08 Aug तमिलनाडु सीएम विजय ने 543 लोकसभा सीटों पर स्थिरता की मांग उठाई
✎ परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण है, जिसका उद्देश्य 'एक व्यक्ति, एक वोट' के सिद्धांत को बनाए रखना है, लेकिन भारत में यह जनसंख्या नियंत्रण और संघीय प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन को लेकर एक संवेदनशील मुद्दा बन गया…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय राजव्यवस्था, संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध | GS Paper I — भारतीय समाज, जनसंख्या एवं संबंधित मुद्दे
- Prelims: परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, लोकसभा सीटों का स्थगन, जनसंख्या नियंत्रण, संघवाद, समान प्रतिनिधित्व
- Essay: भारत में संघवाद की चुनौतियाँ, जनसंख्या नियंत्रण और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण है, जिसका उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत को बनाए रखना है, लेकिन भारत में यह जनसंख्या नियंत्रण और संघीय प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन को लेकर एक संवेदनशील मुद्दा बन गया है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय द्वारा बुलाई गई सांसदों की एक बैठक में लोकसभा सीटों की संख्या को मौजूदा 543 पर स्थिर रखने और राज्यों के वर्तमान प्रतिनिधित्व को बनाए रखने का आह्वान किया गया है। यह मांग प्रस्तावित परिसीमन (Delimitation) संवैधानिक संशोधन विधेयक के विरोध में की गई है, जिसमें परिसीमन आयोग को व्यापक शक्तियाँ देने और लोकसभा सीटों की संख्या में वृद्धि करने की बात कही गई है। दक्षिणी राज्य लगातार इस मुद्दे पर अपनी चिंता व्यक्त कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता के कारण उन्हें कम प्रतिनिधित्व मिल सकता है।
पृष्ठभूमि
- भारत में लोकसभा और राज्य विधानसभा सीटों का परिसीमन प्रत्येक जनगणना के बाद होता है, जिसका उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करना है।
- संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत संसद प्रत्येक जनगणना के बाद एक परिसीमन अधिनियम बनाती है, और अनुच्छेद 170 राज्यों की विधानसभाओं के लिए समान प्रावधान करता है।
- पिछला परिसीमन 2002 में हुआ था, लेकिन लोकसभा सीटों की संख्या को 1971 की जनगणना के आधार पर 543 पर 2026 तक के लिए स्थिर कर दिया गया था। यह स्थगन जनसंख्या नियंत्रण उपायों को अपनाने वाले राज्यों को दंडित होने से बचाने के लिए किया गया था।
- दक्षिणी राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु, का तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता के कारण यदि सीटों का पुनर्वितरण वर्तमान जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो उन्हें लोकसभा में कम प्रतिनिधित्व मिलेगा।
- प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन विधेयक परिसीमन आयोग को व्यापक शक्तियाँ देने का प्रस्ताव करता है, जिस पर कई राज्यों ने आपत्ति जताई है और संसद को अंतिम अधिकार देने की मांग की है।
- इस मुद्दे पर केंद्र-राज्य संबंधों और संघीय ढांचे पर संभावित प्रभावों को लेकर व्यापक बहस छिड़ गई है, जिसमें प्रतिनिधित्व की समानता और जनसंख्या नियंत्रण के प्रोत्साहन के बीच संतुलन साधने की चुनौती है।
परिसीमन क्या है?
- परिसीमन का अर्थ है किसी देश या प्रांत में विधायी निकाय के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण या पुनःनिर्धारण करना।
- इसका मुख्य उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को सुनिश्चित करना है, ताकि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या लगभग समान हो।
- भारत में, परिसीमन का कार्य एक उच्च-शक्ति वाले निकाय, परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) द्वारा किया जाता है, जिसे राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है।
- परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के समान बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
- संविधान के अनुच्छेद 82 के अनुसार, संसद प्रत्येक जनगणना के बाद एक परिसीमन अधिनियम बनाती है।
- अब तक चार परिसीमन आयोगों का गठन किया गया है: 1952, 1963, 1973 और 2002 में।
- बाद में, 84वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा इस स्थगन को 2026 तक बढ़ा दिया गया, ताकि जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को प्रोत्साहित किया जा सके।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| लोकसभा सीटों की संख्या का स्थगन | राज्यों के प्रतिनिधित्व में यथास्थिति बनाए रखने और दक्षिणी राज्यों के हितों की रक्षा का प्रयास। |
| परिसीमन पर संवैधानिक संशोधन विधेयक का विरोध | राज्यों के अधिकारों पर संभावित प्रभाव और केंद्र सरकार की शक्तियों के विस्तार पर चिंता। |
| परिसीमन आयोग की शक्तियों पर आपत्ति | संसद की सर्वोच्चता और आयोग को ‘व्यापक शक्तियां’ देने के विरोध पर जोर। |
| तमिलनाडु विधानसभा में सरकारी प्रस्ताव | राज्य के अधिकारों और दक्षिणी राज्यों के हितों की सुरक्षा के लिए एक औपचारिक कदम। |
| सांसदों के बोलने के अवसर में कमी की आशंका | लोकसभा सीटों की संख्या में वृद्धि से सांसदों के लिए बहस और चर्चा के समय में कमी का तर्क। |
महत्व
राजनीतिक महत्व
- यह मुद्दा केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव को दर्शाता है, विशेषकर दक्षिणी राज्यों द्वारा जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों के बावजूद कम प्रतिनिधित्व की आशंका के संदर्भ में।
- यह संघीय ढांचे (Federal Structure) में राज्यों की स्वायत्तता और उनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक आंदोलन है।
- यह राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका और उनके द्वारा उठाए जा रहे मुद्दों के महत्व को उजागर करता है।
संवैधानिक महत्व
- परिसीमन (Delimitation) एक संवैधानिक प्रक्रिया है जो अनुच्छेद 82 के तहत की जाती है, और इसमें किसी भी बदलाव के लिए संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता होगी।
- यह प्रतिनिधित्व के सिद्धांत (Principle of Representation) और ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के आदर्श पर बहस को पुनर्जीवित करता है, साथ ही जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को पुरस्कृत करने या दंडित करने के सवाल को भी उठाता है।
- परिसीमन आयोग की शक्तियों और संसद की सर्वोच्चता के बीच संतुलन का प्रश्न संवैधानिक बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
सामाजिक-आर्थिक महत्व
- जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को कम प्रतिनिधित्व मिलने की आशंका से उन राज्यों में असंतोष बढ़ सकता है, जिन्होंने परिवार नियोजन कार्यक्रमों में निवेश किया है।
- यह क्षेत्रीय असमानताओं और विकास के विभिन्न स्तरों को उजागर करता है, जहां कुछ राज्य जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में सफल रहे हैं जबकि अन्य नहीं।
- लोकसभा में प्रतिनिधित्व में बदलाव से राज्यों के लिए केंद्रीय योजनाओं और संसाधनों के आवंटन पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।
चुनौतियाँ
1. संघवाद पर प्रभाव
- परिसीमन से दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम होने की आशंका है, जिससे केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव बढ़ सकता है।
- यह राज्यों की स्वायत्तता और संघीय ढांचे के सिद्धांतों के लिए एक चुनौती प्रस्तुत करता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएं, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान और मूल संरचना। संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढांचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ।
2. जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास
- जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त की है, उन्हें परिसीमन के कारण कम प्रतिनिधित्व मिलने का भय है, जिससे भविष्य में जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को हतोत्साहित किया जा सकता है।
- यह जनसंख्या नीति और उसके राजनीतिक परिणामों के बीच एक विरोधाभास पैदा करता है।
यूपीएससी लिंक: GS-1: जनसंख्या एवं संबद्ध मुद्दे। GS-2: विकास प्रक्रियाएँ और विकास उद्योग- गैर-सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों, विभिन्न समूहों और संघों, दानदाताओं, संस्थागत एवं अन्य हितधारकों की भूमिका।
3. प्रतिनिधित्व का सिद्धांत
- लोकसभा में ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत को बनाए रखते हुए विभिन्न राज्यों की जनसंख्या वृद्धि दर में अंतर को समायोजित करना एक जटिल चुनौती है।
- यह राजनीतिक प्रतिनिधित्व की निष्पक्षता और समानता के सिद्धांतों पर बहस को जन्म देता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य-संचालन, शक्तियां एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।
4. संसदीय प्रभावशीलता
- सांसदों की संख्या में वृद्धि से संसद में बहस और चर्चा के लिए उपलब्ध समय में कमी आ सकती है, जिससे संसदीय कार्यवाही की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
- यह संसद की कार्यप्रणाली और उसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठाता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य-संचालन, शक्तियां एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| लोकसभा सीटों का स्थगन | दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम होने की आशंका, जिससे संघीय असंतुलन बढ़ सकता है। |
| परिसीमन आयोग की शक्तियां | आयोग को व्यापक शक्तियां देने से संसद की सर्वोच्चता और राज्यों के अधिकारों पर संभावित अतिक्रमण। |
| जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व | जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को दंडित करने और जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को पुरस्कृत करने का आरोप। |
| सांसदों के बोलने का समय | सीटों की संख्या बढ़ने से प्रत्येक सांसद के लिए उपलब्ध समय में कमी, जिससे संसदीय बहस की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। |
| केंद्र-राज्य संबंध | परिसीमन पर केंद्र सरकार के प्रस्तावित विधेयक से राज्यों और केंद्र के बीच तनाव में वृद्धि। |
आगे की राह
- केंद्र सरकार को सभी राज्यों के साथ व्यापक परामर्श करना चाहिए, विशेषकर उन राज्यों के साथ जिनकी जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन रहा है।
- परिसीमन के लिए एक वैकल्पिक सूत्र पर विचार किया जा सकता है जो जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को दंडित न करे, जैसे कि 1971 की जनगणना को आधार बनाए रखना या एक निश्चित अवधि के लिए सीटों को फ्रीज करना।
- एक स्थायी परिसीमन आयोग की स्थापना की जा सकती है जो राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होकर निष्पक्ष रूप से कार्य करे।
- संसद में बहस और चर्चा के लिए पर्याप्त समय सुनिश्चित करने हेतु संसदीय प्रक्रियाओं में सुधार किया जाना चाहिए, भले ही सांसदों की संख्या में वृद्धि हो।
- संघीय ढांचे के सिद्धांतों का सम्मान करते हुए राज्यों के हितों की रक्षा के लिए एक संवैधानिक समाधान खोजना आवश्यक है।
- जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को प्रोत्साहित करने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन और अन्य नीतियों पर विचार किया जा सकता है, ताकि राज्यों को जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए प्रेरित किया जा सके।
- इस मुद्दे पर राष्ट्रीय सहमति बनाने के लिए राजनीतिक दलों के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
परिसीमन · लोकसभा सीटें · संवैधानिक संशोधन विधेयक · संघवाद · राज्यों का प्रतिनिधित्व · जनसंख्या अनुपात · संसदीय संप्रभुता · प्रतिनिधित्व का सिद्धांत · समानता का अधिकार · दक्षिण भारतीय राज्य
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 81: लोकसभा की संरचना
- अनुच्छेद 82: प्रत्येक जनगणना के बाद पुनः समायोजन
- अनुच्छेद 170: विधानसभाओं की संरचना
- अनुच्छेद 330: लोकसभा में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए सीटों का आरक्षण
अवधारणा प्रवाह
दक्षिणी राज्यों द्वारा जनसंख्या नियंत्रण में सफलता → परिसीमन से प्रतिनिधित्व कम होने की आशंका → लोकसभा सीटों को 543 पर फ्रीज करने की मांग → केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव और संघीय असंतुलन → संवैधानिक संशोधन विधेयक पर राजनीतिक विरोध
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान के अनुच्छेद 82 के अनुसार, प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम संसद द्वारा अधिनियमित किया जाता है।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा लोकसभा सीटों की संख्या को वर्ष 2000 तक के लिए स्थिर कर दिया गया था।
3. परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है। कथन 2 गलत है। 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा लोकसभा सीटों की संख्या को वर्ष 2000 तक के लिए स्थिर कर दिया गया था, जिसे बाद में 84वें संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा 2026 तक बढ़ा दिया गया। कथन 3 सही है। परिसीमन आयोग के आदेश अंतिम होते हैं और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
Q2. परिसीमन आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
अभिकथन (A): परिसीमन आयोग एक उच्चाधिकार प्राप्त निकाय है जिसके आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
कारण (R): संविधान यह सुनिश्चित करता है कि परिसीमन प्रक्रिया राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रहे ताकि निष्पक्ष और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।
उपर्युक्त कथनों के आलोक में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि परिसीमन आयोग के आदेश अंतिम होते हैं और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है। कारण (R) भी सही है क्योंकि यह प्रावधान राजनीतिक हस्तक्षेप को रोकने और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए किया गया है। कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ परिसीमन की प्रक्रिया और इसके संवैधानिक प्रावधानों पर चर्चा कीजिए। क्या जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण संघवाद के सिद्धांतों और दक्षिण भारतीय राज्यों के हितों के लिए खतरा पैदा करता है? समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: परिसीमन की परिभाषा, उद्देश्य और संवैधानिक आधार (अनुच्छेद 82, 170, 330, 332) का उल्लेख करें। परिसीमन आयोग की संरचना और कार्यप्रणाली का वर्णन करें। 42वें और 84वें संविधान संशोधनों के माध्यम से सीटों के स्थगन के इतिहास पर प्रकाश डालें। जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण के पक्ष और विपक्ष में तर्क प्रस्तुत करें। पक्ष में – ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ का सिद्धांत, जनसंख्या वृद्धि के अनुसार प्रतिनिधित्व। विपक्ष में – दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताएं (जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के लिए ‘दंड’), संघवाद पर प्रभाव, भाषाई और सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा। विभिन्न राज्यों के बीच राजनीतिक शक्ति के संतुलन पर संभावित प्रभाव का विश्लेषण करें। निष्कर्ष में एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें कि कैसे जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व और क्षेत्रीय हितों के बीच सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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