भारतीय रुपये का मूल्यह्रास ( Depreciation of Indian Rupees)

भारतीय रुपये का मूल्यह्रास ( Depreciation of Indian Rupees)

  भारतीय रुपये का मूल्यह्रास

पाठ्यक्रम- जीएस-3 भारतीय अर्थव्यवस्था

चर्चा में क्यों?

विदेशी फंड निकासी और भारत-US व्यापार समझौते की अनिश्चितता के कारण भारतीय रुपये का मूल्य 90.43 प्रति अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक गिर गया। वर्ष 2025 में अब तक 5% की गिरावट के साथ रुपये को एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गया है।

रुपये का अवमूल्यन क्या है?

परिचय: रुपये का अवमूल्यन उस स्थिति को कहते हैं जब भारतीय रुपया (INR) प्रमुख विदेशी मुद्राओं, विशेष रूप से अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने मूल्य में गिरावट करता है।

रुपये के मूल्यह्रास का प्रभाव:

सकारात्मक:

निर्यात को बढ़ावा: भारतीय वस्तुएँ विदेशों में सस्ती हो जाती हैं; यह IT, फार्मा और वस्त्र जैसे क्षेत्रों में मदद करता है।
प्रेषण का अधिक मूल्य: NRI को भेजे गए प्रति डॉलर पर अधिक रुपये मिलते हैं, जिससे प्रेषण प्रवाह में वृद्धि होती है।
घरेलू उत्पादन को बढ़ावा: महंगे आयात स्थानीय निर्माण को प्रोत्साहित कर सकते हैं।

नकारात्मक:

आयातित मुद्रास्फीति: कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, उर्वरक जैसी आवश्यक आयातित वस्तुएँ महँगी हो जाती हैं, जिससे मुद्रास्फीति बढ़ती है।
ऊँची कर्ज सेवा लागत: विदेशी मुद्रा में ऋण रखने वाले उधारकर्त्ताओं को समान डॉलर कर्ज चुकाने के लिये अधिक रुपये देने पड़ते हैं।
व्यापार और चालू खाता घाटे में वृद्धि: महंगे आयात बिल के कारण घाटा बढ़ जाता है, भले ही आयात की मात्रा बढ़ी न हो।
पूंजी पलायन का जोखिम: लगातार मूल्यह्रास विदेशी निवेशकों का विश्वास कमज़ोर करता है, जिससे शेयर और ऋण बाज़ारों से और अधिक निकासी होती है।
उपभोक्ता की क्रय शक्ति में कमी: महंगे आयात घरेलू मांग को कमज़ोर करते हैं।

 

मुद्रा का अवमूल्यन बनाम मूल्यह्रास (Devaluation vs Depreciation of Currency)

अवमूल्यन

मूल्यह्रास

सरकार/RBI द्वारा मुद्रा के मूल्य में जानबूझकर की गई गिरावट

मांग और आपूर्ति की ताकतों के कारण बाज़ार द्वारा मुद्रा के मूल्य में गिरावट।

मुद्रा अवमूल्यन केवल स्थिर या पेग्ड विनिमय दर प्रणाली के अंतर्गत होता है।

मूल्यह्रास आमतौर पर तिरती या प्रबंधित-तिरती विनिमय दर प्रणाली (जैसे भारत की) के तहत होता है।

मुद्रा अवमूल्यन का उद्देश्य निर्यात बढ़ाना, व्यापार घाटा कम करना या आर्थिक वृद्धि को प्रोत्साहित करना होता है।

अवमूल्यन के कारणों में FPI निकासी, उच्च आयात, मुद्रास्फीति, बढ़ता हुआ चालू खाता घाटा (CAD), वैश्विक झटके आदि शामिल हैं।

रुपये के मूल्यह्रास के कारण कौन से हैं?

लगातार FPI निकासी: विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने जनवरी 2025 से अब तक 1.48 लाख करोड़ रुपये से अधिक की निकासी की है और अपने फंड को उन बाज़ारों में ले गए हैं जो बेहतर रिटर्न प्रदान करते हैं।
साथ ही वैश्विक भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण अमेरिकी डॉलर की सुरक्षित निवेश (सेफ-हेवेन) संपत्ति के रूप में मांग बढ़ गई है।
US–भारत व्यापार समझौते की अनिश्चितता: व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने में देरी के कारण भविष्य के शुल्क और निर्यात प्रतिस्पर्द्धा को लेकर संदेह उत्पन्न हुई है, जिससे भारत के बाहरी क्षेत्र में विश्वास कमज़ोर हुआ है और रुपये पर दबाव बढ़ गया है।
आयातकों द्वारा बढ़ी हुई डॉलर की मांग: विशेष रूप से सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी के बढ़ते आयात के कारण आयातकों को अधिक डॉलर खरीदने पड़े, जिससे डॉलर की मांग बढ़ी और रुपये के अवमूल्यन में योगदान हुआ।
भारत का व्यापार घाटा: अक्तूबर 2025 में वस्तु निर्यात में 11.8% की गिरावट आई, जबकि आयात में 16.6% की वृद्धि हुई।
निर्यात कमज़ोर होने और आयात में तेज़ी से वृद्धि होने के कारण व्यापार घाटा बढ़ गया है, जिससे रुपये पर दबाव पड़ा है।
ब्रेंट क्रूड की उच्च कीमतें भारत के आयात बिल को बढ़ा देती हैं, जिससे व्यापार घाटा और बढ़ जाता है तथा रुपये को कमज़ोर करती है।
उच्च सोना आयात: अक्तूबर 2025 में सोने के आयात में लगभग 200% की वृद्धि हुई। घरेलू सोने की उच्च कीमतों ने आयात बिल को और बढ़ा दिया, हालाँकि बढ़ती कीमतों ने सोने के भंडार का मूल्य बढ़ाया, फिर भी कुल नुकसान को पूरा करने के लिये यह पर्याप्त नहीं था।
इन उच्च सोना आयातों ने चालू खाता घाटा बढ़ा दिया है तथा रुपये के मूल्यह्रास पर दबाव को और बढ़ा दिया है।

भारतीय रुपये को कैसे मज़बूत किया जा सकता है?

रुपया-आधारित व्यापार निपटान को बढ़ावा देना: डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिये अधिक देशों के साथ विशेष वोस्ट्रो रुपये खाते (SVRAs) का विस्तार करना।
स्थानीय मुद्रा निपटान (LCS) समझौतों को प्रोत्साहित करना, खासकर एशिया, अफ्रीका और गल्फ के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ।
रुपये-आधारित चालान और भुगतान के लिये द्विपक्षीय समझौते (MoUs) बढ़ाएँ, जिससे व्यापार में अमेरिकी डॉलर की मांग कम हो सके।
वैश्विक रुपये के बाज़ार को मज़बूत करना:

  • ऐसा वैश्विक INR फॉरेक्स बाज़ार विकसित करना जिससे अंतर्राष्ट्रीय बैंक 24 घंटे रुपये का लेन-देन कर सकें।
  • भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों (G-secs) को प्रमुख वैश्विक बॉण्ड सूचियों में शामिल करने का समर्थन करना, जिससे दीर्घकालिक निष्क्रिय विदेशी प्रवाह आकर्षित हों।
  • FPI और वैश्विक कस्टोडियंस के लिये KYC, दस्तावेज़ और ऑनबोर्डिंग नियमों को सरल बनाना।
  • भारतीय बैंकों को गैर-निवासियों को रुपये में ऋण देने में सक्षम बनाना ताकि ऑफशोर रुपये का उपयोग बढ़े। वैश्विक स्तर पर रुपये के फंड जुटाने के लिये मसाला बॉण्ड को बढ़ावा दें।

बाहरी क्षेत्र की स्थिरता मज़बूत करना: उतार-चढ़ाव के दौरान तरलता समर्थन सुनिश्चित करने के लिये मुद्रा स्वैप समझौतों का विस्तार करना।
मज़बूत विदेशी मुद्रा भंडार बनाए रखना और अव्यवस्थित उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिये RBI द्वारा सावधानीपूर्वक हस्तक्षेप करना।
केवल अवमूल्यन पर निर्भर रहने के बजाय संरचनात्मक सुधारों के माध्यम से निर्यात प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देना।
रुपये की वैश्विक स्वीकृति को बढ़ाना: UPI अंतर्राष्ट्रीय विस्तार को जारी रखना, जिससे रुपये से जुड़े डिजिटल भुगतान व्यापक रूप से उपलब्ध हों।
रुपये को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के विशेष आहरण अधिकार (SDR) बास्केट में शामिल होने के लिये तैयार करना, जिससे इसकी आरक्षित मुद्रा के रूप में विश्वसनीयता बढ़े।
मज़बूत रुपये के समर्थन हेतु घरेलू सुधार: निर्यात बाज़ारों में विविधता लाकर और उच्च-मूल्य वाले निर्माण को बढ़ावा देकर व्यापार घाटा कम करना।
सोने के आयात को सोना मुद्रीकरण और डिजिटल गोल्ड विकल्प जैसी नीतियों के माध्यम से सीमित करना। स्थिर मुद्रास्फीति और सतर्क राजकोषीय नीति बनाए रखना ताकि स्थिर पूंजी प्रवाह आकर्षित हो सके।

 

 

निष्कर्ष: 

रुपये के मूल्य में गिरावट कमज़ोर निर्यात, उच्च आयात और लगातार पूंजी निर्गम के कारण हुई है। इसे सुदृढ़ करने के लिये निर्यात प्रतिस्पर्द्धा बढ़ाना तथा आयात पर निर्भरता कम करना आवश्यक है। स्थिर मैक्रोइकॉनॉमिक नीतियाँ तथा व्यापक रूप से रुपये-आधारित व्यापार आत्मविश्वास बहाल करने में सहायक होंगे।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q.किसी मुद्रा के अवमूल्यन का प्रभाव यह होता है कि वह आवश्यक रूप से:

 

  1. विदेशी बाज़ारों में घरेलू निर्यात की प्रतिस्पर्द्धात्मकता में सुधार करता है।
  2. घरेलू मुद्रा के विदेशी मूल्य को बढ़ाता है।
  3. व्यापार संतुलन में सुधार करता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 3
(d) केवल 2 और 3
उत्तर: (a)

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q.हाल ही में रुपये के अवमूल्यन के मुख्य कारणों का विश्लेषण करें और इसके भारत पर मैक्रो‑आर्थिक प्रभाव का मूल्यांकन कीजिये।

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