झारखंड: खनिज विधेयक 2026 पर केंद्र के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष, जानें पूरा मामला

Jharkhand: खनिज विधेयक पर झारखंड में सियासी संग्राम, महागठबंधन बोला- राज्यों के अधिकारों से नहीं होगा समझौता — diagram

झारखंड: खनिज विधेयक 2026 पर केंद्र के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष, जानें पूरा मामला

खनिज अधिकार वितरणकेंद्र सरकारखनिज कानून बनाने की शक्तिराज्य सरकारखनिज कर एवं उपकर लगाने की शक्तिसंविधानसातवीं अनुसूची अनुसार अधिकार विभाजनन्यायालय2024 में राज्यों के अधिकार स्पष्ट किएखनिज राजस्वराज्यों के विकास के लिए आय स्रोत
खनिज अधिकार वितरण

✎ खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 राज्यों के संवैधानिक और वित्तीय अधिकारों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है, जिससे भारत के संघीय ढांचे पर बहस छिड़ गई है।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था: खनिज संसाधन, राजस्व
  • Prelims: खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, संघवाद, राज्य सूची, समवर्ती सूची, खनिज अधिकार, राजस्व बंटवारा
  • Essay: भारत में संघवाद की चुनौतियाँ और सहकारी संघवाद का महत्व, प्राकृतिक संसाधनों पर राज्यों का अधिकार और राष्ट्रीय विकास

त्वरित पुनरावृत्ति: खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 राज्यों के संवैधानिक और वित्तीय अधिकारों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है, जिससे भारत के संघीय ढांचे पर बहस छिड़ गई है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर झारखंड में राजनीतिक दलों ने विरोध दर्ज कराया है। उनका आरोप है कि यह विधेयक राज्यों के संवैधानिक और वित्तीय अधिकारों पर हमला है तथा देश के संघीय ढांचे की भावना के विपरीत है। विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर एकजुटता दिखाते हुए आगे की रणनीति बनाने की घोषणा की है।

पृष्ठभूमि

  • भारत का संविधान संघवाद (Federalism) पर आधारित है, जहाँ केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया है।
  • संविधान की सातवीं अनुसूची में संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के माध्यम से विधायी शक्तियों का वितरण किया गया है।
  • खनिज संसाधनों से संबंधित कानून बनाने की शक्ति मुख्य रूप से संसद के पास है, लेकिन राज्यों को भी कुछ हद तक खनिज अधिकारों और राजस्व पर कर लगाने की शक्ति प्राप्त है।
  • वर्ष 2024 में, उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया था कि संविधान के तहत राज्यों को खनिज अधिकारों और खनिज वाली भूमि पर कर एवं उपकर (Cess) लगाने की संवैधानिक शक्ति प्राप्त है।
  • झारखंड जैसे खनिज समृद्ध राज्य अपने राजस्व का एक बड़ा हिस्सा खनिज संसाधनों से प्राप्त करते हैं, जिसका उपयोग जनकल्याणकारी योजनाओं और राज्य के विकास में किया जाता है।
  • खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 भारत में खनन क्षेत्र को विनियमित करने वाला प्रमुख कानून है, जिसमें समय-समय पर संशोधन किए जाते रहे हैं।

खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957

  • यह अधिनियम भारत में खनन गतिविधियों के विनियमन और खनिजों के विकास के लिए एक व्यापक ढाँचा प्रदान करता है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य देश में खनिजों के व्यवस्थित और वैज्ञानिक खनन को सुनिश्चित करना है।
  • यह अधिनियम केंद्र सरकार को खनिजों के विनियमन और विकास से संबंधित नीतियाँ बनाने की शक्ति देता है।
  • राज्यों को भी इस अधिनियम के तहत कुछ शक्तियाँ प्राप्त हैं, विशेषकर खनन पट्टों (Mining Leases) और खनिजों पर रॉयल्टी (Royalty) तथा अन्य शुल्कों के संबंध में।
  • यह अधिनियम खनिजों के अन्वेषण (Exploration), खनन और उनके प्रसंस्करण (Processing) से संबंधित विभिन्न प्रावधानों को कवर करता है।
  • अधिनियम में संशोधन आमतौर पर खनन क्षेत्र में नई चुनौतियों का समाधान करने, निवेश को बढ़ावा देने या पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए किए जाते हैं।
  • राजस्व बंटवारे और रॉयल्टी दरों का निर्धारण इस अधिनियम के तहत एक महत्वपूर्ण पहलू है, जो केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों को प्रभावित करता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित यह विधेयक खनन क्षेत्र के विनियमन से संबंधित है और राज्यों के खनिज अधिकारों को प्रभावित कर सकता है।
राज्यों के संवैधानिक अधिकार भारतीय संविधान के तहत राज्यों को खनिज संसाधनों पर कर और उपकर लगाने की शक्ति प्राप्त है, जो उनके राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
संघीय ढाँचा यह विधेयक भारत के संघीय ढाँचे (Federal Structure) और केंद्र-राज्य संबंधों पर संभावित प्रभाव के कारण चर्चा में है।
खनिज राजस्व झारखंड जैसे खनिज-समृद्ध राज्यों के लिए, खनिज राजस्व उनके बजट और जनकल्याणकारी योजनाओं के वित्तपोषण का एक प्रमुख आधार है।
सहकारी संघवाद केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय की भावना, विशेषकर प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में, सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का एक महत्वपूर्ण पहलू है।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • खनिज राजस्व राज्यों के लिए आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जिसका उपयोग विकास परियोजनाओं और सामाजिक कल्याण योजनाओं के वित्तपोषण के लिए किया जाता है।
  • संशोधन विधेयक से राज्यों के राजस्व स्रोतों पर संभावित प्रभाव पड़ सकता है, जिससे उनकी वित्तीय स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।

संवैधानिक और राजनैतिक महत्व

  • यह विधेयक भारत के संघीय ढाँचे और केंद्र-राज्य संबंधों की प्रकृति पर बहस को जन्म देता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के पूर्व के निर्णयों का हवाला देते हुए राज्यों के खनिज अधिकारों की संवैधानिक वैधता पर जोर दिया जा रहा है।

सामाजिक महत्व

  • खनिज राजस्व का उपयोग गरीबों, किसानों, मजदूरों और वंचित वर्गों के कल्याण के लिए विभिन्न सामाजिक योजनाओं में किया जाता है।
  • राजस्व में कमी से इन योजनाओं पर सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे राज्य के नागरिकों की भलाई प्रभावित हो सकती है।

चुनौतियाँ

1. राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता पर प्रभाव

  • संशोधन विधेयक राज्यों के खनिज राजस्व पर उनके नियंत्रण को सीमित कर सकता है।
  • राजस्व में कमी से राज्यों की जनकल्याणकारी योजनाओं और विकास परियोजनाओं के लिए धन की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

2. संघीय ढाँचे का उल्लंघन

  • राज्यों का आरोप है कि विधेयक संघीय व्यवस्था (Federal System) की भावना के विपरीत है, जहाँ राज्यों को अपने संसाधनों पर अधिकार होता है।
  • यह केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

3. सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की अवहेलना

  • राज्यों का तर्क है कि विधेयक सर्वोच्च न्यायालय के उन ऐतिहासिक फैसलों का उल्लंघन करता है, जिन्होंने राज्यों के खनिज अधिकारों को बरकरार रखा था।
  • यह न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) और विधायी सर्वोच्चता के बीच तनाव पैदा कर सकता है।

4. सहकारी संघवाद की भावना का अभाव

  • राज्यों का मानना है कि केंद्र को राज्यों के अधिकारों का सम्मान करते हुए सहकारी संघवाद की भावना के अनुरूप कार्य करना चाहिए।
  • विधेयक को राज्यों के साथ पर्याप्त परामर्श के बिना पारित करने का आरोप है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
खनिज अधिकारों पर नियंत्रण केंद्र सरकार द्वारा राज्यों के खनिज अधिकारों को सीमित करने का प्रयास।
राजस्व हानि राज्यों के लिए खनिज राजस्व में संभावित कमी, जिससे वित्तीय संकट उत्पन्न हो सकता है।
संवैधानिक शक्ति का हनन राज्यों की संवैधानिक शक्ति पर हमला, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पुष्टि की गई है।
संघीय संतुलन केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति के संघीय संतुलन में व्यवधान की आशंका।
सामाजिक कल्याण पर प्रभाव राजस्व में कमी के कारण जनकल्याणकारी योजनाओं पर सीधा नकारात्मक प्रभाव।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • मंईयां सम्मान योजना

आगे की राह

  • केंद्र सरकार को विधेयक पर राज्यों के साथ व्यापक और सार्थक परामर्श करना चाहिए।
  • राज्यों की चिंताओं को दूर करने के लिए विधेयक में आवश्यक संशोधन किए जाने चाहिए।
  • सहकारी संघवाद की भावना को बढ़ावा देते हुए केंद्र और राज्यों के बीच विश्वास और सहयोग स्थापित किया जाना चाहिए।
  • खनिज संसाधनों के प्रबंधन में राज्यों की भूमिका और अधिकारों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए।
  • राज्यों के वित्तीय हितों की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि उनकी विकास और कल्याणकारी योजनाओं पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े।
  • सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व के निर्णयों का सम्मान करते हुए संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नीति निर्माण किया जाना चाहिए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 · संघीय ढाँचा · राज्यों के अधिकार · सहकारी संघवाद · खनिज राजस्व · न्यायिक समीक्षा · संविधान पीठ · सातवीं अनुसूची · राजकोषीय संघवाद · केंद्र-राज्य संबंध

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘संघ, राज्य और समवर्ती सूचियाँ’}
  • {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘संघ, राज्य और समवर्ती सूचियाँ’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 268-281’, ‘note’: ‘केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 298’, ‘note’: ‘व्यापार करने की शक्ति’}

अवधारणा प्रवाह

केंद्र सरकार द्वारा खनिज संशोधन विधेयक का प्रस्ताव।  →  राज्यों द्वारा विधेयक को अपने अधिकारों पर हमला मानना।  →  राज्यों के खनिज राजस्व में संभावित कमी की आशंका।  →  राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और जनकल्याणकारी योजनाओं पर प्रभाव।  →  संघीय ढाँचे और केंद्र-राज्य संबंधों पर बहस।  →  सहकारी संघवाद की भावना को बनाए रखने की आवश्यकता।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची में ‘खनिज’ विषय केवल राज्य सूची के अंतर्गत आता है।
2. सर्वोच्च न्यायालय की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने निर्णय दिया है कि राज्यों को खनिज अधिकारों और खनिज वाली भूमि पर कर एवं उपकर लगाने की संवैधानिक शक्ति प्राप्त है।
3. खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 केंद्र सरकार को खनिजों के विनियमन का अधिकार देता है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है क्योंकि ‘खनिज’ विषय संघ सूची और राज्य सूची दोनों में आता है, जिसमें विनियमन का अधिकार केंद्र सरकार के पास भी है। कथन 2 सही है, जैसा कि समाचार में उल्लिखित है। कथन 3 सही है, यह अधिनियम केंद्र सरकार को खनिजों के विकास और विनियमन का अधिकार देता है।

Q2. अभिकथन (A): भारत में संघीय ढाँचा केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के स्पष्ट विभाजन पर आधारित है।
कारण (R): संविधान की सातवीं अनुसूची में तीन सूचियाँ – संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची – शामिल हैं जो विधायी शक्तियों का वितरण करती हैं।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?

  1. A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सही है, लेकिन R गलत है।
  4. A गलत है, लेकिन R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि भारत का संघीय ढाँचा केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के विभाजन पर आधारित है। कारण (R) भी सही है और यह A की सही व्याख्या करता है, क्योंकि सातवीं अनुसूची में उल्लिखित सूचियाँ ही इस शक्ति विभाजन का आधार हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को राज्यों के संवैधानिक और वित्तीय अधिकारों पर हमले के रूप में देखा जा रहा है। इस संदर्भ में, भारत में सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की अवधारणा का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए और चर्चा कीजिए कि ऐसे विधेयक केंद्र-राज्य संबंधों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर में खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 का संक्षिप्त परिचय देना चाहिए। सहकारी संघवाद की अवधारणा को परिभाषित करना चाहिए, जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय पर जोर दिया जाता है। विधेयक के माध्यम से राज्यों के संवैधानिक और वित्तीय अधिकारों पर संभावित प्रभावों का विश्लेषण करना चाहिए, जिसमें खनिज राजस्व और राज्य के विकास पर असर शामिल है। सातवीं अनुसूची और सर्वोच्च न्यायालय के प्रासंगिक निर्णयों का उल्लेख करना चाहिए। अंत में, ऐसे विधेयक केंद्र-राज्य संबंधों पर क्या प्रभाव डाल सकते हैं, विशेष रूप से संघीय तनाव और राज्यों की स्वायत्तता के संदर्भ में, इस पर चर्चा करनी चाहिए।

स्रोत: amarujala.com


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

No Comments

Post A Comment