण केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित मापदंडों के माध्यम से होना संवैधानिक संघवाद के सिद्धांतों पर पुनर्विचार की मांग करता है।
- यह सहकारी संघवाद की भावना के विपरीत है, जहाँ राज्यों को उनके संवैधानिक रूप से आवंटित क्षेत्रों में वित्तीय स्वायत्तता महत्वपूर्ण है।
खनिज विकास और निवेश
- हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर सुसंगत खनिज विकास नीति और निवेश के लिए एक अनुमानित वातावरण आवश्यक है, लेकिन इसे राज्यों के साथ परामर्श और सहमति से प्राप्त किया जाना चाहिए।
- अत्यधिक या मनमाने शुल्कों की रोकथाम और सतत खनिज विकास के उद्देश्य राज्यों की संवैधानिक शक्तियों को कमजोर किए बिना प्राप्त किए जा सकते हैं।
चुनौतियाँ
1. राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता का क्षरण
- संशोधित विधेयक राज्यों की खनिज अधिकारों पर कर लगाने की क्षमता को प्रतिबंधित करता है।
- यह राज्यों के राजस्व स्रोतों को कम कर सकता है, जिससे उनकी विकास योजनाओं और कल्याणकारी कार्यक्रमों पर असर पड़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: राजकोषीय संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
2. संघवाद का उल्लंघन
- संविधान के तहत विधायी और वित्तीय शक्तियों के संघीय वितरण पर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
- राज्यों की कराधान शक्ति को केंद्र द्वारा निर्धारित मापदंडों के अधीन करना संवैधानिक संघवाद के सिद्धांतों के खिलाफ है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संघवाद, केंद्र-राज्य विधायी संबंध
3. सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की अवहेलना
- सर्वोच्च न्यायालय ने 2024 में राज्यों की खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी क्षमता को बरकरार रखा था।
- विधेयक के प्रावधान इस निर्णय के विपरीत प्रतीत होते हैं, जिससे न्यायिक समीक्षा का मुद्दा उठ सकता है।
यूपीएससी लिंक: न्यायिक समीक्षा, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय
4. स्थानीय सरकारों पर प्रभाव
- राज्यों के राजस्व में कमी से स्थानीय सरकारों को मिलने वाले शुल्कों और राजस्व पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
- यह जमीनी स्तर पर शासन और विकास को प्रभावित कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: पंचायती राज, स्थानीय स्वशासन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| खनिज अधिकारों पर राज्यों की कराधान शक्ति का प्रतिबंध | राज्यों के राजस्व में कमी और वित्तीय स्वायत्तता का क्षरण। |
| धारा 9D के प्रावधान | राज्यों की विधायी और वित्तीय शक्तियों के संघीय वितरण पर गंभीर चिंताएँ। |
| खनिज-युक्त भूमि पर केंद्र का विनियमन | संघवाद और केंद्र-राज्य संबंधों में असंतुलन की संभावना। |
| सर्वोच्च न्यायालय के 2024 के निर्णय की अनदेखी | संवैधानिक सिद्धांतों और न्यायिक मिसालों का उल्लंघन। |
| राज्यों के साथ परामर्श और सहमति का अभाव | सहकारी संघवाद की भावना के विपरीत। |
आगे की राह
- केंद्र और राज्यों के बीच खनिज नीति पर व्यापक परामर्श और सहमति स्थापित की जानी चाहिए।
- राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और कराधान शक्तियों का सम्मान करते हुए एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
- विधेयक के प्रावधानों की संवैधानिक वैधता की गहन समीक्षा की जानी चाहिए, विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय के पिछले निर्णयों के आलोक में।
- राजस्व-साझाकरण के ऐसे तंत्र विकसित किए जाने चाहिए जो राज्यों के हितों की रक्षा करें और उन्हें पर्याप्त वित्तीय संसाधन प्रदान करें।
- खनिज विकास और विनियमन के लिए एक राष्ट्रीय नीति तैयार करते समय राज्यों की विशिष्ट आवश्यकताओं और स्थानीय परिस्थितियों पर विचार किया जाना चाहिए।
- सहकारी संघवाद को मजबूत करने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच विश्वास और सहयोग का माहौल बनाना महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
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संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘Article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘विधायी शक्तियों का वितरण (सूचियां)’}
- {‘Article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘संघ, राज्य और समवर्ती सूचियां’}
- {‘Entry’: ‘राज्य सूची की प्रविष्टि 49’, ‘note’: ‘भूमि पर कर’}
- {‘Entry’: ‘राज्य सूची की प्रविष्टि 50’, ‘note’: ‘खनिज अधिकारों पर कर’}
- {‘Concept’: ‘सहकारी संघवाद’, ‘note’: ‘केंद्र-राज्य संबंधों का सिद्धांत’}
अवधारणा प्रवाह
केंद्र सरकार द्वारा खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 पारित करना। → विधेयक की धारा 9D द्वारा राज्यों की खनिज अधिकारों पर कराधान शक्ति को प्रतिबंधित करना। → राज्यों के राजस्व में संभावित कमी और वित्तीय स्वायत्तता का क्षरण। → संवैधानिक संघवाद और केंद्र-राज्य संबंधों पर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न होना। → राज्यों द्वारा विधेयक के प्रावधानों पर पुनर्विचार की मांग और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला। → केंद्र और राज्यों के बीच खनिज नीति पर परामर्श और सहमति की आवश्यकता।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II (राज्य सूची) की प्रविष्टि 50 राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति प्रदान करती है।
2. भारत में खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने की शक्ति केवल केंद्र सरकार के पास है।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने 2024 में निर्णय दिया था कि MMDR अधिनियम के तहत देय रॉयल्टी एक कर नहीं है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने पुष्टि की है कि राज्य सूची की प्रविष्टि 50 के तहत राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी क्षमता है। कथन 2 गलत है क्योंकि राज्य सूची की प्रविष्टि 49 के तहत राज्यों को खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने की शक्ति प्राप्त है। कथन 3 सही है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने 2024 में यह निर्णय दिया था कि MMDR अधिनियम के तहत देय रॉयल्टी एक कर नहीं है।
Q2. खनन और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
1. यह विधेयक राज्य सरकारों की खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कोई भी कर, उपकर या अन्य लेवी लगाने की क्षमता को प्रतिबंधित करता है।
2. यह संशोधन खनिज-युक्त भूमि को केंद्र सरकार के विनियमन के दायरे में लाता है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1
- केवल 2
- 1 और 2 दोनों
- न तो 1 और न ही 2
उत्तर: 1 और 2 दोनों — दोनों कथन सही हैं। विधेयक राज्य सरकारों की खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने की शक्ति को सीमित करता है और खनिज-युक्त भूमि को केंद्र सरकार के विनियमन के अधीन लाता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ खनन और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 के प्रावधानों पर केरल के मुख्यमंत्री की आपत्तियों के आलोक में, भारत में राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना: राजकोषीय संघवाद की अवधारणा और उसके महत्व का संक्षिप्त परिचय दें। खनन और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 के प्रमुख प्रावधानों का उल्लेख करें जिन पर राज्यों को आपत्ति है। संविधान की सातवीं अनुसूची, विशेष रूप से राज्य सूची की प्रविष्टि 49 (भूमि पर कर) और प्रविष्टि 50 (खनिज अधिकारों पर कर) के तहत राज्यों की कराधान शक्तियों का विस्तार से वर्णन करें। सर्वोच्च न्यायालय के 2024 के निर्णय का उल्लेख करें जिसने रॉयल्टी को कर नहीं माना और राज्यों की कराधान शक्तियों की पुष्टि की। इन संशोधनों के राज्यों की राजस्व स्वायत्तता और समग्र संघीय संतुलन पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण करें। सहकारी संघवाद के सिद्धांतों और केंद्र-राज्य परामर्श के महत्व पर प्रकाश डालें। निष्कर्ष में, संघीय ढांचे को बनाए रखने के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दें।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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