फेक न्यूज़ और भ्रामक सूचना पर संसद की चिंता : लोकतंत्र की रक्षा की दिशा में कदम

फेक न्यूज़ और भ्रामक सूचना पर संसद की चिंता : लोकतंत्र की रक्षा की दिशा में कदम

सामान्य अध्ययन- 3 – आंतरिक सुरक्षा खण्ड के अंतर्गत – आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में मीडिया और सोशल नेटवर्किंग साइट्स की भूमिका

प्रारंभिक परीक्षा के लिए – फेक न्यूज, भारतीय प्रेस परिषद, मौलिक अधिकार, अनुच्छेद 19, वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार, भाषिनी (BHASHINI), सूचना का अधिकार अधिनियम, प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB), भारत निर्वाचन आयोग (ECI), भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र, सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021

मुख्य परीक्षा के लिए – भारत में डिजिटल मीडिया के विनियमन की आवश्यकता : लोकतांत्रिक मूल्यों और सार्वजनिक व्यवस्था पर फर्जी समाचारों या फेक न्यूज़ और भ्रामक सूचना की चुनौतियाँ एवं प्रभाव 

 

ख़बरों में क्यों ?

 

 

  • भारतीय लोकतंत्र में मीडिया और सूचना का प्रवाह हमेशा से अहम भूमिका निभाता रहा है। प्रौद्योगिकी के विकास और डिजिटल माध्यमों की पहुँच ने सूचना-साझेदारी को पहले से कहीं अधिक त्वरित और सुलभ बना दिया है। किंतु इस तेज़ी ने फेक न्यूज़ और भ्रामक सूचना का अनियंत्रित प्रसार जैसी एक नई समस्या को भी जन्म दिया है 
  • हाल ही में संसद की संचार और सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति ने इस विषय पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कई ठोस सिफारिशें पेश की हैं। 
  • इस स्थायी समिति का मानना है कि झूठी खबरें न केवल समाज में अव्यवस्था फैलाती हैं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की जड़ों को भी कमज़ोर करती हैं।

 

समिति की प्रमुख सिफारिशें : 

 

स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में अनेक उपाय सुझाए हैं जो फेक न्यूज़ पर अंकुश लगाने में सहायक हो सकते हैं।

  1. देश के हर मीडिया संगठन के भीतर तथ्य-जाँच प्रणाली स्थापित करने की अनिवार्यता होना : समिति चाहती है कि हर मीडिया संगठन के भीतर तथ्य-जाँच की औपचारिक व्यवस्था हो। इसके साथ ही, एक आंतरिक लोकपाल या ओम्बड्समैन नियुक्त किया जाए, जो संपादकीय सामग्री की निगरानी कर सके और शिकायतों का समाधान सुनिश्चित कर सके।
  2. कड़े दंडात्मक प्रावधान को अनिवार्य करना : झूठी खबरों के प्रसार को हतोत्साहित करने के लिए समिति ने जुर्माने की राशि बढ़ाने तथा संपादकीय ज़िम्मेदारी तय करने की सिफारिश की है। इससे मीडिया संगठनों की जवाबदेही बढ़ेगी।
  3. स्पष्ट परिभाषा का निर्धारण करने की जरूरत : समिति ने ‘फेक न्यूज़’ की एक ठोस और स्वीकार्य परिभाषा तय करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि फेक न्यूज़ और वैचारिक असहमति, व्यंग्य या आलोचना को एक ही श्रेणी में न डाला जाए।
  4. भारतीय प्रेस परिषद और निगरानी तंत्र को सशक्त करने की आवश्यकता : भ्रामक सूचना के बेहतर निगरानी के लिए शिकायत पोर्टल और स्वतंत्र नियामक निकाय स्थापित करने का सुझाव दिया गया है। इससे संस्थागत स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी। मीडिया की बेहतर निगरानी के लिए, समिति ने एक स्वतंत्र निगरानी निकाय और एक शिकायत पोर्टल बनाने का सुझाव दिया है।
  5. एआई-जनित सामग्री का विनियमन : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से बनी सामग्री पर भी लगाम कसने की बात कही गई है। समिति ने एआई सामग्री बनाने वालों के लिए लाइसेंसिंग और एआई-जनित सामग्री (जैसे वीडियो) पर यह लेबल लगाना अनिवार्य करने का प्रस्ताव दिया है कि यह एआई द्वारा बनाई गई है। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और गुमराह करने वाली सामग्री को रोका जा सकेगा।

 

भ्रामक सूचना/ भ्रामक जानकारी या फेक न्यूज़ पर लगाम क्यों ज़रूरी है?

 

आज फेक न्यूज़ केवल एक संचार समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती बन चुकी है।

  1. लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर असर : चुनावों के दौरान गलत सूचनाएँ जनमत को प्रभावित कर सकती हैं। इससे मतदाता वास्तविक तथ्यों से वंचित रह जाते हैं और लोकतंत्र की नींव डगमगा सकती है।
  2. सूचना के अधिकार का ह्रास : भारत का संविधान नागरिकों को अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति और सूचना का अधिकार देता है। किंतु झूठी खबरें नागरिकों तक सही सूचना पहुँचने में बाधक बनती हैं।
  3. लोक व्यवस्था का विघटन : वर्ष 2018 में बच्चों के अपहरण की अफवाहों ने कई राज्यों में भीड़ हिंसा को जन्म दिया था। यह उदाहरण बताता है कि भ्रामक सूचनाएँ सीधे जनसुरक्षा को प्रभावित कर सकती हैं।
  4. मीडिया और संस्थानों पर विश्वास की कमी : कोविड-19 के दौरान टीकाकरण और उपचार को लेकर फैली अफवाहों ने लोगों का भरोसा सरकारी दिशा-निर्देशों से उठाया और टीकाकरण अभियान प्रभावित हुआ।
  5. राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा : भ्रामक सूचना समाज में विभाजन और अशांति फैला सकती है, जिसे बाहरी शक्तियाँ भी अपने हित में उपयोग कर सकती हैं।

 

भ्रामक सूचना/ भ्रामक जानकारी या फेक न्यूज़ को नियंत्रित करने की मुख्य चुनौतियाँ : 

 

 

फेक न्यूज़ पर रोक लगाने का कार्य आसान नहीं है। इससे जुड़ी मुख्य चुनौतियाँ निम्नलिखित है – 

  1. परिभाषा की जटिलता या अस्पष्ट होना : हर देश और समाज में ‘फेक न्यूज़’ की परिभाषा अलग हो सकती है। विचार और व्यंग्य को इससे अलग करना हमेशा सरल नहीं होता।
  2. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल : यदि नियम बहुत कठोर बनाए जाएँ, तो वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर सकते हैं। संतुलन साधना सबसे बड़ी चुनौती है।
  3. डिजिटल प्लेटफार्मों की वैश्विक स्थिति : अधिकांश सोशल मीडिया कंपनियाँ भारत से बाहर पंजीकृत हैं। ऐसे में उन पर कानूनी कार्यवाही करना कठिन होता है।
  4. तकनीकी कठिनाइयाँ : डीपफेक, बॉट्स और एआई-जनित सामग्री इतनी वास्तविक प्रतीत होती है कि उसे पहचानना मुश्किल हो जाता है।
  5. कम डिजिटल साक्षरता : भारत में बड़ी आबादी अब भी डिजिटल साक्षर नहीं है। वे आसानी से भ्रामक सामग्री के प्रभाव में आ जाते हैं।
  6. राजनीतिक ध्रुवीकरण : राजनीतिक रूप से बंटे हुए समाज में लोग ऐसी ‘फेक न्यूज़’ पर आसानी से यकीन कर लेते हैं जो उनके विचारों से मेल खाती है, जिससे इसे रोकना और भी मुश्किल हो जाता है।
  7. सरकारी हस्तक्षेप का डर : सख्त नियमों को सेंसरशिप के रूप में देखा जा सकता है, जिससे जनता का अधिकारियों पर से विश्वास उठ सकता है।

 

भारत की मौजूदा पहलें : 

 

भारत सरकार ने ‘फेक न्यूज़’ को रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं:

  • भारतीय प्रेस परिषद (PCI) : यह नैतिक पत्रकारिता के लिए दिशानिर्देश देती है।
  • आई.टी. अधिनियम, 2000 : यह सरकार को ऑनलाइन सामग्री को नियंत्रित करने का अधिकार देता है। सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के तहत, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को गैर-कानूनी सामग्री हटाने की ज़िम्मेदारी दी गई है।
  • प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) फैक्ट-चेकिंग इकाई : यह सरकार से जुड़ी भ्रामक जानकारी का खंडन करती है।
  • भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) : ईसीआई ने ‘मिथक बनाम वास्तविकता रजिस्टर’ शुरू किया है और चुनावों के दौरान ‘फेक न्यूज़’ का मुकाबला करने के लिए जागरूकता अभियान भी चलाता है।
  • साइबर अपराध समन्वय केंद्र और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल – ऑनलाइन अपराधों से निपटने की प्रणाली।

 

समाधान / आगे की राह :

 

 

स्थायी समिति की सिफारिशें तभी प्रभावी होंगी जब उन्हें ठोस क्रियान्वयन और व्यापक सामाजिक सहयोग प्राप्त होगा।

  1. कानूनी ढाँचा स्पष्ट करना – कानून में यह स्पष्ट होना चाहिए कि फेक न्यूज़ राय, व्यंग्य और आलोचना से अलग है।
  2. तथ्य-जाँच तंत्र का संस्थानीकरण – स्वतंत्र और प्रमाणित फैक्ट-चेक संस्थाओं की मान्यता होनी चाहिए।
  3. प्लेटफॉर्म की जवाबदेही – सोशल मीडिया कंपनियों को अपने एल्गोरिद्म पारदर्शी बनाने और झूठी सामग्री हटाने की समयबद्ध ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए।
  4. प्रौद्योगिकी का ज़िम्मेदार उपयोग – एआई-आधारित उपकरणों से झूठी खबरों का त्वरित पता लगाया जा सकता है।
  5. जन-जागरूकता और डिजिटल साक्षरता – नागरिकों को सिखाना होगा कि किस प्रकार सूचना की सत्यता को परखा जाए।
  6. अंतर-मंत्रालयी समन्वय सुनिश्चित किया जाना – विभिन्न मंत्रालयों और एजेंसियों के बीच सहयोग सुनिश्चित किया जाए।

 

निष्कर्ष : 

 

 

  • फेक न्यूज़ का मुकाबला करना केवल कानूनी या तकनीकी उपायों का विषय नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी भी है। 
  • भारत का लोकतंत्र तभी सशक्त रह सकता है जब जनता तक सही सूचना पहुँचे और वे तथ्यों के आधार पर निर्णय ले सकें। संसद की स्थायी समिति की सिफारिशें इस दिशा में एक अहम पहल हैं। किंतु इनका सफल कार्यान्वयन तभी संभव है जब सरकार, मीडिया संस्थान, डिजिटल प्लेटफॉर्म और आम नागरिक मिलकर सक्रिय भूमिका निभाएँ।
  • किसी भी देश के लिए भ्रामक सूचना या गलत जानकारी को रोकना एक जटिल चुनौती है, लेकिन सही नीतियों, जागरूकता और तकनीकी समाधानों के साथ इससे निपटा जा सकता है। भारत के लिए भी यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर लगातार ध्यान देना और मिलकर काम करना बहुत ज़रूरी है।

 

स्त्रोत – पी. आई. बी एवं द हिन्दू।

 

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

 

Q.1. निम्नलिखत कथनों और कारणों पर विचार कीजिए :  

कथन (A): फेक न्यूज़ लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करती है।
कारण (R): चुनावों के दौरान झूठी खबरें जनमत को प्रभावित कर सकती हैं और मतदाता वास्तविक तथ्यों से वंचित रह जाते हैं।

  1. A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सही हैं, परन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सही है, परन्तु R गलत है।
  4. A गलत है, परन्तु R सही है।

कूट के आधार पर सही विकल्प का चयन कीजिए।

A. केवल 1 

B. केवल 2 

C. केवल 3 

D. केवल 4 

उत्तर – A

 

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :  

 

Q.1. वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। क्या इसके दायरे में घृणा-भाषण भी शामिल माना जा सकता है? भारत में फिल्मों को अभिव्यक्ति के अन्य माध्यमों की तुलना में विशेष स्थान क्यों प्राप्त है? इसकी विवेचना कीजिए। ( शब्द सीमा – 250 अंक – 15 )

Dr. Akhilesh Kumar Shrivastava
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