12 Aug तमिलनाडु विधानसभा ने लोकसभा सीटों को 543 पर स्थिर रखने का प्रस्ताव पारित किया
✎ परिसीमन आयोग निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करता है, जबकि 106वाँ संवैधानिक संशोधन अधिनियम लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान करता है, जिसका क्रियान्वयन आगामी जनगणना और परिसीमन पर निर्भर…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान – ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और आधारभूत संरचना | GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य और उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ | GS Paper II — संसद और राज्य विधायिका – संरचना, कार्यपद्धति, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय
- Prelims: परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, 106वाँ संवैधानिक संशोधन अधिनियम, महिला आरक्षण, लोकसभा सीटें, जनगणना, समानुपातिक प्रतिनिधित्व
- Essay: भारत में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और उसकी चुनौतियाँ, महिला सशक्तिकरण और राजनीतिक भागीदारी: संवैधानिक प्रावधानों का क्रियान्वयन
त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन आयोग निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करता है, जबकि 106वाँ संवैधानिक संशोधन अधिनियम लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान करता है, जिसका क्रियान्वयन आगामी जनगणना और परिसीमन पर निर्भर करता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
तमिलनाडु विधानसभा ने हाल ही में एक प्रस्ताव पारित किया है, जिसमें केंद्र सरकार से लोकसभा सीटों की संख्या को मौजूदा 543 पर ही बनाए रखने और राज्यों के बीच सीटों के वर्तमान अंतर-राज्यीय वितरण अनुपात को बनाए रखने का आग्रह किया गया है। इस प्रस्ताव में 2029 के लोकसभा चुनावों और उसके बाद के विधानसभा चुनावों में मौजूदा 543 सीटों के आधार पर महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को बिना किसी देरी के लागू करने पर भी जोर दिया गया है। यह घटनाक्रम आगामी परिसीमन अभ्यास और महिला आरक्षण के क्रियान्वयन को लेकर चल रही बहस के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है।
पृष्ठभूमि
- परिसीमन (Delimitation) का अर्थ है किसी देश या एक विधायी निकाय वाले प्रांत में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करना।
- भारत में परिसीमन का मुख्य उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, ताकि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या लगभग समान हो।
- संविधान के अनुच्छेद 82 (Article 82) के तहत संसद प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाती है, जबकि अनुच्छेद 170 (Article 170) राज्यों को भी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन का अधिकार देता है।
- भारत में अब तक चार परिसीमन आयोगों का गठन किया गया है – 1952, 1963, 1973 और 2002 में।
- 42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1976 (42nd Constitutional Amendment Act, 1976) ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों की संख्या को 1971 की जनगणना के आधार पर वर्ष 2000 तक के लिए स्थिर कर दिया था।
- 84वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2001 (84th Constitutional Amendment Act, 2001) ने इस स्थगन को 2026 तक बढ़ा दिया, जिसका अर्थ है कि अगली परिसीमन प्रक्रिया 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आँकड़ों पर आधारित होगी।
- संसद ने 106वाँ संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2023 (106th Constitutional Amendment Act, 2023) पारित किया है, जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है। हालाँकि, यह अधिनियम जनगणना और परिसीमन अभ्यास के बाद ही प्रभावी होगा।
परिसीमन आयोग और महिला आरक्षण
- परिसीमन आयोग एक उच्चाधिकार प्राप्त निकाय है जिसके आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
- इसका मुख्य कार्य निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करना, अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों की पहचान करना और सभी निर्वाचन क्षेत्रों में जनसंख्या की एकरूपता सुनिश्चित करना है।
- परिसीमन के पीछे का तर्क यह है कि जनसंख्या में परिवर्तन के कारण प्रतिनिधित्व में असमानताएँ उत्पन्न हो सकती हैं, जिन्हें दूर करने के लिए निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन आवश्यक है।
- दक्षिणी राज्यों जैसे तमिलनाडु ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, जिसके कारण उन्हें आशंका है कि आगामी परिसीमन में उनकी लोकसभा सीटों की संख्या कम हो सकती है, जबकि अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं।
- 106वाँ संवैधानिक संशोधन अधिनियम, जिसे ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ भी कहा जाता है, महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में समानता प्रदान करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
- इस अधिनियम के प्रभावी होने में देरी, जो जनगणना और परिसीमन से जुड़ी है, महिला आरक्षण के उद्देश्य को पूरा करने में बाधा उत्पन्न कर सकती है, जैसा कि तमिलनाडु के प्रस्ताव में भी रेखांकित किया गया है।
- प्रस्ताव में मौजूदा सीटों के आधार पर महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को लागू करने पर जोर दिया गया है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| लोकसभा सीटों को 543 पर स्थिर करने का प्रस्ताव | जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के हितों की रक्षा |
| अंतर-राज्यीय सीट वितरण के वर्तमान अनुपात को बनाए रखना | राज्यों के बीच मौजूदा प्रतिनिधित्व संतुलन को बनाए रखने में सहायक |
| लोकसभा-राज्यसभा अनुपात 2.2:1 बनाए रखना | संसद के दोनों सदनों के बीच शक्ति संतुलन सुनिश्चित करना |
| महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग करना | महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को शीघ्र सुनिश्चित करने का प्रयास |
| जनगणना और परिसीमन के बिना महिला आरक्षण लागू करने की मांग | महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय को प्राथमिकता देना |
| 106वें संविधान संशोधन अधिनियम का संदर्भ | संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान |
महत्व
राजनीतिक महत्व
- यह प्रस्ताव जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को दर्शाता है, जिन्हें परिसीमन के बाद अपनी संसदीय सीटों में कमी का डर है।
- यह संघवाद (Federalism) और राज्यों के प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर केंद्र-राज्य संबंधों में संभावित तनाव को उजागर करता है।
- महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग करने की मांग महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
संवैधानिक महत्व
- परिसीमन (Delimitation) का मुद्दा संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 से संबंधित है, जो संसद और राज्य विधानसभाओं में सीटों के पुनर्समायोजन का प्रावधान करते हैं।
- यह प्रस्ताव संविधान के मूल ढांचे और राज्यों के समान प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों पर बहस को जन्म दे सकता है।
- महिला आरक्षण का मुद्दा 106वें संविधान संशोधन अधिनियम के कार्यान्वयन और उसके समय-सीमा से जुड़ा है।
सामाजिक महत्व
- महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से अलग करने की मांग महिलाओं को शीघ्र राजनीतिक अधिकार प्रदान करने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से है।
- यह प्रस्ताव समाज में महिलाओं की भूमिका और उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता पर व्यापक चर्चा को प्रोत्साहित करता है।
चुनौतियाँ
1. परिसीमन और जनसंख्या
- परिसीमन का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्समायोजन करना है। यदि सीटों को स्थिर रखा जाता है, तो यह ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत का उल्लंघन कर सकता है।
- जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को उनकी सफलता के लिए दंडित किए जाने का डर है, जबकि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक प्रतिनिधित्व मिल सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
2. संघवाद और राज्यों का प्रतिनिधित्व
- राज्यों के बीच सीटों का वर्तमान अनुपात बनाए रखने की मांग संघवाद के सिद्धांत से जुड़ी है, जहां राज्यों को संसद में उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
- यदि परिसीमन होता है और सीटों की संख्या बढ़ती है, तो यह राज्यों के बीच राजनीतिक शक्ति के पुनर्वितरण का कारण बन सकता है, जिससे कुछ राज्यों को नुकसान हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
3. महिला आरक्षण का कार्यान्वयन
- 106वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन के बाद लागू किया जाना है। इस प्रक्रिया में देरी से महिलाओं को राजनीतिक अधिकार मिलने में विलंब हो रहा है।
- महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग करने की मांग इस बात पर बहस छेड़ती है कि क्या संवैधानिक संशोधनों को उनके मूल प्रावधानों से हटकर लागू किया जा सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: संवैधानिक संशोधन, महिला सशक्तिकरण
4. संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या
- संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 परिसीमन का प्रावधान करते हैं। सीटों को स्थिर रखने का प्रस्ताव इन संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या और उनके दायरे पर सवाल उठाता है।
- यह मुद्दा न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में आ सकता है, यदि कोई पक्ष संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन का दावा करता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: संवैधानिक प्रावधान, न्यायिक समीक्षा
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| जनसंख्या नियंत्रण | जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को संसदीय प्रतिनिधित्व में कमी का डर |
| संघवाद | राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व में असंतुलन की आशंका |
| महिला आरक्षण | जनगणना और परिसीमन से जुड़ाव के कारण कार्यान्वयन में देरी |
| संवैधानिक प्रावधान | परिसीमन के संवैधानिक जनादेश और सीटों को स्थिर रखने की मांग के बीच टकराव |
| राजनीतिक ध्रुवीकरण | परिसीमन के मुद्दे पर विभिन्न राज्यों और राजनीतिक दलों के बीच मतभेद |
| लोकसभा-राज्यसभा अनुपात | संसद के दोनों सदनों के बीच शक्ति संतुलन पर संभावित प्रभाव |
आगे की राह
- केंद्र सरकार को सभी राज्यों के साथ परामर्श कर एक व्यापक राष्ट्रीय सहमति बनाने का प्रयास करना चाहिए।
- परिसीमन के लिए एक निष्पक्ष और पारदर्शी तंत्र विकसित किया जाना चाहिए जो जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के हितों की रक्षा करे।
- महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से अलग करने के विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए ताकि महिलाओं को शीघ्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल सके।
- जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रोत्साहन योजनाएं शुरू की जानी चाहिए ताकि राज्यों को जनसंख्या स्थिरीकरण के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।
- संवैधानिक विशेषज्ञों और कानूनी सलाहकारों की एक समिति गठित की जानी चाहिए ताकि परिसीमन और महिला आरक्षण से संबंधित संवैधानिक जटिलताओं का समाधान किया जा सके।
- संसद को इस मुद्दे पर व्यापक बहस और चर्चा के माध्यम से एक स्थायी समाधान खोजने का प्रयास करना चाहिए।
- राज्यों के बीच विश्वास और सहयोग को बढ़ावा देने के लिए एक अंतर-राज्यीय परिषद (Inter-State Council) की बैठक बुलाई जा सकती है।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
परिसीमन · लोकसभा सीटें · जनसंख्या अनुपात · महिला आरक्षण · 106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम · संघवाद · समान प्रतिनिधित्व · संवैधानिक प्रावधान · राज्यों का प्रतिनिधित्व · जनगणना
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 82’, ‘note’: ‘परिसीमन अधिनियम के तहत सीटों का पुनर्समायोजन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 170’, ‘note’: ‘राज्य विधानसभाओं की सीटों का पुनर्समायोजन’}
- {‘article’: ‘106वां संविधान संशोधन अधिनियम’, ‘note’: ‘लोकसभा और विधानसभाओं में महिला आरक्षण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 330’, ‘note’: ‘लोकसभा में अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 332’, ‘note’: ‘राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षण’}
अवधारणा प्रवाह
तमिलनाडु विधानसभा ने प्रस्ताव पारित किया → लोकसभा सीटों को 543 पर स्थिर करने की मांग → जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों की चिंताएँ → महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग करने की मांग → संवैधानिक प्रावधानों और संघवाद पर बहस
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है।
2. 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों की संख्या को वर्ष 2026 तक के लिए स्थिर कर दिया था।
3. परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 82 संसद को परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है। कथन 2 सही है। 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने सीटों की संख्या को 2026 तक के लिए स्थिर कर दिया था। कथन 3 सही है। परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
Q2. अभिकथन (A): तमिलनाडु विधानसभा ने लोकसभा सीटों को 543 पर स्थिर रखने का प्रस्ताव अपनाया है।
कारण (R): तमिलनाडु का मानना है कि जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने वाले राज्यों को परिसीमन के कारण संसदीय प्रतिनिधित्व में नुकसान नहीं होना चाहिए।
उपर्युक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है, क्योंकि तमिलनाडु विधानसभा ने वास्तव में ऐसा प्रस्ताव अपनाया है। कारण (R) भी सही है और यह A की सही व्याख्या है, क्योंकि जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रोत्साहन और प्रतिनिधित्व में कमी के डर के कारण ही कई दक्षिणी राज्य परिसीमन का विरोध कर रहे हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ परिसीमन प्रक्रिया के पीछे के संवैधानिक सिद्धांतों की व्याख्या करें और चर्चा करें कि जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों और राज्यों के संसदीय प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाए रखने में यह कैसे एक चुनौती प्रस्तुत करता है। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: परिसीमन (Delimitation) की परिभाषा और उद्देश्य का संक्षिप्त परिचय।
2. संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, अनुच्छेद 330 और 332 का उल्लेख। परिसीमन आयोग अधिनियम, 1952, 1962, 1972 और 2002 का संदर्भ।
3. परिसीमन के सिद्धांत: ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ का सिद्धांत, जनसंख्या के अनुपात में सीटों का आवंटन, भौगोलिक सन्निधि और प्रशासनिक इकाइयों का ध्यान रखना।
4. जनसंख्या नियंत्रण और प्रतिनिधित्व की चुनौती: उन राज्यों की चिंताएँ जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त की है, कि उन्हें कम संसदीय सीटों से दंडित किया जा सकता है। दक्षिणी राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु के हालिया प्रस्ताव का उल्लेख।
5. संघवाद पर प्रभाव: राज्यों के बीच असमान प्रतिनिधित्व से संघवाद पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों पर चर्चा।
6. महिला आरक्षण और परिसीमन: 106वें संविधान संशोधन अधिनियम (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) का उल्लेख और इसके कार्यान्वयन को परिसीमन से जोड़ने की चुनौती।
7. आगे की राह/निष्कर्ष: इस चुनौती का समाधान करने के लिए संभावित विकल्पों पर विचार, जैसे कि सीटों की संख्या को स्थिर रखना या जनसंख्या के अलावा अन्य मानदंडों पर विचार करना।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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