18 Jul भारत का स्वच्छ ऊर्जा विरोधाभास : क्षमता और कुल उत्पादन के बीच का अंतर
पाठ्यक्रम – सामान्य अध्ययन – 3 – पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी – भारत का स्वच्छ ऊर्जा विरोधाभास : क्षमता और कुल उत्पादन के बीच का अंतर
प्रारंभिक परीक्षा के लिए :
भारत में सौर और पवन ऊर्जा के अधिक उपयोग में क्या समस्याएँ हैं?
मुख्य परीक्षा के लिए :
भारत में नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता और वास्तविक बिजली उत्पादन के बीच अंतर क्यों है?
खबरों में क्यों?

- भारत वर्तमान में ऊर्जा क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिसका उद्देश्य एक अधिक सतत एवं निम्न-कार्बन उत्सर्जन पर आधारित भविष्य का निर्माण करना है। इस प्रयास के तहत, देश ने कुल स्थापित विद्युत क्षमता का आधा हिस्सा गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों — जैसे सौर, पवन, जल एवं परमाणु ऊर्जा से प्राप्त कर लेने में सफलता प्राप्त की है।
- भारत की यह उपलब्धि 2030 के लिए निर्धारित राष्ट्रीय स्तर पर तय किए गए योगदान (NDC) लक्ष्यों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसे भारत ने पाँच वर्ष पूर्व ही प्राप्त कर लिया है।
- इन स्वच्छ स्रोतों से उत्पन्न वास्तविक बिजली उत्पादन अभी भी कुल उत्पादन का 30% से भी कम है, जो चिंता का विषय यह है। यह स्थिति इस बात को दर्शाती है कि स्थापित क्षमता के पूर्ण उपयोग में अभी भी चुनौतियाँ बनी हुई हैं और उत्पादन क्षमता तथा वास्तविक ऊर्जा उपयोग के बीच एक स्पष्ट अंतर मौजूद है।
भारत की नवीकरणीय ऊर्जा यात्रा : प्रगति, उपलब्धियां और चुनौतियाँ
- भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में नीतिगत समर्थन, तकनीकी नवाचार और निजी क्षेत्र की भागीदारी के सहारे उल्लेखनीय प्रगति की है। यह बदलाव न केवल ऊर्जा क्षेत्र की दिशा को परिवर्तित कर रहा है, बल्कि भारत को वैश्विक मंच पर अग्रणी हरित ऊर्जा राष्ट्रों की पंक्ति में भी स्थापित कर रहा है।
तेज गति से बढ़ती हरित ऊर्जा क्षमता :
- मार्च 2025 तक भारत की कुल स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 220.10 गीगावाट तक पहुँच चुकी है, जो पिछले वित्त वर्ष (2023-24) में 198.75 गीगावाट थी। केवल वित्त वर्ष 2024-25 में ही रिकॉर्ड 29.52 मेगावाट नई हरित क्षमता जोड़ी गई, जो अब तक की सर्वाधिक वार्षिक वृद्धि है।
वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति :
- कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में: विश्व में 4वां स्थान
- पवन ऊर्जा के क्षेत्र में: 4वां स्थान
- सौर ऊर्जा उत्पादन में (REN21 की रिपोर्ट के अनुसार): 5वां स्थान
विभिन्न स्रोतों में प्रगति (2024-25) :
| स्रोत | मुख्य विवरण |
| सौर ऊर्जा | – 23.83 गीगावाट की नई वृद्धि
– कुल स्थापित क्षमता: 105.65 गीगावाट – आरई पोर्टफोलियो में ~50% हिस्सेदारी |
| पवन ऊर्जा | – 4.15 गीगावाट की वृद्धि
– कुल क्षमता: 50.04 गीगावाट |
| जैव ऊर्जा | – कुल क्षमता: 11.58 गीगावाट
– इसमें 0.53 गीगावाट अपशिष्ट-से-ऊर्जा और ऑफ-ग्रिड शामिल |
| लघु जल विद्युत (SHP) | – कुल क्षमता: 5.10 गीगावाट
– 0.44 गीगावाट निर्माणाधीन |
परियोजनाओं की स्थिति और नवाचार :
- निर्माणाधीन परियोजनाएं: 169.40 गीगावाट
- निविदा जारी परियोजनाएं: 65.06 गीगावाट
- नई अवधारणाएं :
- हाइब्रिड मॉडल (सौर + पवन)
- चौबीसों घंटे बिजली आपूर्ति (RTC)
- पीकिंग पावर संयोजन
- थर्मल और नवीकरणीय ऊर्जा का एकीकृत बंडलिंग
नवीकरणीय ऊर्जा विकास की प्रमुख बाधाएँ :
| चुनौती | स्पष्टीकरण |
| 1. कम क्षमता उपयोग कारक (CUF) | सौर (~20%) और पवन (~25–30%) ऊर्जा की परिवर्तनशील प्रकृति इन्हें कोयला (~60%) और परमाणु (~80%) की तुलना में कम विश्वसनीय बनाती है। |
| 2. कोयले पर निर्भरता | कोयला अभी भी 75% से अधिक बिजली उत्पादन करता है, जिससे यह नवीकरणीय ऊर्जा के लिए एक बाधा बना हुआ है। |
| 3. ऊर्जा भंडारण और ग्रिड ढाँचे की कमी | बैटरी भंडारण प्रणालियाँ और पारेषण अवसंरचना सीमित हैं, जिससे हरित ऊर्जा का उपयोग बाधित होता है। |
| 4. फ्लैट टैरिफ व्यवस्था | समय आधारित मूल्य निर्धारण की कमी सौर ऊर्जा के अधिकतम उपयोग में बाधा बनती है। |
| 5. भूमि अधिग्रहण एवं अनुमोदन में विलंब | परियोजनाओं के लिए भूमि एकत्र करना और आवश्यक स्वीकृतियाँ प्राप्त करना जटिल और समयसाध्य है। |
| 6. वित्तीय चुनौतियाँ | उच्च पूंजी लागत, पीपीए में विलंब और नीति अस्थिरता निजी निवेश को प्रभावित करती है। |
| 7. डिस्कॉम के साथ समन्वय की कठिनाई | वितरण कंपनियाँ आर्थिक दबाव में हैं और वे अनिश्चित हरित ऊर्जा को अपनाने में हिचकिचाती हैं। |
भारत में नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना क्यों आवश्यक है ?
- भारत जैसे विशाल और ऊर्जा-गहन देश के लिए नवीकरणीय ऊर्जा का सशक्त उपयोग केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि दीर्घकालिक स्थिरता और आत्मनिर्भरता का मार्ग है। बदलते वैश्विक जलवायु परिदृश्य और घरेलू ऊर्जा मांग को देखते हुए यह परिवर्तन अत्यंत आवश्यक बन जाता है।
नवीकरणीय ऊर्जा के प्रसार की आवश्यकता क्यों है?
- ऊर्जा आत्मनिर्भरता और सुरक्षा : वर्ष 2040 तक ऊर्जा मांग दोगुनी हो सकती है। यदि नवीकरणीय स्रोतों को पर्याप्त रूप से नहीं अपनाया गया, तो भारत को आयातित कोयला और गैस पर अधिक निर्भर रहना पड़ेगा, जिससे वैश्विक मूल्य अस्थिरता और आपूर्ति जोखिम की चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं।
- जलवायु प्रतिबद्धताओं की पूर्ति : भारत ने भले ही कुल स्थापित क्षमता का 50% गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल कर लिया है, परंतु वास्तविक उत्पादन अभी भी 28% के आसपास है। यह पेरिस समझौते के तहत उत्सर्जन में कमी की दिशा में भारत की प्रतिबद्धता को कमजोर कर सकता है।
- वायु प्रदूषण में कमी : कोयला आधारित संयंत्र प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं। जबकि दुनिया के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से 13 भारत में हैं, ऐसे में नवीकरणीय ऊर्जा का प्रसार आवश्यक है ताकि शहरी स्वास्थ्य और वायु गुणवत्ता में सुधार हो सके।
- आर्थिक लाभ और दक्षता : कम क्षमता उपयोग दर (CUF) का अर्थ है कि निवेशित पूंजी से अपेक्षित उत्पादन नहीं हो पा रहा। इससे डेवलपर के लाभ, डिस्कॉम की स्थिरता और उपभोक्ताओं की दरें सभी प्रभावित होती हैं।
- कठिन क्षेत्रों का डीकार्बोनाइजेशन : हरित हाइड्रोजन जैसे ईंधनों के माध्यम से स्टील, उर्वरक और परिवहन जैसे क्षेत्रों को कार्बन मुक्त करना तभी संभव है जब पर्याप्त नवीकरणीय ऊर्जा उपलब्ध हो।
- जल संरक्षण : तापीय विद्युत संयंत्रों की तुलना में नवीकरणीय ऊर्जा तकनीकों में जल की खपत न्यूनतम होती है, जो विशेषकर जल संकट वाले क्षेत्रों के लिए फायदेमंद है।
- रोजगार और ग्रामीण सशक्तिकरण : पीएम-कुसुम जैसी योजनाएँ किसानों को ऊर्जा उत्पादक बना रही हैं। इससे स्थानीय रोजगार सृजन होता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्वच्छ ऊर्जा से जोड़ा जा रहा है।
- ग्रिड सुधार और लचीलापन : नवीकरणीय ऊर्जा के समुचित उपयोग से स्मार्ट ग्रिड, भंडारण, और लचीलापन को बढ़ावा मिलता है, जिससे आपूर्ति अधिक विश्वसनीय और हानि कम होती है।
नवीकरणीय ऊर्जा से संबंधित प्रमुख सरकारी पहलें :
| उपाय | लक्ष्य |
| हरित ऊर्जा गलियारा (GEC) | दूरदराज क्षेत्रों से मांग केंद्रों तक पारेषण व्यवस्था को मज़बूत करना |
| पीएम-कुसुम योजना | किसानों के लिए सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना और ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा पहुंच बढ़ाना |
| राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन | हरित हाइड्रोजन उत्पादन को बढ़ावा देकर उद्योगों को डीकार्बोनाइज करना |
| PLI योजनाएं | घरेलू सौर और बैटरी निर्माण को समर्थन देकर आत्मनिर्भरता बढ़ाना |
| नवीकरणीय हाइब्रिड नीति | सह-स्थित सौर और पवन संयंत्रों के माध्यम से ऊर्जा की उपलब्धता में सुधार |
| समय-आधारित टैरिफ सुधार | मांग के अनुसार मूल्य निर्धारण को प्रोत्साहित करना |
| बैटरी स्टोरेज प्रोत्साहन | भंडारण परियोजनाओं को समर्थन देकर ग्रिड स्थिरता सुनिश्चित करना |
| ग्रीन ओपन एक्सेस नियम | उद्योगों को सीधे हरित ऊर्जा खरीदने की अनुमति देना |
समाधान / आगे की राह :
- स्मार्ट ग्रिड में निवेश करने की आवश्यकता : ऊर्जा मांग को सौर-समृद्ध समय की ओर मोड़ने के लिए स्मार्ट ग्रिड और वास्तविक समय लोड प्रबंधन तंत्र को अपनाएं।
- भंडारण समाधान का विस्तार करने की जरूरत : PLI और VGF जैसे प्रोत्साहनों से बैटरी स्टोरेज व पंप-हाइड्रो परियोजनाओं का स्केल-अप करें।
- विकेन्द्रीकृत ऊर्जा विकल्प को अपनाने की जरूरत : ग्रामीण क्षेत्रों में सौर छतें, मिनी-ग्रिड और सौर पंप जैसी स्थानीय समाधान अपनाकर केंद्रीकृत ग्रिड पर बोझ कम करें।
- बिजली दरों में सुधार की जरूरत : पीक और ऑफ-पीक दरों को अलग करके टैरिफ प्रणाली को अधिक व्यावहारिक बनाएं। हरित ऊर्जा एक्सचेंजों को सुदृढ़ करें।
- भूमि और पारेषण अवसंरचना सुधार की आवश्यकता : अनुमोदन प्रक्रियाओं में पारदर्शिता लाने हेतु केंद्रीकृत डिजिटल पोर्टल विकसित करें और ट्रांसमिशन योजना को RE लक्ष्यों के अनुरूप बनाएं।
- नीतिगत और वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने की आवश्यकता : निजी निवेश आकर्षित करने के लिए दीर्घकालिक, पारदर्शी बिजली खरीद अनुबंध (PPA) की गारंटी सुनिश्चित करें।
निष्कर्ष :
- भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है, भारत के द्वारा नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में विकास की गति ने वैश्विक मानकों को पीछे छोड़ा है और निर्धारित राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों को समय से पहले छू लिया है। फिर भी, स्थापित क्षमता का होना ही पर्याप्त नहीं है; असली उपलब्धि तब होगी जब इसे सतत, विश्वसनीय और चौबीसों घंटे ऊर्जा आपूर्ति में रूपांतरित किया जा सके।
- भारत को अब नवीकरणीय ऊर्जा के निर्माण से आगे बढ़कर इसके प्रभावी उपयोग और वितरण पर ध्यान केंद्रित करना होगा। इसके लिए स्मार्ट ग्रिड, ऊर्जा भंडारण प्रणालियाँ, बाजार आधारित सुधार, और विकेन्द्रीकृत समाधान जैसी रणनीतियाँ निर्णायक होंगी।
- वर्ष 2030 और उसके आगे के दशकों में, यदि भारत इन संरचनात्मक व नीतिगत चुनौतियों का समाधान एक समन्वित दृष्टिकोण से करता है, तो वह न केवल अपनी ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व को संतुलित कर पाएगा, बल्कि वैश्विक मंच पर हरित ऊर्जा नेतृत्व की एक मज़बूत पहचान भी स्थापित कर सकेगा।
स्त्रोत – पी. आई. बी एवं द हिन्दू।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.1. भारत में नवीकरणीय ऊर्जा विकास के संबंध में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत ने 2030 की समय-सीमा से पहले ही कुल स्थापित बिजली क्षमता का 50% गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य हासिल कर लिया है।
2. भारत की कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में सौर ऊर्जा का योगदान आधे से अधिक है।
3. वर्तमान में सभी भारतीय राज्यों में नवीकरणीय ऊर्जा खपत के लिए टाइम-ऑफ-डे (टीओडी) टैरिफ लागू है।
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2, और 3
उत्तर – (a)
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.1. भारत ने अपनी कुल स्थापित विद्युत क्षमता का 50% गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से प्राप्त कर लिया है, फिर भी विद्युत उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा का वास्तविक योगदान 30% से कम क्यों है? चर्चा कीजिए कि इस असंतुलन के प्रमुख कारण क्या हैं और देश में स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ाने के लिए किन उपायों को अपनाया जा सकता है? ( शब्द सीमा – 250 अंक – 15 )
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