07 Aug डीएमके ने सीमांकन विधेयक पर समर्थन के लिए रखे तीन शर्तें
✎ परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण कर जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है, जिसे वर्तमान में 2026 तक के लिए स्थगित किया गया है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान – ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और मूल संरचना | GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ | GS Paper II — संसद और राज्य विधायिका – संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय
- Prelims: परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, जनसंख्या जनगणना, संविधान संशोधन, लोकसभा सीटें, राज्यसभा सीटें, संघवाद
- Essay: भारत में संघवाद की चुनौतियाँ और संवैधानिक संशोधन की भूमिका, संसदीय लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व और जनसंख्या संतुलन का महत्त्व
त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण कर जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है, जिसे वर्तमान में 2026 तक के लिए स्थगित किया गया है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केंद्र सरकार द्वारा नए परिसीमन (Delimitation) अभ्यास के लिए संवैधानिक संशोधन विधेयक लाने की संभावना के बीच, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने विधेयक को समर्थन देने के लिए कुछ शर्तें रखी हैं। यह घटनाक्रम विपक्ष तक पहुँचने के सरकार के प्रयासों के बीच आया है, ताकि विधेयक के लिए आवश्यक संख्या बल जुटाया जा सके।
पृष्ठभूमि
- परिसीमन का अर्थ है किसी देश या प्रांत में विधायी निकाय वाले निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करना।
- भारत में, परिसीमन का कार्य एक उच्च-शक्ति निकाय, परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) द्वारा किया जाता है, जिसके आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत संसद प्रत्येक जनगणना के बाद एक परिसीमन अधिनियम बनाती है।
- संविधान के अनुच्छेद 170 के तहत राज्यों को भी प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है।
- यह स्थगन जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले दक्षिणी राज्यों के हितों की रक्षा के लिए किया गया था, ताकि उन्हें कम संसदीय प्रतिनिधित्व का दंड न मिले।
परिसीमन क्या है?
- परिसीमन का शाब्दिक अर्थ है किसी देश में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को तय करने या फिर से तय करने का कार्य।
- इसका मुख्य उद्देश्य जनसंख्या के समान खंडों के लिए समान प्रतिनिधित्व प्रदान करना है, ताकि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या लगभग बराबर हो।
- परिसीमन आयोग का गठन केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है और इसमें सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश, मुख्य निर्वाचन आयुक्त (Chief Election Commissioner) और संबंधित राज्यों के राज्य निर्वाचन आयुक्त (State Election Commissioners) पदेन सदस्य के रूप में शामिल होते हैं।
- आयोग अपने कार्य में किसी भी राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर कार्य करता है और इसके निर्णय अंतिम होते हैं।
- परिसीमन के माध्यम से अनुसूचित जाति (Scheduled Castes) और अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes) के लिए आरक्षित सीटों का भी निर्धारण किया जाता है, जो उनकी जनसंख्या के अनुपात में होता है।
- भारत में अब तक चार परिसीमन आयोगों का गठन किया जा चुका है — 1952, 1963, 1973 और 2002 में।
- अगला परिसीमन अभ्यास 2026 के बाद होने वाली जनगणना के आँकड़ों के आधार पर किया जाना प्रस्तावित है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| परिसीमन पर संवैधानिक स्थगन | वर्तमान में लोकसभा सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना पर आधारित है और यह स्थगन नवीनतम जनगणना (2027 में अपेक्षित) के बाद समाप्त हो रहा है। DMK इसे 25 साल और बढ़ाना चाहता है। |
| लोकसभा सीटों में 50% की वृद्धि | DMK सभी राज्यों के लिए लोकसभा सीटों में 50% की वृद्धि का समर्थन करता है, जैसा कि गृह मंत्री ने पहले मौखिक रूप से वादा किया था। यह राज्यों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाएगा। |
| प्रत्येक राज्य के लिए सीटों की अनुसूची | DMK चाहता है कि विधायी पैकेज में प्रत्येक राज्य के लिए सीटों की संख्या की एक अनुसूची शामिल हो। इससे पारदर्शिता और निश्चितता आएगी। |
| संविधान संशोधन विधेयक | केंद्र सरकार परिसीमन के लिए एक नया संविधान संशोधन विधेयक लाने की संभावना तलाश रही है, जिसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। |
| विपक्षी दलों से संपर्क | सरकार विधेयक के लिए आवश्यक संख्या बल जुटाने हेतु विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस और DMK से संपर्क कर रही है। |
महत्व
राजनीतिक महत्व
- परिसीमन (Delimitation) एक संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा है, क्योंकि यह राज्यों के चुनावी प्रतिनिधित्व और सत्ता संतुलन को प्रभावित करता है।
- दक्षिण भारतीय राज्यों को आशंका है कि जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता के कारण उन्हें कम सीटें मिल सकती हैं, जबकि उत्तर भारतीय राज्यों को अधिक सीटें मिल सकती हैं।
- DMK की शर्तें केंद्र सरकार के लिए विधेयक पारित कराने हेतु समर्थन जुटाने में महत्वपूर्ण होंगी, विशेषकर जब सरकार के पास स्वयं दो-तिहाई बहुमत नहीं है।
संवैधानिक महत्व
- परिसीमन का संबंध संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 से है, जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के आवंटन से संबंधित हैं।
- सीटों पर स्थगन (freeze) का विस्तार या उसमें बदलाव करने के लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता होगी, जिसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (दो-तिहाई) की आवश्यकता होती है।
- यह मुद्दा संघवाद (Federalism) के सिद्धांतों और राज्यों के समान प्रतिनिधित्व के अधिकार को प्रभावित करता है।
सामाजिक-आर्थिक महत्व
- जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को दंडित करने की धारणा से जनसंख्या नीति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
- सीटों में वृद्धि से संसद की कार्यप्रणाली पर प्रभाव पड़ सकता है, जैसे बहस के लिए कम समय और अधिक सदस्यों के प्रबंधन की चुनौती।
चुनौतियाँ
1. जनसंख्या नियंत्रण बनाम प्रतिनिधित्व
- दक्षिण भारतीय राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, और उन्हें डर है कि परिसीमन से लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा।
- यह चुनौती जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय लक्ष्यों और राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है।
यूपीएससी लिंक: संघवाद, जनसंख्या नीति
2. संवैधानिक संशोधन के लिए बहुमत
- परिसीमन विधेयक को पारित करने के लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता है, जिसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।
- सरकार के पास वर्तमान में स्वयं यह बहुमत नहीं है और उसे विपक्षी दलों के समर्थन की आवश्यकता होगी।
यूपीएससी लिंक: संवैधानिक संशोधन प्रक्रिया
3. राज्यों के बीच राजनीतिक सहमति
- विभिन्न राज्यों के राजनीतिक दल परिसीमन के मुद्दे पर अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं, जिससे एक आम सहमति बनाना मुश्किल हो जाता है।
- DMK जैसी पार्टियों की शर्तें विधेयक के स्वरूप और उसके पारित होने की संभावनाओं को प्रभावित करेंगी।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजनीति, संघवाद
4. संसद की कार्यक्षमता
- लोकसभा सीटों में 50% की वृद्धि से सदस्यों की संख्या काफी बढ़ जाएगी, जिससे संसद की कार्यप्रणाली और बहस की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
- बड़ी संख्या में सदस्यों का प्रबंधन और प्रभावी विधायी कार्य सुनिश्चित करना एक चुनौती होगी।
यूपीएससी लिंक: संसद की कार्यप्रणाली
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| जनसंख्या आधारित परिसीमन | जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों का प्रतिनिधित्व कम होने की आशंका। |
| संवैधानिक स्थगन की समाप्ति | 1971 की जनगणना पर आधारित सीटों का स्थगन समाप्त होने से दक्षिण भारतीय राज्यों के हितों पर नकारात्मक प्रभाव। |
| राजनीतिक सहमति का अभाव | विधेयक पारित करने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटाने में सरकार के सामने चुनौती। |
| संसद में सीटों की वृद्धि | सीटों में 50% की वृद्धि से संसद की कार्यप्रणाली और दक्षता पर संभावित नकारात्मक प्रभाव। |
| संघीय संतुलन | राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व के संतुलन को बनाए रखने और संघवाद के सिद्धांतों का सम्मान करने की आवश्यकता। |
आगे की राह
- केंद्र सरकार को सभी राज्यों और राजनीतिक दलों के साथ व्यापक परामर्श और संवाद स्थापित करना चाहिए ताकि परिसीमन के मुद्दे पर आम सहमति बनाई जा सके।
- जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के हितों की रक्षा के लिए एक तंत्र विकसित किया जाना चाहिए, ताकि उन्हें उनके प्रयासों के लिए दंडित न किया जाए।
- परिसीमन विधेयक में प्रत्येक राज्य के लिए सीटों की संख्या की एक स्पष्ट अनुसूची शामिल की जानी चाहिए ताकि पारदर्शिता और निश्चितता सुनिश्चित हो सके।
- लोकसभा सीटों में वृद्धि के साथ-साथ संसद की कार्यप्रणाली को अधिक कुशल बनाने के लिए आवश्यक सुधारों पर विचार किया जाना चाहिए।
- परिसीमन के लिए एक निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए जो संवैधानिक सिद्धांतों और संघीय ढांचे का सम्मान करती हो।
- दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए जनसंख्या नियंत्रण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया जाना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
परिसीमन · लोकसभा सीटें · संवैधानिक संशोधन · जनगणना · संघवाद · राज्यों का प्रतिनिधित्व · संसदीय लोकतंत्र · DMK की शर्तें · दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व · संवैधानिक नैतिकता
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 82’, ‘note’: ‘लोकसभा के लिए सीटों का पुनर्समायोजन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 170’, ‘note’: ‘राज्य विधानसभाओं के लिए सीटों का पुनर्समायोजन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 368’, ‘note’: ‘संविधान संशोधन की शक्ति और प्रक्रिया’}
अवधारणा प्रवाह
1971 की जनगणना पर आधारित लोकसभा सीटों पर स्थगन समाप्त हो रहा है। → केंद्र सरकार नए परिसीमन के लिए संविधान संशोधन विधेयक लाने की तैयारी में है। → DMK ने विधेयक को समर्थन देने के लिए तीन शर्तें रखी हैं। → इन शर्तों में 1976 के स्थगन को 25 साल बढ़ाना और 50% सीटों की वृद्धि शामिल है। → सरकार को विधेयक पारित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत हेतु विपक्षी समर्थन की आवश्यकता है। → परिसीमन का मुद्दा जनसंख्या नियंत्रण और राज्यों के प्रतिनिधित्व को प्रभावित करता है। → विधेयक पारित होने से भारत के संघीय ढांचे और राजनीतिक संतुलन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. परिसीमन (Delimitation) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. परिसीमन का उद्देश्य जनसंख्या के समान खंडों को समान प्रतिनिधित्व प्रदान करना है।
2. भारत में परिसीमन आयोग एक संवैधानिक निकाय है।
3. 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के परिसीमन पर लगे प्रतिबंध को 2026 तक बढ़ा दिया था।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। परिसीमन का मुख्य उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को सुनिश्चित करना है। कथन 2 सही है। परिसीमन आयोग का गठन संसद के एक अधिनियम द्वारा किया जाता है, लेकिन इसकी शक्तियाँ और कार्य संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत निर्धारित हैं, जो इसे एक संवैधानिक निकाय का दर्जा देते हैं। कथन 3 सही है। 84वें संशोधन ने 2026 तक सीटों की संख्या को 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर कर दिया था।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा अनुच्छेद संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है?
- अनुच्छेद 81
- अनुच्छेद 82
- अनुच्छेद 170
- अनुच्छेद 330
उत्तर: अनुच्छेद 82 — अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 170 राज्यों की विधानसभाओं के लिए परिसीमन से संबंधित है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ परिसीमन प्रक्रिया का उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन करना है, लेकिन यह अक्सर राजनीतिक विवादों को जन्म देती है। भारत में परिसीमन की संवैधानिक पृष्ठभूमि और इसके समक्ष चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: परिसीमन की परिभाषा और उद्देश्य (जनसंख्या के समान प्रतिनिधित्व) का संक्षिप्त परिचय।
2. संवैधानिक पृष्ठभूमि: संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 का उल्लेख। परिसीमन आयोग का गठन और उसकी स्वायत्तता। 42वें, 84वें और 87वें संविधान संशोधनों का संदर्भ, विशेष रूप से 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों के स्थगन का प्रावधान।
3. परिसीमन के उद्देश्य और लाभ: ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ सिद्धांत, जनसंख्या असमानताओं को दूर करना, अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए सीटों का आरक्षण।
4. परिसीमन के समक्ष चुनौतियाँ:
क. जनसंख्या वृद्धि में क्षेत्रीय असमानताएँ: दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताएँ कि जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता के कारण उन्हें कम प्रतिनिधित्व मिल सकता है।
ख. राजनीतिक संवेदनशीलता: राज्यों के बीच सीटों के बँटवारे को लेकर राजनीतिक दलों के विरोध और संघवाद पर प्रभाव।
ग. संवैधानिक गतिरोध: सीटों की संख्या में वृद्धि और उसके लिए आवश्यक संवैधानिक संशोधन पर आम सहमति का अभाव।
घ. DMK जैसी पार्टियों की शर्तें: वर्तमान समाचार के संदर्भ में DMK की 1976 के स्थगन को 25 साल और बढ़ाने और सभी राज्यों के लिए लोकसभा सीटों में 50% की वृद्धि की मांग का उल्लेख।
5. समालोचनात्मक विश्लेषण: क्या परिसीमन वास्तव में ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत को बनाए रखता है या यह जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को हतोत्साहित करता है? संघवाद के सिद्धांत पर इसका प्रभाव। राजनीतिक सर्वसम्मति की आवश्यकता।
6. निष्कर्ष: भविष्य के परिसीमन के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता, जिसमें जनसंख्या के साथ-साथ राज्यों के योगदान और संघवाद के सिद्धांतों का भी ध्यान रखा जाए।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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