दलहन आत्मनिर्भरता मिशन 2030: UPSC & PCS के लिए महत्वपूर्ण योजना

दलहन आत्मनिर्भरता मिशन 2030: UPSC & PCS के लिए महत्वपूर्ण योजना

दलहन आत्मनिर्भरता मिशन 2030: UPSC & PCS के लिए महत्वपूर्ण योजना

Map of Madhya Pradesh, Maharashtra, Rajasthan, Uttar Pradesh, Gujar highlighted on the map of India — दलहन आत्मनिर्भरता…
मानचित्र: भारत के प्रमुख दाल उत्पादन केंद्र

✎ दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन का लक्ष्य 2030-31 तक भारत को दालों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना है, जिसके लिए घरेलू उत्पादन वृद्धि, आयात में कमी और किसानों की आय में वृद्धि पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भूगोल (फसलें, कृषि)  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था (कृषि, खाद्य सुरक्षा, सरकारी नीतियां, आत्मनिर्भरता)
  • Prelims: दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), राष्ट्रीय कृषि बाजार (e-NAM), खाद्य सुरक्षा, कृषि उत्पादन, जलवायु-अनुकूल बीज
  • Essay: भारत में कृषि क्षेत्र का आधुनिकीकरण और किसानों की आय दोगुनी करना, खाद्य सुरक्षा और पोषण: चुनौतियाँ और समाधान

त्वरित पुनरावृत्ति: दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन का लक्ष्य 2030-31 तक भारत को दालों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना है, जिसके लिए घरेलू उत्पादन वृद्धि, आयात में कमी और किसानों की आय में वृद्धि पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारत सरकार द्वारा 11 अक्टूबर, 2025 को ‘दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन’ की शुरुआत की पहली वर्षगाँठ मनाई गई। यह मिशन 2030-31 तक दालों के उत्पादन में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था, जिसके लिए 2025-26 से 2030-31 तक 11,440 करोड़ रुपये का वित्तीय आवंटन किया गया है। इस मिशन के तहत, देश ने दलहन उत्पादन, कृषि रकबे और फसल की उपज में मजबूत वृद्धि दर्ज की है, जिससे आयात पर निर्भरता कम हुई है और निर्यात में वृद्धि हुई है।

पृष्ठभूमि

  • भारत विश्व में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता देश है।
  • दालें भारतीय आहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, क्योंकि इनमें 20-25% प्रोटीन होता है।
  • ऐतिहासिक रूप से, भारत को अपनी घरेलू मांग को पूरा करने के लिए दालों का आयात करना पड़ता था, जिससे देश की विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ता था।
  • सरकार ने किसानों को दालों की खेती के लिए प्रोत्साहित करने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में लगातार वृद्धि की है।
  • कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करना भारत सरकार की एक प्रमुख नीतिगत प्राथमिकता रही है, जिसमें दलहन भी एक महत्वपूर्ण घटक है।
  • जलवायु परिवर्तन और कृषि पद्धतियों में सुधार की आवश्यकता को देखते हुए, जलवायु-अनुकूल बीजों और बेहतर गुणवत्ता वाले बीजों को बढ़ावा देना आवश्यक है।

दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन क्या है?

  • यह मिशन 11 अक्टूबर, 2025 को शुरू किया गया था, जिसका लक्ष्य 2030-31 तक दालों के उत्पादन में भारत को आत्मनिर्भर बनाना है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना, आयात पर निर्भरता कम करना और किसानों की आय बढ़ाना है।
  • मिशन के लिए 2025-26 से 2030-31 तक 11,440 करोड़ रुपये का वित्तीय आवंटन किया गया है।
  • लक्ष्य 2030-31 तक उत्पादन को लगभग 350 लाख टन तक पहुँचाना और प्रति हेक्टेयर पैदावार को 1,130 किलोग्राम तक बढ़ाना है।
  • रणनीतिक उपायों में तूर (अरहर), उड़द और मसूर के उत्पादन पर विशेष ध्यान, जलवायु-अनुकूल बीजों का वितरण और खेती के दायरे का विस्तार शामिल है।
  • मिशन के तहत छह वर्षों में 87.5 लाख मुफ्त बीज किट और 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीजों का वितरण किया जाएगा।
  • उत्पादन बढ़ाने के लिए 489 जिलों को शामिल करते हुए क्लस्टर-आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाएगा और 1,000 प्रसंस्करण इकाइयों (दाल मिलों) की स्थापना की जाएगी।
  • NCCF और NAFED के माध्यम से इच्छुक और पंजीकृत किसानों से तूर, उड़द और मसूर की सुनिश्चित खरीद की जाएगी।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
लक्ष्य 2030-31 तक दालों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना, उत्पादन 350 लाख टन तक पहुँचाना और प्रति हेक्टेयर पैदावार 1,130 किलोग्राम करना।
वित्तीय आवंटन 2025-26 से 2030-31 तक 11,440 करोड़ रुपये का प्रावधान।
फोकस फसलें तूर (अरहर), उड़द और मसूर के उत्पादन में वृद्धि पर विशेष ध्यान।
बीज वितरण छह वर्षों में 87.5 लाख मुफ्त बीज किट और 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीजों का वितरण।
खेती का रकबा दलहन की खेती के दायरे को 35 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाकर कुल 310 लाख हेक्टेयर तक पहुँचाना।
प्रसंस्करण इकाइयाँ 1,000 प्रसंस्करण इकाइयों (दाल मिलों) की स्थापना।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • घरेलू उत्पादन में वृद्धि से आयात पर निर्भरता कम होगी, जिससे बहुमूल्य विदेशी मुद्रा (Foreign Exchange) की बचत होगी।
  • किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करके उनकी आय में वृद्धि होगी, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा।
  • दालों के निर्यात में वृद्धि से देश के कृषि निर्यात को बढ़ावा मिलेगा और व्यापार संतुलन (Trade Balance) में सुधार होगा।

पोषण सुरक्षा

  • दालें प्रोटीन का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं, विशेषकर शाकाहारी आबादी के लिए, जिससे देश में पोषण सुरक्षा (Nutritional Security) सुनिश्चित होगी।
  • दालों की उपलब्धता बढ़ने से कुपोषण (Malnutrition) से निपटने में मदद मिलेगी, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

कृषि विकास

  • जलवायु-अनुकूल बीजों और बेहतर गुणवत्ता वाले बीजों के उपयोग को बढ़ावा देने से कृषि उत्पादकता (Agricultural Productivity) में सुधार होगा।
  • क्लस्टर-आधारित दृष्टिकोण और प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना से दलहन मूल्य-श्रृंखला (Value Chain) का विकास होगा, जिससे किसानों को बेहतर बाज़ार पहुँच मिलेगी।

चुनौतियाँ

1. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

  • दालें वर्षा-आधारित फसलें हैं और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण अनियमित वर्षा, सूखा या बाढ़ जैसी स्थितियाँ उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं।
  • तापमान में वृद्धि और कीटों व बीमारियों का प्रकोप भी दलहन उत्पादन के लिए चुनौती बन सकता है।

2. बुनियादी ढाँचा और प्रौद्योगिकी

  • प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना और प्रमाणित बीजों के वितरण में लॉजिस्टिक्स (Logistics) संबंधी चुनौतियाँ आ सकती हैं, विशेषकर दूरदराज के क्षेत्रों में।
  • किसानों तक उन्नत कृषि तकनीकों और जलवायु-अनुकूल बीजों की पहुँच सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है।

3. बाज़ार और मूल्य अस्थिरता

  • न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और सुनिश्चित खरीद के बावजूद, बाज़ार में दालों की कीमतों में उतार-चढ़ाव किसानों के लिए अनिश्चितता पैदा कर सकता है।
  • भंडारण सुविधाओं की कमी और बाज़ार लिंकेज (Market Linkages) का अभाव किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य प्राप्त करने से रोक सकता है।

4. किसानों की जागरूकता और प्रशिक्षण

  • नई कृषि पद्धतियों, बीज किस्मों और प्रौद्योगिकी को अपनाने के लिए किसानों को पर्याप्त प्रशिक्षण और जागरूकता की आवश्यकता है।
  • छोटे और सीमांत किसानों तक मिशन के लाभों को प्रभावी ढंग से पहुँचाना एक चुनौती हो सकती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
सीमित सिंचाई दालें मुख्य रूप से वर्षा-आधारित फसलें हैं, जिससे सिंचाई सुविधाओं की कमी उत्पादन को अस्थिर बनाती है।
गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता किसानों तक उच्च गुणवत्ता वाले और जलवायु-अनुकूल बीजों की समय पर पहुँच सुनिश्चित करना।
बाज़ार लिंकेज का अभाव छोटे किसानों के लिए अपनी उपज को सीधे बाज़ार तक पहुँचाने में कठिनाई, जिससे बिचौलियों पर निर्भरता बढ़ती है।
कटाई के बाद का नुकसान भंडारण और प्रसंस्करण सुविधाओं की कमी के कारण कटाई के बाद उपज का नुकसान।
अंतर्राष्ट्रीय मूल्य अस्थिरता वैश्विक बाज़ार में दालों की कीमतों में उतार-चढ़ाव घरेलू बाज़ार को प्रभावित कर सकता है।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन

आगे की राह

  • जलवायु-स्मार्ट कृषि (Climate-Smart Agriculture) पद्धतियों को बढ़ावा देना, जिसमें सूखा-प्रतिरोधी किस्मों और कुशल जल प्रबंधन तकनीकों का उपयोग शामिल हो।
  • कृषि अनुसंधान और विकास में निवेश बढ़ाना ताकि नई, उच्च उपज वाली और रोग-प्रतिरोधी दालों की किस्मों को विकसित किया जा सके।
  • किसानों को उन्नत कृषि तकनीकों, मिट्टी स्वास्थ्य प्रबंधन और फसल विविधीकरण (Crop Diversification) पर नियमित प्रशिक्षण और विस्तार सेवाएँ प्रदान करना।
  • दालों के लिए एक सुदृढ़ मूल्य-श्रृंखला विकसित करना, जिसमें कटाई के बाद के नुकसान को कम करने के लिए भंडारण, प्रसंस्करण और विपणन बुनियादी ढाँचे में सुधार शामिल हो।
  • न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) प्रणाली को और अधिक प्रभावी बनाना और किसानों से दालों की सुनिश्चित खरीद सुनिश्चित करना।
  • अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौतों में दालों के हितों की रक्षा करना और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए आयात नीतियों को संतुलित करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

दलहन आत्मनिर्भरता मिशन · पोषण सुरक्षा · कृषि निर्यात · न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) · मूल्य-श्रृंखला दृष्टिकोण · जलवायु-अनुकूल बीज · क्लस्टर-आधारित दृष्टिकोण · दाल मिलें · आयात प्रतिस्थापन · किसानों की आय · खाद्य सुरक्षा · कृषि विविधीकरण

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 39(a)’, ‘note’: ‘आजीविका के पर्याप्त साधनों का अधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 47’, ‘note’: ‘पोषण स्तर और जीवन स्तर में सुधार’}

अवधारणा प्रवाह

दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन का शुभारंभ  →  घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित  →  आयात पर निर्भरता में कमी  →  किसानों की आय में वृद्धि  →  पोषण सुरक्षा सुनिश्चित  →  कृषि अर्थव्यवस्था का सुदृढ़ीकरण

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस मिशन का लक्ष्य 2030-31 तक दालों के उत्पादन को लगभग 350 लाख टन तक बढ़ाना है।
2. यह मिशन 2025-26 से 2030-31 तक की अवधि के लिए 11,440 करोड़ रुपये के वित्तीय आवंटन के साथ शुरू किया गया था।
3. मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान भारत के प्रमुख दाल उत्पादक क्षेत्रों में से हैं।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। मिशन का लक्ष्य 2030-31 तक उत्पादन को 350 लाख टन तक बढ़ाना है। कथन 2 सही है। मिशन के लिए 2025-26 से 2030-31 तक 11,440 करोड़ रुपये का वित्तीय आवंटन किया गया है। कथन 3 सही है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान भारत के प्रमुख दाल उत्पादक राज्य हैं।

Q2. अभिकथन (A): भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक देश है और दालें भारतीय आहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
कारण (R): दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन का उद्देश्य घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देकर और आयात पर निर्भरता कम करके पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

  1. A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
  2. A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
  3. A सही है, लेकिन R गलत है।
  4. A गलत है, लेकिन R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि भारत दालों का सबसे बड़ा उत्पादक है और यह भारतीय आहार का अभिन्न अंग है। कारण (R) भी सही है और यह अभिकथन का सही स्पष्टीकरण है, क्योंकि मिशन का प्राथमिक लक्ष्य घरेलू उत्पादन बढ़ाकर और आयात कम करके पोषण सुरक्षा प्राप्त करना है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए ‘दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन’ के उद्देश्यों और रणनीतिक उपायों का विश्लेषण कीजिए। यह मिशन किसानों की आय और पोषण सुरक्षा को कैसे प्रभावित कर सकता है? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** ‘दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन’ (Pulses Self-Sufficiency Mission) का संक्षिप्त परिचय, इसकी शुरुआत की तिथि (11 अक्टूबर, 2025) और वित्तीय आवंटन (11,440 करोड़ रुपये)। दालों के महत्व पर प्रकाश डालें (प्रोटीन स्रोत, पोषण सुरक्षा, कृषि निर्यात)।
2. **मिशन के उद्देश्य:**
* 2030-31 तक दालों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करना (लक्ष्य: 350 लाख टन उत्पादन, 1,130 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पैदावार)।
* आयात पर निर्भरता कम करना।
* किसानों की आय बढ़ाना।
* व्यापक मूल्य-श्रृंखला दृष्टिकोण अपनाना।
3. **रणनीतिक उपाय:**
* तूर, उड़द और मसूर के उत्पादन पर विशेष ध्यान।
* जलवायु-अनुकूल बीजों और बेहतर गुणवत्ता वाले बीजों को बढ़ावा देना।
* मुफ्त बीज किटों और प्रमाणित बीजों का वितरण (87.5 लाख किट, 126 लाख क्विंटल बीज)।
* दलहन की खेती के दायरे में वृद्धि (35 लाख हेक्टेयर तक विस्तार, कुल 310 लाख हेक्टेयर)।
* क्लस्टर-आधारित दृष्टिकोण (489 जिलों को शामिल करना)।
* 1,000 प्रसंस्करण इकाइयों (दाल मिलों) की स्थापना।
* NCCF और NAFED के माध्यम से सुनिश्चित खरीद (न्यूनतम समर्थन मूल्य – MSP पर)।
* MSP में वृद्धि (उड़द, तूर, मसूर के MSP में हालिया वृद्धि का उल्लेख)।
4. **किसानों की आय पर प्रभाव:**
* MSP में वृद्धि और सुनिश्चित खरीद से किसानों को बेहतर मूल्य और आय सुरक्षा।
* उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि से अधिक उपज और अधिक लाभ।
* प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना से मूल्य संवर्धन और किसानों को बेहतर बाजार पहुंच।
* आयात पर निर्भरता कम होने से घरेलू बाजार में स्थिरता।
5. **पोषण सुरक्षा पर प्रभाव:**
* दालों के घरेलू उत्पादन में वृद्धि से प्रति व्यक्ति उपलब्धता में सुधार।
* दालों में उच्च प्रोटीन सामग्री के कारण कुपोषण से निपटने में मदद।
* खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका, विशेषकर प्रोटीन की कमी वाले क्षेत्रों में।
6. **निष्कर्ष:** मिशन की सफलता से भारत की कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूती, विदेशी मुद्रा की बचत और सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में योगदान।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


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