छत्रपति शिवाजी महाराज : भारतीय राष्ट्रीयता और स्वशासन के अग्रदूत

छत्रपति शिवाजी महाराज : भारतीय राष्ट्रीयता और स्वशासन के अग्रदूत

  • सामान्य अध्ययन – प्रश्न पत्र – 1 – के अंतर्गत ‘ भारतीय कला एवं संस्कृति’, भारतीय इतिहास के महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व, आधुनिक भारतीय इतिहास ’ खण्ड से संबंधित। 
  • प्रारंभिक परीक्षा के – ‘ छत्रपति शिवाजी महाराज, हिंदवी स्वराज, अष्टप्रधान मंडल, शिवनेरी दुर्ग, राज्य व्यवहार कोष, गुरिल्ला युद्ध, पुरंदर की संधि, छत्रपति संभाजी महाराज ’ खण्ड से संबंधित। 

 

खबरों में क्यों?

 

 

  • हाल ही में 3 अप्रैल को छत्रपति शिवाजी महाराज की पुण्यतिथि (Death Anniversary) के अवसर पर देशभर में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। 
  • हाल ही में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह द्वारा छत्रपति शिवाजी महाराज की पुण्यतिथि (Death Anniversary) पर उन्हें दी गई श्रद्धांजलि ने एक बार फिर उनके द्वारा स्थापित ‘हिंदवी स्वराज’ के सिद्धांतों और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। 
  • इसके अतिरिक्त, हाल के वर्षों में शिवाजी महाराज के ‘वाघ नख’ (बाघ के पंजे) को ब्रिटेन से भारत वापस लाने के प्रयासों ने भी उनके इतिहास के प्रति जन-रुचि को बढ़ाया है।

 

शिवाजी महाराज का जीवन – परिचय : एक जननायक का उदय : 

 

  • जन्म : शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी, 1630 को पुणे के निकट शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। उनके पिता शाहजी भोंसले बीजापुर सल्तनत में एक उच्चाधिकारी थे और माता जीजाबाई एक अत्यंत धर्मनिष्ठ और स्वाभिमानी महिला थीं।
  • बचपन और संस्कार : शिवाजी के व्यक्तित्व पर उनकी माता जीजाबाई और उनके गुरु दादोजी कोंडदेव का गहरा प्रभाव था। रामायण और महाभारत की कहानियों ने उनमें साहस और नैतिकता के बीज बोए।
  • प्रारंभिक विजय : मात्र 16 वर्ष की आयु में उन्होंने तोरणा किले पर विजय प्राप्त कर अपने सैन्य अभियान की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने चाकन, कोंडाणा और पुरंदर जैसे किलों पर अधिकार कर लिया।

 

हिंदवी स्वराज का दृष्टिकोण और लक्ष्य : देश की संप्रभुता का स्वप्न

 

  • शिवाजी महाराज का लक्ष्य केवल राज्य जीतना नहीं था, बल्कि ‘हिंदवी स्वराज’ की स्थापना करना भी था। यह विचार उस समय के विदेशी और अत्याचारी शासन के विरुद्ध एक मौलिक भारतीय प्रतिक्रिया थी।
  • स्वदेशी संप्रभुता : स्वराज का अर्थ था – ‘ऐसी सत्ता जो अपनी हो, अपनी भूमि से जुड़ी हो और अपने लोगों के लिए हो।’
  • सांस्कृतिक पुनरुत्थान : उन्होंने फारसी के स्थान पर मराठी और संस्कृत को राजकाज की भाषा बनाने के लिए ‘राज्य व्यवहार कोष’ तैयार करवाया।
  • धार्मिक सहिष्णुता : उनका स्वराज धर्मनिरपेक्षता का एक प्रारंभिक रूप था। उन्होंने मंदिरों की रक्षा की, लेकिन उनकी सेना और प्रशासन में मुसलमान भी उच्च पदों पर आसीन थे।

 

शिवाजी का अष्टप्रधान प्रशासन : शासन की रीढ़ : 

 

  • शिवाजी महाराज ने अपने शासनकाल में प्रशासन को सुव्यवस्थित करने के लिए एक केन्द्रीकृत ‘अष्टप्रधान मंडल’ की स्थापना की थी। यह एक प्रकार की कैबिनेट प्रणाली थी जहाँ प्रत्येक मंत्री सीधे महाराज के प्रति उत्तरदायी था।

 

पद नाम संबंधित कार्य
पेशवा मुख्य प्रधान राज्य का सामान्य प्रशासन और कल्याण।
अमात्य वित्त मंत्री आय और व्यय का लेखा-जोखा रखना।
वाकयानवीस गृह मंत्री खुफिया विभाग, डाक और घरेलू मामले।
शुरुनवीस सचिव राजकीय पत्राचार की देखरेख।
दबीर/सुमंत विदेश मंत्री अन्य राज्यों के साथ कूटनीतिक संबंध।
सर-ए-नौबत सेनापति सैन्य भर्ती, प्रशिक्षण और अनुशासन।
पंडित राव उच्च पुरोहित धार्मिक मामले और दान-पुण्य।
न्यायाधीश मुख्य न्यायाधीश दीवानी और फौजदारी न्याय का प्रबंधन।

 

शिवाजी महाराज द्वारा लड़े गए प्रमुख युद्ध और सैन्य रणनीति : 

 

  • शिवाजी महाराज को ‘गुरिल्ला युद्ध’ ( गनिमी कावा ) का पितामह माना जाता है। उन्होंने भौगोलिक परिस्थितियों का लाभ उठाकर छोटी सेना के साथ ही, मुगलों की बड़ी सेना और बीजापुर सेनाओं को परास्त किया था।
  • प्रतापगढ़ का युद्ध (1659) : यह उनकी सबसे साहसी जीत थी। उन्होंने बीजापुर के सेनापति अफजल खान और उसकी विशाल सेना को अपने ‘वाघ नख’ से मार गिराया।
  • पुरंदर का युद्ध और संधि (1665) : जयसिंह के साथ हुई संधि के कारण उन्हें कई किले देने पड़े, लेकिन यह उनकी कूटनीतिक चाल थी ताकि वे भविष्य के लिए शक्ति संचय कर सकें।
  • सिंहगढ़ का युद्ध (1670) : शिवाजी महाराज ने तानाजी मालुसरे के बलिदान के साथ इस दुर्ग पर विजय प्राप्त की। इसी अवसर पर शिवाजी ने कहा था कि – “ गढ़ आला पण सिंह गेला” (गढ़ तो आया, पर सिंह चला गया)।
  • सूरत की लूट (1664 और 1670) : मुगलों की आर्थिक कमर तोड़ने के लिए उन्होंने सूरत के समृद्ध व्यापारिक केंद्र पर हमला किया था।

 

नौसेना के जनक ( Father of Indian Navy ) : 

 

  • शिवाजी महाराज पहले भारतीय शासक थे जिन्होंने यह समझा कि समुद्री तटों की सुरक्षा के बिना स्वशासन करना और उसका देखना एकदम अधूरा है। अतः उन्होंने सिंधुदुर्ग, विजयदुर्ग और खांदेरी जैसे मजबूत जल-दुर्गों का निर्माण करवाया। उन्होंने एक शक्तिशाली नौसेना तैयार की ताकि कोंकण तट पर डच, पुर्तगाली और अंग्रेजों के प्रभाव को नियंत्रित किया जा सके।

 

प्रमुख उपाधियाँ और राज्याभिषेक : 

 

  • शिवाजी महाराज का 6 जून, 1674 को रायगढ़ के किले में विधिवत राज्याभिषेक हुआ था। उन्होंने निम्नलिखित उपाधियाँ धारण कीं:
  • छत्रपति : ( सम्राटों का सम्राट )।
  • शककर्त्ता : ( एक नए युग का प्रवर्तक )।
  • क्षत्रिय कुलावतंस : ( क्षत्रिय वंश का आभूषण )।
  • हैन्दव धर्मोद्धारक : ( हिंदू धर्म का उद्धार करने वाला )।

 

मृत्यु और उत्तराधिकार : 

 

  • शिवाजी महाराज का लगातार युद्ध अभियानों और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं (पेचिश और बुखार) के कारण 3 अप्रैल, 1680 को रायगढ़ किले में ही, इस महान नायक का निधन हो गया। उनके बाद उनके पुत्र छत्रपति संभाजी महाराज ने उनके संघर्ष को आगे बढ़ाया, जिन्होंने मुगलों के सामने झुकने के बजाय बलिदान को चुना।

 

शिवाजी महाराज के शासन सिद्धांत की वर्तमान प्रासंगिकता : 

 

  • शिवाजी महाराज के शासन के सिद्धांत वर्तमान समय में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। इनके शासन सिद्धांत से निम्नांकित सूत्रों को अपनाया जा सकता है –  
  1. स्वदेशी भावना : आत्मनिर्भर भारत के विचार में ‘स्वराज’ की झलक मिलती है।
  2. महिला सम्मान : उन्होंने युद्धबंदी महिलाओं के साथ भी सम्मानजनक व्यवहार की कठोर नीति लागू की थी।
  3. कुशल प्रबंधन : उनकी जल संरक्षण प्रणाली और किलों का वास्तुशिल्प आज भी इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उदाहरण है।
  4. नौसैनिक शक्ति : भारत की वर्तमान समुद्री रणनीति आज भी उन्हीं के पदचिह्नों पर आधारित है।

 

निष्कर्ष : 

 

 

  • छत्रपति शिवाजी महाराज केवल एक हिंदू राजा ही नहीं थे, बल्कि वे एक ‘राष्ट्र निर्माता’ भी थे। उन्होंने शून्य से आरंभ कर एक शक्तिशाली साम्राज्य खड़ा किया और लोगों के मन से मुगलों की अपराजेयता का डर निकाल दिया। 
  • छत्रपति शिवाजी महाराज न केवल एक कुशल योद्धा थे, बल्कि एक दूरदर्शी राजनेता और समाज सुधारक भी थे। उनका शासन न्याय, समानता और स्वाभिमान पर आधारित था। 
  • ‘स्वराज’ के प्रति उनका समर्पण और उनकी प्रशासनिक सूझबूझ उन्हें विश्व के महानतम जननायकों की श्रेणी में खड़ा करती है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सीमित संसाधनों के बावजूद यदि संकल्प दृढ़ हो, तो इतिहास की क्रूरतम से क्रूरतम धारा को बदला जा सकता है।

 

“निश्चयाचा महामेरु, बहुतजनांसी आधारु, अखंडस्थितीचा निर्धारु, श्रीमंत योगी।”

(निश्चय का महान पर्वत, बहुजन का आधार, अखंड स्थिति का निर्धारण करने वाले – वही हमारे श्रीमंत योगी (शिवाजी) हैं।)

 

स्रोत – पी.आई.बी एवं द हिन्दू। 

 

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न : 

 

Q.1. प्रशासनिक ढाँचा ‘अष्टप्रधान’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए : 

  1. ‘अष्टप्रधान’ एक कैबिनेट प्रणाली थी जहाँ प्रत्येक मंत्री सीधे छत्रपति के प्रति उत्तरदायी था।
  2. ‘अमात्य’ का मुख्य कार्य विदेशी राज्यों के साथ कूटनीतिक संबंध बनाए रखना था।
  3. ‘वाकयानवीस’ गृह मंत्री के रूप में खुफिया विभाग और घरेलू मामलों की देखरेख करता था।
  4. ‘पंडित राव’ सैन्य भर्ती और अनुशासन के लिए जिम्मेदार था।

कूट का उपयोग कर सही विकल्प का चयन करें : 

A. केवल कथन 1 और 2 

B. केवल कथन 1 और 3 

C. केवल कथन 2 और 4 

D. उपरोक्त सभी कथन।

  • उत्तर: B. केवल 1 और 3 
  • व्याख्या : कथन 2 गलत है क्योंकि ‘अमात्य’ वित्त मंत्री था, जबकि विदेशी मामलों का कार्य ‘सुमंत/दबीर’ का था। कथन 4 भी गलत है क्योंकि ‘पंडित राव’ धार्मिक मामलों के प्रमुख थे, सैन्य विभाग ‘सर-ए-नौबत’ के पास था।

 

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न : 

Q. 1. छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित ‘हिंदवी स्वराज’ के मूल सिद्धांतों की विवेचना कीजिए तथा वर्तमान भारत के प्रशासनिक एवं सैन्य (विशेषकर नौसेना) ढाँचे और रणनीति में उनकी प्रासंगिकता को स्पष्ट कीजिए। (शब्द सीमा – 250 अंक – 15)

Dr. Akhilesh Kumar Shrivastava
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