13 Aug केरल ने केंद्र के खनन संशोधन विधेयक का किया तीव्र विरोध, संविधानिक अधिकारों पर हमला बताया
✎ खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के वितरण और भारतीय संघवाद के सिद्धांतों पर बहस का केंद्र बन गया है, विशेष रूप से 'भूमि' से संबंधित मामलों पर।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान, संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध | GS Paper III — खनिज संसाधन, आर्थिक विकास
- Prelims: खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957, राज्य सूची की प्रविष्टि 18, संघ सूची, समवर्ती सूची, संघवाद, खनन क्षेत्र में केंद्र-राज्य संबंध
- Essay: भारत में संघवाद की चुनौतियाँ, केंद्र-राज्य संबंधों में विधायी शक्तियों का वितरण
त्वरित पुनरावृत्ति: खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के वितरण और भारतीय संघवाद के सिद्धांतों पर बहस का केंद्र बन गया है, विशेष रूप से ‘भूमि’ से संबंधित मामलों पर।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल सरकार ने खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026) का कड़ा विरोध करने का संकल्प लिया है। केरल के मुख्यमंत्री ने इस विधेयक को भूमि पर राज्य की संवैधानिक शक्तियों का गंभीर अतिक्रमण और भारत की संघीय संरचना के लिए एक बड़ा खतरा बताया है।
पृष्ठभूमि
- भारतीय संविधान विधायी शक्तियों को संघ (Union), राज्य (State) और समवर्ती (Concurrent) सूचियों के बीच स्पष्ट रूप से वितरित करता है।
- राज्य सूची की प्रविष्टि 18 ‘भूमि’ से संबंधित मामलों को राज्यों के विधायी अधिकार क्षेत्र में रखती है।
- खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 (Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957) भारत में खनन क्षेत्र को नियंत्रित करने वाला प्रमुख कानून है।
- केंद्र सरकार समय-समय पर इस अधिनियम में संशोधन करती रही है ताकि खनन क्षेत्र में सुधार और विनियमन सुनिश्चित किया जा सके।
- राज्यों का मानना है कि ‘खनिज-युक्त भूमि’ की परिभाषा का विस्तार करके केंद्र तटीय क्षेत्रों और वनों को भी शामिल कर रहा है, जिससे उनके अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण हो रहा है।
- केंद्र-राज्य संबंधों में विधायी शक्तियों का यह वितरण भारतीय संघवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू है, जहाँ दोनों स्तरों पर सरकारों के अपने-अपने अधिकार क्षेत्र होते हैं।
खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957
- यह अधिनियम भारत में खनन क्षेत्र के विकास और विनियमन के लिए एक व्यापक ढाँचा प्रदान करता है।
- यह केंद्र सरकार को खनिजों के विनियमन और विकास के लिए नियम बनाने का अधिकार देता है।
- अधिनियम की धारा 13 और 15 केंद्र और राज्य सरकारों को क्रमशः खनिजों के पट्टे और रॉयल्टी से संबंधित नियम बनाने की शक्ति देती हैं।
- यह अधिनियम ‘खनिज’ की परिभाषा और खनन गतिविधियों के लिए आवश्यक विभिन्न अनुमतियों को भी परिभाषित करता है।
- संशोधन विधेयक का उद्देश्य खनन क्षेत्र में पारदर्शिता, दक्षता और प्रतिस्पर्धा को बढ़ाना हो सकता है, लेकिन यह राज्यों के अधिकारों के साथ टकराव पैदा कर रहा है।
- यह विधेयक केंद्र सरकार को कुछ खनिजों के लिए ‘खनिज-युक्त भूमि’ के संबंध में अधिक शक्तियाँ प्रदान करने का प्रयास करता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 | यह विधेयक केंद्र सरकार द्वारा खनन क्षेत्र में नियामक शक्तियों के विस्तार का प्रयास करता है। |
| राज्य सूची की प्रविष्टि 18 (भूमि) | संविधान के अनुसार, भूमि राज्य सूची का विषय है, जिस पर राज्यों को विशेष विधायी शक्ति प्राप्त है। |
| खनिज-युक्त भूमि की परिभाषा का विस्तार | केंद्र सरकार तटीय क्षेत्रों और वनों को भी शामिल करते हुए ‘खनिज-युक्त भूमि’ की परिभाषा का विस्तार करना चाहती है, जिससे राज्यों की शक्तियों का अतिक्रमण हो सकता है। |
| संघीय ढाँचे पर खतरा | राज्यों का मानना है कि यह विधेयक शक्तियों के संवैधानिक वितरण का उल्लंघन करता है और भारत के संघीय ढाँचे के लिए गंभीर खतरा है। |
| विझिंजम अंतर्राष्ट्रीय बंदरगाह | यह केरल में एक महत्वपूर्ण बंदरगाह है जो अब तक केवल ट्रांसशिपमेंट संचालन संभाल रहा था, लेकिन अब सीधे EXIM (निर्यात-आयात) कार्गो आवाजाही शुरू करेगा। |
महत्व
राजकोषीय संघवाद पर प्रभाव
- खनन राजस्व राज्यों के लिए आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। यदि केंद्र सरकार खनन पर अधिक नियंत्रण प्राप्त करती है, तो राज्यों की राजस्व स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।
- शक्तियों के वितरण में बदलाव से राज्यों की वित्तीय स्थिति पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे केंद्र पर उनकी निर्भरता बढ़ सकती है।
राज्यों की विधायी स्वायत्तता
- संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत भूमि राज्य सूची का विषय है। इस विधेयक के माध्यम से केंद्र का हस्तक्षेप राज्यों की इस विशेष विधायी शक्ति का उल्लंघन कर सकता है।
- यह राज्यों को अपने भू-संसाधनों के प्रबंधन और विकास के संबंध में निर्णय लेने की क्षमता को कमजोर कर सकता है।
संघीय ढाँचे का संरक्षण
- भारत का संविधान संघवाद के सिद्धांत पर आधारित है, जहाँ केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन है। इस तरह के विधेयक संघीय संतुलन को बिगाड़ सकते हैं।
- राज्यों द्वारा कानूनी चुनौती की संभावना यह दर्शाती है कि यह मुद्दा संवैधानिक सिद्धांतों और संघीय संबंधों के लिए कितना महत्वपूर्ण है।
आर्थिक विकास और बुनियादी ढाँचा
- विझिंजम बंदरगाह पर सीधे EXIM कार्गो आवाजाही शुरू होने से केरल के लिए प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ होंगे, जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।
- यह बंदरगाह भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और समुद्री लॉजिस्टिक्स में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, जिससे व्यापार सुगमता में सुधार होगा।
चुनौतियाँ
1. संघीय संतुलन का उल्लंघन
- यह विधेयक राज्यों की विधायी शक्तियों का अतिक्रमण करके संवैधानिक रूप से स्थापित संघीय संतुलन को बाधित कर सकता है।
- शक्तियों के वितरण में बदलाव से केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव बढ़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
2. राजस्व स्वायत्तता पर प्रभाव
- खनन से प्राप्त राजस्व राज्यों के लिए महत्वपूर्ण है। केंद्र के अधिक नियंत्रण से राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता कम हो सकती है।
- यह राज्यों को अपने विकास कार्यक्रमों के लिए धन जुटाने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: राजकोषीय संघवाद, राज्य वित्त
3. पर्यावरण और तटीय क्षेत्र प्रबंधन
- ‘खनिज-युक्त भूमि’ की परिभाषा में तटीय क्षेत्रों और वनों को शामिल करने से इन संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्रों पर खनन गतिविधियों का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
- राज्यों को अपने पर्यावरण की रक्षा और सतत विकास सुनिश्चित करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण, तटीय क्षेत्र प्रबंधन
4. न्यायिक समीक्षा की संभावना
- यदि यह विधेयक कानून बन जाता है, तो राज्यों द्वारा इसे संवैधानिक वैधता के आधार पर चुनौती दी जा सकती है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया में लंबा समय लग सकता है।
- न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का परिणाम केंद्र-राज्य संबंधों और खनन नीति के भविष्य को निर्धारित करेगा।
यूपीएससी लिंक: न्यायिक समीक्षा, संवैधानिक कानून
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| विधायी शक्तियों का अतिक्रमण | केंद्र द्वारा राज्य सूची के विषय (भूमि) पर कानून बनाने का प्रयास, जो संवैधानिक शक्तियों के वितरण का उल्लंघन है। |
| संघीय ढाँचे पर खतरा | राज्यों की स्वायत्तता को कमजोर करना और केंद्र-राज्य संबंधों में असंतुलन पैदा करना। |
| राजस्व हानि की संभावना | खनन से प्राप्त होने वाले राज्य राजस्व पर केंद्र के बढ़ते नियंत्रण से राज्यों की वित्तीय स्थिति प्रभावित हो सकती है। |
| पर्यावरणीय प्रभाव | तटीय क्षेत्रों और वनों में खनन गतिविधियों के विस्तार से संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्रों को नुकसान पहुँच सकता है। |
| राज्यों की आपत्ति और कानूनी चुनौती | केरल जैसे राज्यों द्वारा विधेयक का कड़ा विरोध और कानूनी उपायों पर विचार, जिससे संवैधानिक विवाद उत्पन्न हो सकता है। |
आगे की राह
- केंद्र और राज्यों के बीच सार्थक संवाद स्थापित किया जाए ताकि खनन नीति पर आम सहमति बन सके।
- विधेयक के प्रावधानों की सावधानीपूर्वक समीक्षा की जाए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे संवैधानिक सिद्धांतों और संघीय ढाँचे के अनुरूप हैं।
- शक्तियों के वितरण के संबंध में राज्यों की चिंताओं को दूर करने के लिए विधेयक में आवश्यक संशोधन किए जाएँ।
- खनन से संबंधित राजस्व साझाकरण के लिए एक पारदर्शी और न्यायसंगत तंत्र विकसित किया जाए।
- पर्यावरण संरक्षण और सतत खनन प्रथाओं को सुनिश्चित करने के लिए मजबूत नियामक ढाँचा तैयार किया जाए।
- विवादों के समाधान के लिए अंतर-राज्यीय परिषदों (Inter-State Councils) जैसे संवैधानिक मंचों का प्रभावी ढंग से उपयोग किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
संघवाद · केंद्र-राज्य संबंध · सातवीं अनुसूची · राज्य सूची · संघ सूची · समवर्ती सूची · खनन और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक · भूमि · संवैधानिक शक्तियां · न्यायिक समीक्षा · विधेयक · कानून
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘विधायी शक्तियों का वितरण’}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘संघ, राज्य और समवर्ती सूची’}
- {‘article’: ‘राज्य सूची की प्रविष्टि 18’, ‘note’: ‘भूमि पर राज्यों की शक्ति’}
- {‘article’: ‘राज्य सूची की प्रविष्टि 23’, ‘note’: ‘खनन पर राज्यों की शक्ति’}
- {‘article’: ‘संघ सूची की प्रविष्टि 54’, ‘note’: ‘खनन पर केंद्र की शक्ति’}
अवधारणा प्रवाह
केंद्र सरकार द्वारा खनन संशोधन विधेयक, 2026 प्रस्तुत किया गया। → विधेयक ‘खनिज-युक्त भूमि’ की परिभाषा का विस्तार करता है, जिसमें तटीय क्षेत्र और वन शामिल हैं। → राज्यों का आरोप है कि यह भूमि पर उनकी संवैधानिक शक्तियों का अतिक्रमण है। → यह भारत के संघीय ढाँचे और केंद्र-राज्य संबंधों पर गंभीर प्रश्न उठाता है। → केरल सरकार ने कानूनी और राजनीतिक विरोध की घोषणा की है। → यह मुद्दा न्यायिक समीक्षा और संवैधानिक व्याख्या की ओर ले जा सकता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के वितरण से संबंधित है।
2. ‘भूमि’ विषय संविधान की राज्य सूची की प्रविष्टि 18 के अंतर्गत आता है।
3. संसद के पास राज्य सूची में उल्लिखित विषयों पर कानून बनाने की विशेष शक्ति है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि सातवीं अनुसूची केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के वितरण का प्रावधान करती है। कथन 2 भी सही है क्योंकि ‘भूमि’ राज्य सूची की प्रविष्टि 18 के तहत राज्यों के विधायी अधिकार क्षेत्र में आती है। कथन 3 गलत है क्योंकि संसद के पास संघ सूची के विषयों पर विशेष शक्ति है, जबकि राज्य सूची के विषयों पर राज्यों के पास विशेष शक्ति होती है।
Q2. अभिकथन (A): केंद्र सरकार द्वारा पारित खनन और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026, राज्यों की संवैधानिक शक्तियों का अतिक्रमण कर सकता है।
कारण (R): यह विधेयक ‘खनिज-युक्त भूमि’ की परिभाषा के माध्यम से भूमि से संबंधित शक्तियों को केंद्रीय अधिकार क्षेत्र में लाने का प्रयास करता है, जबकि भूमि राज्य सूची का विषय है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सत्य हैं, और कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है। विधेयक भूमि से संबंधित शक्तियों को केंद्रीय अधिकार क्षेत्र में लाने का प्रयास कर रहा है, जो राज्य सूची का विषय है, और इस प्रकार राज्यों की संवैधानिक शक्तियों का अतिक्रमण कर सकता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारतीय संघवाद के संदर्भ में केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के वितरण की विवेचना कीजिए। खनन और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 जैसे हालिया विधायी प्रयासों के आलोक में राज्यों की स्वायत्तता पर इसके संभावित प्रभावों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: यह उत्तर भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के वितरण की विस्तृत व्याख्या से शुरू होगा, जिसमें संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची का उल्लेख होगा। विशेष रूप से, ‘भूमि’ और ‘खनन’ से संबंधित प्रविष्टियों (राज्य सूची की प्रविष्टि 18 और संघ सूची की प्रविष्टि 54) पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इसके बाद, खनन और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 के प्रमुख प्रावधानों और ‘खनिज-युक्त भूमि’ की परिभाषा के माध्यम से केंद्र द्वारा अधिकार क्षेत्र के विस्तार के प्रयासों पर चर्चा की जाएगी। उत्तर में केरल सरकार द्वारा उठाए गए आपत्तियों को शामिल किया जाएगा, जिसमें राज्यों की संवैधानिक शक्तियों के अतिक्रमण और संघीय ढांचे के लिए खतरे पर जोर दिया जाएगा। अंत में, राज्यों की स्वायत्तता पर ऐसे विधायी प्रयासों के संभावित प्रभावों का आलोचनात्मक विश्लेषण किया जाएगा, जिसमें न्यायिक समीक्षा की भूमिका और सहकारी संघवाद के सिद्धांतों का उल्लेख होगा।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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