01 Dec भारत की कॉफ़ी: सतत् विकास और प्रीमियम गुणवत्ता का वैश्विक मॉडल
भारत की कॉफ़ी: सतत् विकास और प्रीमियम गुणवत्ता का वैश्विक मॉडल
जीएस पेपर 3 – भारतीय अर्थव्यवस्था और कृषि
चर्चा में क्यों?
भारत आज विश्व का सातवाँ सबसे बड़ा कॉफ़ी उत्पादक देश है, जो वैश्विक उत्पादन में लगभग 3.5% का योगदान देता है। कॉफ़ी सेक्टर भारत में अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, भूगोल, GI टैग, FTA (मुक्त व्यापार समझौता) तथा समावेशी विकास के अनेक आयामों को एक साथ जोड़ता है, विशेष रूप से सतत् कृषि, जैव-विविधता संरक्षण, छोटे किसानों की समृद्धि और आदिवासी सशक्तिकरण पर ज़ोर देता है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में कॉफ़ी निर्यात ने 1.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर का नया कीर्तिमान स्थापित किया है।
ऐतिहासिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि :
भारतीय कॉफ़ी की नींव 17वीं शताब्दी में पड़ी, जब सूफ़ी संत बाबा बुदन ने यमन के मोचा बंदरगाह से लाए गए 7 कॉफ़ी बीज चिकमगलूर (कर्नाटक) की बाबा बुदन गिरी पहाड़ियों में रोपे थे। 18वीं सदी में ब्रिटिशों ने वाणिज्यिक बागानों की स्थापना की, जिसके बाद 1942 में Coffee Act VII के तहत कॉफ़ी बोर्ड ऑफ़ इंडिया की स्थापना की गई, जिसने इस क्षेत्र को संगठित समर्थन दिया।
कॉफ़ी की खेती भारत में कुल 4.91 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल पर फैली हुई है और यह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से 20 लाख से अधिक लोगों को रोज़गार प्रदान करती है। यह क्षेत्र मुख्य रूप से छोटे किसानों पर निर्भर है, जहाँ 99% किसान छोटे हैं और कुल उत्पादन का लगभग 70% इन्हीं किसानों द्वारा किया जाता है।

मुख्य उत्पादक राज्य: कर्नाटक (71%), केरल, और तमिलनाडु मिलकर लगभग 96% उत्पादन करते हैं।
गैर-पारंपरिक क्षेत्र: आंध्र प्रदेश, ओडिशा और सभी सात उत्तर-पूर्वी राज्यों में भी कॉफ़ी उगाई जाती है, जहाँ यह आदिवासी समुदायों के बीच तीव्र सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन ला रही है।
उत्पादन लक्ष्य: 2025-26 के लिए अनुमानित उत्पादन लगभग 3.6 लाख टन है।
भारतीय कॉफ़ी की अनूठी विशेषताएँ: शेड-ग्रोन मॉडल
भारतीय कॉफ़ी को उसकी उच्च गुणवत्ता और विशिष्टता उसके शेड-ग्रोन (छायादार) सिस्टम से मिलती है। यह खेती पश्चिमी घाट में होती है, जिसे विश्व के 36 बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट में से एक माना जाता है।
भारत में कॉफी इंडस्ट्री मुख्य रूप से कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु जैसे कॉफी उगाने वाले बड़े राज्यों में है, जो मिलकर देश के कुल कॉफी उत्पादन का लगभग 96 प्रतिशत हिस्सा हैं। इनमें कर्नाटक 2,80,275 मीट्रिक टन (2025–26 के लिए पोस्ट ब्लॉसम एस्टिमेट) के प्रोडक्शन के साथ सबसे आगे है, इसके बाद केरल और तमिलनाडु का नंबर आता है।
भारत में कॉफी उगाने की जगह 13 अलग-अलग एग्रो-क्लाइमैटिक ज़ोन में बंटी हुई है, जिनमें से हर एक की वैश्विक बाजार में अपनी कॉफी के लिए एक खास पहचान है। इन ज़ोन को तीन बड़े ग्रुप में बांटा गया है:
a) पारंपरिक इलाके जिनमें कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु शामिल हैं;
b) गैर-पारंपरिक इलाके- आंध्र प्रदेश और ओडिशा; और
c) उत्तर पूर्वी इलाके, जिनमें असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा शामिल हैं।
कॉफी आंध्र प्रदेश, ओडिशा और उत्तर-पूर्वी राज्यों के आदिवासी इलाकों में एक ज़रूरी सोशियो-इकोनॉमिक भूमिका निभाती है, जो ग्रामीण विकास और इकोलॉजिकल बैलेंस को बढ़ावा देते हुए स्थायी तौर पर रोजी-रोटी देती है। पहचाने गए कॉफी इलाकों में अनामलाई (तमिलनाडु), अराकू वैली (आंध्र प्रदेश), बाबाबुदनगिरी (कर्नाटक), चिक्कमगलुरु (कर्नाटक), कूर्ग (कर्नाटक), नीलगिरी (तमिलनाडु), शेवरॉय (तमिलनाडु), त्रावणकोर (केरल) और वायनाड (केरल) शामिल हैं।

इस मॉडल की प्रमुख विशेषताएँ:
दो-स्तरीय छायादारी प्रणाली : 50 से अधिक प्रजातियों के सदाबहार वृक्षों की छाया प्रदान की जाती है, जो जैव-विविधता संरक्षण और मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करती है।
अंतर-फसली खेती : कॉफ़ी बागानों में काली मिर्च, इलायची और वनीला जैसे मसालों की अंतर-फसली खेती भी की जाती है, जिससे उत्पादन पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ बनता है।
किस्मों की श्रेष्ठता : अरेबिका कॉफ़ी ऊँचाई वाले ठंडे क्षेत्रों में, जबकि रोबस्टा निचले गर्म-नम क्षेत्रों में उगाई जाती है। स्रोतों के अनुसार, विश्व की सर्वश्रेष्ठ रोबस्टा भारत में ही उगती है।
GI टैग और स्पेशलिटी कॉफ़ी की वैश्विक पहचान
भारत विश्व का 5वाँ सबसे बड़ा कॉफ़ी निर्यातक है, जो अपने उत्पादन का 70% से अधिक निर्यात करता है। भारत की सात कॉफ़ी किस्मों को भौगोलिक संकेत (GI) टैग प्राप्त है, जो वैश्विक बाज़ार में उनकी प्रीमियम पहचान को और मज़बूत करता है:
1. कूर्ग अरेबिका (कर्नाटक)
2. चिकमगलूर अरेबिका (कर्नाटक)
3. बाबाबुदनगिरी अरेबिका (कर्नाटक)
4. वायनाड रोबस्टा (केरल)
5. अराकू वैली अरेबिका (आंध्र प्रदेश)
6. मॉनसून्ड मालाबार रोबस्टा (कर्नाटक-केरल)
7. कोरापुट कॉफ़ी (ओडिशा)
भारत अपनी स्पेशलिटी कॉफ़ी के लिए भी प्रसिद्ध है, जिनमें शामिल हैं:
मॉनसून्ड मालाबार AA : कम एसिडिटी और मखमली स्वाद के लिए जानी जाती है।
मैसूर नगेट्स एक्स्ट्रा बोल्ड : बड़े बीन्स और उत्कृष्ट सुगंध के लिए प्रसिद्ध है।
रोबस्टा कापी रॉयल : बोल्ड फ्लेवर और अच्छा क्रेमा प्रदान करती है। कोरापुट कॉफ़ी को हाल ही में ‘नो योर कॉफ़ी’ (KYK) 2024 इवेंट में दो फाइन कप अवार्ड मिले हैं।
कॉफ़ी बोर्ड ऑफ़ इंडिया और नीतिगत सुधार
1942 के कॉफ़ी अधिनियम के तहत गठित कॉफ़ी बोर्ड ऑफ़ इंडिया, मूल्य श्रृंखला में अनुसंधान और विकास (R&D) के लिए सेंट्रल कॉफ़ी रिसर्च इंस्टीट्यूट (CCRI) और पाँच क्षेत्रीय स्टेशनों के माध्यम से काम करता है। यह ICDP (Integrated Coffee Development Programme) के तहत ड्राइंग यार्ड और पल्पर यूनिट जैसी बुनियादी ढाँचा सुविधाओं का विकास करता है, साथ ही ‘फ्लेवर ऑफ़ इंडिया – फाइन कप अवार्ड’ तथा ‘नो योर कॉफ़ी’ (KYK) कार्यक्रम जैसे घरेलू प्रचार चलाता है।
हाल के नीतिगत सुधारों ने भारतीय कॉफ़ी को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया है:
GST में कमी (2025) : इंस्टेंट कॉफ़ी और कॉफ़ी एक्सट्रैक्ट पर वस्तु एवं सेवा कर (GST) को 18% से घटाकर 5% कर दिया गया है। इससे खुदरा कीमतें कम होंगी, घरेलू खपत बढ़ेगी और छोटे प्रोसेसरों को लाभ होगा।
भारत-UK CETA (2025): इस व्यापक आर्थिक व्यापार समझौते के तहत, भारतीय रोस्टेड और इंस्टेंट कॉफ़ी को UK के प्रीमियम बाज़ार में ड्यूटी-फ्री पहुँच मिलेगी।
भारत-EFTA TEPA (1 अक्टूबर 2025 से लागू) : यह समझौता स्विट्जरलैंड, नॉर्वे और आइसलैंड में सभी भारतीय कॉफ़ी पर 0% आयात शुल्क की सुविधा प्रदान करता है, जिससे प्रीमियम शेड-ग्रोन कॉफ़ी के लिए विशाल अवसर खुलेंगे।
आदिवासी सशक्तिकरण का कोरापुट मॉडल :
ओडिशा की कोरापुट कॉफ़ी पहल समावेशी विकास का एक उत्कृष्ट मॉडल है। TDCCOL (Tribal Development Co-operative Corporation of Odisha Ltd.) (1967 में स्थापित) किसानों से डोर-स्टेप खरीद सुनिश्चित करता है और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के माध्यम से उचित मूल्य का भुगतान करता है।2019 में “कोरापुट कॉफ़ी” ब्रांड लॉन्च किया गया।
इस ब्रांड के 8 कैफ़े भुवनेश्वर, पुरी और दिल्ली जैसे शहरों में चल रहे हैं। इस मॉडल से ग्रामीण आय में वृद्धि हुई है, बिचौलियों पर निर्भरता घटी है और श्रमिकों के प्रवास में कमी आई है।
भविष्य का विज़न और चुनौतियाँ
भारतीय कॉफ़ी बाज़ार 2028 तक 8.9% CAGR (चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर) से बढ़ने का अनुमान है, जबकि ‘आउट-ऑफ-होम’ (कैफ़े चेन) सेगमेंट में यह वृद्धि 15–20% CAGR तक होने की संभावना है। कॉफ़ी बोर्ड ने 2047 तक 9 लाख टन उत्पादन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है, जो वर्तमान उत्पादन का लगभग ढाई गुना है।
इस क्षेत्र को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है:
जलवायु परिवर्तन : अनियमित मानसून और तापमान वृद्धि।
कीट-रोग : जैसे व्हाइट स्टेम बोरर और लीफ रस्ट।
श्रमिकों की कमी और माइग्रेशन।
वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव।
स्पेशलिटी कॉफ़ी की घरेलू जागरूकता अभी कम है।
निष्कर्ष :
सात बीजों से शुरू हुई भारत की कॉफ़ी यात्रा आज 4.91 लाख हेक्टेयर क्षेत्र, 1.8 बिलियन डॉलर निर्यात और सात GI टैग प्राप्त वैश्विक पहचान तक पहुँच चुकी है। भारतीय कॉफ़ी मॉडल, जो पर्यावरण-अनुकूल शेड-ग्रोन खेती और आदिवासी-आधारित विकास पर केंद्रित है, यह सिद्ध करता है कि आर्थिक विकास, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समावेश एक साथ संभव हैं। GST कटौती, नए FTA, और 2047 के विशाल उत्पादन लक्ष्य के साथ, भारत वैश्विक बाज़ार में गुणवत्ता और सतत् विकास का एक अग्रणी ब्रांड बनने की राह पर है।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q. भारत के कॉफ़ी क्षेत्र के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1.भारत में उगाई जाने वाली कॉफ़ी मुख्यतः शेड-ग्रोवन (छाया में उगाई गई) होती है, जो जैव विविधता को संरक्षित करती है।
2.भारत विश्व का सातवाँ सबसे बड़ा कॉफी उत्पादक है और अपने कुल उत्पादन का लगभग 70% निर्यात करता है।
3.”मॉनसून्ड मालाबार” और “मैसूर नगेट्स एक्स्ट्रा बोल्ड” भारत की स्पेशलिटी कॉफी किस्में हैं, जिनको GI टैग प्राप्त है।
4. भारत-EFTA TEPA समझौते के तहत स्विट्ज़रलैंड और नॉर्वे भारत की सभी कॉफ़ी आयात पर शून्य शुल्क प्रदान करते हैं।
सही कथन चुनिए:
(a) केवल 1, 2 और 4
(b) केवल 1 और 3
(c) केवल 1, 2 और 3
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (a) केवल 1, 2 और 4
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q. “भारत की कॉफी कहानी खेत से लेकर वैश्विक प्रसिद्धि तक—एक सतत विकास मॉडल”। भारत के कॉफी सेक्टर की वृद्धि, क्षेत्रीय विशेषताएँ, निर्यात क्षमता और नीतिगत सुधारों की भूमिका का विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द)
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