07 Aug डीएमके ने निर्धारित किया परिसीमन विधेयक का समर्थन करने के लिए शर्तें
✎ परिसीमन का उद्देश्य 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' के सिद्धांत को बनाए रखते हुए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को जनसंख्या परिवर्तन के अनुसार समायोजित करना है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान, संघवाद, संसद और राज्य विधायिकाएँ, केंद्र-राज्य संबंध | GS Paper II — विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप
- Prelims: परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, 1971 की जनगणना, 2026 तक सीटों का स्थगन, संविधान संशोधन विधेयक, लोकसभा सीटें, राज्यसभा सीटें
- Essay: भारत में संघवाद की चुनौतियाँ और क्षेत्रीय असमानताएँ, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और जनसंख्या नियंत्रण: एक संतुलनकारी कार्य
त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन का उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखते हुए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को जनसंख्या परिवर्तन के अनुसार समायोजित करना है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केंद्र सरकार द्वारा नए परिसीमन (Delimitation) अभ्यास के लिए संवैधानिक संशोधन विधेयक लाने की संभावना के बीच, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने विधेयक को समर्थन देने के लिए कुछ शर्तें रखी हैं। DMK चाहती है कि लोकसभा सीटों का वर्तमान स्थगन (freeze) अगले 25 वर्षों तक जारी रहे, साथ ही सभी राज्यों के लिए लोकसभा सीटों में 50% की वृद्धि की जाए। यह घटनाक्रम केंद्र द्वारा विपक्षी दलों से विधेयक के लिए समर्थन जुटाने के प्रयासों के बीच आया है।
पृष्ठभूमि
- परिसीमन का अर्थ है किसी देश या प्रांत में विधायी निकाय वाले निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करना।
- भारत में, परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) का गठन संसद के एक अधिनियम द्वारा किया जाता है।
- संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत संसद प्रत्येक जनगणना के बाद एक परिसीमन अधिनियम बनाती है।
- यह स्थगन जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को प्रोत्साहित करने के लिए किया गया था, ताकि जिन राज्यों ने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया है, उन्हें कम संसदीय प्रतिनिधित्व का दंड न मिले।
- दक्षिण भारतीय राज्य, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उन्हें डर है कि नए परिसीमन से उनकी संसदीय सीटों में कमी आ सकती है, जबकि उत्तर भारतीय राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं।
परिसीमन क्या है?
- परिसीमन का शाब्दिक अर्थ है विधायी निकाय वाले देश या प्रांत में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करने की प्रक्रिया।
- भारत में, यह प्रक्रिया परिसीमन आयोग द्वारा की जाती है, जिसका मुख्य कार्य जनसंख्या में परिवर्तन के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों की संख्या को समायोजित करना है।
- परिसीमन का उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को सुनिश्चित करना है, ताकि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या लगभग समान हो।
- संविधान के अनुच्छेद 82 के अनुसार, संसद प्रत्येक जनगणना के बाद एक परिसीमन अधिनियम बनाती है।
- परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के समान बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
- भारत में अब तक चार बार (1952, 1963, 1973 और 2002 में) परिसीमन आयोग का गठन किया गया है।
- यह स्थगन 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा किया गया था, जिसका उद्देश्य उन राज्यों को दंडित होने से बचाना था जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त की थी।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| परिसीमन (Delimitation) | संसद और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण। |
| 1971 की जनगणना पर आधारित सीटों का स्थगन | जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करने के लिए दक्षिणी राज्यों को दंडित न करने हेतु एक संवैधानिक प्रावधान। |
| लोकसभा सीटों में 50% की वृद्धि | बढ़ती जनसंख्या और प्रतिनिधित्व की आवश्यकता को समायोजित करने का प्रस्ताव। |
| संवैधानिक संशोधन विधेयक | परिसीमन प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक। |
| राज्यों के लिए सीटों की अनुसूची | प्रत्येक राज्य को मिलने वाली सीटों की संख्या में पारदर्शिता और निश्चितता। |
| संसद में दो-तिहाई बहुमत | संवैधानिक संशोधन विधेयक पारित करने के लिए अनिवार्य। |
महत्व
राजनीतिक महत्व
- यह विधेयक केंद्र और विपक्षी दलों, विशेषकर DMK, के बीच एक महत्वपूर्ण राजनीतिक गतिरोध का विषय है।
- दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व को लेकर चिंताएँ संघवाद (Federalism) और क्षेत्रीय संतुलन के मुद्दों को उठाती हैं।
- संसदीय बहुमत प्राप्त करने के लिए राजनीतिक दलों के बीच सहयोग और बातचीत की आवश्यकता को दर्शाता है।
संवैधानिक महत्व
- परिसीमन प्रक्रिया भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत आती है।
- सीटों के स्थगन को 25 साल और बढ़ाने का प्रस्ताव संविधान में संशोधन की आवश्यकता को दर्शाता है।
- यह विधेयक जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व के संवैधानिक सिद्धांतों को प्रभावित करेगा।
सामाजिक-आर्थिक महत्व
- जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे दक्षिणी राज्यों को भविष्य के परिसीमन में नुकसान होने की आशंका है।
- बढ़ी हुई सीटों से विभिन्न सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।
- यह विधेयक देश के विभिन्न क्षेत्रों के बीच विकास और संसाधनों के वितरण पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है।
चुनौतियाँ
1. संघवाद और क्षेत्रीय असंतुलन
- दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता के कारण उन्हें कम संसदीय सीटें मिलेंगी।
- यह केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव पैदा कर सकता है और क्षेत्रीय असमानताओं को बढ़ा सकता है।
यूपीएससी लिंक: राजव्यवस्था: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
2. संवैधानिक संशोधन की चुनौती
- संवैधानिक संशोधन विधेयक पारित करने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।
- विपक्षी दलों के विरोध के कारण सरकार के लिए यह बहुमत प्राप्त करना मुश्किल हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: राजव्यवस्था: संवैधानिक संशोधन प्रक्रिया
3. जनसंख्या नियंत्रण पर प्रभाव
- यदि जनसंख्या वृद्धि के आधार पर सीटें बढ़ती हैं, तो यह उन राज्यों को हतोत्साहित कर सकता है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा प्रदर्शन किया है।
- यह राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के लक्ष्यों को प्रभावित कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक मुद्दे: जनसंख्या नीति, जनसांख्यिकी
4. राजनीतिक आम सहमति का अभाव
- विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच परिसीमन के तौर-तरीकों और सीटों के आवंटन पर आम सहमति का अभाव है।
- यह विधेयक को पारित करने में देरी या बाधा उत्पन्न कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: राजव्यवस्था: राजनीतिक दल, संसदीय कार्यप्रणाली
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व | जनसंख्या नियंत्रण के कारण सीटों में कमी का डर। |
| संवैधानिक संशोधन के लिए बहुमत | विपक्षी समर्थन के बिना विधेयक पारित करने में कठिनाई। |
| जनसंख्या नियंत्रण प्रोत्साहन | सीटों में वृद्धि से जनसंख्या नियंत्रण प्रयासों पर नकारात्मक प्रभाव। |
| संघीय संतुलन | केंद्र-राज्य संबंधों में संभावित तनाव। |
| पारदर्शिता और निश्चितता | राज्यों के लिए सीटों की अनुसूची की मांग। |
| राजनीतिक आम सहमति | विभिन्न दलों के बीच मतभेद। |
आगे की राह
- केंद्र सरकार को सभी हितधारकों, विशेषकर दक्षिणी राज्यों के साथ व्यापक परामर्श करना चाहिए।
- परिसीमन के लिए एक निष्पक्ष और पारदर्शी तंत्र विकसित किया जाना चाहिए जो जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को दंडित न करे।
- जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे राज्यों को उनके प्रयासों के लिए क्षतिपूर्ति या प्रोत्साहन प्रदान करने के तरीकों पर विचार किया जाना चाहिए।
- संवैधानिक संशोधन विधेयक में सभी राज्यों के लिए सीटों की एक स्पष्ट अनुसूची शामिल की जानी चाहिए।
- राजनीतिक आम सहमति बनाने के लिए विपक्षी दलों के साथ निरंतर संवाद और बातचीत आवश्यक है।
- परिसीमन प्रक्रिया को राजनीतिकरण से बचाने के लिए एक स्वतंत्र और निष्पक्ष परिसीमन आयोग की भूमिका को मजबूत किया जाना चाहिए।
- दीर्घकालिक समाधानों पर विचार किया जाना चाहिए जो संघीय संतुलन और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व दोनों को सुनिश्चित करें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
परिसीमन · लोकसभा सीटें · संवैधानिक संशोधन · जनगणना · संघवाद · राज्यों का प्रतिनिधित्व · संसदीय लोकतंत्र · संवैधानिक नैतिकता · जनसांख्यिकीय लाभांश · राजनीतिक प्रतिनिधित्व · संसदीय प्रक्रिया · संवैधानिक प्रावधान
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘अनुच्छेद 82’: ‘प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन’}
- {‘अनुच्छेद 170’: ‘राज्यों की विधानसभाओं की संरचना’}
- {‘अनुच्छेद 330’: ‘लोकसभा में अनुसूचित जाति/जनजाति का आरक्षण’}
- {‘अनुच्छेद 332’: ‘राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति/जनजाति का आरक्षण’}
- {‘अनुच्छेद 368’: ‘संविधान में संशोधन की शक्ति’}
अवधारणा प्रवाह
जनगणना के आंकड़े जारी → परिसीमन आयोग का गठन → निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण → संवैधानिक संशोधन विधेयक का प्रस्ताव → संसद में विधेयक पर चर्चा और मतदान → नए निर्वाचन क्षेत्रों का कार्यान्वयन
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. परिसीमन का उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर सभी निर्वाचन क्षेत्रों में सीटों की संख्या को समान करना है।
2. भारत में परिसीमन आयोग एक संवैधानिक निकाय है।
3. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों को 2026 तक के लिए फ्रीज कर दिया गया था।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि परिसीमन का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करना है ताकि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या लगभग समान हो। कथन 2 गलत है क्योंकि परिसीमन आयोग एक सांविधिक निकाय है, जिसे संसद के अधिनियम द्वारा स्थापित किया जाता है। कथन 3 गलत है क्योंकि 42वें संविधान संशोधन अधिनियम ने सीटों को 2001 तक के लिए फ्रीज किया था, जिसे बाद में 84वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा 2026 तक बढ़ा दिया गया।
Q2. परिसीमन आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
2. परिसीमन आयोग के आदेशों को लोकसभा और संबंधित राज्य विधानसभाओं के समक्ष रखा जाता है, लेकिन उनमें कोई संशोधन नहीं किया जा सकता है।
उपरोक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2
- 1 और 2 दोनों
- न तो 1 और न ही 2
उत्तर: 1 और 2 दोनों — कथन 1 सही है क्योंकि परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के तहत अंतिम माना जाता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है। कथन 2 भी सही है क्योंकि आयोग के आदेशों को लोकसभा और संबंधित राज्य विधानसभाओं के समक्ष रखा जाता है, लेकिन वे उनमें कोई संशोधन नहीं कर सकते हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में परिसीमन के संवैधानिक प्रावधानों और इसके उद्देश्यों पर चर्चा कीजिए। साथ ही, दक्षिणी राज्यों द्वारा परिसीमन को लेकर व्यक्त की जा रही चिंताओं का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: परिसीमन की परिभाषा और इसका महत्व।
2. संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 82 और 170 का उल्लेख, परिसीमन आयोग अधिनियम, 84वां और 87वां संविधान संशोधन अधिनियम।
3. परिसीमन के उद्देश्य: ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को सुनिश्चित करना, जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व, निर्वाचन क्षेत्रों का युक्तिकरण।
4. दक्षिणी राज्यों की चिंताएं: जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त करने वाले राज्यों के प्रतिनिधित्व में कमी का डर, संघवाद पर प्रभाव, राजनीतिक शक्ति का पुनर्वितरण।
5. आलोचनात्मक परीक्षण: जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रोत्साहन की कमी, जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के कारण असंतुलन, राजनीतिक ध्रुवीकरण की संभावना, वैकल्पिक समाधानों पर विचार (जैसे लोकसभा सीटों में वृद्धि)।
6. निष्कर्ष: संतुलन बनाने की आवश्यकता, राष्ट्रीय एकता और राज्यों के हितों के बीच सामंजस्य।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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