01 Oct भारत का समुद्री पुनर्जागरण : ‘नीली अर्थव्यवस्था’ के माध्यम से वैश्विक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर
पाठ्यक्रम – सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र –3 के ‘ भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास ’ के अंतर्गत – अर्थव्यवस्था एवं अवसंरचना – नौवहन, बंदरगाह और जहाज निर्माण क्षेत्र, भारत का समुद्री पुनर्जागरण : ‘नीली अर्थव्यवस्था’ के माध्यम से वैश्विक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर
प्रारंभिक परीक्षा के लिए – जहाज निर्माण वित्तीय सहायता योजना (SBFAS) क्या है और इसकी प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
मुख्य परीक्षा के लिए – आर्थिक विकास, रोज़गार सृजन और राष्ट्रीय सुरक्षा में भारत के जहाज निर्माण और समुद्री क्षेत्र के महत्व पर चर्चा कीजिए।
ख़बरों में क्यों ?
- हाल ही में, केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा भारत के जहाज निर्माण और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़, पुनर्जीवित और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए जिस ₹69,725 करोड़ के ऐतिहासिक और व्यापक पैकेज को मंजूरी दी गई है, उसने देश के आर्थिक और रणनीतिक परिदृश्य में एक नए अध्याय का सूत्रपात किया है।
- यह पहल न केवल भारत की “ब्लू इकोनॉमी” (नीली अर्थव्यवस्था) को एक अभूतपूर्व गति प्रदान करेगी, बल्कि इसे आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य की प्राप्ति और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक विश्वसनीय और अग्रणी खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने के लिए एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में भी कार्य करेगी।
- यह पैकेज, अपनी व्यापकता और महत्वाकांक्षा में बेजोड़ है, जिसका मुख्य उद्देश्य भारतीय समुद्री क्षेत्र में व्याप्त संरचनात्मक कमियों को दूर करना और उसे विश्व के अग्रणी समुद्री राष्ट्रों के समकक्ष लाना है।

पैकेज की मुख्य विशेषताएं और वित्तीय रूपरेखा :
केंद्र सरकार द्वारा घोषित इस बहुआयामी पैकेज की वित्तीय संरचना को तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित किया गया है, जो जहाज निर्माण उद्योग को वित्तीय समर्थन, समुद्री विकास हेतु पूंजीगत निवेश और घरेलू क्षमता के विस्तार पर केंद्रित हैं:
जहाज निर्माण वित्तीय सहायता योजना (SBFAS) का विस्तार :
- इस योजना को वर्ष 2036 तक विस्तारित किया गया है।
- इसके लिए ₹24,736 करोड़ की एक महत्वपूर्ण कोष राशि आवंटित की गई है।
- उद्देश्य: यह वित्तीय सहायता घरेलू शिपयार्ड्स को वैश्विक बाज़ार में प्रतिस्पर्धा करने के लिए लागत संबंधी अंतर को पाटने (Cost Parity) और अत्याधुनिक जहाज निर्माण के लिए प्रोत्साहन प्रदान करेगी। यह सुनिश्चित करेगा कि भारतीय शिपयार्ड्स को अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर प्राप्त करने में मदद मिले।
समुद्री विकास कोष (MDF) और समुद्री निवेश कोष (MIF) की स्थापना :
- समुद्री विकास कोष (MDF) : इसमें ₹25,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है, जिसका लक्ष्य समग्र समुद्री अवसंरचना के विकास और पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना है।
- समुद्री निवेश कोष (MIF) : MDF का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ₹20,000 करोड़ के इस कोष में निहित है, जो बड़े पैमाने पर अवसंरचनात्मक परियोजनाओं और नवाचार को प्रोत्साहित करने पर केंद्रित है। यह कोष आधुनिक बंदरगाह सुविधाओं, मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी और हरित समुद्री प्रौद्योगिकियों में निजी एवं सार्वजनिक निवेश को आकर्षित करेगा।
जहाज निर्माण विकास योजना (SbDS) : क्षमता विस्तार पर बल :
- इस योजना को ₹19,989 करोड़ की राशि के साथ प्रारंभ किया गया है।
- रणनीतिक लक्ष्य : इसका प्राथमिक उद्देश्य भारत की घरेलू जहाज निर्माण क्षमता को मौजूदा स्थिति से बढ़ाकर 4.5 मिलियन ग्रॉस टन (GT) के एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य तक पहुँचाना है। यह क्षमता विस्तार भारत को वैश्विक जहाज निर्माण मानचित्र पर एक प्रमुख स्थान दिलाएगा।
भारतीय अर्थव्यवस्था में ‘ट्रिपल-ए’ आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव :
इस व्यापक पहल के दूरगामी आर्थिक और सामाजिक लाभों को ‘ट्रिपल-ए’ (रोजगार, निवेश और आत्मनिर्भरता) फ्रेमवर्क के तहत समझा जा सकता है:
- रोजगार सृजन और सामाजिक उत्थान : इस पैकेज का सबसे महत्वपूर्ण और तत्काल प्रभाव रोजगार के मोर्चे पर दिखाई देगा। यह अनुमान लगाया गया है कि इन पहलों के कारण 30 लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित होंगे। यह न केवल शिपयार्ड्स और बंदरगाहों पर सीधे रोजगार प्रदान करेगा, बल्कि लॉजिस्टिक्स, समुद्री प्रशिक्षण, मरम्मत, इंजीनियरिंग और संबंधित सहायक उद्योगों की एक विस्तृत श्रृंखला में भी नौकरियों का विस्तार करेगा, जिससे तटीय समुदायों की अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव आएगा।
- निवेश आकर्षण और आर्थिक संवर्धन : यह पैकेज एक मजबूत नीतिगत संकेत देता है कि भारत समुद्री क्षेत्र में निजी और सार्वजनिक निवेश के लिए एक स्थिर और आकर्षक गंतव्य है। उम्मीद है कि यह पहल लगभग ₹4.5 लाख करोड़ का निवेश आकर्षित करेगी। यह निवेश उन्नत डॉकिंग सुविधाओं, आधुनिक कार्गो हैंडलिंग उपकरणों, स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास और निजी शिपिंग बेड़े के विस्तार में लगेगा, जिससे क्षेत्र की समग्र दक्षता और क्षमता में वृद्धि होगी।
- आपूर्ति श्रृंखला में लचीलापन और आत्मनिर्भरता : घरेलू जहाज निर्माण क्षमता में वृद्धि करके और बंदरगाहों को मजबूत बनाकर, यह पैकेज आपूर्ति श्रृंखला, ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा में लचीलापन (Resilience) सुनिश्चित करेगा। अपनी महत्वपूर्ण नौवहन आवश्यकताओं के लिए विदेशी शिपयार्डों पर निर्भरता कम होगी, जिससे भू-राजनीतिक दबावों से बचाव होगा। यह भारत को वैश्विक समुद्री क्षेत्र में एक अग्रणी स्थान प्राप्त करने में निर्णायक रूप से मदद करेगा।
भारत का समुद्री क्षेत्र : वर्तमान स्थिति और संरचना :

भारतीय समुद्री क्षेत्र अर्थव्यवस्था की एक जीवन रेखा है, जिसके आयामों को निम्नलिखित आँकड़ों और घटकों से समझा जा सकता है:
समुद्री क्षेत्र के महत्वपूर्ण आँकड़े (2025 तक) :
| विशेषता | आँकड़ा (2025 तक) | निहितार्थ |
| व्यापार की मात्रा | 95% व्यापार समुद्री मार्ग से | व्यापार और अर्थव्यवस्था के लिए अति महत्वपूर्ण |
| व्यापार का मूल्य | 70% व्यापार समुद्री मार्ग से | उच्च मूल्य वाले व्यापार का समुद्री निर्भरता |
| बंदरगाहों की संख्या | 12 प्रमुख और 200+ गैर-प्रमुख/मध्यम बंदरगाह | विस्तृत तटीय पहुँच, लेकिन क्षमता का असमान वितरण |
| कार्गो यातायात | 1,500 MTPA (2024–25 में) | विकास की तीव्र गति और अवसंरचना पर दबाव |
| जहाज निर्माण क्षमता लक्ष्य | 4.5 मिलियन ग्रॉस टन (नई योजनाओं के तहत) | वैश्विक हिस्सेदारी बढ़ाने की महत्वाकांक्षा |
| रोजगार (प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष) | 1.6 करोड़ से अधिक | विशाल रोजगार सृजन क्षमता |
भारतीय समुद्री एवं शिपिंग क्षेत्र के प्रमुख घटक :

यह क्षेत्र एक जटिल पारिस्थितिकी तंत्र है, जिसके प्रमुख अंग निम्नलिखित हैं:
- जहाज निर्माण एवं मरम्मत उद्योग : भारत के शिपयार्ड, जिसमें सार्वजनिक और निजी दोनों शामिल हैं, बेड़े के निर्माण और रखरखाव में लगे हुए हैं।
- बंदरगाह (Ports) : देश के आर्थिक प्रवेश द्वार – 12 प्रमुख बंदरगाह (जैसे JNPT, कांडला, विशाखापत्तनम) और 200 से अधिक गैर-प्रमुख/मध्यम बंदरगाह (राज्य सरकारों द्वारा प्रबंधित)।
- शिपिंग कंपनियाँ : सार्वजनिक क्षेत्र की शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (SCI) और निजी बेड़े जो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय जलमार्गों पर कार्गो और यात्रियों का परिवहन करते हैं।
- अंतर्देशीय जल परिवहन (IWT) : गंगा, ब्रह्मपुत्र और अन्य नदियों में परिवहन का एक लागत प्रभावी और पर्यावरण अनुकूल विकल्प।
- लॉजिस्टिक्स एवं समुद्री अवसंरचना : इसमें कोल्ड चेन सुविधाएं, बड़े गोदाम, कंटेनर फ्रेट स्टेशन और मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क शामिल हैं।
- समुद्री प्रशिक्षण एवं शोध : भारतीय समुद्री विश्वविद्यालय (IMU) और अन्य संस्थान जो समुद्री पेशेवरों को प्रशिक्षण देते हैं।
- जहाज पुनर्चक्रण उद्योग : गुजरात का अलंग विश्व के सबसे बड़े जहाज तोड़ने वाले हब में से एक है, जो स्टील की पुनरावृत्ति में महत्वपूर्ण है।
आर्थिक विकास में भारत के बंदरगाहों की सामाजिक-आर्थिक भूमिका :
बंदरगाह केवल कार्गो के हस्तांतरण केंद्र नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र की सामाजिक-आर्थिक वृद्धि के इंजन हैं।
- व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business) : 95% व्यापार इनके माध्यम से होता है। उदाहरण के लिए, जेएनपीटी (Jawaharlal Nehru Port Trust) अकेले भारत के 40% कंटेनरीकृत कार्गो को संभालता है, जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के लिए इसकी केंद्रीय भूमिका को दर्शाता है।
- रोज़गार सृजन : बंदरगाह और संबद्ध समुद्री गतिविधियों से 1.6 करोड़ से अधिक नौकरियाँ जुड़ी हुई हैं, जो तटीय राज्यों के लिए एक प्रमुख आय स्रोत हैं।
- क्षेत्रीय विकास : सागरमाला परियोजना जैसी पहलों के माध्यम से, बंदरगाह तटीय राज्यों और उनके भीतरी इलाकों में आर्थिक विकास के ग्रोथ हब के रूप में कार्य कर रहे हैं।
- निर्यात प्रतिस्पर्धा : कुशल बंदरगाह लॉजिस्टिक्स को बढ़ाकर, भारत अपनी लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने का लक्ष्य रखता है (लक्ष्य 2030 तक GDP का 8%)। यह निर्यात को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाएगा।
- ऊर्जा एवं खाद्य सुरक्षा : देश के 80% कच्चे तेल का आयात बंदरगाहों से होता है। इसी तरह, कृषि अनाज का निर्यात और उर्वरकों का आयात देश की खाद्य सुरक्षा में बंदरगाहों की केंद्रीय भूमिका को स्थापित करता है।
- विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) एवं औद्योगिक विकास : बंदरगाहों पर सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल से बड़े पैमाने पर विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) आकर्षित होता है, जो विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ) और तटीय औद्योगिक गलियारों के विकास को बढ़ावा देता है।
वैश्विक महाशक्ति बनने की राह में प्रमुख चुनौतियाँ :
भारत की समुद्री क्षमता अपार है, लेकिन वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ने के लिए कुछ गंभीर चुनौतियों का समाधान आवश्यक है:
- वैश्विक जहाज निर्माण में कम हिस्सेदारी : भारत का योगदान 1% से भी कम है, जबकि चीन (~40%) और दक्षिण कोरिया (~25%) वैश्विक बाजार पर हावी हैं। यह कम हिस्सेदारी न केवल विदेशी मुद्रा का नुकसान है, बल्कि रणनीतिक निर्भरता को भी दर्शाता है।
- उच्च लॉजिस्टिक्स लागत : भारत की लॉजिस्टिक्स लागत GDP का 13-14% है, जो वैश्विक औसत (8-9%) से काफी अधिक है। यह उच्च लागत भारतीय निर्यात को वैश्विक बाजार में महंगा बनाती है।
- अवसंरचना की कमी और अप्रचलन : भारत में सीमित गहरे जल वाले बंदरगाह हैं। बहुत कम बंदरगाह ही 18,000 TEUs से अधिक क्षमता वाले अल्ट्रा-लार्ज कंटेनर जहाजों (ULCVs) को संभाल सकते हैं, जिससे जहाजों को पड़ोसी देशों के बंदरगाहों पर जाना पड़ता है।
- प्रौद्योगिकी घाटा : घरेलू जहाज निर्माण अभी भी कई महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों जैसे उन्नत जहाज डिज़ाइन, इंजन और विशेष उपकरणों के लिए विदेशी निर्भरता रखता है, जिससे उत्पादन की लागत और समय बढ़ता है।
- पर्यावरण एवं सुरक्षा के मुद्दे : गुजरात का अलंग शिपब्रेकिंग यार्ड जैसे क्षेत्र अभी भी प्रदूषण नियंत्रण और श्रमिक सुरक्षा मानकों के पालन में आलोचना का सामना करते हैं, जिसके लिए सतत और हरित प्रक्रियाओं की आवश्यकता है।
समाधान / आगे की राह :
केंद्र सरकार इन चुनौतियों का सामना करने के लिए एक बहुआयामी और समन्वित नीतिगत दृष्टिकोण अपना रही है, जिसका विवरण निम्नलिखित प्रमुख पहलों में देखा जा सकता है:
| योजना/अधिनियम/समिति | फोकस क्षेत्र | स्थिति/प्रभाव |
| सागरमाला कार्यक्रम | बंदरगाह-आधारित औद्योगिक विकास और तटीय क्षेत्र का संवर्धन | 802 परियोजनाएँ लक्षित; 233 पूर्ण, क्षेत्रीय विकास पर बल। |
| भारतमाला एवं गति शक्ति | मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स और अवसंरचना संपर्क | बंदरगाह क्लस्टरों के साथ सड़क, रेल और जलमार्गों का एकीकृत विकास। |
| SBFAS (2036 तक) | जहाज निर्माण हेतु वित्तीय प्रोत्साहन और लागत अंतर को पाटना | ₹24,736 करोड़ का कोष; घरेलू शिपयार्डों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना। |
| प्रमुख बंदरगाह प्राधिकरण अधिनियम, 2021 | बंदरगाहों को स्वायत्तता, निर्णय लेने की गति बढ़ाना | PPP मॉडल को और अधिक प्रोत्साहन देना; कॉर्पोरेट प्रशासन को मजबूत करना। |
| बंदरगाह अधिनियम, 2025 | 1908 के पुराने अधिनियम का प्रतिस्थापन; आधुनिकीकरण | शासन, सुरक्षा और डिजिटलीकरण में सुधार लाना; नियमों का सरलीकरण। |
| राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति, 2022 | लॉजिस्टिक्स लागत को वैश्विक औसत पर लाना | क्रियान्वयन जारी; डेटा-संचालित निर्णय और प्रक्रिया दक्षता में वृद्धि। |
| NMPT समिति | शिपबिल्डिंग एवं शिपिंग हेतु दीर्घकालिक रणनीति का खाका | आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्यों के साथ समुद्री क्षेत्र को संरेखित करना। |
निष्कर्ष :
- केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा ₹69,725 करोड़ के इस व्यापक पैकेज की मंजूरी भारत के समुद्री पुनर्जागरण की औपचारिक घोषणा है। यह पहल स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि भारत का जहाज निर्माण एवं समुद्री क्षेत्र अब केवल एक आर्थिक इंजन मात्र नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, व्यापारिक स्थिरता और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य का एक अत्यधिक रणनीतिक स्तंभ है।
- इस पैकेज के कार्यान्वयन से भारत बंदरगाह-आधारित औद्योगिकीकरण की ओर अग्रसर होगा, जिससे शिपयार्ड क्षमता का न केवल विस्तार होगा बल्कि वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता का एक नया मानक भी स्थापित होगा। यह एक ऐसा संगम होगा जो भारत को ‘मेक इन इंडिया’ के लक्ष्यों को समुद्री क्षेत्र में साकार करने की शक्ति देगा।
- इतिहास साक्षी है कि जिस प्रकार औद्योगिक क्रांति के दौर में रेलवे ने भारत की मुख्य भूमि को एक साथ जोड़कर देश की आर्थिक रीढ़ का निर्माण किया था, उसी प्रकार 21वीं सदी की वृद्धि की कहानी का आधार हमारी समुद्री शक्ति और ब्लू इकोनॉमी होगी।
- यह निवेश भारत को हिंद महासागर क्षेत्र के एक अपरिहार्य शक्ति केंद्र के रूप में स्थापित करेगा और वैश्विक समुद्री व्यापार के भविष्य को आकार देने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।
- यह ₹69,725 करोड़ का निवेश भारत को एक ‘ महान समुद्री राष्ट्र ( ग्रेट मैरीटाइम नेशन ) ’ के रूप में पुनर्स्थापित करने की दिशा में एक साहसिक कदम है।
स्त्रोत – पी. आई. बी एवं द हिन्दू।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.1. बंदरगाह अधिनियम, 2025 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यह भारतीय बंदरगाह अधिनियम, 1908 का स्थान लेता है।
- यह बंदरगाहों में डिजिटलीकरण और व्यापार सुगमता के लिए ढाँचा प्रदान करता है।
- यह केवल संघ सूची के अंतर्गत आने वाले प्रमुख बंदरगाहों पर लागू होता है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर – (a)
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.1. भारत के समुद्री एवं जहाज निर्माण क्षेत्र को ‘भारी अभियांत्रिकी / इंजीनियरिंग की जननी’ तथा सामरिक सुरक्षा के प्रमुख स्तंभ के रूप में क्यों माना जाता है? भारत की आर्थिक प्रगति और राष्ट्रीय सुरक्षा में इसकी भूमिका का विश्लेषण कीजिए। इसके साथ – ही – साथ इस क्षेत्र के पुनर्जीवन हेतु सरकार द्वारा हाल ही में उठाए गए कदमों की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए।( शब्द सीमा – 250 अंक – 15 )

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