जीआरएसई में ‘श्रेयस’ एनजीओपीवी लॉन्च: आत्मनिर्भर भारत की ओर बड़ा कदम

जीआरएसई में 'श्रेयस' एनजीओपीवी लॉन्च: आत्मनिर्भर भारत की ओर बड़ा कदम

जीआरएसई में ‘श्रेयस’ एनजीओपीवी लॉन्च: आत्मनिर्भर भारत की ओर बड़ा कदम

स्वदेशी एनजीओपीवी निर्माण प्रक्रियाडिजाइनस्वदेशीनिर्माणजीआरएसई/जीएसएलजलावतरणनौसेना को सौंपतैनातीसमुद्री सुरक्षा
स्वदेशी एनजीओपीवी निर्माण प्रक्रिया

✎ अगली पीढ़ी के अपतटीय गश्ती पोत 'श्रेयस' का जलावतरण भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने और 'आत्मनिर्भर भारत' के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था  |  GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध (समुद्री सुरक्षा के संदर्भ में)
  • Prelims: अगली पीढ़ी के अपतटीय गश्ती पोत (NGOPV), श्रेयस पोत, गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE), गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL), आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, समुद्री निगरानी, मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR)
  • Essay: भारत की बढ़ती समुद्री शक्ति और क्षेत्रीय सुरक्षा, आत्मनिर्भरता के माध्यम से राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करना

त्वरित पुनरावृत्ति: अगली पीढ़ी के अपतटीय गश्ती पोत ‘श्रेयस’ का जलावतरण भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

10 अक्टूबर 2026 को, मेसर्स गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE), कोलकाता में भारतीय नौसेना के उप प्रमुख वाइस एडमिरल अजय कोचर की उपस्थिति में अगली पीढ़ी के अपतटीय गश्ती पोत (NGOPV) यार्ड 3040, ‘श्रेयस’ का जलावतरण किया गया। यह घटना भारत के स्वदेशी पोत निर्माण प्रयासों और ‘आत्मनिर्भर भारत’ तथा ‘मेक इन इंडिया’ पहलों के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

पृष्ठभूमि

  • भारतीय नौसेना के लिए अगली पीढ़ी के अपतटीय गश्ती पोतों (NGOPV) का निर्माण गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL), गोवा और गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE), कोलकाता में एक साथ किया जा रहा है।
  • ये पोत स्वदेशी रूप से डिजाइन और निर्मित किए गए हैं, जो भारत की रक्षा विनिर्माण क्षमताओं में महत्वपूर्ण प्रगति का प्रतीक हैं।
  • NGOPV का उद्देश्य मौजूदा अपतटीय गश्ती पोतों (OPV) और नौसेना अपतटीय गश्ती पोतों (NOPV) की क्षमताओं को बढ़ाना है।
  • इन पोतों का नाम भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से लिया गया है; ‘श्रेयस’ शब्द संस्कृत से लिया गया है, जिसका अर्थ ‘सर्वश्रेष्ठ’ या ‘अति उत्कृष्ट’ है।
  • यह जलावतरण भारत सरकार की ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ जैसी प्रमुख पहलों के अनुरूप है, जो रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर जोर देती हैं।
  • यह परियोजना समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है।

अगली पीढ़ी के अपतटीय गश्ती पोत (NGOPV) क्या हैं?

  • अगली पीढ़ी के अपतटीय गश्ती पोत (NGOPV) भारतीय नौसेना के लिए अत्याधुनिक युद्धपोत हैं, जिन्हें विभिन्न समुद्री अभियानों के लिए डिज़ाइन किया गया है।
  • इन पोतों को विशेष रूप से समुद्री निगरानी (Maritime Surveillance), खोज और बचाव (Search and Rescue) अभियानों के लिए उन्नत क्षमताओं के साथ तैयार किया गया है।
  • NGOPV भारत के अपतटीय परिसंपत्तियों की सुरक्षा (Protection of Offshore Assets) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे, जिनमें तेल और गैस रिग तथा अन्य महत्वपूर्ण समुद्री बुनियादी ढाँचे शामिल हैं।
  • ये पोत मानवीय सहायता और आपदा राहत (Humanitarian Assistance and Disaster Relief – HADR) अभियानों में भी सक्षम हैं, जो प्राकृतिक आपदाओं या अन्य आपात स्थितियों के दौरान सहायता प्रदान कर सकते हैं।
  • NGOPV समुद्री डकैती-रोधी अभियानों (Anti-Piracy Operations) में भी भाग लेंगे, जिससे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
  • इन पोतों को मल्टी-डोमेन ऑपरेशन्स (Multi-Domain Operations) के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिसका अर्थ है कि वे एक साथ कई प्रकार के कार्यों को अंजाम दे सकते हैं।
  • इनका निर्माण भारत के दो प्रमुख शिपयार्ड, गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) और गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) द्वारा किया जा रहा है, जो स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देता है।
  • NGOPV भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमताओं को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाएंगे, जिससे भारत की समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव मजबूत होगा।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
अगली पीढ़ी के अपतटीय गश्ती पोत (एनजीओपीवी) भारतीय नौसेना की समुद्री निगरानी और सुरक्षा क्षमताओं में वृद्धि।
स्वदेशी डिजाइन और निर्माण ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ पहलों के अनुरूप, रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा।
मल्टी-डोमेन ऑपरेशन्स समुद्री निगरानी, खोज और बचाव, अपतटीय परिसंपत्तियों की सुरक्षा, मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) तथा समुद्री डकैती-रोधी अभियानों में उपयोग।
दो शिपयार्ड में निर्माण (GSL, गोवा और GRSE, कोलकाता) उत्पादन क्षमता में वृद्धि और परियोजना के समय पर पूरा होने को सुनिश्चित करना।
पोत का नाम ‘श्रेयस’ भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक, संस्कृत में ‘सर्वश्रेष्ठ’ या ‘अति उत्कृष्ट’ अर्थ।

महत्व

सामरिक महत्व

  • ये पोत भारत की समुद्री सुरक्षा को सुदृढ़ करेंगे, विशेषकर हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती भू-रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में।
  • समुद्री डकैती-रोधी अभियानों और मानवीय सहायता तथा आपदा राहत (HADR) कार्यों में भारत की क्षमता को बढ़ाएंगे, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता में योगदान मिलेगा।

आर्थिक महत्व

  • स्वदेशी निर्माण से रक्षा क्षेत्र में घरेलू उद्योग को बढ़ावा मिलेगा, जिससे रोजगार सृजन और तकनीकी विकास होगा।
  • रक्षा आयात पर निर्भरता कम होगी, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य को बल मिलेगा।

तकनीकी महत्व

  • इन पोतों का स्वदेशी डिजाइन और निर्माण भारत की इंजीनियरिंग और विनिर्माण क्षमताओं को प्रदर्शित करता है।
  • आधुनिक समुद्री प्रौद्योगिकियों के विकास और एकीकरण को बढ़ावा मिलेगा।

अंतर्राष्ट्रीय संबंध

  • भारत की समुद्री शक्ति में वृद्धि से क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर उसकी रणनीतिक स्थिति मजबूत होगी।
  • यह अन्य देशों के साथ रक्षा सहयोग और साझेदारी के अवसर भी प्रदान कर सकता है।

चुनौतियाँ

1. तकनीकी आत्मनिर्भरता

  • कुछ महत्वपूर्ण घटकों और प्रणालियों के लिए अभी भी विदेशी निर्भरता बनी हुई है।
  • अत्याधुनिक रक्षा प्रौद्योगिकियों के अनुसंधान और विकास में निवेश की आवश्यकता।

2. परियोजना प्रबंधन और समय-सीमा

  • बड़े और जटिल रक्षा परियोजनाओं में अक्सर देरी और लागत में वृद्धि का जोखिम होता है।
  • परियोजनाओं को समय पर और बजट के भीतर पूरा करने के लिए प्रभावी निगरानी और प्रबंधन की आवश्यकता।

3. मानव संसाधन और कौशल विकास

  • रक्षा विनिर्माण क्षेत्र में कुशल कार्यबल की कमी।
  • उच्च-तकनीकी पोत निर्माण के लिए विशेष प्रशिक्षण और कौशल विकास कार्यक्रमों की आवश्यकता।

4. गुणवत्ता नियंत्रण और मानकीकरण

  • स्वदेशी रूप से निर्मित उपकरणों और प्रणालियों में उच्च गुणवत्ता मानकों को बनाए रखना।
  • अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप प्रमाणन और मानकीकरण सुनिश्चित करना।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
रक्षा बजट आवंटन आधुनिक नौसेना के लिए पर्याप्त और निरंतर वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला महत्वपूर्ण रक्षा उपकरणों और कच्चे माल के लिए वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भरता।
साइबर सुरक्षा आधुनिक नौसैनिक प्रणालियों में साइबर हमलों से बचाव की आवश्यकता।
पर्यावरणीय प्रभाव पोत निर्माण और संचालन के पर्यावरणीय प्रभावों का प्रबंधन।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • आत्मनिर्भर भारत
  • मेक इन इंडिया

आगे की राह

  • रक्षा अनुसंधान एवं विकास में निवेश बढ़ाना ताकि महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में पूर्ण आत्मनिर्भरता प्राप्त की जा सके।
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी को और प्रोत्साहित करना और उन्हें रक्षा उत्पादन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए अनुकूल माहौल प्रदान करना।
  • परियोजना प्रबंधन क्षमताओं को सुदृढ़ करना ताकि रक्षा परियोजनाओं में देरी और लागत में वृद्धि को कम किया जा सके।
  • रक्षा विनिर्माण क्षेत्र के लिए कुशल कार्यबल तैयार करने हेतु कौशल विकास कार्यक्रमों और प्रशिक्षण पहलों को बढ़ावा देना।
  • अंतर्राष्ट्रीय रक्षा सहयोग को बढ़ावा देना, विशेषकर प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और संयुक्त विकास परियोजनाओं के लिए।
  • नौसेना के आधुनिकीकरण और विस्तार के लिए पर्याप्त और निरंतर बजटीय आवंटन सुनिश्चित करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

आत्मनिर्भर भारत · मेक इन इंडिया · स्वदेशी रक्षा उत्पादन · भारतीय नौसेना · समुद्री सुरक्षा · अपतटीय गश्ती पोत (OPV) · रक्षा अधिग्रहण · सामरिक स्वायत्तता · सागर (SAGAR) सिद्धांत · हिंद-प्रशांत क्षेत्र

अवधारणा प्रवाह

सरकार की ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ पहलें  →  स्वदेशी रक्षा उत्पादन पर जोर  →  अगली पीढ़ी के अपतटीय गश्ती पोतों (एनजीओपीवी) का निर्माण  →  भारतीय नौसेना की समुद्री सुरक्षा क्षमता में वृद्धि  →  भारत की सामरिक स्थिति का सुदृढ़ीकरण

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. अगली पीढ़ी के अपतटीय गश्ती पोतों (एनजीओपीवी) का निर्माण केवल गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) द्वारा किया जा रहा है।
2. ये पोत समुद्री निगरानी, खोज और बचाव, तथा मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) अभियानों के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।
3. ‘श्रेयस’ नाम संस्कृत से लिया गया है जिसका अर्थ ‘सर्वश्रेष्ठ’ या ‘अति उत्कृष्ट’ होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है क्योंकि अगली पीढ़ी के अपतटीय गश्ती पोतों का निर्माण दो शिपयार्ड (GSL, गोवा और GRSE, कोलकाता) में किया जा रहा है। कथन 2 सही है, ये पोत समुद्री निगरानी, खोज और बचाव, अपतटीय परिसंपत्तियों की सुरक्षा, मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) तथा समुद्री डकैती-रोधी अभियानों जैसे मल्टी-डोमेन ऑपरेशन्स के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। कथन 3 भी सही है, ‘श्रेयस’ नाम संस्कृत से लिया गया है जिसका अर्थ ‘सर्वश्रेष्ठ’ या ‘अति उत्कृष्ट’ होता है।

Q2. अभिकथन (A): भारत सरकार की ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ पहलें रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण को बढ़ावा दे रही हैं।
कारण (R): अगली पीढ़ी के अपतटीय गश्ती पोतों (एनजीओपीवी) का स्वदेशी रूप से डिजाइन और निर्माण किया जा रहा है, जो इन पहलों के अनुरूप है।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ का उद्देश्य रक्षा उत्पादन सहित विभिन्न क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना है। कारण (R) भी सही है और अभिकथन की सही व्याख्या करता है, क्योंकि NGOPV का स्वदेशी निर्माण इन पहलों के प्रत्यक्ष परिणाम और प्रमाण हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने में स्वदेशी रक्षा उत्पादन के महत्व का परीक्षण कीजिए। ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ पहलों ने इस दिशा में कैसे योगदान दिया है, चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: भारत की विशाल तटरेखा, विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (EEZ) और समुद्री व्यापार मार्गों के संदर्भ में समुद्री सुरक्षा के महत्व को रेखांकित करें। हाल ही में लॉन्च किए गए ‘श्रेयस’ जैसे अगली पीढ़ी के अपतटीय गश्ती पोत (NGOPV) का उल्लेख करें।
2. स्वदेशी रक्षा उत्पादन का महत्व:
क. सामरिक स्वायत्तता: आयात पर निर्भरता कम करना, महत्वपूर्ण समय में आपूर्ति सुनिश्चित करना।
ख. आर्थिक लाभ: रोजगार सृजन, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, निर्यात क्षमता।
ग. सुरक्षा संवर्धन: विशिष्ट भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप डिजाइन, त्वरित रखरखाव और मरम्मत।
घ. भू-राजनीतिक प्रभाव: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की स्थिति को मजबूत करना।
3. ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ का योगदान:
क. नीतिगत ढांचा: रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया में स्वदेशीकरण को प्राथमिकता देना।
ख. निवेश और प्रोत्साहन: निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देना, अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश।
ग. प्रमुख परियोजनाएं: NGOPV, विमानवाहक पोत, पनडुब्बियों जैसी परियोजनाओं का उदाहरण।
घ. प्रौद्योगिकी विकास: उन्नत प्रौद्योगिकियों के स्वदेशी विकास पर जोर।
4. चुनौतियाँ और आगे की राह: अनुसंधान एवं विकास में निवेश की आवश्यकता, निजी क्षेत्र की पूर्ण भागीदारी, निर्यात को बढ़ावा देना।
5. निष्कर्ष: भारत की समुद्री सुरक्षा और ‘ब्लू इकोनॉमी’ (Blue Economy) के लिए स्वदेशी रक्षा उत्पादन के दीर्घकालिक लाभों को दोहराएं।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)

West Bengal PCS (WBPSC / WBCS) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: मेसर्स जीआरएसई, कोलकाता द्वारा हाल ही में लॉन्च किए गए अगली पीढ़ी के अपतटीय गश्ती पोत (ओपीवी) ‘श्रेयस’ का निर्माण किस श्रेणी के अंतर्गत किया गया है?

  1. आईएनएस विक्रमादित्य श्रेणी
  2. सागर श्रेणी
  3. समर्थ श्रेणी
  4. अभय श्रेणी

उत्तर: समर्थ श्रेणी — जीआरएसई द्वारा निर्मित ‘श्रेयस’ अगली पीढ़ी के अपतटीय गश्ती पोत ‘समर्थ’ श्रेणी के अंतर्गत आता है, जिसका उद्देश्य तटीय सुरक्षा और समुद्री निगरानी को सुदृढ़ करना है।

Mains: मेसर्स जीआरएसई, कोलकाता द्वारा निर्मित ‘श्रेयस’ जैसे अगली पीढ़ी के अपतटीय गश्ती पोतों के निर्माण से पश्चिम बंगाल के रक्षा उद्योग और तटीय सुरक्षा में क्या परिवर्तन आए हैं? अपने उत्तर में पश्चिम बंगाल के संदर्भ में विश्लेषण कीजिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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