भारत – अफगानिस्तान संबंधों में नया अध्याय : तालिबान के विदेश मंत्री की नई दिल्ली यात्रा

भारत – अफगानिस्तान संबंधों में नया अध्याय : तालिबान के विदेश मंत्री की नई दिल्ली यात्रा

पाठ्यक्रम – मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र – 2 – के ‘ अंतर्राष्ट्रीय संबंध ’ के अंतर्गत ‘ भारत-अफगानिस्तान संबंध एक नए चरण में प्रवेश : तालिबान विदेश मंत्री की नई दिल्ली की पहली यात्रा ’ से संबंधित। 

प्रारंभिक परीक्षा के लिए – तालिबान शासन के तहत भारत-अफगानिस्तान संबंधों के आर्थिक और व्यापारिक आयाम क्या हैं?

मुख्य परीक्षा के लिए – तालिबान सरकार से निपटने में भारत के सामने कौन सी प्रमुख चुनौतियाँ हैं?

 

खबरों में क्यों ? 

 

 

  • हाल ही में अफगानिस्तान के तालिबान विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी की नई दिल्ली यात्रा ने दक्षिण एशिया की जटिल और तेजी से बदलती भू-राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ दिया है। यह यात्रा न केवल भारत-अफगानिस्तान संबंधों के एक नए चरण का प्रतीक है, बल्कि यह अफगानिस्तान में 2021 के सत्ता परिवर्तन के बाद भारत की विदेश नीति के एक व्यावहारिक और विकसित होते दृष्टिकोण को भी रेखांकित करती है। यह घटनाक्रम भारत की क्षेत्रीय हितों की रक्षा करने, मानवीय दायित्वों को निभाने, और कट्टरता तथा आतंकवाद के खतरों को नियंत्रित करने की उसकी अनिवार्यता को दर्शाता है।
  • वर्ष 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी और तालिबान के काबुल पर नियंत्रण के बाद, भारत ने सुरक्षा चिंताओं के कारण अपने दूतावास को बंद कर दिया था। हालांकि, 2022 में भारत ने एक “तकनीकी मिशन” के माध्यम से सीमित कूटनीतिक वापसी की, जिसका प्राथमिक उद्देश्य मानवीय सहायता, चिकित्सा सहायता, और व्यापार को सुगम बनाना था। मुत्ताकी की यात्रा, भारत द्वारा तालिबान सरकार को आधिकारिक मान्यता दिए बिना भी, बातचीत के चैनल को खुला रखने की उसकी नीति का स्पष्ट प्रमाण है। यह एक राजनीतिक-आर्थिक पुल बनाने का प्रयास है, जो क्षेत्रीय स्थिरता और भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों की सेवा कर सके।

 

ऐतिहासिक मित्रता और आधुनिक चुनौतियाँ : 

 

  • भारत और अफगानिस्तान के संबंध प्राचीन काल से ही सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सभ्यतागत जुड़ाव पर आधारित रहे हैं। भारतीय उपमहाद्वीप की सभ्यता में गंधार और काबुल घाटी का विशेष स्थान रहा है। स्वतंत्र भारत ने हमेशा अफगानिस्तान को एक विश्वसनीय साझेदार और मध्य एशिया का द्वार माना है।
  • लेकिन अगस्त 2021 में अमेरिकी सेनाओं की अचानक वापसी और तालिबान की सत्ता में वापसी ने इस संबंध को अस्थिर कर दिया। भारत ने अपने 3 अरब डॉलर से अधिक मूल्य के विकास परियोजनाओं को असुरक्षा के चलते रोक दिया और दूतावास बंद कर दिया।
  • फिर भी भारत ने 2022 में “टेक्निकल मिशन” के रूप में काबुल में सीमित उपस्थिति बहाल की ताकि मानवीय सहायता, स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा और व्यापारिक संवाद जारी रखा जा सके। यही “सॉफ्ट एंगेजमेंट” अब मुत्ताकी की यात्रा के साथ “पॉलिटिकल एंगेजमेंट” में बदलती दिखाई दे रही है।

 

यात्रा का मुख्य उद्देश्य : 

 

  1. द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करना और राजनीतिक संवाद पुनः प्रारंभ करना।
  2. व्यापारिक विनिमय बढ़ाना, विशेषकर अफगान सूखे मेवे, केसर, और खनिज निर्यात के अवसरों को विस्तारित करना।
  3. स्वास्थ्य और मानवीय सहयोग पर चर्चा तथा वीज़ा और कांसुलर सेवाओं को आसान बनाना।
  4. क्षेत्रीय संपर्क (Connectivity) को बढ़ाने हेतु चाबहार जैसे बंदरगाहों के उपयोग पर विचार करना। 

 

यात्रा का महत्व :

 

राजनीतिक और कूटनीतिक आयाम : 

 

  • यह यात्रा भारत और तालिबान के बीच तनाव में कमी और संवाद की पुनः शुरुआत का प्रतीक है।
  • भारत ने अभी तक तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन व्यावहारिक कूटनीति (Pragmatic Diplomacy) अपनाकर अपने रणनीतिक हितों की रक्षा कर रहा है।
  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद समिति द्वारा मुत्ताकी के लिए यात्रा प्रतिबंध अस्थायी रूप से हटाना इस कूटनीतिक पहल को संभव बना सका है।
  • यह तालिबान के लिए क्षेत्रीय वैधता (Regional Legitimacy) हासिल करने का प्रयास भी है। 

आर्थिक और व्यापारिक आयाम : 

 

  • अफगानिस्तान, पाकिस्तान पर निर्भरता घटाने के लिए भारत जैसे नए व्यापारिक भागीदारों की तलाश में है।
  • भारत पहले से ही अफगानिस्तान को गेहूं, दवाइयाँ और COVID-19 टीके जैसी मानवीय सहायता प्रदान कर रहा है।
  • सूखे मेवे, केसर, फलों और खनिजों का व्यापार अफगान अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत बन सकता है।
  • चाबहार बंदरगाह भारत और अफगानिस्तान दोनों के लिए व्यापारिक जीवनरेखा बनता जा रहा है, क्योंकि पाकिस्तान भूमि मार्ग अवरुद्ध रखता है।

 

क्षेत्रीय और सामरिक आयाम : 

 

  • यह यात्रा मॉस्को क्षेत्रीय सम्मेलन के तुरंत बाद हुई जिसमें भारत, पाकिस्तान, ईरान, चीन और मध्य एशियाई देशों ने भाग लिया। वहाँ विदेशी सैन्य ठिकानों (विशेषकर अमेरिकी) का विरोध किया गया।
  • भारत के लिए यह संवाद आतंकवाद, चरमपंथ और मादक पदार्थ तस्करी जैसी चुनौतियों के विरुद्ध सहयोग का मंच है।
  • भारत अपने अफगान परियोजनाओं – जैसे सलमा बांध, काबुल संसद भवन, और जर्नलिस्ट ट्रेनिंग सेंटर – को सुरक्षित रखने की दिशा में भी काम कर रहा है।

 

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में महत्व : 

 

  • वर्तमान में केवल रूस ने तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता दी है, जबकि चीन, ईरान और पाकिस्तान कार्यात्मक संबंध (Functional Ties) बनाए हुए हैं।
  • भारत का दृष्टिकोण “Functional Engagement without Formal Recognition” पर आधारित है — यानी मानवीय और आर्थिक संवाद बिना औपचारिक मान्यता के।
  • मुत्ताकी की यह यात्रा तालिबान की ओर से अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता की दिशा में संतुलित कूटनीतिक प्रयास है। 

 

भारत – अफगानिस्तान संबंधों की मुख्य चुनौतियाँ : 

 

  1. सुरक्षा और आतंकवाद का खतरा : तालिबान के शासन में लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) जैसे भारत-विरोधी संगठनों के पुनर्सक्रिय होने की संभावना भारत की चिंता का विषय है। अफगानिस्तान पुनः आतंकवाद का अड्डा न बन जाए, यह भारत की प्राथमिक चिंता है।
  2. राजनीतिक वैधता का अभाव : तालिबान सरकार को अंतरराष्ट्रीय मान्यता न मिलने के कारण भारत जैसे देशों के लिए दीर्घकालिक समझौते या निवेश संरक्षण कठिन है।
  3. मानवाधिकार और लैंगिक असमानता : महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन पर प्रतिबंध तालिबान शासन की अलोकतांत्रिक छवि को पुष्ट करते हैं, जो भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों से मेल नहीं खाती।
  4. कूटनीतिक संतुलन का दबाव : भारत को तालिबान के साथ संवाद करते हुए अमेरिका और पश्चिमी सहयोगियों के विरोध का सामना न करना पड़े, इसके लिए अत्यंत संतुलित नीति अपनानी होगी।
  5. व्यापार और संपर्क की सीमाएँ : पाकिस्तान की भू-राजनीतिक बाधाएँ और अफगानिस्तान की कमजोर अवसंरचना व्यापार को सीमित करती हैं। चाबहार बंदरगाह इस स्थिति में महत्त्वपूर्ण विकल्प के रूप में उभरता है।
  6. पाकिस्तान का प्रभाव : तालिबान और पाकिस्तान के गहरे संबंध भारत की रणनीतिक क्षमता को सीमित करते हैं। इस वजह से भारत की क्षेत्रीय पहुँच (Regional Outreach) प्रभावित होती है।
  7. भारतीय निवेश की अनिश्चितता : भारत की 3 अरब डॉलर से अधिक की परियोजनाएँ—जैसे सड़कें, बांध, संसद भवन और अस्पताल—राजनीतिक अस्थिरता के कारण जोखिम में हैं। 

 

भारत की नीति और दृष्टिकोण : 

 

  1. सावधानीपूर्वक व्यावहारिक संलग्नता (Pragmatic & Cautious Engagement) : भारत तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता दिए बिना अपनी रणनीतिक और सुरक्षा हितों की रक्षा कर रहा है।
  2. मानवीय सहायता : भारत अब तक 50,000 टन गेहूं, दवाइयाँ और COVID-19 टीके भेज चुका है। इससे भारत की छवि एक सहायता–प्रदाता राष्ट्र (Humanitarian Partner) के रूप में मजबूत हुई है।
  3. स्वास्थ्य और शिक्षा में सहयोग : भारत अफगान छात्रों को ICCR छात्रवृत्तियाँ देता है और अफगान मरीजों के लिए मेडिकल वीज़ा की सुविधा जारी रखे हुए है।
  4. क्षेत्रीय संवादों में सक्रिय भागीदारी : भारत “मॉस्को फॉर्मेट” और “शंघाई सहयोग संगठन (SCO)” जैसे मंचों पर अफगान शांति और स्थिरता की दिशा में योगदान दे रहा है।
  5. जनकेंद्रित दृष्टिकोण (People-centric Focus) : भारत की नीति अफगान जनता के कल्याण पर केंद्रित है, जिससे न केवल सकारात्मक जनधारणा (Positive Perception) बनती है बल्कि दीर्घकालिक मित्रता भी सुदृढ़ होती है। 

 

आगे की राह : 

 

  1. संलग्नता का क्रमिक विस्तार : भारत को मानवीय और आर्थिक सहायता बढ़ाते हुए राजनीतिक दूरी बनाए रखनी चाहिए। धीरे-धीरे “टेक्निकल मिशन” को “डिप्लोमैटिक मिशन” में बदला जा सकता है।
  2. क्षेत्रीय सहयोग को सुदृढ़ करना : ईरान, रूस और मध्य एशियाई देशों के साथ मिलकर क्षेत्रीय स्थिरता और आतंकवाद–रोधी सहयोग को बढ़ावा देना चाहिए।
  3. संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से संवाद : भारत को यूएन–मध्यस्थित कूटनीति के तहत अफगान शासन को उत्तरदायित्व, मानवाधिकार और समावेशिता की दिशा में प्रेरित करना चाहिए।
  4. शर्त आधारित सामान्यीकरण (Conditional Normalization) : तालिबान द्वारा महिलाओं के अधिकारों, शिक्षा, और समावेशी शासन को स्वीकार करने की दिशा में ठोस कदम उठाने पर ही पूर्ण कूटनीतिक संबंध बहाल किए जाएँ।
  5. भारतीय परियोजनाओं की सुरक्षा : भारत को अपनी परियोजनाओं – विशेषकर सलमा बांध और काबुल संसद भवन – की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तालिबान प्रशासन से संस्थागत गारंटी लेनी चाहिए।
  6. जनकेंद्रित योजनाओं पर बल : स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करके भारत लोक-आधारित कूटनीति (Public Diplomacy) को मजबूत कर सकता है।
  7. सुरक्षा जोखिमों की सतर्क निगरानी : भारत को आतंकवादी गतिविधियों, मादक पदार्थ तस्करी और सीमा-पार नेटवर्क्स पर निरंतर निगरानी रखनी चाहिए। 

 

निष्कर्ष : 

 

  • आमिर खान मुत्ताकी की भारत यात्रा दक्षिण एशिया में यथार्थवादी कूटनीति (Pragmatic Diplomacy) की जीत का प्रतीक है। यह इस बात की स्वीकृति है कि भू-राजनीति में, किसी देश की सरकार की विचारधारा के बावजूद, राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए संचार के चैनल खुले रखना महत्वपूर्ण है।
  • यह यात्रा अफगानिस्तान के प्रति भारत के विकसित दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से दर्शाती है—जो मानवीयता के प्रति प्रतिबद्ध, सुरक्षा के प्रति सतर्क, और व्यापारिक कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने के लिए दृढ़ संकल्पित है। यह दक्षिण एशिया में एक नए क्षेत्रीय क्रम की शुरुआत का संकेत है, जहाँ भू-राजनीतिक अनिवार्यताएँ वैचारिक असहमतियों पर भारी पड़ रही हैं। भारत के लिए, यह एक नाजुक संतुलनकारी कार्य है, लेकिन यह एक अपरिहार्य कार्य भी है जो उसके दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता और क्षेत्रीय प्रभाव के लिए महत्वपूर्ण है।
  • तालिबान के लिए यह यात्रा अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता और आर्थिक सहयोग की दिशा में एक अवसर है। यदि अफगान शासन अंतरराष्ट्रीय मानदंडों, महिला अधिकारों और समावेशी शासन की दिशा में ठोस कदम उठाता है, तो भारत–अफगान संबंध भविष्य में फिर से साझा विकास और स्थिरता के स्तंभ बन सकते हैं।

 

स्त्रोत – पी. आई. बी एवं द हिन्दू। 

 

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

 

Q.1. निम्नलिखित देशों पर विचार करें: 

  1. अज़रबैजान
  2. किर्गिस्तान
  3. ताजिकिस्तान
  4. तुर्कमेनिस्तान
  5. उज़्बेकिस्तान

उपरोक्त में से किसकी सीमा अफ़गानिस्तान से लगती है?

A. केवल 1, 2 और 5

B. केवल 1, 2, 3 और 4

C. केवल 3, 4 और 5

D. 1, 2, 3, 4 और 5

उत्तर – C

 

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

 

Q.1. “अफगानिस्तान के तालिबान विदेश मंत्री की भारत यात्रा के महत्व पर चर्चा कीजिए। यह यात्रा भारत की अफगानिस्तान नीति और दक्षिण एशिया में बदलते क्षेत्रीय समीकरणों को किस प्रकार दर्शाती है?” ( शब्द सीमा – 250 अंक – 15 ) 

Dr. Akhilesh Kumar Shrivastava
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