भारतीय कृषि में सतत समृद्धि : कृषि अपशिष्ट प्रबंधन और चक्रीय अर्थव्यवस्था

भारतीय कृषि में सतत समृद्धि : कृषि अपशिष्ट प्रबंधन और चक्रीय अर्थव्यवस्था

मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र – 3 – के अंतर्गत ‘ भारतीय कृषि, भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास ’ से संबंधित।

प्रारंभिक परीक्षा के अंतर्गत – ‘ कृषि में चक्रीय अर्थव्यवस्था, SDG 12, मीथेन, बहु-राज्य सहकारी समितियाँ, बुनियादी ढांचा कोष (AIF), विकसित भारत 2047, जलवायु परिवर्तन, वायु, मृदा तथा जल प्रदूषण, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय, कृषि अपशिष्ट प्रबंधन, इन-सीटू,  एक्स-सीटू (Ex-situ), SDG 2 (शून्य भुखमरी)’ से संबंधित।

 

ख़बरों में क्यों ?

 

  • भारत सरकार ने फरवरी 2026 में अपशिष्ट से संपदा/धन (Waste to Wealth) पहल को पर्यावरणीय स्थिरता और आर्थिक विकास के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में रेखांकित किया है। 
  • भारत में प्रतिवर्ष अनुमानित 35 करोड़ टन कृषि अपशिष्ट उत्पन्न होता है। ऐसे में दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा और जलवायु लचीलापन सुनिश्चित करने के लिए भारतीय कृषि में सतत समृद्धि के लिए चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण एक पारिस्थितिकी एवं आर्थिक अनिवार्यता बन गया है।

 

कृषि में चक्रीय अर्थव्यवस्था की अवधारणा :

 

 

  • कृषि में चक्रीय अर्थव्यवस्था उत्पादन और उपभोग के पैटर्न / प्रणाली में एक प्रणालीगत परिवर्तन को दर्शाती है। इसका उद्देश्य कच्चे माल, जल और ऊर्जा के दोहन को न्यूनतम करना तथा मूल्य शृंखला के प्रत्येक चरण में अपशिष्ट को समाप्त करना है। 
  • यह मुख्य रूप से छह R सिद्धांतों – Reduce (कम करना), Reuse (पुनः उपयोग), Recycle (पुनर्चक्रण), Refurbish (नवीनीकरण), Recover (पुनर्प्राप्ति) और Repair (मरम्मत) दृष्टिकोण द्वारा निर्देशित है।
  • रेखीय अर्थव्यवस्था ‘ले–बनाओ–फेंको’ मॉडल के विपरीत, एक चक्रीय अर्थव्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि सामग्री ‘पुनर्चक्रण’ के माध्यम से विस्तारित अवधि तक उत्पादक उपयोग में बनी रहे, जहाँ कचरे को उसके मूल रूप में या गुणवत्ता हानि के बिना उच्च-मूल्य वाली पुनर्प्राप्ति के रूप में बदल दिया जाता है।

 

पृष्ठभूमि और संदर्भ :

 

  • भारत का कृषि क्षेत्र खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, किंतु खेती, कटाई और प्रसंस्करण के दौरान यह अपशिष्ट का एक प्रमुख स्रोत भी है। वैश्विक स्तर पर मानव उपभोग के लिए उत्पादित 1.3 अरब टन खाद्य पदार्थ प्रतिवर्ष नष्ट हो जाते हैं।
  • भारत में लैंडफिल में जैविक अपशिष्ट के कुप्रबंधन से मीथेन तथा अन्य ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है, जिससे जलवायु परिवर्तन तेज होता है और वायु, मृदा तथा जल प्रदूषित होते हैं। हालांकि, इस अपशिष्ट में अपार संभावनाएँ निहित होती हैं। 
  • नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार भारत में कृषि अवशेषों से प्रतिवर्ष 18,000 मेगावाट से अधिक ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है और पोषक तत्वों से भरपूर जैविक उर्वरक तैयार किए जा सकते हैं।

 

महत्व और प्रासंगिकता :

 

 

  • आर्थिक विकास और रोजगार : वर्ष 2050 तक, भारत की चक्रीय अर्थव्यवस्था का बाजार मूल्य $2 ट्रिलियन तक पहुंचने और 10 मिलियन नौकरियां पैदा करने की उम्मीद है।
  • ऊर्जा और मृदा सुरक्षा : अवशेषों को कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) और जैविक खाद में बदलने से रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम होती है और मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार होता है।
  • जलवायु शमन : इंजीनियर्ड बायोचार जैसी तकनीकें कार्बन को अलग करती हैं और पर्यावरणीय प्रदूषकों को हटाती हैं, जिससे खाद्य अपशिष्ट प्रबंधन चक्रीयता का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन जाता है।
  • संसाधन दक्षता : प्रकृति की पुनर्योजी प्रणालियों से प्रेरणा लेते हुए, चक्रीयता न्यूनतम अपशिष्ट के साथ इष्टतम संसाधन उपयोग सुनिश्चित करती है।

 

कृषि अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ और उससे जुड़े मुख्य मुद्दे :

 

  • इन-सीटू बर्निंग (खेत में पराली जलाना) : अगली फसल चक्र के लिए जल्दी से जमीन तैयार करने के लिए, किसान अक्सर फसल के अवशेषों (पराली) को जला देते हैं, जिससे मिट्टी के पोषक तत्व कम हो जाते हैं और गंभीर वायु प्रदूषण होता है।
  • कटाई के बाद का नुकसान : कटाई के बाद की पूरी प्रणाली में महत्वपूर्ण मात्रात्मक (वजन/आयतन) और गुणात्मक (पोषक तत्व/स्वाद) कमी आती है।
  • पशुधन अपशिष्ट प्रबंधन : भारी मात्रा में गोबर का प्रबंधन और बीमारी के प्रकोप के दौरान पशुओं के शवों का सुरक्षित निपटान एक तकनीकी और वित्तीय चुनौती बना हुआ है।
  • खुदरा स्तर पर खाद्य अपशिष्ट : वैश्विक खाद्य अपशिष्ट का लगभग 60% घरेलू स्तर पर उत्पन्न होता है, जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में भारी योगदान देता है।

 

आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव :

 

  • आर्थिक : कृषि बुनियादी ढांचा कोष (AIF) जैसे बुनियादी ढांचे के कोषों ने 1.13 लाख से अधिक परियोजनाओं के लिए ₹66,310 करोड़ मंजूर किए हैं, जिसमें कोल्ड स्टोरेज और प्रसंस्करण इकाइयां शामिल हैं, जिससे किसान की आय में वृद्धि हुई है।
  • सामाजिक : जल जीवन मिशन और जल शक्ति मिशन कृषि के लिए जल सुरक्षा और उपचारित अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग को बढ़ावा देते हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में टिकाऊ जल शासन सुनिश्चित होता है।
  • पर्यावरणीय : चक्रीय अभ्यास सीधे तौर पर मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार और रासायनिक निर्भरता को कम करके SDG 12 (जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन) और SDG 2 (शून्य भुखमरी) का समर्थन करते हैं।

 

शासन और संस्थागत पहलू :

 

  • सरकार ने चक्रीयता को बढ़ावा देने के लिए कई बहु-क्षेत्रीय पहलें शुरू की हैं। जो निम्नलिखित है – 
  • गोबरधन योजना (GOBARdhan Scheme) : पशुओं के गोबर और खाद्य अपशिष्ट को कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) और जैविक खाद में बदलने के लिए एक बहु-मंत्रालयी प्रयास। जनवरी 2026 तक, यह 979 परिचालन संयंत्रों के साथ भारत के 51.4% जिलों को कवर करती है।
  • फसल अवशेष प्रबंधन (Crop Residue Management – CRM) : वर्ष 2018-19 से, 42,000 से अधिक कस्टम हायरिंग सेंटरों (CHCs) के माध्यम से इन-सीटू और एक्स-सीटू अवशेष प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों को ₹3,926.16 करोड़ जारी किए गए हैं।
  • बुनियादी ढांचा कोष (AIF) और AHIDF : पशुपालन बुनियादी ढांचा विकास कोष (₹15,000 करोड़ का कोष) और कृषि बुनियादी ढांचा कोष (AIF) कचरे से धन (Waste-to-Wealth) बुनियादी ढांचे और जैविक इनपुट उत्पादन के लिए संस्थागत ऋण प्रदान करते हैं।
  • बहु-राज्य सहकारी समितियाँ (Multi-State Cooperative Societies – MSCS) : जैविक खाद और पशु उप-उत्पादों जैसे खाल और हड्डियों के वैज्ञानिक प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए तीन नई समितियां गठित की गई हैं।

 

समाधान / आगे की राह :

 

 

  • बुनियादी ढांचे का विस्तार करने की जरूरत : उन शेष 48.6% जिलों में कस्टम हायरिंग सेंटर (CHCs) और बायोगैस संयंत्रों की स्थापना में तेजी लाना जो अभी तक गोबरधन (GOBARdhan) के अंतर्गत नहीं आए हैं।
  • तकनीकी / प्रोद्योगिकी एकीकरण करने की आवश्यकता : पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता बढ़ाने के लिए लक्षित प्रोत्साहनों के माध्यम से इंजीनियर्ड बायोचार (Engineered Biochar) और बायोमास पुनर्चक्रण के उपयोग को बढ़ावा देना।
  • नियामक सामंजस्य की जरूरत : निजी निवेश को आकर्षित करने और कचरे से धन (Waste-to-Wealth) के पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए उर्वरक नियंत्रण आदेश (Fertiliser Control Order) के तहत जैविक खाद के मानदंडों को और सरल बनाना।
  • एकीकृत जल प्रबंधन करने की जरूरत : भूजल पर दबाव को कम करने के लिए कृषि के गैर-पेय उद्देश्यों के लिए घरेलू और औद्योगिक अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग का विस्तार करना।
  • व्यवहार परिवर्तन के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता : किसानों को पराली के इन-सीटू (In-situ) प्रबंधन के बजाय एक्स-सीटू (Ex-situ) प्रबंधन के लिए प्रोत्साहित करना, जहाँ पराली को जलाने के बजाय उसे जैव-ऊर्जा (बायोएनर्जी) हेतु एकत्र किया जा सके।

 

निष्कर्ष :

 

  • भारतीय कृषि में ‘चक्रीय अर्थव्यवस्था’ की ओर संक्रमण यह स्पष्ट करता है कि आर्थिक विस्तार और पर्यावरणीय संरक्षण परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। 
  • गोबरधन (GOBARdhan) और कृषि अवसंरचना कोष (AIF) जैसी प्रमुख योजनाओं के माध्यम से भारत कृषि अपशिष्ट को ‘कचरे से कंचन/ संपदा/धन’ (Waste to Wealth) में बदलकर सतत समृद्धि की नई आधारशिला रख रहा है। यह रूपांतरण केवल अपशिष्ट प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक विकास और पारिस्थितिक संतुलन के बीच एक सुदृढ़ सेतु है।
  • अंततः, बुनियादी ढांचे (जैसे – CHCs और बायोगैस संयंत्र) में निवेश और नीतिगत सुधारों के माध्यम से यह प्रणाली ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘विकसित भारत 2047’ के विजन को साकार करने के लिए अपरिहार्य है। यह सुनिश्चित करता है कि राष्ट्र की प्रगति समावेशी, जलवायु-लचीली और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध हो।

 

स्त्रोत – पी. आई. बी एवं द हिन्दू।

 

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

 

Q.1. भारत में कृषि में चक्रीय अर्थव्यवस्था और कचरे से धन पहल के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. चक्रीय अर्थव्यवस्था उत्पादकता बढ़ाने के लिए ‘लो-बनाओ-फेको’ (take-make-dispose) मॉडल को बढ़ावा देती है।
  2. गोबर धन (GOBARdhan) योजना पशुओं के गोबर और जैविक कचरे को कंप्रेस्ड बायोगैस और जैविक खाद में बदलने पर केंद्रित है।
  3. भारत में कृषि अवशेषों में महत्वपूर्ण नवीकरणीय ऊर्जा उत्पन्न करने की क्षमता है।
  4. फसल अवशेषों को जलाने (पराली जलाना) से पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में वृद्धि होती है जिससे मिट्टी की उर्वरता में सुधार होता है।

उपरोक्त कथनों में से कौन से सही हैं?

A. केवल 1 और 2 

B. केवल 2 और 3 

C. केवल 1, 3 और 4 

D. केवल 2, 3 और 4

उत्तर : B. केवल 2 और 3

व्याख्या :

  • कथन 1 गलत है। चक्रीय अर्थव्यवस्था रैखिक ‘लो-बनाओ-फेको’ मॉडल के विपरीत कचरे को समाप्त करने और संसाधनों के पुनर्चक्रण पर आधारित है।
  • कथन 4 गलत है। पराली जलाने से मिट्टी के आवश्यक पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं और वायु प्रदूषण फैलता है, इससे उर्वरता में सुधार नहीं बल्कि गिरावट आती है। अतः विकल्प B सही उत्तर है। 

 

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

 

Q.1. कृषि में ‘चक्रीय अर्थव्यवस्था’ की अवधारणा की व्याख्या कीजिए। चर्चा कीजिए कि यह भारत में जलवायु लचीलापन, किसानों की आय में वृद्धि और सतत विकास में किस प्रकार योगदान दे सकती है? ( शब्द सीमा – 250 अंक – 15 )

Dr. Akhilesh Kumar Shrivastava
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