तमिलनाडु ने कर्नाटक से कावेरी जल छोड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया

DMK moves Supreme Court to direct Karnataka to release Tamil Nadu’s share of Cauvery water — labelled illustration

तमिलनाडु ने कर्नाटक से कावेरी जल छोड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया

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Exploded view: DMK moves Supreme Court to direct Karnataka to release Tamil Nadu’s share of Cauvery water

✎ कावेरी जल विवाद भारत में अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का एक प्रमुख उदाहरण है, जिसका समाधान संवैधानिक प्रावधानों, न्यायिक हस्तक्षेप और विशेष प्राधिकरणों के माध्यम से किया जाता है।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान, अंतर-राज्यीय संबंध, संघीय ढाँचा  |  GS Paper III — कृषि, जल संसाधन
  • Prelims: कावेरी जल विवाद, अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956, कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA), कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC), अनुच्छेद 262, मेट्टूर बांध, बिलीगुंडलू
  • Essay: भारत में संघवाद की चुनौतियाँ: अंतर-राज्यीय विवादों का प्रबंधन, जल सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था: एक स्थायी समाधान की ओर

त्वरित पुनरावृत्ति: कावेरी जल विवाद भारत में अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का एक प्रमुख उदाहरण है, जिसका समाधान संवैधानिक प्रावधानों, न्यायिक हस्तक्षेप और विशेष प्राधिकरणों के माध्यम से किया जाता है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने कर्नाटक को तमिलनाडु के हिस्से कावेरी जल को छोड़ने का निर्देश देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया है। DMK ने सर्वोच्च न्यायालय से कर्नाटक को कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) के 28 जुलाई के निर्देश को तत्काल और पूरी तरह से लागू करने का निर्देश देने का आग्रह किया है, जिसे कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) ने 30 जुलाई को पुष्टि की थी। इस निर्देश में बिलीगुंडलू में अंतर-राज्यीय संपर्क बिंदु पर प्रतिदिन 3,500 क्यूसेक पानी का प्रवाह सुनिश्चित करना शामिल है।

पृष्ठभूमि

  • कावेरी नदी जल विवाद भारत के दक्षिणी राज्यों कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी के बीच कावेरी नदी के जल के बंटवारे को लेकर एक दीर्घकालिक विवाद है।
  • इस विवाद की जड़ें ब्रिटिश काल में मैसूर रियासत और मद्रास प्रेसीडेंसी के बीच हुए समझौतों में निहित हैं।
  • भारत सरकार ने 1990 में कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) का गठन किया, जिसने 2007 में अपना अंतिम निर्णय दिया।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में CWDT के फैसले को संशोधित किया और जल बंटवारे के फार्मूले को अंतिम रूप दिया, जिसमें कर्नाटक को 284.75 TMC, तमिलनाडु को 404.25 TMC, केरल को 30 TMC और पुडुचेरी को 7 TMC आवंटित किया गया।
  • सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर 2018 में कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) का गठन किया गया ताकि न्यायाधिकरण के निर्णय और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके।
  • इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून की कमी के कारण कावेरी बेसिन में पानी का प्रवाह कम रहा है, जिससे तमिलनाडु के निचले जलग्रहण क्षेत्रों में ‘कुरुवई’ फसल सूखने का खतरा है।

अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956

  • यह अधिनियम भारत के संविधान के अनुच्छेद 262 के तहत संसद को अंतर-राज्यीय नदियों या नदी घाटियों के जल से संबंधित किसी भी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन का प्रावधान करने की शक्ति प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद 262 (1) संसद को कानून द्वारा किसी भी अंतर-राज्यीय नदी या नदी घाटी के जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित किसी भी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन का प्रावधान करने का अधिकार देता है।
  • अनुच्छेद 262 (2) में कहा गया है कि संसद कानून द्वारा यह प्रावधान कर सकती है कि सर्वोच्च न्यायालय या कोई अन्य न्यायालय ऐसे किसी भी विवाद या शिकायत के संबंध में अधिकारिता का प्रयोग नहीं करेगा।
  • यह अधिनियम केंद्र सरकार को किसी राज्य सरकार के अनुरोध पर या यदि उसे लगता है कि सार्वजनिक हित में ऐसा करना आवश्यक है, तो एक न्यायाधिकरण (Tribunal) स्थापित करने का अधिकार देता है।
  • न्यायाधिकरण का निर्णय अंतिम और विवाद में शामिल पक्षों पर बाध्यकारी होता है।
  • इस अधिनियम के तहत गठित न्यायाधिकरणों के निर्णयों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय भी शामिल है, हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के अधिकार का प्रयोग करते हुए कुछ मामलों की सुनवाई की है।
  • यह अधिनियम भारत में जल संसाधनों के प्रबंधन और अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
कावेरी जल विवाद यह भारत में अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का एक प्रमुख उदाहरण है, जिसमें जल-बंटवारे के सिद्धांतों और संघीय ढांचे की भूमिका पर प्रकाश डाला गया है।
सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान में सर्वोच्च न्यायालय की अंतिम न्यायिक और अधिनिर्णायक शक्ति को दर्शाता है।
कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) ये निकाय अंतर-राज्यीय जल विवादों के प्रबंधन और अधिनिर्णय के लिए स्थापित नियामक और कार्यान्वयन तंत्र हैं।
कृषि पर निर्भरता कावेरी डेल्टा क्षेत्र में लाखों किसानों और कृषि श्रमिकों की आजीविका के लिए नदी जल की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करता है।
सूखा और जल संकट कमजोर मानसून और जल प्रबंधन की चुनौतियों के कारण निचले तटवर्ती राज्यों में उत्पन्न होने वाले गंभीर कृषि संकट को दर्शाता है।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • कावेरी डेल्टा क्षेत्र में लगभग 14.913 लाख एकड़ कृषि भूमि मेट्टूर जलाशय पर सिंचाई के लिए निर्भर है, जिससे लगभग चार मिलियन किसान और दस मिलियन कृषि श्रमिक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं।
  • जल की कमी से ‘कुरुवई’ फसल को भारी नुकसान हो रहा है, जिससे किसानों की आजीविका और राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।

राजकोषीय महत्व

  • फसल के नुकसान और कृषि संकट से राज्य के राजस्व पर दबाव पड़ सकता है और किसानों को सहायता प्रदान करने के लिए सरकारी व्यय में वृद्धि हो सकती है।

सामाजिक महत्व

  • जल की कमी से लाखों किसानों और कृषि श्रमिकों के जीवन पर सीधा प्रभाव पड़ता है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी और बेरोजगारी बढ़ सकती है।
  • यह विवाद राज्यों के बीच सामाजिक सद्भाव और सहयोग को भी प्रभावित करता है, जिससे क्षेत्रीय तनाव बढ़ सकता है।

शासन और संवैधानिक महत्व

  • यह मामला अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान में संघीय ढांचे, सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका और स्थापित नियामक निकायों (CWRC, CWMA) की प्रभावशीलता को दर्शाता है।
  • यह जल संसाधनों के प्रबंधन और वितरण में राज्यों के अधिकारों और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती को उजागर करता है।

चुनौतियाँ

1. अंतर-राज्यीय जल विवादों का समाधान

  • राज्यों के बीच जल-बंटवारे पर आम सहमति का अभाव, जिससे विवादों का स्थायी समाधान मुश्किल हो जाता है।
  • निचले तटवर्ती राज्यों की कृषि आवश्यकताओं और ऊपरी तटवर्ती राज्यों की जल भंडारण आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करना।

2. नियामक निकायों की प्रभावशीलता

  • CWRC और CWMA जैसे स्थापित निकायों के निर्देशों का राज्यों द्वारा पालन न करना, जिससे उनकी विश्वसनीयता और प्रभावशीलता पर सवाल उठते हैं।
  • इन निकायों के निर्णयों को लागू करने के लिए पर्याप्त प्रवर्तन तंत्र की कमी।

3. जलवायु परिवर्तन और जल संकट

  • दक्षिण-पश्चिम मानसून की कमी जैसे मौसमी बदलावों के कारण नदी बेसिन में जल प्रवाह में कमी, जिससे जल उपलब्धता और भी अनिश्चित हो जाती है।
  • जल संसाधनों के प्रबंधन के लिए दीर्घकालिक और जलवायु-लचीली रणनीतियों की आवश्यकता।

4. कृषि आजीविका का संरक्षण

  • जल की कमी के कारण फसल के नुकसान से प्रभावित किसानों की आजीविका की रक्षा करना और उन्हें पर्याप्त मुआवजा प्रदान करना।
  • सूखा-प्रतिरोधी फसलों को बढ़ावा देना और सिंचाई के वैकल्पिक तरीकों को विकसित करना।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
जल-बंटवारे पर असहमति राज्यों के बीच ऐतिहासिक और भावनात्मक मुद्दे, जिससे समाधान कठिन हो जाता है।
नियामक निर्देशों का अनादर कर्नाटक द्वारा CWRC और CWMA के निर्देशों का पालन न करना, जिससे न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं।
कृषि पर गंभीर प्रभाव तमिलनाडु में ‘कुरुवई’ फसल का सूखना, जिससे लाखों किसानों की आजीविका खतरे में है।
कमजोर मानसून इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून की कमी से कावेरी बेसिन में जल प्रवाह में भारी कमी आई है।
अंतर-राज्यीय तनाव जल विवाद राज्यों के बीच राजनीतिक और सामाजिक तनाव को बढ़ाता है।

आगे की राह

  • सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का त्वरित और पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित किया जाए, ताकि निचले तटवर्ती राज्यों की तत्काल कृषि आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।
  • कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) को अपनी निगरानी और प्रवर्तन शक्तियों का प्रभावी ढंग से उपयोग करना चाहिए, और अनुपालन रिपोर्ट नियमित रूप से प्रस्तुत करनी चाहिए।
  • राज्यों को जल-बंटवारे के मुद्दों पर रचनात्मक संवाद और सहयोग को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि दीर्घकालिक और स्थायी समाधान खोजे जा सकें।
  • जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के लिए आधुनिक तकनीकों, जैसे जल संचयन, सूक्ष्म सिंचाई और जल-कुशल फसलों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए, कावेरी बेसिन के लिए एक व्यापक जल प्रबंधन योजना विकसित की जानी चाहिए, जिसमें सूखे और बाढ़ दोनों से निपटने के प्रावधान हों।
  • किसानों को फसल विविधीकरण, वैकल्पिक आजीविका और फसल बीमा जैसी योजनाओं के माध्यम से सहायता प्रदान की जानी चाहिए, ताकि वे जल संकट के प्रभावों का सामना कर सकें।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

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संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 262: अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का अधिनिर्णय
  • अनुच्छेद 136: सर्वोच्च न्यायालय की विशेष अनुमति याचिका की शक्ति
  • अनुच्छेद 32: मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उपचार

अवधारणा प्रवाह

कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून के कारण कावेरी बेसिन में जल प्रवाह में कमी।  →  कर्नाटक द्वारा तमिलनाडु के लिए कावेरी जल की अपेक्षित मात्रा जारी न करना।  →  कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के निर्देशों का उल्लंघन।  →  तमिलनाडु के निचले तटवर्ती जिलों में कृषि भूमि (विशेषकर ‘कुरुवई’ फसल) का सूखना।  →  लाखों किसानों और कृषि श्रमिकों की आजीविका पर गंभीर खतरा।  →  DMK द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कर्नाटक को जल छोड़ने का निर्देश देने की मांग।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) का गठन अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत किया गया था।
2. सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में अपने फैसले में कावेरी नदी के पानी को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किया था।
3. कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) का गठन कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के अंतिम अधिनिर्णय को लागू करने के लिए किया गया था।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। CWDT का गठन 1990 में अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत किया गया था। कथन 2 सही है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में कावेरी नदी के पानी को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किया था। कथन 3 सही है। CWMA का गठन 2018 में CWDT के अंतिम अधिनिर्णय को लागू करने के लिए किया गया था।

Q2. अभिकथन (A): भारत में अंतर-राज्यीय जल विवादों को हल करने के लिए संसद के पास कानून बनाने की शक्ति है।
कारण (R): संविधान का अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय नदी विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि संसद के पास अंतर-राज्यीय जल विवादों को हल करने के लिए कानून बनाने की शक्ति है। कारण (R) भी सही है और A की सही व्याख्या है, क्योंकि अनुच्छेद 262 विशेष रूप से संसद को इस उद्देश्य के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है, जैसे कि अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956।

Q3. कावेरी नदी जल विवाद में शामिल राज्यों का सही समूह कौन सा है?

  1. कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश
  2. कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी
  3. कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और पुडुचेरी
  4. कर्नाटक, केरल, तेलंगाना और तमिलनाडु

उत्तर: कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी — कावेरी नदी जल विवाद में कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी शामिल हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। कावेरी जल विवाद के संदर्भ में इसकी प्रभावशीलता का भी मूल्यांकन कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: भारत में अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों की संक्षिप्त पृष्ठभूमि और संवैधानिक प्रावधान (अनुच्छेद 262) का उल्लेख।
2. सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका: अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान में सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार और भूमिका का विस्तार से वर्णन करें। इसमें शामिल हैं:
* मूल क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 131) और अपीलीय क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 136) के तहत भूमिका।
* न्यायाधिकरणों के अधिनिर्णयों की न्यायिक समीक्षा का मुद्दा (सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं को न्यायाधिकरण के अधिनिर्णय पर अपीलीय क्षेत्राधिकार से बाहर रखा है, लेकिन कुछ मामलों में हस्तक्षेप किया है)।
* अंतरिम आदेश जारी करने की शक्ति।
* संघवाद और सहकारी संघवाद के सिद्धांतों पर प्रभाव।
3. कावेरी जल विवाद के संदर्भ में प्रभावशीलता का मूल्यांकन:
* कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के गठन और उसके अधिनिर्णय का उल्लेख।
* सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 2018 के फैसले का विश्लेषण, जिसमें जल आवंटन को संशोधित किया गया और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) तथा कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) का गठन किया गया।
* वर्तमान समाचार (DMK द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में याचिका) का संदर्भ देते हुए, सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद राज्यों द्वारा अनुपालन में चुनौतियों पर प्रकाश डालें।
* न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं और राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता पर चर्चा करें।
4. चुनौतियाँ और आगे का रास्ता: अंतर-राज्यीय जल विवादों के स्थायी समाधान के लिए आवश्यक सुधारों पर सुझाव, जैसे कि बेहतर डेटा साझाकरण, वैज्ञानिक जल प्रबंधन, और राज्यों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना।
5. निष्कर्ष: न्यायिक हस्तक्षेप के महत्व को स्वीकार करते हुए, यह भी बताएं कि स्थायी समाधान के लिए राजनीतिक सहमति और सहकारी संघवाद आवश्यक है।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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